कबाड़ी जिंदा होता तो और खुश होते

आज रविवार है। घड़ी की सुइयां चलते हुए आवाज़ करती है। इनकी टिक-टिक के अलावा, मनीपुर गांव में आज शांति है। Continue reading

भाई, लड़की से बात करना मुश्किल ना है

लड़की से बात करना कितना मुश्किल है?

मैं इस हलचल को बेंच पर बैठकर देखता हूँ। मेरे सामने अनेक लड़कियाँ है, उनसे बात करते लड़के है। जब कोई काम बन्दा खुद ना कर पाता है, उस काम को कोई दूसरा कर जाता है तो उसे दूसरे की अचीवमेंट कहा जाता है। कम से कम पहला बन्दा तो उसे अचीवमेंट ही कहेगा। तो क्या लड़कियों से बात करना एक अचीवमेंट है? मुझे ना पता। पर मुझे बेहतर ख्याल सोचने की जरूरत है।

आज कॉलेज आने का ख्याल नाहक किया। इतने दिनों का आलस चढ़ा हुआ है, उसे एक दिन में उतार फेंकना मुश्किल है। बेंच पर बैठे-बैठे उबासी आती है। उमस में गर्मी भी ज्यादा है। दिन कैसे कटेगा? मुझे ना पता।

“निताश भाई आज कॉलेज चलना है?”
सवेरे की पहली बात मुझे आज आशीष की सुनाई दी थी।

आशीष मेरा एक मित्र है। वो कॉलेज के उन मनुष्यो में है जो मेरी बातें सुनकर मुझसे दूर ना भागे थे। वो मेरे साथ बना रहा, और कब वो जान-पहचान से आगे बढ़कर क्लासमेट और फिर मित्र बन गया, इसका मुझे ना पता। मेरा कॉलेज में एक मित्र है। वो आशीष है।

अभी मैं बेंच पर बैठा उसी का इंतजार कर रहा हूँ। बात करने वाले लड़के-लड़कियां निकल चुके है। लड़कियों से बात करना क्या अचीवमेंट है? ये बात मेरे दिमाग में घूम रही है।

लड़कियों से बात करने की चुल्ल जवानी का एक रोग है। शायद ये इसका लक्षण है। मुझे ना पता। बचपन का पता है कि दूसरे दर्जे में इनसे पेंसिल मांगने पर भी अन्य लड़के मजाक बना देते थे। वो उस वक़्त हंसते थे। बस हंसते रहते थे। उनकी हंसी से सतर्क होकर मैंने लड़कियों से बात करना त्याग ही दिया था। त्याग महान बताया गया है। ये त्याग उस समय मुझे महान लगा था, पर दर्जे का नम्बर बढ़ते-बढ़ते जब दस पर आ रुका और मुझ पर हंसने वाले खुद हंसकर लड़कियों से बतियाने लगे थे, उस वक़्त मैं झेंपकर रह गया था। उनकी हंसी और हंसने में परिवर्तन आया था। और वो यहां तक सीमित ना था कि वो पहले मुझ पर लड़कियों से बात करने पर हंसते थे और बाद में उनके साथ हंसने लगे थे। वो हंसी मेरे ऊपर ही केंद्रित रही थी। मैंने झेंपना उस हंसी से ही सीखा था। अब कॉलेज के दूसरे साल में झेंपना तो कम हुआ है , पर बातों की कमी अभी भी है।

बेंच पर बैठे, दूर से आशीष आता दिखता है। उसके साथ अजंता भी है। अजंता का दिखना कॉलेज में मेरे झेंपने का एक कारण है। ये कारण पहले साल से बना हुआ है। मुझे याद है पहले साल में जब उसे देखा था तो मैंने बात करनी चाही थी। हम क्लास में बैठे थे और उसने स्टेज पर एक ‘ब्यूटीफुल स्पीच’ दी थी। उस वक़्त उसे इम्प्रेस करने की चाह में मैंने सबसे ज्यादा तालिया बजायी थी और आशीष से भी बजवाई थी। मेरे तालिया पीटने से वो इम्प्रेस तो ना हुई, पर वो स्पीच खत्म करके आई तो मैं बात करने को खड़ा हुआ था। बेंच पर खड़े होते ही मुझे चेहरे दिखे और मैं झेप गया था। लेक्चरर ने मेरे बेंच पर खड़े होने का गलत अनुमान लगाया था और मुझे आगे बुला लिया था। आगे जाकर उन्होंने मुझे सिंधु घाटी सभ्यता पर अपने विचार रखने को बोला था। ‘सिंधु घाटी सभ्यता एक प्राचीन सभ्यता है, जो सिंधु नदी के किनारे किसी समय फली-फूली थी। प्राचीन वक़्त होते हुए भी वो कई चीजों में हमसे आधुनिक थे, जैसे कि नगर में गन्दे पानी की निकासी हेतु पक्की नालियों का प्रबंध, सभी के रहने के लिए पक्के घरो का प्रबंध इत्यादि। आधुनिक समय में हमे उनकी सभ्यता के अवशेष मिले है। पर इस सभ्यता का अंत,  कुदरती कारण या बाहरी मनुष्यो का हमला, इसके क्या कारण है। ये सवाल आज भी अचंभित करता है। सिर्फ मुझे ही नही, पर सभी को जिनके सामने इसका जिक्र होता है।’ ये सब विचार मेरे मन में थे। मैंने इन्हें बोलने के लिए मुख भी खोला था। सोचा था कि जल्दी विचार बाहर निकलकर इसे बंद कर लूंगा। बचपन में मां ने मेरे ज्यादा बोलने पर मुझे बंदर कहा था। मुझे स्टेज पर सभी के सामने बंदर ना लगना था। पर मुख खोलने पर विचार ना आये, सिर्फ सांस आयी। मैं शायद बंदर जैसा लगने लगा था, क्योंकि क्लास में सारे बच्चे हंसने लगे थे। लेक्चरर ने ये सब देखकर मुझे वापस जाने को बोल दिया। वापस आने पर देखा कि आशीष हंसकर अजंता से बात कर रहा है।
हा-हा, ही-ही, ये मेरा बैकग्राउंड म्यूजिक बन गया था। पूरी क्लास मेरे ऊपर हंस रही थी। आशीष भी, अजंता भी। उनकी हंसी मुझे विचलित ना कर रही थी, पर मेरे खुद के विचारों का बाहर ना आना। उस दिन के बाद मैंने अजंता से बात करने का ख्याल छोड़ दिया। सिर्फ ख्याल के सोचने पर पूरी क्लास हंसने लगी थी, विचारो ने मुझे छोड़ दिया था। उससे बात करने को हिम्मत की तो पूरा कॉलेज हँसेगा। ऐसा सोचकर और उसे देखकर मैं झेंप गया था।

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आशीष मेरे पास आकर बैठ गया। अजंता ने जाते हुए हाथ हिलाया था, पर वो शायद आशीष के लिए था। झेंपते हुए मैं दुनिया भूल जाता हूँ।

“भाई तू लड़कियों से बात कैसे कर लेता है?” मैं बोला, “मतलब इतना आसान तो होता ना होगा?”

“भाई आसान है। कुछ मुश्किल ना है।”, आशीष बोला।

“भाई फिर कौनसी बात करता है तू कि लड़की हंसी रहती है। कोई जोक सुनाता है क्या?”

ये सुनकर आशीष हंसने लगा।

“चूतिये हंस मत। पूरी बात बता।”, आशीष अजंता ना था, जिसका हंसना मुझे झेंप करने को मजबूर करता।

“सच भाई, कोई जोक ना है। लड़की से बात करना कोई मुश्किल ना है। बस तू बात कर, वो भी करेंगी।”, आशीष बोला।

“बात तो तेरी सही है। अच्छा यूं बता कि ये खुद भी किसी से बात करती है क्या?”

“खुद भी बात करती है भाई। अभी अजंता को देखा तूने। वो मुझे गेट पर मिली और खुद बातें करने लगी।”

“भाई मीठी मिर्च मत खिला। मैंने तो देखा उनको बात की शुरुआत करते।”

“भाई अब तू फुद्दू बात कर रहा है। तू साले देखेगा क्या, तेरी नजर उस फ़ोन से ना हटती कभी।”

“ना भाई ऐसा थोड़ी है।”, आशीष सच्ची बात बोल गया था। मैं हड़बड़ा उठा था।

“ऐसा ही है भाई। तू फ़ोन से तो हटता ना, लड़की से क्या बात करेगा?”

“भाई ऐसा ना है। वो कई बार फ़ोन में अपडेट आ जाती है तो कई बार मैं ऑनलाइन फॉर्म भर रहा होता हूं।”

“भाई अपडेट तेरी कॉलेज में ही क्यों आती है, घर क्यों ना आती।”

“भाई मुझे ना पता।”

“मुझे पता है। तू लड़कियों से शर्माता है।”

“भाई मैं ना शर्माता किसी से। बस बात इतनी है कि समझ ना आता कि उनसे क्या बात करूं?”

“तू मुझसे कौनसी बात करता है? भाई लड़कियों से बात करने को इतना ना सोचना चाहिए।”

“भाई सोचना चाहिए। कोई बेवकूफ बात कही जाए और वो हंस दे तो।”

“तू अजीब है यार। अभी तू उन्हें हँसाने की बात कर रहा था और अभी ना हँसाने को कह रहा है। भाई वो हंस दे तो तू भी हंस और आगे बात कर।”

“ना भाई। इतना आसान ना है।”, इतना कहकर मैं खड़ा हो गया।, “चल अब, पहला लेक्चर अटेंड करना है।”

वो भी मेरे साथ चल पड़ा।

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कॉलेज के दूसरे साल का पहला लेक्चर। मेरे साथ वाले बेंच पर अजंता बैठी है। वो अपनी सहेली से बातें करती है। आशीष अगले बेंच पर बैठी लड़की से बातें कर रहा है। लेक्चरर औरंगज़ेब की कुछ कहानी बता रहा है।

अजंता अब लेक्चरर की और देख रही है। शायद उसे औरंगज़ेब की कहानी अच्छी लग रही है। जब वो सहेली से बात कर चुकी थी, तब उसने नजर घुमाकर पूरी क्लास देखा था। शायद मुझे भी देखा था। उस पल झेंपने का मन ना था, बस किसी तरह बात करनी थी।

दूसरा साल कैसा निकलेगा? लड़कियों से बात करना क्या मुश्किल है? औरंगज़ेब इतना इंटरेस्टिंग क्यों है? ऊपर कोई खुदा है जो इंसानो की मदद करता है, उनकी बात सुनता है? इन सवालों के क्या कोई जवाब है?

मुझे ना पता।

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छुट्टियां और बचपन की फालतू यादें

छुट्टियां चल रही है। घर और कॉलेज, दोनों जगह से मुक्त हूँ। एग्जाम के दौरान छुट्टियां बिताने को लेकर बहुत बातें सोची थी। वो बातें वही तक सीमित रही। अब घर पर हूँ, तो एक-एक छुट्टी काटनी भारी हूँ। पार्क में घूमना, या पड़ोस की आंटी से मोहल्ले की खबरें जानना; वक़्त काटने को घर बस यही चीजें है। आरम्भ में घरवालों की बातों में मैं वो बेचारा लड़का था जो इम्तिहान के बाद आराम कर रहा है। अभी कुछ दिन ही बीते है। बेटा निताश लामणी करिया, माँ हर रोज रोटी के साथ सुझाव देती है। छोरे बीड़ी फैक्टरी में लग जा, बापू हुक्के से मुँह हटाने के बाद कहते है। मैं ऐसे रियेक्ट करता हूँ कि मैंने उनका कहा सुना ही ना। मैं कामचोर नही हूँ, मैं जानता हूँ। कॉलेज के एक साल में कुछ नखरे पाल लिए है, जिनको संग लेकर अब लामणी करनी या बीड़ी फैक्टरी में काम करना नामुमकिन है। ये बात माँ-बापू को समझानी मुश्किल है, और पड़ोस की आंटी को भी जो कल मुझे माँ-बाप की बात ना मानने वाले चरित्रहीन आदमी के तौर पर दूसरो को बता रही थी।

आज की शाम दोस्त के घर बीती। करने को हमने खाट पर लेटकर छत को ताडा और बकवास की। इससे बेहतर कुछ करने को भी ना था। हवा में जैसे उबाऊपन घुला था। नाक से सांस ली जाती तो मुँह से उबासी निकलती। कमरे में मच्छर थे। वो काट ना रहे थे। कान के आगे पी-पी रहे थे। शायद वे भी अलसा गए थे अपनी दिनचर्या से। पूरा दिन लोगो को काटना और उनकी तालियों से बचना। इसलिए कान के पास पी-पी कर रहे थे। मानो अपनी वाणी में याचना कर रहे थे कि अपनी ताली से हमारी जीवन-लीला समाप्त करो और इस बोरियत से बचाओ।

हम खाट पर लेटे थे। बातें समाप्त हो चुकी थी और सन्नाटा था। अचानक उसने बचपन की बातें शुरू कर दी। मेरा बचपन अच्छा था, सब मुझसे प्यार करते थे, मैं जो चाहता वो खाता था, मुझे कोई काम ना करना पड़ता था; मेरे मित्र ने इनके अलावा और भी काफी बातें कही जो मैं सुन ना पाया। मेरा मन कही और था। मैं उस वक़्त अपने बचपन को याद कर रहा था। उसका बचपन अच्छा था, उसने बताया था। मेरा बचपन मजाक था, मैंने उसे ना बताया।

मुझे बचपन का जिक्र सुनके भंडारे सबसे पहले याद आते है। शिवरात्रि का भंडारा, पीर बाबा का भंडारा; कोई भंडारा ना छोड़ता था मैं। उस वक़्त जीभ पिज़्ज़े-बर्गर और बातें टिश्यू पेपर, फिंगर-बाउल जैसे शहरी चोंचलो से अनजान थी, तो आलू की सब्जी और पूरी का स्वाद भाता था। इतना भाता था कि एक साल मैंने तीन गाँवों के भंडारे भी निपटाये थे।

गाँव के भंडारों का बंदोबस्त बड़ा आसान होता है। पंडाल लगाके दरिया बिछा दी जाती है। जनता बैठती है, तब लोग पत्तल, सब्जी, पूरी आदि का वितरण करते है। भंडारे में काफी लोग आते है, इसलिए दरियों का साफ़ होना जरुरी होता है। ये साफ़ रहे, इसलिए जूतें-चप्पलो को पहले ही निकलवा लिया जाता है।

वो जमाना हवाई चप्पलों का था। मुझे इनका वास्तविक नाम भी ना पता था। काली, सफ़ेद, नीली, भूरी, उँची एड़ी वाली; मेरे लिए सब बाटा वाली चप्पल थी। इनकी बचपन में कोई कद्र नहीं थी। घर से निकलने पर पहनी जाती और खेलते वक़्त खुद पैरो से गायब हो जाती। इनपर खेलते हुए ध्यान देना वक़्त की बर्बादी थी। कोई चप्पल पर ध्यान ना देता था, जब तक कि एक लड़का फलोटर लेकर ना आया था।

पहली बार जब उन्हें देखा, तो मन में उनकी चाह उमड़ आई थी। वो लड़का उन्हें लेकर बहुत इतरा रहा था। उसकी फलोटर को किसी ने चप्पल कहा तो उसका मुँह बन आया था। फलोटर की खासियत दिखने के लिए उसने फलोटर को अपनी कमर में मरवाया भी था। मैं देखकर हैरान हुआ था। बाटा वाली चप्पल एक बार लगने पर रुला देती थी, वही ये फलोटर का कुछ असर ही ना था। बस तभी से फलोटर पहनने की जिद पकडली थी। फलोटर पहनूंगा, ये ख्याल ही राजी करता था। घर जाकर जिद सामने रख दी, तो किसी ने ध्यान ना दिया। अगले दिन जब जिद का उग्र रूप दिखलाया, तो थप्पड़ पड़े। दो-चार दिन तक तो यही चला, पर जोर-जोर से रोता देखकर माँ का दिल पिघल आया था। पांचवे दिन मेरे भी पांवो में फलोटर थी।

मैं फलोटर पाकर बड़ा खुश था। मेरे लिए वो मेरा खजाना था। उन्हें पहनकर मैं ना भागता और खेल-कूद में भी उनपर नजर रखता। खेलकर घर आता तो नहाता बाद में, पहले उन्हें पानी से धोता था। मेरी छोटी सी दुनिया में मेरे फलोटर का बहुत ही विशेष स्थान था।

शिवरात्रि आई। मैं भण्डारे में फलोटर पहनकर गया। माँ ने खूब मना किया था, पर मैं ना माना था।

खाना खाने के पहले फलोटर बाहर उतार दिए थे। जब मैं वापस आया, तो वो गायब थे। खूब ढूंढी पर ना मिली। मैं उस वक़्त रोने लगा था। घर जाकर और ज्यादा रोया। सोचा था कि माँ दोबारा फलोटर दिला देंगी। पर अबकी बार ऐसा ना हुआ, उलट ज्यादा रोने पर कमर में कसकर बाटा वाली चप्पल और लगी। मैं रोने लगा। कुछ समय बाद बापू मनाने आये। मैंने उन्हें कहा कि माँ फलोटर मारती तो वो ना लगती और मैं इतना ना रोता।

मेरे फलोटर मेरे साथ सिर्फ सात-आठ दिन रहे। पर जाते हुए भी एक अमूल्य सबक सीखा गए। उस दिन से मैंने भंडारों में टूटी चप्पल पहनकर जाना शुरू कर दिया, जो अब तक कायम है।