छुट्टियां और बचपन की फालतू यादें

छुट्टियां चल रही है। घर और कॉलेज, दोनों जगह से मुक्त हूँ। एग्जाम के दौरान छुट्टियां बिताने को लेकर बहुत बातें सोची थी। वो बातें वही तक सीमित रही। अब घर पर हूँ, तो एक-एक छुट्टी काटनी भारी हूँ। पार्क में घूमना, या पड़ोस की आंटी से मोहल्ले की खबरें जानना; वक़्त काटने को घर बस यही चीजें है। आरम्भ में घरवालों की बातों में मैं वो बेचारा लड़का था जो इम्तिहान के बाद आराम कर रहा है। अभी कुछ दिन ही बीते है। बेटा निताश लामणी करिया, माँ हर रोज रोटी के साथ सुझाव देती है। छोरे बीड़ी फैक्टरी में लग जा, बापू हुक्के से मुँह हटाने के बाद कहते है। मैं ऐसे रियेक्ट करता हूँ कि मैंने उनका कहा सुना ही ना। मैं कामचोर नही हूँ, मैं जानता हूँ। कॉलेज के एक साल में कुछ नखरे पाल लिए है, जिनको संग लेकर अब लामणी करनी या बीड़ी फैक्टरी में काम करना नामुमकिन है। ये बात माँ-बापू को समझानी मुश्किल है, और पड़ोस की आंटी को भी जो कल मुझे माँ-बाप की बात ना मानने वाले चरित्रहीन आदमी के तौर पर दूसरो को बता रही थी।

आज की शाम दोस्त के घर बीती। करने को हमने खाट पर लेटकर छत को ताडा और बकवास की। इससे बेहतर कुछ करने को भी ना था। हवा में जैसे उबाऊपन घुला था। नाक से सांस ली जाती तो मुँह से उबासी निकलती। कमरे में मच्छर थे। वो काट ना रहे थे। कान के आगे पी-पी रहे थे। शायद वे भी अलसा गए थे अपनी दिनचर्या से। पूरा दिन लोगो को काटना और उनकी तालियों से बचना। इसलिए कान के पास पी-पी कर रहे थे। मानो अपनी वाणी में याचना कर रहे थे कि अपनी ताली से हमारी जीवन-लीला समाप्त करो और इस बोरियत से बचाओ।

हम खाट पर लेटे थे। बातें समाप्त हो चुकी थी और सन्नाटा था। अचानक उसने बचपन की बातें शुरू कर दी। मेरा बचपन अच्छा था, सब मुझसे प्यार करते थे, मैं जो चाहता वो खाता था, मुझे कोई काम ना करना पड़ता था; मेरे मित्र ने इनके अलावा और भी काफी बातें कही जो मैं सुन ना पाया। मेरा मन कही और था। मैं उस वक़्त अपने बचपन को याद कर रहा था। उसका बचपन अच्छा था, उसने बताया था। मेरा बचपन मजाक था, मैंने उसे ना बताया।

मुझे बचपन का जिक्र सुनके भंडारे सबसे पहले याद आते है। शिवरात्रि का भंडारा, पीर बाबा का भंडारा; कोई भंडारा ना छोड़ता था मैं। उस वक़्त जीभ पिज़्ज़े-बर्गर और बातें टिश्यू पेपर, फिंगर-बाउल जैसे शहरी चोंचलो से अनजान थी, तो आलू की सब्जी और पूरी का स्वाद भाता था। इतना भाता था कि एक साल मैंने तीन गाँवों के भंडारे भी निपटाये थे।

गाँव के भंडारों का बंदोबस्त बड़ा आसान होता है। पंडाल लगाके दरिया बिछा दी जाती है। जनता बैठती है, तब लोग पत्तल, सब्जी, पूरी आदि का वितरण करते है। भंडारे में काफी लोग आते है, इसलिए दरियों का साफ़ होना जरुरी होता है। ये साफ़ रहे, इसलिए जूतें-चप्पलो को पहले ही निकलवा लिया जाता है।

वो जमाना हवाई चप्पलों का था। मुझे इनका वास्तविक नाम भी ना पता था। काली, सफ़ेद, नीली, भूरी, उँची एड़ी वाली; मेरे लिए सब बाटा वाली चप्पल थी। इनकी बचपन में कोई कद्र नहीं थी। घर से निकलने पर पहनी जाती और खेलते वक़्त खुद पैरो से गायब हो जाती। इनपर खेलते हुए ध्यान देना वक़्त की बर्बादी थी। कोई चप्पल पर ध्यान ना देता था, जब तक कि एक लड़का फलोटर लेकर ना आया था।

पहली बार जब उन्हें देखा, तो मन में उनकी चाह उमड़ आई थी। वो लड़का उन्हें लेकर बहुत इतरा रहा था। उसकी फलोटर को किसी ने चप्पल कहा तो उसका मुँह बन आया था। फलोटर की खासियत दिखने के लिए उसने फलोटर को अपनी कमर में मरवाया भी था। मैं देखकर हैरान हुआ था। बाटा वाली चप्पल एक बार लगने पर रुला देती थी, वही ये फलोटर का कुछ असर ही ना था। बस तभी से फलोटर पहनने की जिद पकडली थी। फलोटर पहनूंगा, ये ख्याल ही राजी करता था। घर जाकर जिद सामने रख दी, तो किसी ने ध्यान ना दिया। अगले दिन जब जिद का उग्र रूप दिखलाया, तो थप्पड़ पड़े। दो-चार दिन तक तो यही चला, पर जोर-जोर से रोता देखकर माँ का दिल पिघल आया था। पांचवे दिन मेरे भी पांवो में फलोटर थी।

मैं फलोटर पाकर बड़ा खुश था। मेरे लिए वो मेरा खजाना था। उन्हें पहनकर मैं ना भागता और खेल-कूद में भी उनपर नजर रखता। खेलकर घर आता तो नहाता बाद में, पहले उन्हें पानी से धोता था। मेरी छोटी सी दुनिया में मेरे फलोटर का बहुत ही विशेष स्थान था।

शिवरात्रि आई। मैं भण्डारे में फलोटर पहनकर गया। माँ ने खूब मना किया था, पर मैं ना माना था।

खाना खाने के पहले फलोटर बाहर उतार दिए थे। जब मैं वापस आया, तो वो गायब थे। खूब ढूंढी पर ना मिली। मैं उस वक़्त रोने लगा था। घर जाकर और ज्यादा रोया। सोचा था कि माँ दोबारा फलोटर दिला देंगी। पर अबकी बार ऐसा ना हुआ, उलट ज्यादा रोने पर कमर में कसकर बाटा वाली चप्पल और लगी। मैं रोने लगा। कुछ समय बाद बापू मनाने आये। मैंने उन्हें कहा कि माँ फलोटर मारती तो वो ना लगती और मैं इतना ना रोता।

मेरे फलोटर मेरे साथ सिर्फ सात-आठ दिन रहे। पर जाते हुए भी एक अमूल्य सबक सीखा गए। उस दिन से मैंने भंडारों में टूटी चप्पल पहनकर जाना शुरू कर दिया, जो अब तक कायम है।