कबाड़ी जिंदा होता तो और खुश होते

आज रविवार है। घड़ी की सुइयां चलते हुए आवाज़ करती है। इनकी टिक-टिक के अलावा, मनीपुर गांव में आज शांति है। Continue reading

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छुट्टियां और बचपन की फालतू यादें

छुट्टियां चल रही है। घर और कॉलेज, दोनों जगह से मुक्त हूँ। एग्जाम के दौरान छुट्टियां बिताने को लेकर बहुत बातें सोची थी। वो बातें वही तक सीमित रही। अब घर पर हूँ, तो एक-एक छुट्टी काटनी भारी हूँ। पार्क में घूमना, या पड़ोस की आंटी से मोहल्ले की खबरें जानना; वक़्त काटने को घर बस यही चीजें है। आरम्भ में घरवालों की बातों में मैं वो बेचारा लड़का था जो इम्तिहान के बाद आराम कर रहा है। अभी कुछ दिन ही बीते है। बेटा निताश लामणी करिया, माँ हर रोज रोटी के साथ सुझाव देती है। छोरे बीड़ी फैक्टरी में लग जा, बापू हुक्के से मुँह हटाने के बाद कहते है। मैं ऐसे रियेक्ट करता हूँ कि मैंने उनका कहा सुना ही ना। मैं कामचोर नही हूँ, मैं जानता हूँ। कॉलेज के एक साल में कुछ नखरे पाल लिए है, जिनको संग लेकर अब लामणी करनी या बीड़ी फैक्टरी में काम करना नामुमकिन है। ये बात माँ-बापू को समझानी मुश्किल है, और पड़ोस की आंटी को भी जो कल मुझे माँ-बाप की बात ना मानने वाले चरित्रहीन आदमी के तौर पर दूसरो को बता रही थी।

आज की शाम दोस्त के घर बीती। करने को हमने खाट पर लेटकर छत को ताडा और बकवास की। इससे बेहतर कुछ करने को भी ना था। हवा में जैसे उबाऊपन घुला था। नाक से सांस ली जाती तो मुँह से उबासी निकलती। कमरे में मच्छर थे। वो काट ना रहे थे। कान के आगे पी-पी रहे थे। शायद वे भी अलसा गए थे अपनी दिनचर्या से। पूरा दिन लोगो को काटना और उनकी तालियों से बचना। इसलिए कान के पास पी-पी कर रहे थे। मानो अपनी वाणी में याचना कर रहे थे कि अपनी ताली से हमारी जीवन-लीला समाप्त करो और इस बोरियत से बचाओ।

हम खाट पर लेटे थे। बातें समाप्त हो चुकी थी और सन्नाटा था। अचानक उसने बचपन की बातें शुरू कर दी। मेरा बचपन अच्छा था, सब मुझसे प्यार करते थे, मैं जो चाहता वो खाता था, मुझे कोई काम ना करना पड़ता था; मेरे मित्र ने इनके अलावा और भी काफी बातें कही जो मैं सुन ना पाया। मेरा मन कही और था। मैं उस वक़्त अपने बचपन को याद कर रहा था। उसका बचपन अच्छा था, उसने बताया था। मेरा बचपन मजाक था, मैंने उसे ना बताया।

मुझे बचपन का जिक्र सुनके भंडारे सबसे पहले याद आते है। शिवरात्रि का भंडारा, पीर बाबा का भंडारा; कोई भंडारा ना छोड़ता था मैं। उस वक़्त जीभ पिज़्ज़े-बर्गर और बातें टिश्यू पेपर, फिंगर-बाउल जैसे शहरी चोंचलो से अनजान थी, तो आलू की सब्जी और पूरी का स्वाद भाता था। इतना भाता था कि एक साल मैंने तीन गाँवों के भंडारे भी निपटाये थे।

गाँव के भंडारों का बंदोबस्त बड़ा आसान होता है। पंडाल लगाके दरिया बिछा दी जाती है। जनता बैठती है, तब लोग पत्तल, सब्जी, पूरी आदि का वितरण करते है। भंडारे में काफी लोग आते है, इसलिए दरियों का साफ़ होना जरुरी होता है। ये साफ़ रहे, इसलिए जूतें-चप्पलो को पहले ही निकलवा लिया जाता है।

वो जमाना हवाई चप्पलों का था। मुझे इनका वास्तविक नाम भी ना पता था। काली, सफ़ेद, नीली, भूरी, उँची एड़ी वाली; मेरे लिए सब बाटा वाली चप्पल थी। इनकी बचपन में कोई कद्र नहीं थी। घर से निकलने पर पहनी जाती और खेलते वक़्त खुद पैरो से गायब हो जाती। इनपर खेलते हुए ध्यान देना वक़्त की बर्बादी थी। कोई चप्पल पर ध्यान ना देता था, जब तक कि एक लड़का फलोटर लेकर ना आया था।

पहली बार जब उन्हें देखा, तो मन में उनकी चाह उमड़ आई थी। वो लड़का उन्हें लेकर बहुत इतरा रहा था। उसकी फलोटर को किसी ने चप्पल कहा तो उसका मुँह बन आया था। फलोटर की खासियत दिखने के लिए उसने फलोटर को अपनी कमर में मरवाया भी था। मैं देखकर हैरान हुआ था। बाटा वाली चप्पल एक बार लगने पर रुला देती थी, वही ये फलोटर का कुछ असर ही ना था। बस तभी से फलोटर पहनने की जिद पकडली थी। फलोटर पहनूंगा, ये ख्याल ही राजी करता था। घर जाकर जिद सामने रख दी, तो किसी ने ध्यान ना दिया। अगले दिन जब जिद का उग्र रूप दिखलाया, तो थप्पड़ पड़े। दो-चार दिन तक तो यही चला, पर जोर-जोर से रोता देखकर माँ का दिल पिघल आया था। पांचवे दिन मेरे भी पांवो में फलोटर थी।

मैं फलोटर पाकर बड़ा खुश था। मेरे लिए वो मेरा खजाना था। उन्हें पहनकर मैं ना भागता और खेल-कूद में भी उनपर नजर रखता। खेलकर घर आता तो नहाता बाद में, पहले उन्हें पानी से धोता था। मेरी छोटी सी दुनिया में मेरे फलोटर का बहुत ही विशेष स्थान था।

शिवरात्रि आई। मैं भण्डारे में फलोटर पहनकर गया। माँ ने खूब मना किया था, पर मैं ना माना था।

खाना खाने के पहले फलोटर बाहर उतार दिए थे। जब मैं वापस आया, तो वो गायब थे। खूब ढूंढी पर ना मिली। मैं उस वक़्त रोने लगा था। घर जाकर और ज्यादा रोया। सोचा था कि माँ दोबारा फलोटर दिला देंगी। पर अबकी बार ऐसा ना हुआ, उलट ज्यादा रोने पर कमर में कसकर बाटा वाली चप्पल और लगी। मैं रोने लगा। कुछ समय बाद बापू मनाने आये। मैंने उन्हें कहा कि माँ फलोटर मारती तो वो ना लगती और मैं इतना ना रोता।

मेरे फलोटर मेरे साथ सिर्फ सात-आठ दिन रहे। पर जाते हुए भी एक अमूल्य सबक सीखा गए। उस दिन से मैंने भंडारों में टूटी चप्पल पहनकर जाना शुरू कर दिया, जो अब तक कायम है।

मनीपुर : प्यार का किस्सा

रात का वक़्त है। मनीपुर में रोज की तरह बिजली नहीं आ रही। रात के अँधेरे में, निताश अपने छोटे भाई को अपने स्कूल के किस्से सुना रहा है।

मनीपुर का सरकारी इस्कूल। यह भी बाकी सरकारी इस्कूलों के जैसा था। पीली दीवारे जिन पर सालो पहले पुताई हुई थी, जगह-जगह से टूटा हुआ फर्श, कमरो में सीलन की झलक, रेत और मकड़ी के जालो से भरी दीवारे, एक और से तोड़ी हुई चारदीवारी; इस्कूल का हर एक पहलू इसको एक टिपिकल सरकारी इस्कूल बताता था।

देहात का इस्कूल था। तो देहात के ना लिखे नियम चलते थे। अब वो ज्यादातर नियम तो याद ना रहे, पर उनमे से एक नियम सदा याद रहता जो की लड़को और लड़कियो के बीच की दूरी को लेकर था। यह नियम याद रहा क्योंकि इसी को लेके देहात से नफरत हुई थी।

नियम था की लड़के और लड़कियो को इस्कूल में जितना दूर हो सके उतना दूर रखा जाए। पता ना किस चीज को लेकर ये नियम था। पर था तो निभाना पड़ता था। ना निभाना अलग बात थी, पर इसे तोड़ने पर घरवाले और मास्टर दोनों तोड़ते थे।

तो बात 11वीं की है। साल बदला। नए दर्जे में आये। पर बदलाव बस यही तक सीमित रहा। पर उस साल, लड़कियो वाले सेक्शन में एक नयी लड़की आई। उसके आने पर उसको देखा तो नहीं, पर उसके बारें में बातें सुनी। बातें अलग सुनी उसकी, तो वो अलग लगी।

देहात में लड़कियो को शायद दबाकर रखा जाता था। उन दिनों मैंने उन्हें कभी ऊँचा कहते ना सुना था। हौले हौले आपस में बतियाती थी। बातें उनकी जैसी होती थी। हंसती भी दबकर थी। घर भी यही और इस्कूल में भी यही हाल था। उनके रूम से कभी शोर ना आता, भले ही मास्टर ना होता। उनके कमरे में होने का पता मास्टर की पढ़ाने वाली आवाज से ही लगता था। अब ऐसे देस मे कोई ऐसा आये जिसके लिए बातें ख़त्म ना हो, तो अजीब लगा।

बातें बातें कम, अफवाह ज्यादा लगती थी। उसे आये दो महीने का समय ना हुआ था, पर फिर भी हर लौंडे की जुबान पर उसके चर्चे रहते थे। एक कहता की मुँहफट है, बोलती रहती है। दूसरा कहता की शहर से आई है, बालों को अलग इश्टाइल में रखती है। तीसरे ने कहा की फलाने के साथ इसका चक्कर है। चौथे ने कहा की वो छोड़ दिया इसने और नया बना लिया। अब ये गिनती शायद बीस तक चली, पर इतना जरूर था की वो हर एक की बातों में थी। और हर एक के पास कुछ नयी बात थी। अपनी बात करे तो हमने ज्यादा ना सोचा उसको लेके, बस ज्यादा देखा।

तो हमने उसे देखा। जब मौका मिला तब देखा। और बातो को जब गौर में लिया तो सच में वो अलग थी। वो मुँहफट थी। खुलके बोलती थी। पर खुलके हंसती भी थी। बालों को कुछ अलग हिसाब से बांधती थी। चश्मे लगाती थी। इस्कूल की लेडी टीचर भी उसी की बातें करती। क्लासरूम में उसकी आवाज गूंजती थी। चुप लड़कियो में एक वो सदा बक-बक करती रहती थी। कई मायनों में अच्छी भी लगने लगी थी। दिन बीतने लगे। जब मौका मिला उसे देखा। अब जब लड़के उसके बारे में उल्टा-सीधा बोलते तो बुरा लगता। उन्हें चुप कराने का भरपूर जी करता। शायद दिल अपना चुतिया कटवा  चुका था। हमे पता था। पर अच्छा लगता था, सो हमने चलने दिया।

दिन बीते। महीने बीते। साल बीता। पर लड़को की बातें ख़त्म ना हुई। वो सब सुनकर दिल थोडा दुखता, पर ये वो लड़के थे जिनका मानना था की भैंस जमीन और जोहड़ दोनों जगह पर रह सकती है, सो उनकी बातो पे विश्वास कभी ना हुआ। पर मन में कभी-कभार जरूर खटकी।

एक और साल बदला। 12वीं क्लास में दूसरे गाँव से एक लड़का आया। रविश नाम था।  पूरा खालिस देसी। उसकी बातें कभी ख़त्म ना होती। पूरी क्लास को हँसाता। मास्टर को बातों में लगा लेता। शुरुआत में बावलितरेड लगा, पर जब बातें हुई तो लगा की मैं गलत था। बन्दा दिमाग वाला था। इस दौरान थोडा पढाई में मन लगाया तो उस चश्मे वाली से थोडा दूर हुआ।

छुट्टियां पड़ी। ख़त्म हुई। दोबारा गया तो अब की बार रविश के साथ एक दो बार बैठा। बन्दे की बातें टाइमपास के लिए परफेक्ट थी। ऐसी 5-6 बैठक हुई। उसकी और मेरी बातें चली। वो ज्यादातर अपने बारें में कहता रहता। फिर एक दिन उसने अपनी बातों में उस चश्मे वाली का जिक्र किया। मैं सकपका गया एकदम। पर पता ना लगने दिया। उसने बताया की उसकी चश्मे वाली से बात हुई थी और उन दोनों का चक्कर चला था। वो कुछ हफ्ते चला और फिर उसने नया ढून्ढ लिया। शुरआत में यकीन ना किया, पर फिर उसने कुछ चीजें ऐसी दिखाई की यकीन दिल मसोसकर करना पड़ा। उस दिन दिल टूटा। और टूटा भी तो साला कुछ शोर ना हुआ।

12वीं के पेपर नजदीक थे। तो प्यार तो हमसे पूरी साल ना हो पाया था, तो पढाई की कोशिश की। हमारे पेपर का सेण्टर हमारा इस्कूल ही था। चीटिंग भरपूर होती थी। पर अब की बार फ्लाइंग और सुपरिन्टेन्डेन्ट सख्त था। साले ने चीटिंग ना करने दी। लास्ट पेपर का दिन है। मैं पेपर देकर बहार बैठा जूते पहन रहा था। वो बाहर आई। मेरी तरफ देखा। एक पल के लिए नजर मिली। पर फिर वो चली गयी। उस पल में जब नजर मिली थी, तो कटवाने के लिए मैं फिर से तैयार था। पर दिमाग ने बचा लिया।”

“दादा तुमने दो साल तक एकतरफा प्यार किया। आप या तो मूरख थे या पुराने आशिक़। खैर, उसको उस दिन के बाद देखा आपने”

“कॉलेज में मिलती थी रोज। पर वहा वो और मैं भीड़ में खो गए। फिर न मिले कभी।”

“दादा कैसा होता अगर वो और आप एक हो जाते तो?”

“बस अब सो जा। सवेरे इस्कूल भी जाना है तुझे।”

“गुड नाईट दादा।”

“सो जा।”

Afternoon Walk : Tales from Moneypur

It is afternoon. The sun is in its full glory. Nithash walks towards his home, lost in his own thoughts.

I continue walking, despite the numbing pain in my ankles. Home is far, so I’ll have to walk. I must be stringent. College canteen and the sandwiches, they can wait. But Moneypur Tempowala’s won’t.

Walking and Waking. I dislike both. They take me away from my favorite things. Bed in the morning and her in the afternoon. A juxtaposition of my favorite things, is the remedy perhaps.

College equals curiosity. I wonder why those kids have taken a liking to it. There is nothing lika…

Meanwhile, A car, in its pursuit to beat Bugati, went past by him, barely touching him.

‘Bhosdike! Dekh ke na chala sakta ke’, an outcry, in response to the sudden surprise, found an outlet.

Asshole. They get a car under their ass and they act like they own the road. Brat.

Yes. College. I wonder why people like it. Canteen’s food is good. Teachers are helpful. But what else? Perhaps I’m missing something. It must be their group and the selfie. I don’t like selfies. They make people weird. Girls make their lips awkward. They resemble a calf who has been stopped from milkfeeding in middle. Also boys lift their eyebrows. I know they don’t read a thing. Perhaps being weird is cool.

Lifting his head and gawking at the sign ahead, he says to himself, “Ah! Home has come.”