कबाड़ी जिंदा होता तो और खुश होते

आज रविवार है। घड़ी की सुइयां चलते हुए आवाज़ करती है। इनकी टिक-टिक के अलावा, मनीपुर गांव में आज शांति है। Continue reading

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दादी बुंदिया

आज कॉलेज जाने को घर से जल्दी निकला था। रोज-रोज आशीष कहा है, कहा है की रट लगाए फ़ोन करता रहता था। आज उसे ये मौका ना देना था।

“रै बेटा कित जावै है?”

मैं गांव के अड्डे की ओर चला जा रहा था। अचानक पीछे से आवाज़ आयी। आवाज़ दादी बुंदिया की थी।

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Short Story: माँ, शादी उलझन है (भाग 1)

आधी रात हो चली है। प्रतीक्षा अपने कमरे में बैठी है। दुल्हन की वेशभूषा में, सिर से पैर तक आभूषणों में सज्जित, वो दीवार की ओर देखती है। चेहरे पर कोई भाव दृश्य नहीं है, मानो मेकअप ने उन्हें नजरों से छिपा दिया हो। वह बस बैठी हुई दीवार को ताकती है। उसकी सखी उसके साथ है, परन्तु वह बालकनी में खड़ी है। दूर में बारात दिखती है, वो उसके बारे में बोल रही है।

प्रतीक्षा के आसपास इतना कुछ घटित हो रहा है, फिर भी वह इन सब से बेखबर लगती है। चुपचाप बैठी बस दीवार की और देखती है।

*****

सुबह के आठ बज रहे है। प्रतीक्षा घर के बाहर स्कूल बस के इंतजार में खड़ी है। उसकी सहेली पूजा अभी तक ना आई थी।

प्रतीक्षा सत्रह वर्ष की है। वह कदकाठी में कम, परन्त आवाज में बुलंद थी। बचपन ख़त्म होने तक उसे बाल छोटे रखने का शौक था। माँ ने कई बार बाल बड़े करनें को लेकर टोका था। छोटे बाल लड़कियों पर अच्छे नहीं लगते, माँ ने कहा था। पर उसने माँ की बाकी बातों की तरह ये बात भी टाल दी थी। पर जब से पूजा न अपने बड़े बालों में चोटी करनी शुरू कर दी थी, तब से उसने बाल बढ़ाने की ठान ली थी। अब वो रोजाना माँ से बालों में तेल की चम्पी कराती और चोटी करने को कहती। शुरू के एक-दो दिन माँ को ये अजीब लगा। लड़की बात कभी ना सुनती और अब अचानक बालो में तेल और चोटी, सोचकर माँ भी हैरान थी। सब सही था, परंतु उसके बाल छोटे थे। चोटी घनी ना बन पाती थी। इसके ऊपर उसकी छोटी बहन उसे ‘चोटी चुहिया’ कहकर चिढ़ाती थी। माँ-बाप सामने होते तो प्रतीक्षा स्वयं को रोक लेती थी, पर अकेले में पाकर वो भी उसको एक-दो थप्पड़ रसीद कर देती थी। फिर जब सुप्रिया कहती कि वो थप्पड़ की बात माँ को बताएगी, तो प्रतीक्षा उसे चुप रहने के प्रलोभन भी देती थी।

प्रतीक्षा घर के बाहर खड़ी है। घर के सामने रखे बड़े गमलों में फूल खिले है। सवेरे मोगरा के सफ़ेद फूल अच्छे लग रहे थे। वो उनकी ही तरफ देख रही थी, कि अचानक उसे कन्धे पर हाथ रखे जाने का आभास हुआ। शरीर में एक पल के लिए स्तब्धता उठती है, परंतु ज्यों ही वो मुड़ती है, पूजा को पाती है। पूजा आ गयी थी, पर हांफ रही थी।

“आज फिर तुझसे उठा ना गया क्या?”, सुबह की वार्ता प्रतीक्षा शुरू कर देती है।

“उठ गयी थी। पर फिर वो हिस्ट्री का असाइनमेंट भी तो पूरा करना था।”, पूजा बोलती है।

“आलसी कही की। एक हफ्ते पहले दिया था असाइनमेंट, तू अब तक पूरा ना कर पायी क्या?”

“अब तेरे जैसी पढनतरु तो हूँ नहीं मैं। बस आज सुबह किया पूरा।”

“ना पता तेरा आलसपन कब हिस्ट्री बनेगा। मैं तो…”

इससे पहले की प्रतीक्षा बात पूरी कर पाती, नजदीक आती बस के हॉर्न ने उस पर पूर्ण विराम लगा दिया था।

Tales from Moneypur : शांत चीकू

दोपहर का वक़्त है। मनीपुर प्राइमरी स्कूल की घंटी बज चुकी है। बच्चे दौड़ते हुए कमरो से बाहर निकलते है। इन्ही के बीच, चीकू, कंधे लटकाये और मुँह फुलाए, घर की और बढ़ता है।

***

चीकू घर आता है। सीधे टीवी वाले कमरे में घुसता है। उसकी बड़ी दीदी टीवी देख रही है। कदमो को पटक, चीकू अपने आवागमन की और इशारा करता है। इस पर, उसकी बड़ी दीदी, जिनकी नजर टीवी पर है, बिना नजर घुमाए कहती है,

“आ गया तू। चल अब हाथ-मुँह धो ले।”

मानो इस वाक्य को चीकू ने अनसुना कर दिया, दोबारा पाँव पटकता है। इस बार उसकी दीदी टीवी को छोड़, उसकी और देखती है। पाती है कि चीकू का चेहरा तमतमाया हुआ है और बालों में रेत भरा है।

“कहाँ लड़ाई कर आया आज? बड़ा रोब में हो रहा है।”

चीकू चेहरे के भाव बदले बिना, दीदी के चेहरे को एकटक निहारता है। फिर अचानक दीदी का अचानक फ़ोन बजने लगता है और कमरे में टीवी कार्यक्रम के डायलॉग्स के अलावा, फ़ोन से निकलकर ‘दिल दीवाना ना जाने कब खो गया’ के स्वर गूंजने लगते है। दीदी फ़ोन उठाकर उठती है और बोलती है,

“हां बेबी, आपका बड़ी देर बाद फ़ोन आया…”

बात पूरी हो पाती, इससे पहले ही चीकू भागकर दादाजी के पास चला आता है।

***

दादाजी अपने कमरे में खाट पर बैठे है। सामने हूक्के के साथ उनके टेम का साथी जयलाल भी हुक्का गूडगूड़ाता पड़ा है। दादाजी दोनों हाथों से चश्मे को पकड़, नजरों के दूर-नजदीक लाते है। शायद चश्में का नंबर बढ़ गया है। इतने में, चीकू आकर खड़ा हो जाता है।

“आ लिया तू। चल इब चलके किमी खा-पी ले।”

चीकू मुँह फुलाये खड़ा रहता है। दादाजी चश्मे को एक तरफ रखकर, चीकू की तरफ देखकर कहते है,

“रै छोरे आज के होगा। किमी बोलेगा भी या नुही दीदे पाड़ेगा।”

जयलाल ये सब देखता है। हूक्के का मुँह छोड़कर, चीकू की और देखता है। मानो स्तिथी का जायजा लेते हुए, चीकू की और देखता है। हूक्के से दूर होने का गम उसके चेहरे पर साफ़ दिखता है। शायद उसे कुछ बोलना चाहिए, यूं सोचकर बोलता है,

“छोरे म्हारी बात भी सुण लिया कर कदी। चल इब कोई ना, अपनी महतारी कने जा।”

दादाजी हूक्के का किनारा पकड़कर गूडगूडाते है। चीकू एकटक देखता है, फिर भाग जाता है।

***

माँ रसोई में है। अभी-अभी लस्सी बिलोके अलग हटी है। बाल सम्भवा रही थी की देखती है की चीकू आगे खड़ा है। हाल उसका अभी भी वही है। बाल इधर-उधर जिनमें रेत पड़ा हुआ है, चेहरा लाल और गाल फूले हुए। आँखें लगभग भर आई है। मानो अभी रो पड़ेगा।

“आ गया मेरा लाल। ये क्या हाल बनवा रखा है। चल जाके कपडे बदल ले और खाना खा ले। लस्सी अभी अभी निकाली है।”

“मुझको ना खाना खाना। मुझे आपसे बात भी ना करनी है।”

“क्यों रे? सुबह वाली बात लेकर अभी भी गुस्सा है क्या?”

“हाँ। पापा ने मुझे क्यों मारा? मैं तो बस राजू को रोटी पकड़ा रहा था।”

“अरे मेरा भोला बेटा। कहा मारा। बस एक दो हलकी सी चपत ही तो लगायी थी।”

“थप्पड़ मारे थे जोर से। और वो भी यूँ ही की मैं राजू को रोटी दे रहा था।”

“बेटा राजू गन्दा है। तू उसे छु लेता तो तुझे शुद्ध होना पड़ता। पंडत को बुलाना पड़ता। पूजा करनी पड़ती। समझा।”

“पर क्यों?”

“अब मुझे नहीं पता ये सब। चल अब कपडे बदल ले। तेरे पापा भी आते होंगे।”

Moneypur Tales : DARK

I sit at home, looking at the sky. I have no idea what I will do the next hour or the next day. Living in the moment, perhaps they have termed it like this. It has been raining cats and dogs here in Moneypur since last night.

My friends visited. I stayed at home instead of going to College in this downpour. How much they think of me? My feelings feels an instant shift, or say a change. I am indeed lucky. Oh no! It is the old cynic mind speaking again. Friends came because they wanted your books, not because they care for you. After all! No one in his right state of mind would come to your smelly room.

I think I should tell you a little about my old cynic mind. Inside my head, there is a constant struggle between two voices. I don’t know which one is right at times. I just let them do things the way them deem ok. One is mr. bright side, the glass is half full, and the other is old cynic, fill the glass with goddamn whisky.

Well, old cynic was right. The room is indeed smelly. And the walls are sore pain to the eye. They haven’t been painted from the last three years. “I will tell dad to lend me money to paint ’em this month”, but old cynic knows the answer already.

College? Ah! It feels so good there. my friends are there. The library is there. Teachers are there. Also, she is there. But what’s stopping me? Oh yes! The same old shirt and trousers. They are dirty and old. I could wash them, but this weather  wouldn’t let  them dry. Moreover, what will washing them do? She will never look at me. I need new clothes. I will ask father.

The sun is going down. The sky looks reddish. And lo! Father is home. Eh! He is drunk and dirty again. Drenched in sweat. The work must be more than average today. I heard that Government has lifted it’s ban on construction of buildings. Must’ve been lifting bricks all day.

Scrounging the pocket of his father’s shirt for money, he finds 50 bucks. Must’ve bought liquor, he thinks to himself.

The sky is pitch dark now. Moonlight peeks from behind clouds. Stars are nowhere to be seen. It is dark everywhere.