कबाड़ी जिंदा होता तो और खुश होते

आज रविवार है। घड़ी की सुइयां चलते हुए आवाज़ करती है। इनकी टिक-टिक के अलावा, मनीपुर गांव में आज शांति है। Continue reading

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दादी बुंदिया

आज कॉलेज जाने को घर से जल्दी निकला था। रोज-रोज आशीष कहा है, कहा है की रट लगाए फ़ोन करता रहता था। आज उसे ये मौका ना देना था।

“रै बेटा कित जावै है?”

मैं गांव के अड्डे की ओर चला जा रहा था। अचानक पीछे से आवाज़ आयी। आवाज़ दादी बुंदिया की थी।

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What’s A Man?

आदमी क्या है? What is a man?
He is a question asked by himself.
I ask this question occasionally. It is appealing to my mind. It makes me feel like a erudite man.
One couldn’t find answer at home. You can find questions or comforts at home, but the world outside has answers. So i stepped out.

Who am I?
This thing was on my mind. Constantly. It was there when I reached the limit of my village and looked at the road.
The road. It’s always been there. Answers to every journey and destination. Maybe the road can answer my question.
I walk. And I walk a little more. Sweat makes me feel sticky. The wind ain’t blowing and stench of sweat is everywhere. It is in my hands, my hair, my clothes, everywhere. It is in my mind and the things I say. It is in the roadside flowers and overgrown bushes.
I see a tree and decide to sit down. Continue reading

भाई, लड़की से बात करना मुश्किल ना है

लड़की से बात करना कितना मुश्किल है?

मैं इस हलचल को बेंच पर बैठकर देखता हूँ। मेरे सामने अनेक लड़कियाँ है, उनसे बात करते लड़के है। जब कोई काम बन्दा खुद ना कर पाता है, उस काम को कोई दूसरा कर जाता है तो उसे दूसरे की अचीवमेंट कहा जाता है। कम से कम पहला बन्दा तो उसे अचीवमेंट ही कहेगा। तो क्या लड़कियों से बात करना एक अचीवमेंट है? मुझे ना पता। पर मुझे बेहतर ख्याल सोचने की जरूरत है।

आज कॉलेज आने का ख्याल नाहक किया। इतने दिनों का आलस चढ़ा हुआ है, उसे एक दिन में उतार फेंकना मुश्किल है। बेंच पर बैठे-बैठे उबासी आती है। उमस में गर्मी भी ज्यादा है। दिन कैसे कटेगा? मुझे ना पता।

“निताश भाई आज कॉलेज चलना है?”
सवेरे की पहली बात मुझे आज आशीष की सुनाई दी थी।

आशीष मेरा एक मित्र है। वो कॉलेज के उन मनुष्यो में है जो मेरी बातें सुनकर मुझसे दूर ना भागे थे। वो मेरे साथ बना रहा, और कब वो जान-पहचान से आगे बढ़कर क्लासमेट और फिर मित्र बन गया, इसका मुझे ना पता। मेरा कॉलेज में एक मित्र है। वो आशीष है।

अभी मैं बेंच पर बैठा उसी का इंतजार कर रहा हूँ। बात करने वाले लड़के-लड़कियां निकल चुके है। लड़कियों से बात करना क्या अचीवमेंट है? ये बात मेरे दिमाग में घूम रही है।

लड़कियों से बात करने की चुल्ल जवानी का एक रोग है। शायद ये इसका लक्षण है। मुझे ना पता। बचपन का पता है कि दूसरे दर्जे में इनसे पेंसिल मांगने पर भी अन्य लड़के मजाक बना देते थे। वो उस वक़्त हंसते थे। बस हंसते रहते थे। उनकी हंसी से सतर्क होकर मैंने लड़कियों से बात करना त्याग ही दिया था। त्याग महान बताया गया है। ये त्याग उस समय मुझे महान लगा था, पर दर्जे का नम्बर बढ़ते-बढ़ते जब दस पर आ रुका और मुझ पर हंसने वाले खुद हंसकर लड़कियों से बतियाने लगे थे, उस वक़्त मैं झेंपकर रह गया था। उनकी हंसी और हंसने में परिवर्तन आया था। और वो यहां तक सीमित ना था कि वो पहले मुझ पर लड़कियों से बात करने पर हंसते थे और बाद में उनके साथ हंसने लगे थे। वो हंसी मेरे ऊपर ही केंद्रित रही थी। मैंने झेंपना उस हंसी से ही सीखा था। अब कॉलेज के दूसरे साल में झेंपना तो कम हुआ है , पर बातों की कमी अभी भी है।

बेंच पर बैठे, दूर से आशीष आता दिखता है। उसके साथ अजंता भी है। अजंता का दिखना कॉलेज में मेरे झेंपने का एक कारण है। ये कारण पहले साल से बना हुआ है। मुझे याद है पहले साल में जब उसे देखा था तो मैंने बात करनी चाही थी। हम क्लास में बैठे थे और उसने स्टेज पर एक ‘ब्यूटीफुल स्पीच’ दी थी। उस वक़्त उसे इम्प्रेस करने की चाह में मैंने सबसे ज्यादा तालिया बजायी थी और आशीष से भी बजवाई थी। मेरे तालिया पीटने से वो इम्प्रेस तो ना हुई, पर वो स्पीच खत्म करके आई तो मैं बात करने को खड़ा हुआ था। बेंच पर खड़े होते ही मुझे चेहरे दिखे और मैं झेप गया था। लेक्चरर ने मेरे बेंच पर खड़े होने का गलत अनुमान लगाया था और मुझे आगे बुला लिया था। आगे जाकर उन्होंने मुझे सिंधु घाटी सभ्यता पर अपने विचार रखने को बोला था। ‘सिंधु घाटी सभ्यता एक प्राचीन सभ्यता है, जो सिंधु नदी के किनारे किसी समय फली-फूली थी। प्राचीन वक़्त होते हुए भी वो कई चीजों में हमसे आधुनिक थे, जैसे कि नगर में गन्दे पानी की निकासी हेतु पक्की नालियों का प्रबंध, सभी के रहने के लिए पक्के घरो का प्रबंध इत्यादि। आधुनिक समय में हमे उनकी सभ्यता के अवशेष मिले है। पर इस सभ्यता का अंत,  कुदरती कारण या बाहरी मनुष्यो का हमला, इसके क्या कारण है। ये सवाल आज भी अचंभित करता है। सिर्फ मुझे ही नही, पर सभी को जिनके सामने इसका जिक्र होता है।’ ये सब विचार मेरे मन में थे। मैंने इन्हें बोलने के लिए मुख भी खोला था। सोचा था कि जल्दी विचार बाहर निकलकर इसे बंद कर लूंगा। बचपन में मां ने मेरे ज्यादा बोलने पर मुझे बंदर कहा था। मुझे स्टेज पर सभी के सामने बंदर ना लगना था। पर मुख खोलने पर विचार ना आये, सिर्फ सांस आयी। मैं शायद बंदर जैसा लगने लगा था, क्योंकि क्लास में सारे बच्चे हंसने लगे थे। लेक्चरर ने ये सब देखकर मुझे वापस जाने को बोल दिया। वापस आने पर देखा कि आशीष हंसकर अजंता से बात कर रहा है।
हा-हा, ही-ही, ये मेरा बैकग्राउंड म्यूजिक बन गया था। पूरी क्लास मेरे ऊपर हंस रही थी। आशीष भी, अजंता भी। उनकी हंसी मुझे विचलित ना कर रही थी, पर मेरे खुद के विचारों का बाहर ना आना। उस दिन के बाद मैंने अजंता से बात करने का ख्याल छोड़ दिया। सिर्फ ख्याल के सोचने पर पूरी क्लास हंसने लगी थी, विचारो ने मुझे छोड़ दिया था। उससे बात करने को हिम्मत की तो पूरा कॉलेज हँसेगा। ऐसा सोचकर और उसे देखकर मैं झेंप गया था।

••

आशीष मेरे पास आकर बैठ गया। अजंता ने जाते हुए हाथ हिलाया था, पर वो शायद आशीष के लिए था। झेंपते हुए मैं दुनिया भूल जाता हूँ।

“भाई तू लड़कियों से बात कैसे कर लेता है?” मैं बोला, “मतलब इतना आसान तो होता ना होगा?”

“भाई आसान है। कुछ मुश्किल ना है।”, आशीष बोला।

“भाई फिर कौनसी बात करता है तू कि लड़की हंसी रहती है। कोई जोक सुनाता है क्या?”

ये सुनकर आशीष हंसने लगा।

“चूतिये हंस मत। पूरी बात बता।”, आशीष अजंता ना था, जिसका हंसना मुझे झेंप करने को मजबूर करता।

“सच भाई, कोई जोक ना है। लड़की से बात करना कोई मुश्किल ना है। बस तू बात कर, वो भी करेंगी।”, आशीष बोला।

“बात तो तेरी सही है। अच्छा यूं बता कि ये खुद भी किसी से बात करती है क्या?”

“खुद भी बात करती है भाई। अभी अजंता को देखा तूने। वो मुझे गेट पर मिली और खुद बातें करने लगी।”

“भाई मीठी मिर्च मत खिला। मैंने तो देखा उनको बात की शुरुआत करते।”

“भाई अब तू फुद्दू बात कर रहा है। तू साले देखेगा क्या, तेरी नजर उस फ़ोन से ना हटती कभी।”

“ना भाई ऐसा थोड़ी है।”, आशीष सच्ची बात बोल गया था। मैं हड़बड़ा उठा था।

“ऐसा ही है भाई। तू फ़ोन से तो हटता ना, लड़की से क्या बात करेगा?”

“भाई ऐसा ना है। वो कई बार फ़ोन में अपडेट आ जाती है तो कई बार मैं ऑनलाइन फॉर्म भर रहा होता हूं।”

“भाई अपडेट तेरी कॉलेज में ही क्यों आती है, घर क्यों ना आती।”

“भाई मुझे ना पता।”

“मुझे पता है। तू लड़कियों से शर्माता है।”

“भाई मैं ना शर्माता किसी से। बस बात इतनी है कि समझ ना आता कि उनसे क्या बात करूं?”

“तू मुझसे कौनसी बात करता है? भाई लड़कियों से बात करने को इतना ना सोचना चाहिए।”

“भाई सोचना चाहिए। कोई बेवकूफ बात कही जाए और वो हंस दे तो।”

“तू अजीब है यार। अभी तू उन्हें हँसाने की बात कर रहा था और अभी ना हँसाने को कह रहा है। भाई वो हंस दे तो तू भी हंस और आगे बात कर।”

“ना भाई। इतना आसान ना है।”, इतना कहकर मैं खड़ा हो गया।, “चल अब, पहला लेक्चर अटेंड करना है।”

वो भी मेरे साथ चल पड़ा।

•••

कॉलेज के दूसरे साल का पहला लेक्चर। मेरे साथ वाले बेंच पर अजंता बैठी है। वो अपनी सहेली से बातें करती है। आशीष अगले बेंच पर बैठी लड़की से बातें कर रहा है। लेक्चरर औरंगज़ेब की कुछ कहानी बता रहा है।

अजंता अब लेक्चरर की और देख रही है। शायद उसे औरंगज़ेब की कहानी अच्छी लग रही है। जब वो सहेली से बात कर चुकी थी, तब उसने नजर घुमाकर पूरी क्लास देखा था। शायद मुझे भी देखा था। उस पल झेंपने का मन ना था, बस किसी तरह बात करनी थी।

दूसरा साल कैसा निकलेगा? लड़कियों से बात करना क्या मुश्किल है? औरंगज़ेब इतना इंटरेस्टिंग क्यों है? ऊपर कोई खुदा है जो इंसानो की मदद करता है, उनकी बात सुनता है? इन सवालों के क्या कोई जवाब है?

मुझे ना पता।

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सुरेन्दर के सपनो वाली चुल्ल

दिनों की लड़ी लगी पड़ी है। पहला जाता है, दूसरा आता है। वार बदलते है, पर इनके टाइप एक जैसे रहते है। सारे दिन एक जैसे है। मैं तुम्हे ये सब इसलिए नही बता रहा कि मुझे तुमसे सहानुभूति चाहिए। मुझे अपना दुःख भी ना बांटना है। बस बात इतनी है कि पूरे दिन में जो मजाक होते है, उन पर मैं रोता हूँ।

आज शिवरात्रि है। सवेरे मैं मंदिर के बाहर खड़ा कांवड़ देख रहा था कि सुरेन्दर टकरा गया। उसकी आँखें सुल्फि सी थी, जैसे की सोया ना हो। निताश तुझे उससे बात ना करनी चाहिए थी, ये बात अब मेरे दिमाग में अब आती है। पर बात मैंने ना की थी। वो खुद मेरे नजदीक आया था और अपनी सपनो वाली बात बताई थी। कि किस तरह उसने अपने घूमने-फिरने का सपना पूरा किया था और कैसे वो दोबारा एक अलग जगह घूमने जायेगा। ये दुनिया के बाशिंदे है। इन सबकी तशरीफ़ में चुल्ल रहती है कि इसको जब तक कही टेका ना जाए वो शांत ना होती है। उसने अपनी चुल्ल मुझे दे दी। दिन अंत होता है, शिव की सौगंध है कि सब सच कहूँगा। मैं घर बैठा अपने कॉलेज खुलने की राह देखता काटता हूँ। घूमना-फिरना मेरा गाँव के फ्लैटों वाले रोड तक सीमित है। अब मुझे जो दुनिया देखने की ख्वाहिश है, ये पूरी ना होगी।

कोसने को मेरे पास उस सुरेन्दर को लेकर कुछ नही है। यूँ तो मैं अपने मन को कोस सकता हूँ, पर मन मेरा है। अपना है। सुरेन्दर मनीपुर का सबसे बकवास इंसान है। उसके मुँह से पहले बीड़ी निकलती है, फिर उसका धुँआ और अंत में उसकी बकवास। पहले उसकी बकवास सपना डांसर की नयी वीडियो ढूँढने को लेकर थी और अब सपना पूरा करने की है। उस पर एक नजर से कतई ना लगता है कि उसके कुछ सपने होंगे। कमतर आंकना भूल है। पर मेरे गुरूजी कहते थे कि “एस्पेक्टशन एंड एक्सेप्शन आर ऑलवेज देयर।” सुरेन्दर उन मानुसो में से ना है जिनके सपने घूमने-फिरने जैसे होते है। ये शौक शहरी चोंचला है। ये उन तक ही अच्छा है। पर इसके किटाणु संक्रामक है। बातों से फैलते है। सुरेन्दर ने घूमने-फिरने के किटाणु मुझे दे दिए है।

मैंने घूमना-फिरना दूर से देखा है। मेरे दोस्त कही ना कही घूमते रहते है। मनाली, लेह, लद्दाख, दार्जिलिंग फलाना धिमकाना। ये जगह मैंने किताबो में देखि है। वो वहां असल में घूमते है। मेरी बातों में जलन की बदबू दिखे मगर वो है नही। वो मेरी घुटन है। मेरी आसपास की घुटन। ये मुझे अच्छे से जानती है और मैं इसे। इस घुटन से बचने का तरीका है सैर सपाटा। ये बात मुझे पता है। पर इस सैर सपाटे की दवादारू महंगी पुड़िया है। सपने ऊँचे भले ही देखने बढ़िया आदत है। पर ऊँचाई महंगी होती है। यथार्थ में जमीन पैरो के लिए और नीचे मनुष्यो के लिए एक खाली जेब बड़ा ही बदसूरत आइना माफिक है।

लाईनो के मध्य अर्थ मत ढूँढना। ग़ुम जाओगे। अनेक बातों की एक बात है कि मैं एक आम आदमी है। मेरी साधारणता मेरी विशेषता है। मैं जिस चीज को छूता हूँ, वो साधारण हो जाती है। सपने महंगे है। मैंने उन्हें देखा है, पर छुआ नहीं। मैं मित्रो के साथ मॉल में घूमा हूँ। शोरूम्स में  ग्लास परे मॉडल को ताड़ा है। उनके पहने कपड़ो की कुशल कारीगरी और कपड़े की बुनावट को देखा है। शोरूम की लाइट्स और उसकी ए०सी० वाली ठण्डी हवा को महसूस किया है। उनमे आने वाली जनता के ढंग को देखा है। लड़कियों के गोरेपन पर उनकी हंसी को देखा और सुना है। मैकडोनाल्ड्स और डोमिनोस जैसे जगह पर खानपीन के वस्तुओं पर सोचा है। मॉल आगे खड़ी मर्सीडीज, ऑडी और BMW की लम्बी कारों को सराहा है। सिनेमा में एक बार घूमकर देखा है। सब कुछ ‘ए क्लास अपार्ट’ है। अब मेरे बताने के ढंग के ऊपर ना जाना कि मेरा तुम्हे बताना मेरी मजबूरी की पुकार है कि मुझे तुमसे मदद चाहिए। मुझे सब अच्छा लगा। परन्तु अच्छे लगने का अर्थ ये नहीं है कि उस वस्तु की जरूरत है। जहर का स्वाद भले ही श्रेष्ठ हो, परंतु उसे पीना श्रेष्ठ नहीं है। कुछ ऐसा ही हिसाब मेरा इन सब चीजो से है। गाँव में रहते हुए छोटी दुनिया में छोटी सोच विकसित की। अब ये जो शहरी कल्चर है, ये चोंचला है। जनता इसे फॉलो करती है क्योंकि वो कर सकते है। पर इसका मतलब ये नहीं की वो सब के लिए है। विज्ञापन देखना बुद्धि भंग करता है। अनावश्यक चीजो को जिंदगी का अभिन्न अंग दर्शाना इसका मकसद है। कुछ ऐसा ही इन सब शहरी चोंचलो के साथ है। इनका शहरी कल्चर इनकी शहरी जिंदगी का विज्ञापन है। मेरी सोच का दायरा सीमित भले हो, परन्तु सीमित सच बड़े झूठ से सही है।

सुरेन्दर बकवास इंसान है। एक दिन में सपना देखना और उसे पूरा करना, प्रेरणा मनुष्य को क्षणिक प्रेरित कर सकती है। कि वो अपने से ऊपर उठे और आगे बढे। परन्तु प्रेरणा दिमाग का नशा है। जितनी जल्दी चढ़ता है, उतनी ही जल्दी उतरता है। उसके घूमने-फिरने का बताना किस चीज की प्रेरणा थी, मुझे ना पता। वो अपनी फेंकू प्रवृति के लिये प्रसिद्ध है। उसका पिछला स्वप्न सपना डांसर के साथ पड़ोस के लखन के ब्याह में ठुमके मारने का था। उसका वो स्वप्न सच ना हुआ, पर उसने गाँव में सपना डांसर को प्रसिद्ध जरूर करवा दिया था।

मैं दिन को बैठकर देखूँ तो कुछ नया ना है। ये घूमने-फिरने की जो चुल्ल है, ये कल तक उतर जायेगी। फिर भी अभी ये दिमाग में घूम रही है, तो कुछ अजीब है। मन चंचल है। घूमने की सोच से खेलकर जब ऊब जायेगा, तो जल्दी ही कुछ नया पकड़ लेगा। बस मुझे तब तक अपने को संभालकर रखना है।

उपरोक्त लाईनो में स्वप्न है, बातें है, मज़बूरी है, दोस्त है, शौक है, गाँव है, शहर है, इनके लोग है, कार है, मदद है, बीमारी है, दवाई है, रूपए है, चोंचले है, सब है। बस वक़्त की कमी है।

मुझे सपनो का डांसर बनना है

मैं सुरेन्द्र हूँ। इस वक़्त गाँव के टेसन पर बैठा हूँ। मेरी कमर में दर्द है और गांड फटी पड़ी है।

कल रात मैं अपनी नौकरी पर था। मैं बिल्डिंग का एक पूरा चक्कर लगाकर कुर्सी पर बैठा था। फ़ोन हाथ में था और मैं यूटूब पर सपना डांसर की नई वीडियो ढूंढ रहा था। फ़ोन पर उसकी वीडियो और फ़ोटो आ रहे थे। जितनी आई, सारी देख रखी थी। मैं जितना नीचे जाता, उतनी ज्यादा वीडियो आती। उनमे से एक पर मेरा ध्यान गया। उस पर सपना को फोटो नही थी। मैं बोर हो रहा हूँ, सोचकर उसे चलाया। फिर उसमे एक लुगाई बोली। उसने सपनो का डांसर बनने को कहा। उसने बात की कि सपनो का पीछा करना चाहिए। कुछ देर तक उसकी बात चली, फिर मैं बिल्डिंग का चक्कर लगाने को चल दिया।

नौकरी करके मैं घर पहुँचा। मैं थका हुआ था। बिजली नही थी। कपड़ो से पसीने की बदबू आ रही थी। मैंने बीड़ी चसाईं और रोटी तोड़ी। सोने को लेटा तो बार-बार वीडियो पर ध्यान जाता। सपनो का डांसर बनो। उनका पीछा करो।

मैं सो गया।

•••••

आज सुबह अजीब लग रहा था। सपनो का डांसर बनो, उनका पीछा करो। बातें मन में जम गयी थी। मेरा सपना क्या है? मुझे ना पता था। छोटी उम्र में भागना, खेलना और घूमना पसंद था। बड़ा हुआ तो बीड़ी, लड़की और घूमना पसन्द था। पिताजी की साइकिल पर पूरा गाँव घूमना, पैदल चलकर अगले गाँव जाना, जोहड़ में भैसों को घूमाना, लड़कियां घुमाने के लिए उनकी क्लास के बाहर घूमना। ये सब घूमना-घुमाना मुझे अच्छा लगता था और शायद यही मेरा सपना था।

आज मैं नौकरी की जगह टेसन गया। वहाँ मैं दिल्ली की रेल में चढ़ लिया। मुझे सपना आज ही पूरा करना था।

रेल में भीड़ थीं। डब्बे के गेट पर भी खड़ा होना मुश्किल था। डब्बे के पाखाने महक मार रहे थे। हवा उनसे होकर आती। भीड़ का पसीना भी नाक तक आता। हालत बुरी थी, पर सहनी पड़ी। दिल्ली का टेसन कब आया, मुझे पता ना चला। मैंने उतरकर कमर पकड़ ली थी। दर्द हो रहा था।

मैंने घर से चलते चाय ना पी थी, टेसन पर याद आया। चाय की तलब थी। टेसन पर एक टपरी पर गया और चाय के लिए बोला। उसने मुझे एक कप में चाय दी। कप मैंने देखा, मेरी छोटी ऊँगली से भी छोटा था। मैंने चाय का पतीला और छलनी देखी। छलनी पर चायपत्ती काली का जगह भूरी पड़ी थी और उन पर मक्खी उड़ती थी। उस चायपत्ती के ढेर में शायद मक्खी भी पड़ी थी और बाकी मक्खी अपनी साथी को ढूंढती उड़ती थी।  बाहर ऐसा ही है, ये सोचकर मैंने चाय पी। चाय का एक घूँट लेने पर पता चला, वो चाय का गर्म जूस था। जी में आया कि कुल्ला करके इस टपरी वाले के मुँह पर फेंक दूँ। मैंने ऐसा कर भी देता, पर 10 रूपए की चाय बर्बाद ना करनी थी।

मैं घर से घूमने को निकला था। चीजें देखने निकला था। दिल्ली के टेसन पर जो पहली चीज मैंने देखी, वो भीड़ थी। बस भीड़। उसमें दुनिया थी। आदमी थे, औरत थी, भिखारी थे और कुत्ते भी थे। उसमे गन्दगी भी थी। मैंने ये सब देखा पर ये चीजें मैंने गाँव में भी खूब देखी थी। पर यहाँ एक चीज अलग थी, औरतें। गाँव की लुगाई सदा ढकी रहती थी। पर यहाँ अलग था। यहाँ इनकी चमड़ी गौरी थी। और ये ढकी हुई भी ना थी। आदमी वाले कपड़े पहन रखी थी। आदमी वाले कपड़ो में उनका सब नजर आता। बाहर ऐसा ही है। मैं ये सब पूरे दिन देखता, पर मुझे दिल्ली भी घूमनी थी।

टेसन से निकलकर मैं टम्पू वाले के पास गया और उसे चिड़ियाघर जाने को बोला। वो चल दिया। उसका टम्पू बढ़िया था। मैं कमर टिकाकर बैठा ताकि कमर में दर्द ना हो। उसका टम्पू आवाज़ भी कम करता था और तेज था। सब सही था, पर हरामी ने किराये के 70 रूपए लिए। मैंने 10 रूपए की कही, पर वो ना माना। पूरे 70 रूपए लिए। पर दिल्ली बड़ा शहर है और यहाँ ऐसा ही है। टेसन वापिस पैदल जाऊंगा, ये सोचकर मैं चिड़ियाघर के अंदर गया।

मैं चिड़ियाघर में गया। चीते, शेर, हाथी, बहुत सारे जानवर थे। अब तक इनका फ़ोटो देखा था। वो सब सही थे, पर वो जाली किसलिए लगा रखी थी। बचपन में पिताजी खेतों पर कांटे वाले तार लगाते थे। रात को गाय, भैंस खेत में घुसकर फसल खाती थी। उनसे बचाने के लिए पिताजी तार लगाते थे। ये जाली भी इसलिए ही लगायी होगी ताकि शेर बाकियो को खा ना ले। पर बाकी जानवर तो फिर खुले घूमने चाहिए, बिलकुल मेरी तरह। मैं ये सब सोच रहा था। मुझे भूख भी लग रही थी। इन चिड़ियाघर वालो को यहाँ मुर्गे भी रखने चाहिए। बाकी जानवरो के खाने का हिसाब तो सही है पर कुछ यहाँ पर इंसानो का भी तो होना चाहिए।

मैं चिड़ियाघर से बाहर आ गया। मुझे भूख लगी थी। सपना पूरा करने के चक्कर में मैंने सुबह रोटी भी ना खायी थी। अब दोपहर हो आई थी। मुझे भूख जबरदस्त लग रही थी। अब मुझे कुछ खाना था। सड़क के किनारे एक ठेला था। वो छोले-भठूरे बना रहा था। एक प्लेट का दाम 40 रूपए था। मौल-करने की हिम्मत ना थी। बाहर ऐसी भूख थी। मैंने उसे एक प्लेट के लिए कह दिया।

उसने मुझे एक प्लेट में थोड़े से छोले और दो भठूरे दिए। कोने में थोडा प्याज भी था। उन छोले-भठूरो की शक्ल 40 रूपए की ना थी। भठूरे साबुन के बुलबुले जैसे थे। लगता था कि फूंक मारी तो उड़ जायेंगे और ऊपर जाकर फट जायेंगे। छोले भी ऐसे ही थे। पूरी सब्जी में बस तीन या चार छोले के दाने थे। और सारा भूरा पानी। मैं ना खाता, पर भूख लग रही थी और 40 रूपए भी बर्बाद ना करने थे।

मैंने छोले-भठूरे खाये। मैं चल दिया। मेरे पास बीड़ी भी नही थी। सपना पूरा करने के चक्कर में घर ही रह गयी थी। और अब पेट में गैस बन रही थी। मुझे बीड़ी पीनी थी। मैंने आसपास देखा। थोड़ी दूरी पर एक खोखा था। मैं खोखे पर गया और शिव के मंडल के लिए कहा। उसने   अपने सुपारी वाले दांतो के बीच से उसका रेट 8 रूपए बताया। इतना सुनना था और मुझे गुस्सा आ गया। मैं उसकी गांड तोड़ता। बेहतरीन तोड़ता। शिव का मंडल गाँव में 5 रूपए का और 512 वाला मंडल 10 का मिलता है। ये साला दिनदहाड़े लूट रहा था। मैं उसको पीटता, पर पेट में गैस बन रही थी। बाहर ऐसा ही है, सोचकर मैंने मंडल लेने के लिए रूपए निकाले। बस 50 रूपए बचे थे। सुबह सपना पूरा करने के चक्कर में मैं रूपए लेना भी भूल गया था। इसका रोना मैं रोता, पर इससे पहले मुझे बीड़ी पीनी थी।

मेरे पास रूपए कम थे। मुझे दिल्ली में और घूमना था। ये हो ना पाता, इसलिए मैं वापस टेसन की तरफ चल दिया। दोपहर में बड़ी दूर पैदल चलना पड़ा। गैस भी हो रही थी। पसीने लगातार आ रहे थे। कमर का दर्द भी वापस आ गया था। पैर उठाना मुश्किल था। किसी तरह टेसन पंहुचा।

टेसन पर पहुँचकर देखा कि 1 बज गया था। गुडगाँव वाली रेल 3 बजे आती। मैं एक बेंच पर जाकर बैठ गया। कमर में दर्द था।

3 बजे रेल आई तो उसमें चढ़ लिया। बिल्कुल सुबह वाला हाल था। भीड़ थी, पसीना था और पाखाने वाली मुँह को लगती हवा। बस कमर दर्द नया था। भीड़ में बीड़ी भी ना पी गयी। हाल गर्मी और भीड़ ने पहले ही बुरा कर दिया था, जब रेल हर एक टेसन पर रूकती तो भीड़ और ज्यादा दिमाग ख़राब करती। बाहर वाले अंदर आने को धक्का मारते और अंदर वाले बाहर जाने को धक्का मारते। इन धक्को, भीड़, पसीनें और गर्मी की वजह से गुस्सा आ रहा था। मैं एक-एक करके सबकी गांड तोड़ता, पर भीड़ में हिलना भी मुश्किल था। सोचा, बाहर ऐसा ही है।

गाँव के टेसन तक आते भीड़ कम हुई, पर सीट ना मिली। टेसन पर उतरा तो राहत मिली। 5 बज रहे थे। मेरी कमर अब और दर्द कर रही थी। पर अभी घर ना जा सकता था। घर जाता तो पिताजी डण्डा करते। मैं टेसन पर ही एक बेंच पर बैठ गया।

मैं बैठा था। सपनो का डांसर बनो और उनका पीछा करो। आज मैंने कौनसा सपना पूरा किया, मेरे समझ में ना आया। और ये घूमने का सपना मेरा कब था? मैं कौन से सपनो का डांसर बना?

मैं रात तक बैठा रहा। सपनो के डांसर ने मुझे बढ़िया चुतिया बनाया था।

बेटा, तूने सारी इज्जत लुटवा दी

मनीपुर में बीते सालों में पंचायत के चुनाव ना हुए थे। आसपास के गाँवों में हो चुके थे। पुराने सरपंच, पंचो को देखकर गाँव की जनता भी बोर हो गयी थी। पहले, उनको देखकर गांववाले जी-जी करते ना रुकते थे। जी आओ बैठो, जी सरकार हुक्का पी लो, जी सरकार बताओ नयी ताजा, जी म्हारा काम करवा दियो; सरपंच के लिए ये सब रोज की बात थी। बीते दिनों में ये सब चुकने लगा था। हुक्का तो दूर की बात, लोग बात भी मुँह बनाकर करने लगे थे। सरपंच मूर्ख ना था। वो सच जानता था। गांववाले उससे ऊब चले थे। पर चुनाव करवाना सरकार का कार्य था, इसलिए वो मजबूर था।

तो जब गाँव में चुनाव होने की खबर फैली, तो सारा गाँव खुश हुआ। सरपंच भी खुश था। अब उसे दोबारा इज्जत मिलने वाली थी।

चुनाव की खबर से सारा गाँव खुश था। पूरे गाँव का माहौल त्यौहार वरगा हो गया था। बैठके जमने लगी थी और हुक्के की मांग बढ़ चली थीं। चुनाव में कौन खड़ा होगा, किसकी क्या चाल रहेगी, कौन जीतेगा; बैठकों में इन मुद्दों पर हुक्कों की गुड़गुड के बीच जोर से बहस होती। इन बैठकों में बुजुर्ग अपनी खाट और पीपल के पेड़ तक सीमित रहे। युवा शक्ति इन्हें ठेकों तक लेकर गयी।

इस चहल के बीच सरपंच अपने घर पर रहा। वो उदास था। सरपंच रहते हुए उसे इज्जत की आदत पड़ गयी थी। अब उसे वो दोबारा ना मिलने वाली थी, इसलिए वो उदास था। चुनाव उसकी जगह उसका बेटा हरचंद लड़ने वाला था।

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हरचंद चुनाव को लेकर उत्साहित है। गाँव का सरपंच बनना उसका सपना है।

पिछले चुनावो में जब उसके पिता सरपंच बने, तो उसे कोई फर्क ना पड़ा था। सरपंच बनना कोई ऐसी उपलब्धि ना थी, जिस पर फकर किया जाए। उसकी यह सोच थी। पर इसे बदलते देर ना लगी थी। सरपंच बनते ही उसके पिता को ज्यादा इज्जत मिलने लगी थी। गलियों में चलते लोग राम-राम करते। हुक्के का पहला घूंठ उन्हें मिलता। ग्रामीण उन्हें सदा घेरे रहते। इज्जत का असर उनके घर पर भी पड़ा था। उसकी लिपाई-पुताई तो हुई ही, एक नया कमरा भी बना था। इज्जत भरपूर मात्रा में मिल रही थी, और सरपंच उसे चटकारे लेकर बटोर रहे थे। हरचंद ने इज्जत की पॉवर को अचंभित होकर देखा था। प्रभाव उस पर स्वाभाविक था। उसने गाँव का अगला सरपंच बनने की बात ठान ली थी।

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चुनाव में गाँव सरपंच के पद के दो उम्मीदवार आगे आये। पहला हरचंद, और दूसरा अर्जुन।

यह चुनाव पिछलों से भिन्न था। पिछले चुनाव बड़े-बुजुर्ग लोगो तक सीमित रहे थे। कारण दिया जाता रहा था कि गाँव का सरपंच एक अनुभवी और पढ़ा-सीखा हुआ इंसान होना चाहिए। एक जिसने घाट-घाट का पानी पिया हो और वक़्त देखा हो। पिछले चुनावों तक ये कारण चला। इस चुनाव में सरकार ने इस्कूल पढ़े-लिखे होने का नियम अड़ा दिया था। तर्क था कि सरपंच इंसान पढ़ा ना पर अक्षर पढ़ा हो। इस नियम के आगे सारे बुजुर्ग फेल हो गए थे। अब चुनाव युवा शक्ति लड़ रही थी।

हरचंद अपनी जीत को लेकर आश्वस्त था। अर्जुन को पूरा गाँव जानता था। वह सदा ठेकों या खेतों में पड़ा रहता था। ठेकों पर रहता तो दारू और खेतो पर सुट्टा पीता। वो भारी जेब वाला दिलदार था, तो गाँव की आधी युवा शक्ति उसके साथ रहती। उसके चुनाव लड़ने की बात से वो अचंभित हुआ था, पर खुश था। गांववाले कभी एक नशेड़ी को सरपंच ना बनायेंगे, वो ये सोचकर खुश था। अर्जुन के चुनाव लड़ने ने उसके सरपंच बनने का कार्य आसान कर दिया था।

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मनीपुर गाँव में चुनाव जीतने की तैयारियां शुरू हो चुकी है।

हरचंद को तैयारियों के लिए ज्यादा सोचना ना पड़ा था। बड़े-बुजुर्गो से उसे कोई मतलब ना था। उसके हिसाब से बड़े-बुजुर्गो का कार्य बस हुक्का पीना और खाट पर पड़े-पड़े शिकायत करना था। बदले में उसने किसी बड़े-बुजुर्ग के ना तो पैर छुए ना ही उन्हें इज्जत दी। उसके पिता सरपंच ने उसे चेताने की कोशिश की। बेटा बड़े लोगो की इज्जत करनी चाहिए, पिता सरपंच ने उसे कहा था। पर हरचंद ने उन्हें अनसुना कर दिया था। उसने अपना सारा ध्यान युवा शक्ति को खुश करने पर लगा दिया था। युवा शक्ति के हर वाहक को उसने अंग्रेजी दारु की बोतल तो दी ही, पर चकणे की दुकान पर अपने नाम से उनके लिए खाता भी खुलवा दिया था। उसने बड़े-बुजुर्गो का ख्याल ना किया, पर उन्हें मना भी ना किया। दिन में एक दो बुजुर्ग लोग जब उसके पास आते, तो खासी-ठण्ड की वजह बताकर लिटिल-लिटिल कहके बोतल ले जाते थे। उनका तर्क था कि लिटिल-लिटिल खाँसी का इलाज कर देती है।

हरचंद अपनी तैयारियों में लगा हुआ था। वही उसका प्रतिद्वंदी अपनी दिनचर्या में लगा रहता। उसने चुनाव जीतने के लिए कोई कार्य ना किया। रोज उठकर या तो ठेकों पर जाता या फिर खेतों में रहता। ऐसा प्रतीत होता था कि उसे चुनाव से कोई फर्क ना पड़ा था।

एक दिन, हरचंद अपने घर के बाहर खाट पर बैठा था। अभी एक पेटी युवा शक्ति को देकर आया था, तो आराम कर रहा था। सामने से अर्जुन आता दिखा तो बोला, “अर्जुन आज इस गली किस तरह?”

“भाई तुझसे मिलने आया बस।”, अर्जुन ने उत्तर दिया।

“आजा भाई। बैठके बात करेंगे।”

“और चुनाव की तैयारी कैसी चल रही है तेरी?”

“बस भाई सही है। तू बता।”

“भाई मैं भी कर ही रहा हूँ। सुन, कल पंचायत करवाई है। तुझे भी आना है। दोनों अपने-अपने विचार गांव के आगे रख लेवेंगे।”

“अरे भाई पंचायत तो ना आया जावेगा। खैर कुछ सेवा कर सकूँ तो बता दे?”

“यार ठेके पे बोतल ना मिल रही। तेरे पास बताई।”

इसके पश्चात, अर्जुन बोतल लेकर अपनी राह चला गया। हरचंद खाट उठाकर घर के अंदर चला गया।

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आज पंचायत है। पूरा गाँव पीपल के पेड़ तले इकट्ठा हुआ है। अर्जुन आराम से बैठा है। हरचंद नदारद है।

“हरचंद कहाँ है”, एक बुजुर्ग पूछते है।

“ताऊ घर पे ही है। बुलाया पर वो ना आता।”, एक युवा शक्ति का वाहक बोला।

“तो कोई ना। अर्जुन बेटा, तू शुरू कर।”

अर्जुन अपने स्थान से खड़ा हुआ। उसकी आँखें लाल है।

“गाँववालो, मैं अर्जुन हूँ। इस गाँव का निवासी। मेरे युवा भाइयो को मेरा नमस्कार, तो बड़े-बुजुर्गो को मेरा प्रणाम। पीछे बैठी मेरी माताओ को मेरा चरणस्पर्श। मैं सरपंच पद के लिए उम्मीदवार हूँ। मेरे पास कहने को ज्यादा कुछ नहीं है। आप ही की तरह, मैं भी इस गाँव में रहता हूँ और देखता हूँ कि इसमें कितने अभाव है। बच्चे इस्कूल नहीं जाते, गलियो में पानी भरा रहता है, बिजली मुश्किल से आती है इत्यादि। ये सब छोटी मुसीबतें है। सबसे बड़ी मुसीबत है कि गाँव का नौजवान नशे में फंसा है। इसकी वजह से वह निकम्मा हो गया है। गाँववालो, अगर मैं सरपंच बनता हूँ तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इस नशे की बुराई को जड़ से मिटाऊंगा।”

ये कहकर अर्जुन बैठ गया। गाँव के बुजुर्गो ने हरचंद के लिये दोबारा बुलावा भेजा, पर वो ना आया। अंत में उसके पिता सरपंच गए, पर वो फिर भी ना आया।

“वो पंचायत और गांव को कुछ ना समझता है। ऐसा सरपंच अपने किसी काम का ना।”, एक बुजुर्ग बोले।

“सही कहते हो आप। और तो पूरे गाँव में ये नशे वाली बुराई उसी की तो है।”, एक और बुजुर्ग बोल पड़े।

इसके बाद पूरा गाँव कुछ-कुछ बोलता रहा। इसका अंत अर्जुन को सबकी सहमति से सरपंच बनाकर हुआ।

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रात है।

हरचंद अपने कमरे में बैठा है। किवाड़ बंद है। किवाड़ पर हल्की दस्तक देकर उसके पिता बोलते है,
“बेटा, तूने कमाई हुई साड़ी इज्जत लुटवा दी।”