कबाड़ी जिंदा होता तो और खुश होते

आज रविवार है। घड़ी की सुइयां चलते हुए आवाज़ करती है। इनकी टिक-टिक के अलावा, मनीपुर गांव में आज शांति है। Continue reading

भाई, लड़की से बात करना मुश्किल ना है

लड़की से बात करना कितना मुश्किल है?

मैं इस हलचल को बेंच पर बैठकर देखता हूँ। मेरे सामने अनेक लड़कियाँ है, उनसे बात करते लड़के है। जब कोई काम बन्दा खुद ना कर पाता है, उस काम को कोई दूसरा कर जाता है तो उसे दूसरे की अचीवमेंट कहा जाता है। कम से कम पहला बन्दा तो उसे अचीवमेंट ही कहेगा। तो क्या लड़कियों से बात करना एक अचीवमेंट है? मुझे ना पता। पर मुझे बेहतर ख्याल सोचने की जरूरत है।

आज कॉलेज आने का ख्याल नाहक किया। इतने दिनों का आलस चढ़ा हुआ है, उसे एक दिन में उतार फेंकना मुश्किल है। बेंच पर बैठे-बैठे उबासी आती है। उमस में गर्मी भी ज्यादा है। दिन कैसे कटेगा? मुझे ना पता।

“निताश भाई आज कॉलेज चलना है?”
सवेरे की पहली बात मुझे आज आशीष की सुनाई दी थी।

आशीष मेरा एक मित्र है। वो कॉलेज के उन मनुष्यो में है जो मेरी बातें सुनकर मुझसे दूर ना भागे थे। वो मेरे साथ बना रहा, और कब वो जान-पहचान से आगे बढ़कर क्लासमेट और फिर मित्र बन गया, इसका मुझे ना पता। मेरा कॉलेज में एक मित्र है। वो आशीष है।

अभी मैं बेंच पर बैठा उसी का इंतजार कर रहा हूँ। बात करने वाले लड़के-लड़कियां निकल चुके है। लड़कियों से बात करना क्या अचीवमेंट है? ये बात मेरे दिमाग में घूम रही है।

लड़कियों से बात करने की चुल्ल जवानी का एक रोग है। शायद ये इसका लक्षण है। मुझे ना पता। बचपन का पता है कि दूसरे दर्जे में इनसे पेंसिल मांगने पर भी अन्य लड़के मजाक बना देते थे। वो उस वक़्त हंसते थे। बस हंसते रहते थे। उनकी हंसी से सतर्क होकर मैंने लड़कियों से बात करना त्याग ही दिया था। त्याग महान बताया गया है। ये त्याग उस समय मुझे महान लगा था, पर दर्जे का नम्बर बढ़ते-बढ़ते जब दस पर आ रुका और मुझ पर हंसने वाले खुद हंसकर लड़कियों से बतियाने लगे थे, उस वक़्त मैं झेंपकर रह गया था। उनकी हंसी और हंसने में परिवर्तन आया था। और वो यहां तक सीमित ना था कि वो पहले मुझ पर लड़कियों से बात करने पर हंसते थे और बाद में उनके साथ हंसने लगे थे। वो हंसी मेरे ऊपर ही केंद्रित रही थी। मैंने झेंपना उस हंसी से ही सीखा था। अब कॉलेज के दूसरे साल में झेंपना तो कम हुआ है , पर बातों की कमी अभी भी है।

बेंच पर बैठे, दूर से आशीष आता दिखता है। उसके साथ अजंता भी है। अजंता का दिखना कॉलेज में मेरे झेंपने का एक कारण है। ये कारण पहले साल से बना हुआ है। मुझे याद है पहले साल में जब उसे देखा था तो मैंने बात करनी चाही थी। हम क्लास में बैठे थे और उसने स्टेज पर एक ‘ब्यूटीफुल स्पीच’ दी थी। उस वक़्त उसे इम्प्रेस करने की चाह में मैंने सबसे ज्यादा तालिया बजायी थी और आशीष से भी बजवाई थी। मेरे तालिया पीटने से वो इम्प्रेस तो ना हुई, पर वो स्पीच खत्म करके आई तो मैं बात करने को खड़ा हुआ था। बेंच पर खड़े होते ही मुझे चेहरे दिखे और मैं झेप गया था। लेक्चरर ने मेरे बेंच पर खड़े होने का गलत अनुमान लगाया था और मुझे आगे बुला लिया था। आगे जाकर उन्होंने मुझे सिंधु घाटी सभ्यता पर अपने विचार रखने को बोला था। ‘सिंधु घाटी सभ्यता एक प्राचीन सभ्यता है, जो सिंधु नदी के किनारे किसी समय फली-फूली थी। प्राचीन वक़्त होते हुए भी वो कई चीजों में हमसे आधुनिक थे, जैसे कि नगर में गन्दे पानी की निकासी हेतु पक्की नालियों का प्रबंध, सभी के रहने के लिए पक्के घरो का प्रबंध इत्यादि। आधुनिक समय में हमे उनकी सभ्यता के अवशेष मिले है। पर इस सभ्यता का अंत,  कुदरती कारण या बाहरी मनुष्यो का हमला, इसके क्या कारण है। ये सवाल आज भी अचंभित करता है। सिर्फ मुझे ही नही, पर सभी को जिनके सामने इसका जिक्र होता है।’ ये सब विचार मेरे मन में थे। मैंने इन्हें बोलने के लिए मुख भी खोला था। सोचा था कि जल्दी विचार बाहर निकलकर इसे बंद कर लूंगा। बचपन में मां ने मेरे ज्यादा बोलने पर मुझे बंदर कहा था। मुझे स्टेज पर सभी के सामने बंदर ना लगना था। पर मुख खोलने पर विचार ना आये, सिर्फ सांस आयी। मैं शायद बंदर जैसा लगने लगा था, क्योंकि क्लास में सारे बच्चे हंसने लगे थे। लेक्चरर ने ये सब देखकर मुझे वापस जाने को बोल दिया। वापस आने पर देखा कि आशीष हंसकर अजंता से बात कर रहा है।
हा-हा, ही-ही, ये मेरा बैकग्राउंड म्यूजिक बन गया था। पूरी क्लास मेरे ऊपर हंस रही थी। आशीष भी, अजंता भी। उनकी हंसी मुझे विचलित ना कर रही थी, पर मेरे खुद के विचारों का बाहर ना आना। उस दिन के बाद मैंने अजंता से बात करने का ख्याल छोड़ दिया। सिर्फ ख्याल के सोचने पर पूरी क्लास हंसने लगी थी, विचारो ने मुझे छोड़ दिया था। उससे बात करने को हिम्मत की तो पूरा कॉलेज हँसेगा। ऐसा सोचकर और उसे देखकर मैं झेंप गया था।

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आशीष मेरे पास आकर बैठ गया। अजंता ने जाते हुए हाथ हिलाया था, पर वो शायद आशीष के लिए था। झेंपते हुए मैं दुनिया भूल जाता हूँ।

“भाई तू लड़कियों से बात कैसे कर लेता है?” मैं बोला, “मतलब इतना आसान तो होता ना होगा?”

“भाई आसान है। कुछ मुश्किल ना है।”, आशीष बोला।

“भाई फिर कौनसी बात करता है तू कि लड़की हंसी रहती है। कोई जोक सुनाता है क्या?”

ये सुनकर आशीष हंसने लगा।

“चूतिये हंस मत। पूरी बात बता।”, आशीष अजंता ना था, जिसका हंसना मुझे झेंप करने को मजबूर करता।

“सच भाई, कोई जोक ना है। लड़की से बात करना कोई मुश्किल ना है। बस तू बात कर, वो भी करेंगी।”, आशीष बोला।

“बात तो तेरी सही है। अच्छा यूं बता कि ये खुद भी किसी से बात करती है क्या?”

“खुद भी बात करती है भाई। अभी अजंता को देखा तूने। वो मुझे गेट पर मिली और खुद बातें करने लगी।”

“भाई मीठी मिर्च मत खिला। मैंने तो देखा उनको बात की शुरुआत करते।”

“भाई अब तू फुद्दू बात कर रहा है। तू साले देखेगा क्या, तेरी नजर उस फ़ोन से ना हटती कभी।”

“ना भाई ऐसा थोड़ी है।”, आशीष सच्ची बात बोल गया था। मैं हड़बड़ा उठा था।

“ऐसा ही है भाई। तू फ़ोन से तो हटता ना, लड़की से क्या बात करेगा?”

“भाई ऐसा ना है। वो कई बार फ़ोन में अपडेट आ जाती है तो कई बार मैं ऑनलाइन फॉर्म भर रहा होता हूं।”

“भाई अपडेट तेरी कॉलेज में ही क्यों आती है, घर क्यों ना आती।”

“भाई मुझे ना पता।”

“मुझे पता है। तू लड़कियों से शर्माता है।”

“भाई मैं ना शर्माता किसी से। बस बात इतनी है कि समझ ना आता कि उनसे क्या बात करूं?”

“तू मुझसे कौनसी बात करता है? भाई लड़कियों से बात करने को इतना ना सोचना चाहिए।”

“भाई सोचना चाहिए। कोई बेवकूफ बात कही जाए और वो हंस दे तो।”

“तू अजीब है यार। अभी तू उन्हें हँसाने की बात कर रहा था और अभी ना हँसाने को कह रहा है। भाई वो हंस दे तो तू भी हंस और आगे बात कर।”

“ना भाई। इतना आसान ना है।”, इतना कहकर मैं खड़ा हो गया।, “चल अब, पहला लेक्चर अटेंड करना है।”

वो भी मेरे साथ चल पड़ा।

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कॉलेज के दूसरे साल का पहला लेक्चर। मेरे साथ वाले बेंच पर अजंता बैठी है। वो अपनी सहेली से बातें करती है। आशीष अगले बेंच पर बैठी लड़की से बातें कर रहा है। लेक्चरर औरंगज़ेब की कुछ कहानी बता रहा है।

अजंता अब लेक्चरर की और देख रही है। शायद उसे औरंगज़ेब की कहानी अच्छी लग रही है। जब वो सहेली से बात कर चुकी थी, तब उसने नजर घुमाकर पूरी क्लास देखा था। शायद मुझे भी देखा था। उस पल झेंपने का मन ना था, बस किसी तरह बात करनी थी।

दूसरा साल कैसा निकलेगा? लड़कियों से बात करना क्या मुश्किल है? औरंगज़ेब इतना इंटरेस्टिंग क्यों है? ऊपर कोई खुदा है जो इंसानो की मदद करता है, उनकी बात सुनता है? इन सवालों के क्या कोई जवाब है?

मुझे ना पता।

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सुरेन्दर के सपनो वाली चुल्ल

दिनों की लड़ी लगी पड़ी है। पहला जाता है, दूसरा आता है। वार बदलते है, पर इनके टाइप एक जैसे रहते है। सारे दिन एक जैसे है। मैं तुम्हे ये सब इसलिए नही बता रहा कि मुझे तुमसे सहानुभूति चाहिए। मुझे अपना दुःख भी ना बांटना है। बस बात इतनी है कि पूरे दिन में जो मजाक होते है, उन पर मैं रोता हूँ।

आज शिवरात्रि है। सवेरे मैं मंदिर के बाहर खड़ा कांवड़ देख रहा था कि सुरेन्दर टकरा गया। उसकी आँखें सुल्फि सी थी, जैसे की सोया ना हो। निताश तुझे उससे बात ना करनी चाहिए थी, ये बात अब मेरे दिमाग में अब आती है। पर बात मैंने ना की थी। वो खुद मेरे नजदीक आया था और अपनी सपनो वाली बात बताई थी। कि किस तरह उसने अपने घूमने-फिरने का सपना पूरा किया था और कैसे वो दोबारा एक अलग जगह घूमने जायेगा। ये दुनिया के बाशिंदे है। इन सबकी तशरीफ़ में चुल्ल रहती है कि इसको जब तक कही टेका ना जाए वो शांत ना होती है। उसने अपनी चुल्ल मुझे दे दी। दिन अंत होता है, शिव की सौगंध है कि सब सच कहूँगा। मैं घर बैठा अपने कॉलेज खुलने की राह देखता काटता हूँ। घूमना-फिरना मेरा गाँव के फ्लैटों वाले रोड तक सीमित है। अब मुझे जो दुनिया देखने की ख्वाहिश है, ये पूरी ना होगी।

कोसने को मेरे पास उस सुरेन्दर को लेकर कुछ नही है। यूँ तो मैं अपने मन को कोस सकता हूँ, पर मन मेरा है। अपना है। सुरेन्दर मनीपुर का सबसे बकवास इंसान है। उसके मुँह से पहले बीड़ी निकलती है, फिर उसका धुँआ और अंत में उसकी बकवास। पहले उसकी बकवास सपना डांसर की नयी वीडियो ढूँढने को लेकर थी और अब सपना पूरा करने की है। उस पर एक नजर से कतई ना लगता है कि उसके कुछ सपने होंगे। कमतर आंकना भूल है। पर मेरे गुरूजी कहते थे कि “एस्पेक्टशन एंड एक्सेप्शन आर ऑलवेज देयर।” सुरेन्दर उन मानुसो में से ना है जिनके सपने घूमने-फिरने जैसे होते है। ये शौक शहरी चोंचला है। ये उन तक ही अच्छा है। पर इसके किटाणु संक्रामक है। बातों से फैलते है। सुरेन्दर ने घूमने-फिरने के किटाणु मुझे दे दिए है।

मैंने घूमना-फिरना दूर से देखा है। मेरे दोस्त कही ना कही घूमते रहते है। मनाली, लेह, लद्दाख, दार्जिलिंग फलाना धिमकाना। ये जगह मैंने किताबो में देखि है। वो वहां असल में घूमते है। मेरी बातों में जलन की बदबू दिखे मगर वो है नही। वो मेरी घुटन है। मेरी आसपास की घुटन। ये मुझे अच्छे से जानती है और मैं इसे। इस घुटन से बचने का तरीका है सैर सपाटा। ये बात मुझे पता है। पर इस सैर सपाटे की दवादारू महंगी पुड़िया है। सपने ऊँचे भले ही देखने बढ़िया आदत है। पर ऊँचाई महंगी होती है। यथार्थ में जमीन पैरो के लिए और नीचे मनुष्यो के लिए एक खाली जेब बड़ा ही बदसूरत आइना माफिक है।

लाईनो के मध्य अर्थ मत ढूँढना। ग़ुम जाओगे। अनेक बातों की एक बात है कि मैं एक आम आदमी है। मेरी साधारणता मेरी विशेषता है। मैं जिस चीज को छूता हूँ, वो साधारण हो जाती है। सपने महंगे है। मैंने उन्हें देखा है, पर छुआ नहीं। मैं मित्रो के साथ मॉल में घूमा हूँ। शोरूम्स में  ग्लास परे मॉडल को ताड़ा है। उनके पहने कपड़ो की कुशल कारीगरी और कपड़े की बुनावट को देखा है। शोरूम की लाइट्स और उसकी ए०सी० वाली ठण्डी हवा को महसूस किया है। उनमे आने वाली जनता के ढंग को देखा है। लड़कियों के गोरेपन पर उनकी हंसी को देखा और सुना है। मैकडोनाल्ड्स और डोमिनोस जैसे जगह पर खानपीन के वस्तुओं पर सोचा है। मॉल आगे खड़ी मर्सीडीज, ऑडी और BMW की लम्बी कारों को सराहा है। सिनेमा में एक बार घूमकर देखा है। सब कुछ ‘ए क्लास अपार्ट’ है। अब मेरे बताने के ढंग के ऊपर ना जाना कि मेरा तुम्हे बताना मेरी मजबूरी की पुकार है कि मुझे तुमसे मदद चाहिए। मुझे सब अच्छा लगा। परन्तु अच्छे लगने का अर्थ ये नहीं है कि उस वस्तु की जरूरत है। जहर का स्वाद भले ही श्रेष्ठ हो, परंतु उसे पीना श्रेष्ठ नहीं है। कुछ ऐसा ही हिसाब मेरा इन सब चीजो से है। गाँव में रहते हुए छोटी दुनिया में छोटी सोच विकसित की। अब ये जो शहरी कल्चर है, ये चोंचला है। जनता इसे फॉलो करती है क्योंकि वो कर सकते है। पर इसका मतलब ये नहीं की वो सब के लिए है। विज्ञापन देखना बुद्धि भंग करता है। अनावश्यक चीजो को जिंदगी का अभिन्न अंग दर्शाना इसका मकसद है। कुछ ऐसा ही इन सब शहरी चोंचलो के साथ है। इनका शहरी कल्चर इनकी शहरी जिंदगी का विज्ञापन है। मेरी सोच का दायरा सीमित भले हो, परन्तु सीमित सच बड़े झूठ से सही है।

सुरेन्दर बकवास इंसान है। एक दिन में सपना देखना और उसे पूरा करना, प्रेरणा मनुष्य को क्षणिक प्रेरित कर सकती है। कि वो अपने से ऊपर उठे और आगे बढे। परन्तु प्रेरणा दिमाग का नशा है। जितनी जल्दी चढ़ता है, उतनी ही जल्दी उतरता है। उसके घूमने-फिरने का बताना किस चीज की प्रेरणा थी, मुझे ना पता। वो अपनी फेंकू प्रवृति के लिये प्रसिद्ध है। उसका पिछला स्वप्न सपना डांसर के साथ पड़ोस के लखन के ब्याह में ठुमके मारने का था। उसका वो स्वप्न सच ना हुआ, पर उसने गाँव में सपना डांसर को प्रसिद्ध जरूर करवा दिया था।

मैं दिन को बैठकर देखूँ तो कुछ नया ना है। ये घूमने-फिरने की जो चुल्ल है, ये कल तक उतर जायेगी। फिर भी अभी ये दिमाग में घूम रही है, तो कुछ अजीब है। मन चंचल है। घूमने की सोच से खेलकर जब ऊब जायेगा, तो जल्दी ही कुछ नया पकड़ लेगा। बस मुझे तब तक अपने को संभालकर रखना है।

उपरोक्त लाईनो में स्वप्न है, बातें है, मज़बूरी है, दोस्त है, शौक है, गाँव है, शहर है, इनके लोग है, कार है, मदद है, बीमारी है, दवाई है, रूपए है, चोंचले है, सब है। बस वक़्त की कमी है।

मुझे सपनो का डांसर बनना है

मैं सुरेन्द्र हूँ। इस वक़्त गाँव के टेसन पर बैठा हूँ। मेरी कमर में दर्द है और गांड फटी पड़ी है।

कल रात मैं अपनी नौकरी पर था। मैं बिल्डिंग का एक पूरा चक्कर लगाकर कुर्सी पर बैठा था। फ़ोन हाथ में था और मैं यूटूब पर सपना डांसर की नई वीडियो ढूंढ रहा था। फ़ोन पर उसकी वीडियो और फ़ोटो आ रहे थे। जितनी आई, सारी देख रखी थी। मैं जितना नीचे जाता, उतनी ज्यादा वीडियो आती। उनमे से एक पर मेरा ध्यान गया। उस पर सपना को फोटो नही थी। मैं बोर हो रहा हूँ, सोचकर उसे चलाया। फिर उसमे एक लुगाई बोली। उसने सपनो का डांसर बनने को कहा। उसने बात की कि सपनो का पीछा करना चाहिए। कुछ देर तक उसकी बात चली, फिर मैं बिल्डिंग का चक्कर लगाने को चल दिया।

नौकरी करके मैं घर पहुँचा। मैं थका हुआ था। बिजली नही थी। कपड़ो से पसीने की बदबू आ रही थी। मैंने बीड़ी चसाईं और रोटी तोड़ी। सोने को लेटा तो बार-बार वीडियो पर ध्यान जाता। सपनो का डांसर बनो। उनका पीछा करो।

मैं सो गया।

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आज सुबह अजीब लग रहा था। सपनो का डांसर बनो, उनका पीछा करो। बातें मन में जम गयी थी। मेरा सपना क्या है? मुझे ना पता था। छोटी उम्र में भागना, खेलना और घूमना पसंद था। बड़ा हुआ तो बीड़ी, लड़की और घूमना पसन्द था। पिताजी की साइकिल पर पूरा गाँव घूमना, पैदल चलकर अगले गाँव जाना, जोहड़ में भैसों को घूमाना, लड़कियां घुमाने के लिए उनकी क्लास के बाहर घूमना। ये सब घूमना-घुमाना मुझे अच्छा लगता था और शायद यही मेरा सपना था।

आज मैं नौकरी की जगह टेसन गया। वहाँ मैं दिल्ली की रेल में चढ़ लिया। मुझे सपना आज ही पूरा करना था।

रेल में भीड़ थीं। डब्बे के गेट पर भी खड़ा होना मुश्किल था। डब्बे के पाखाने महक मार रहे थे। हवा उनसे होकर आती। भीड़ का पसीना भी नाक तक आता। हालत बुरी थी, पर सहनी पड़ी। दिल्ली का टेसन कब आया, मुझे पता ना चला। मैंने उतरकर कमर पकड़ ली थी। दर्द हो रहा था।

मैंने घर से चलते चाय ना पी थी, टेसन पर याद आया। चाय की तलब थी। टेसन पर एक टपरी पर गया और चाय के लिए बोला। उसने मुझे एक कप में चाय दी। कप मैंने देखा, मेरी छोटी ऊँगली से भी छोटा था। मैंने चाय का पतीला और छलनी देखी। छलनी पर चायपत्ती काली का जगह भूरी पड़ी थी और उन पर मक्खी उड़ती थी। उस चायपत्ती के ढेर में शायद मक्खी भी पड़ी थी और बाकी मक्खी अपनी साथी को ढूंढती उड़ती थी।  बाहर ऐसा ही है, ये सोचकर मैंने चाय पी। चाय का एक घूँट लेने पर पता चला, वो चाय का गर्म जूस था। जी में आया कि कुल्ला करके इस टपरी वाले के मुँह पर फेंक दूँ। मैंने ऐसा कर भी देता, पर 10 रूपए की चाय बर्बाद ना करनी थी।

मैं घर से घूमने को निकला था। चीजें देखने निकला था। दिल्ली के टेसन पर जो पहली चीज मैंने देखी, वो भीड़ थी। बस भीड़। उसमें दुनिया थी। आदमी थे, औरत थी, भिखारी थे और कुत्ते भी थे। उसमे गन्दगी भी थी। मैंने ये सब देखा पर ये चीजें मैंने गाँव में भी खूब देखी थी। पर यहाँ एक चीज अलग थी, औरतें। गाँव की लुगाई सदा ढकी रहती थी। पर यहाँ अलग था। यहाँ इनकी चमड़ी गौरी थी। और ये ढकी हुई भी ना थी। आदमी वाले कपड़े पहन रखी थी। आदमी वाले कपड़ो में उनका सब नजर आता। बाहर ऐसा ही है। मैं ये सब पूरे दिन देखता, पर मुझे दिल्ली भी घूमनी थी।

टेसन से निकलकर मैं टम्पू वाले के पास गया और उसे चिड़ियाघर जाने को बोला। वो चल दिया। उसका टम्पू बढ़िया था। मैं कमर टिकाकर बैठा ताकि कमर में दर्द ना हो। उसका टम्पू आवाज़ भी कम करता था और तेज था। सब सही था, पर हरामी ने किराये के 70 रूपए लिए। मैंने 10 रूपए की कही, पर वो ना माना। पूरे 70 रूपए लिए। पर दिल्ली बड़ा शहर है और यहाँ ऐसा ही है। टेसन वापिस पैदल जाऊंगा, ये सोचकर मैं चिड़ियाघर के अंदर गया।

मैं चिड़ियाघर में गया। चीते, शेर, हाथी, बहुत सारे जानवर थे। अब तक इनका फ़ोटो देखा था। वो सब सही थे, पर वो जाली किसलिए लगा रखी थी। बचपन में पिताजी खेतों पर कांटे वाले तार लगाते थे। रात को गाय, भैंस खेत में घुसकर फसल खाती थी। उनसे बचाने के लिए पिताजी तार लगाते थे। ये जाली भी इसलिए ही लगायी होगी ताकि शेर बाकियो को खा ना ले। पर बाकी जानवर तो फिर खुले घूमने चाहिए, बिलकुल मेरी तरह। मैं ये सब सोच रहा था। मुझे भूख भी लग रही थी। इन चिड़ियाघर वालो को यहाँ मुर्गे भी रखने चाहिए। बाकी जानवरो के खाने का हिसाब तो सही है पर कुछ यहाँ पर इंसानो का भी तो होना चाहिए।

मैं चिड़ियाघर से बाहर आ गया। मुझे भूख लगी थी। सपना पूरा करने के चक्कर में मैंने सुबह रोटी भी ना खायी थी। अब दोपहर हो आई थी। मुझे भूख जबरदस्त लग रही थी। अब मुझे कुछ खाना था। सड़क के किनारे एक ठेला था। वो छोले-भठूरे बना रहा था। एक प्लेट का दाम 40 रूपए था। मौल-करने की हिम्मत ना थी। बाहर ऐसी भूख थी। मैंने उसे एक प्लेट के लिए कह दिया।

उसने मुझे एक प्लेट में थोड़े से छोले और दो भठूरे दिए। कोने में थोडा प्याज भी था। उन छोले-भठूरो की शक्ल 40 रूपए की ना थी। भठूरे साबुन के बुलबुले जैसे थे। लगता था कि फूंक मारी तो उड़ जायेंगे और ऊपर जाकर फट जायेंगे। छोले भी ऐसे ही थे। पूरी सब्जी में बस तीन या चार छोले के दाने थे। और सारा भूरा पानी। मैं ना खाता, पर भूख लग रही थी और 40 रूपए भी बर्बाद ना करने थे।

मैंने छोले-भठूरे खाये। मैं चल दिया। मेरे पास बीड़ी भी नही थी। सपना पूरा करने के चक्कर में घर ही रह गयी थी। और अब पेट में गैस बन रही थी। मुझे बीड़ी पीनी थी। मैंने आसपास देखा। थोड़ी दूरी पर एक खोखा था। मैं खोखे पर गया और शिव के मंडल के लिए कहा। उसने   अपने सुपारी वाले दांतो के बीच से उसका रेट 8 रूपए बताया। इतना सुनना था और मुझे गुस्सा आ गया। मैं उसकी गांड तोड़ता। बेहतरीन तोड़ता। शिव का मंडल गाँव में 5 रूपए का और 512 वाला मंडल 10 का मिलता है। ये साला दिनदहाड़े लूट रहा था। मैं उसको पीटता, पर पेट में गैस बन रही थी। बाहर ऐसा ही है, सोचकर मैंने मंडल लेने के लिए रूपए निकाले। बस 50 रूपए बचे थे। सुबह सपना पूरा करने के चक्कर में मैं रूपए लेना भी भूल गया था। इसका रोना मैं रोता, पर इससे पहले मुझे बीड़ी पीनी थी।

मेरे पास रूपए कम थे। मुझे दिल्ली में और घूमना था। ये हो ना पाता, इसलिए मैं वापस टेसन की तरफ चल दिया। दोपहर में बड़ी दूर पैदल चलना पड़ा। गैस भी हो रही थी। पसीने लगातार आ रहे थे। कमर का दर्द भी वापस आ गया था। पैर उठाना मुश्किल था। किसी तरह टेसन पंहुचा।

टेसन पर पहुँचकर देखा कि 1 बज गया था। गुडगाँव वाली रेल 3 बजे आती। मैं एक बेंच पर जाकर बैठ गया। कमर में दर्द था।

3 बजे रेल आई तो उसमें चढ़ लिया। बिल्कुल सुबह वाला हाल था। भीड़ थी, पसीना था और पाखाने वाली मुँह को लगती हवा। बस कमर दर्द नया था। भीड़ में बीड़ी भी ना पी गयी। हाल गर्मी और भीड़ ने पहले ही बुरा कर दिया था, जब रेल हर एक टेसन पर रूकती तो भीड़ और ज्यादा दिमाग ख़राब करती। बाहर वाले अंदर आने को धक्का मारते और अंदर वाले बाहर जाने को धक्का मारते। इन धक्को, भीड़, पसीनें और गर्मी की वजह से गुस्सा आ रहा था। मैं एक-एक करके सबकी गांड तोड़ता, पर भीड़ में हिलना भी मुश्किल था। सोचा, बाहर ऐसा ही है।

गाँव के टेसन तक आते भीड़ कम हुई, पर सीट ना मिली। टेसन पर उतरा तो राहत मिली। 5 बज रहे थे। मेरी कमर अब और दर्द कर रही थी। पर अभी घर ना जा सकता था। घर जाता तो पिताजी डण्डा करते। मैं टेसन पर ही एक बेंच पर बैठ गया।

मैं बैठा था। सपनो का डांसर बनो और उनका पीछा करो। आज मैंने कौनसा सपना पूरा किया, मेरे समझ में ना आया। और ये घूमने का सपना मेरा कब था? मैं कौन से सपनो का डांसर बना?

मैं रात तक बैठा रहा। सपनो के डांसर ने मुझे बढ़िया चुतिया बनाया था।

Tales from Moneypur : Angreji Speaking Course

अप्रैल चल चुका है।
मनीपुर में धीरे-धीरे गर्मी अपने आने का आभास करा रही है। धूप सवेरे जल्दी निकल आती है। दोपहर को गर्म हवा जिस्म को झुलसाती है। गाँव के बाहर गन्दा तालाब दिनोदिन सूखता जाता है। दिन में बिजली नहीं आती है। निकलते-मिलते लोग अपनी बातों में गर्मी का भी जिक्र कर देते है। और शाम को चुगलियों के आदान-प्रदान को महिलाएं भी देर से निकलती है। गर्मी आ गयी है, मनीपुर की हर इक चीज इस बात को दर्शाती है।

बीतें मार्च में 12वे दर्जे की परीक्षाएं हुई थी। परिणाम बाद में आएगा, सो तब तक गाँव की नयी जनता के काफी लोग बेरोजगार है। जो नहीं है, वो कुछ लोग खेतों में लावणी में लगे है, तो कुछ पास गाँव की बीड़ी कारखाने में चले जाते है।

निताश कुछ दिनों से घर पर था। तीन-चार दिन सब सही रहा है। पर पांचवे दिन से घर से कटने लगा। वो घर से उबा नहीं। बस घरवालों से हर इक बात पे बीड़ी फेक्टरी में जाने की जो सलाह मिलती, वो अब सही ना जाती। तो अब कुछ करने को, वो घर से निकल कर गुरुग्राम की राह पकड़ता है। इस सब में उसे पड़ोस का बिरजू मिलता है। बिरजू भी नया-नया बेरोजगार है।

“और भाई निताश, आज कहाँ?”
“कही ना यार। गुड़गांव जाऊंगा।”
“भाई गुड़गांव तो मैं भी जा रहा हूँ। मैं पूंछू क्या करने जा रहा है?”
“रेलवे रोड पे कुछ इंस्टिट्यूट है। उनमे जाकर इंग्लिश या कंप्यूटर के कोर्स की पूछ कर आऊंगा।”
“सही है भाई। अब कही जाकर पढ़ने से छुटकारा मिला तो अब भी तू पढ़ेगा।”
“पढता कौन है, बस टेम पास करने जाऊंगा। अपनी बता। क्या काम है तुझे आज?”
“भाई जाति प्रमाण पत्र बनवा रहा हूँ। आज तीसरा दिन है तहसील में। सरपंच ने तो साइन मार दिए पर ये पटवारी टरका रहा है।”
“इसका क्या करेगा तू?”
“दाखिला लूँगा कालिज में। इससे हो जायेगा।”
“अबे कॉलेज में क्या करेगा तू?”
“भाई बी०ए० करूँगा। सब वही तो करते है।”
“अबे वो सब तो सही है। पर 12वीं तो तेरी पर्चियों के बिसर कटी, कॉलेज में क्या हाल होगा।”
“वो सब देखा जायेगा। और पढ़ने को कौन साला कॉलेज जाता है। भाई कॉलेज में सैक्टरो की लडकिया आएँगी। बिलकुल शहरी। अंग्रेजी बोलने वाली। उनके साथ सेटिंग करूँगा।”

इस बात को ज्यों ही निताश सुनता है, हँसना शुरू कर देता है।

“भाई हँस मत। तू देखियो पटा लूँगा दो महीनो में।”

इतना कहते ही, तहसील का रास्ता नजर आता है। बिरजू टेम्पो वाले को रुकने को बोलके किराया देता है। टेम्पो किनारे पे लगते ही, बिरजू उतरकर तहसील ओर चल देता है।

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अमेरिकन इंस्टिट्यूट फॉर स्पोकन लैंग्वेज।

रेलवे रोड के बायीं तरफ, एक दो मंजिला ईमारत पर तीन बड़े-बड़े बोर्ड पर अंग्रेजी और हिंदी में ये लिखा है। एक हंसती हुई फिरंगी गोरी कन्या भी एक किताब लिए साइड में छपी है। नीचे अंग्रेजी में लिखा है – Spoken English Courses, Basic Computer, Tally ERP, Personality Development Classes. ईमारत के सामने दुपहिए आराम से खड़े है। टेम्पो से उतरकर थोड़ी देर चलने के बाद निताश इस बिल्डिंग के सामने खड़ा हैं। धूप ज्यादा है, तो अंदर चल देता है।

अंदर जाने के बाद ए०सी० की बनावटी ठण्ड उसे मिलती है। बाहर जहाँ धूप में सब जलता लगता है, अंदर आकर जन्नत लगती है। अच्छा लगता है। फिर जब सामने रिसेप्शन पर वो एक कन्या को देखता है, तो उसे और अच्छा लगता है।

“इंग्लिश स्पीकिंग क्लास्सो की जानकारी चाहिए।”

निताश के कंठ से मुश्किल से निकले ये बोल, रेसेप्शनसिस्ट को शायद सुनाई नहीं दिए। उनकी भी गलती नहीं है, उनका पूरा ध्यान उनके फ़ोन पर था। निताश के तीसरी बार बोलने पर, नजर उठाये बिना वे जवाब देती है,

” ₹1000 एडमिशन फीस है और ₹1250 मंथली। तीन महीने का कोर्स है। एडवांस पेमेंट पर 10% ऑफ है।”

“क्या-क्या सिखाएंगे?”
“इंग्लिश स्पीकिंग एंड थिंग्स।”
“अखबार में पढ़ा था की डैमो क्लास्से भी है?”
“अभी फुल है वे।”
“कोई किताब लेनी होगी?”

निताश के लगातार पूछताछ से शायद वो झल्ला गयी थी। एक पल नजर फ़ोन पे से उठायी, और निताश की तरफ एक पर्चा बढ़ा दिया। उस पल निताश ने गौर से उसके चेहरे पर लगा हुआ मेकअप देखा। कहाँ से लिपस्टिक की आउटलाइन शुरू होती है, कैसे-कैसे गालो पे पुताई हुई लगती है, नाक से निकलते एक-दो बाल, भड़कीली लाल रंग की लिपस्टिक, करीने से बनायीं हुई आइब्रो; उस पल निताश ने बहुत कुछ देखा।

*****

निताश इंस्टिट्यूट के बाहर खड़ा है। दूसरे किसी इंस्टिट्यूट में जाने की उसकी हिम्मत ना हुई।

साइड में एक जूस का ठेला है। उसके पास जाकर एक गिलास जूस बनाने को कहता है। जब तक की जूस बने और उसे मिले, उस खाली वक़्त में यहाँ वहां नजर मारता है। अचानक देखता है की अमेरिकन इंस्टिट्यूट फॉर लैंग्वेजेज की बिल्डिंग में से चार गोरी-गोरी कन्याएं निकलती है, दो स्कूटी पर सवार होती है और अगले पल निकल लेती है।

जूस वाला उसे गिलास थमा देता है। उसे हाथ में पकडे निताश मंद-मंद मुस्काता है।

*****

रात का वक़्त। बिजली नदारद। निताश के पिता खाट पर बैठके हुक्का गुड़गुड़ाते रहे थे की निताश की सामने खड़ा देखते है।

“हां इब के चाहिए?”
“आपा वो दाखिला लेना है।”
“इभी तो पेपर करकै हटा है। नम्बर भी ना आये पेपरआन के। इभी कित दाखिले लेवेगा?”
“वो आपा इंग्लिश सीखनी है।”
“आच्छा। कितने लेवेगा?”
“आपा पांच हजार।”
“रे बीड़ी फैक्टरी में चला जा इतने रपिये चाहिए तो। मैं ना देता।”

इतना सुनकर निताश अम्मी-अम्मी चिल्लाता है। चूल्हे आगे बैठी उसकी माँ नजर उठाकर देखती है। चूल्हे की आंच में धुएं की वजह से आँखों में आया पानी किसी को नही दीखता। आँखें मलती हुई वो बोलती है,

“रे निताश के बापू दे दे रपिये। के इन्हें धरर् के पूजेगा। इब तेरे तकिये नीचे पड़े ये रपिये न्यू तो ना है की रातू-रात बियावेंगे।”

“क्यूँ दूँ रपिये। बियाते ना तो ये फरी में भी ना आते। खेतां का काम करती हानी तो इसके जोर पड़े है। इब रपिये मांगते जोर ना पड़ता।”

“रे दे दे रपिये। तूने ना बेरा। घर पड़ा-पड़ा किमी करता तो ना, ऊपर तें इतणा काम खिंडा दिया करे। काल सारे लीकडे तोड़ दिए। पूछन पे कव्हे है की नुही तोड़ दिए। सारे फेर दुबारा लाने पड़े। इब तने के-के बताऊँ।”

“इसने बीड़ी फेक्टरी में भेज दे। सबतै सही रव्हेगा यो काम।”

“अर बना दे फेर नशेड़ी। मैं ना भेजु। तू चुपचाप रपिये दे दिए कल। किमी सीख ही लेवेगा।”

“चाल तो फेर टीक है। दे दूंगा काल रपिये। अर सुन छोरे तू, इबे इतणे रपिये देरा हूँ तो इनका बराबर की किमी बात भी सीखिये। चाल इब हुक्का भर ला।”

निताश हौले-हौले मुस्कुराते हुए हुक्का भरने चल देता है। पर अँधेरे में किसी को कुछ नजर ना आता है।

Tales from Moneypur : शांत चीकू

दोपहर का वक़्त है। मनीपुर प्राइमरी स्कूल की घंटी बज चुकी है। बच्चे दौड़ते हुए कमरो से बाहर निकलते है। इन्ही के बीच, चीकू, कंधे लटकाये और मुँह फुलाए, घर की और बढ़ता है।

***

चीकू घर आता है। सीधे टीवी वाले कमरे में घुसता है। उसकी बड़ी दीदी टीवी देख रही है। कदमो को पटक, चीकू अपने आवागमन की और इशारा करता है। इस पर, उसकी बड़ी दीदी, जिनकी नजर टीवी पर है, बिना नजर घुमाए कहती है,

“आ गया तू। चल अब हाथ-मुँह धो ले।”

मानो इस वाक्य को चीकू ने अनसुना कर दिया, दोबारा पाँव पटकता है। इस बार उसकी दीदी टीवी को छोड़, उसकी और देखती है। पाती है कि चीकू का चेहरा तमतमाया हुआ है और बालों में रेत भरा है।

“कहाँ लड़ाई कर आया आज? बड़ा रोब में हो रहा है।”

चीकू चेहरे के भाव बदले बिना, दीदी के चेहरे को एकटक निहारता है। फिर अचानक दीदी का अचानक फ़ोन बजने लगता है और कमरे में टीवी कार्यक्रम के डायलॉग्स के अलावा, फ़ोन से निकलकर ‘दिल दीवाना ना जाने कब खो गया’ के स्वर गूंजने लगते है। दीदी फ़ोन उठाकर उठती है और बोलती है,

“हां बेबी, आपका बड़ी देर बाद फ़ोन आया…”

बात पूरी हो पाती, इससे पहले ही चीकू भागकर दादाजी के पास चला आता है।

***

दादाजी अपने कमरे में खाट पर बैठे है। सामने हूक्के के साथ उनके टेम का साथी जयलाल भी हुक्का गूडगूड़ाता पड़ा है। दादाजी दोनों हाथों से चश्मे को पकड़, नजरों के दूर-नजदीक लाते है। शायद चश्में का नंबर बढ़ गया है। इतने में, चीकू आकर खड़ा हो जाता है।

“आ लिया तू। चल इब चलके किमी खा-पी ले।”

चीकू मुँह फुलाये खड़ा रहता है। दादाजी चश्मे को एक तरफ रखकर, चीकू की तरफ देखकर कहते है,

“रै छोरे आज के होगा। किमी बोलेगा भी या नुही दीदे पाड़ेगा।”

जयलाल ये सब देखता है। हूक्के का मुँह छोड़कर, चीकू की और देखता है। मानो स्तिथी का जायजा लेते हुए, चीकू की और देखता है। हूक्के से दूर होने का गम उसके चेहरे पर साफ़ दिखता है। शायद उसे कुछ बोलना चाहिए, यूं सोचकर बोलता है,

“छोरे म्हारी बात भी सुण लिया कर कदी। चल इब कोई ना, अपनी महतारी कने जा।”

दादाजी हूक्के का किनारा पकड़कर गूडगूडाते है। चीकू एकटक देखता है, फिर भाग जाता है।

***

माँ रसोई में है। अभी-अभी लस्सी बिलोके अलग हटी है। बाल सम्भवा रही थी की देखती है की चीकू आगे खड़ा है। हाल उसका अभी भी वही है। बाल इधर-उधर जिनमें रेत पड़ा हुआ है, चेहरा लाल और गाल फूले हुए। आँखें लगभग भर आई है। मानो अभी रो पड़ेगा।

“आ गया मेरा लाल। ये क्या हाल बनवा रखा है। चल जाके कपडे बदल ले और खाना खा ले। लस्सी अभी अभी निकाली है।”

“मुझको ना खाना खाना। मुझे आपसे बात भी ना करनी है।”

“क्यों रे? सुबह वाली बात लेकर अभी भी गुस्सा है क्या?”

“हाँ। पापा ने मुझे क्यों मारा? मैं तो बस राजू को रोटी पकड़ा रहा था।”

“अरे मेरा भोला बेटा। कहा मारा। बस एक दो हलकी सी चपत ही तो लगायी थी।”

“थप्पड़ मारे थे जोर से। और वो भी यूँ ही की मैं राजू को रोटी दे रहा था।”

“बेटा राजू गन्दा है। तू उसे छु लेता तो तुझे शुद्ध होना पड़ता। पंडत को बुलाना पड़ता। पूजा करनी पड़ती। समझा।”

“पर क्यों?”

“अब मुझे नहीं पता ये सब। चल अब कपडे बदल ले। तेरे पापा भी आते होंगे।”