मेरे दिनों का पता

तुम्हे मेरे दिनों का पता है,
ये सारे एक उतावलेपन से पीड़ित है।
ये उतावलापन है इनके रोज की दिनचर्या से बच निकलने का।
इस बच निकलने या बचाने के धारावाहिक में कोई प्रेम या अन्य पात्र नही है।
सब कुछ एक परम्परा है इस जवानी की।
कि इस उम्र में जीवन की चल रही हकीकत से हमे छुटकारा चाहिए।
चाहे वो क्षणिक ही क्यों ना हो।
हम उसे पाकर रहेंगे और हम पाए बिना ना रुकेंगे।
ये बच निकलने की प्रवृति अंदर से उपजती है कि रोज के समान्यपन को छलकाया जाए।
पैर इतने जोर से जमीन पर टिकाये जाए की उनका जोश जमीन की स्थिरता को विचलित करे।
इस उम्मीद में कि स्थिरता में जमे हुए कुछ या कोई तो जगेगा ही।
वो आएगा और हमारे साथ खड़ा होगा इस संघर्ष में जोे जिंदगी की रोजमर्रा के खेल के खिलाफ है।
ये खेल जिसे खेलने के लिए हमे बचपन से शिक्षा, दीक्षा, लाड-मार आदि से पढ़ाया गया।
कि जब बचपन निकलेगा और जवानी दस्तक देगी तब हम बचपने के बहकावे में पड़कर कोई गलत कर्म ना करेंगे।
कोई गलत कर्म ना करने पर मेरे दिन जीवन के अंत तक सुख-पूर्ण होंगे।
मेरे दिन, इसी परिणाम को लेकर होने वाले संघर्ष से परेशान है।
कि कल के फ़िक्रे में अभी आज का क्या कुसूर है कि इन्हें गवाया जाए।
कल को बचाने के लिये आज बचाना है।
मेरे दिन इसी में है।

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