चिर पहले सुना कि तेरी शादी आती है

चिर पहले सुना कि तेरी शादी आती है,
अब सामने आकर तू क्या बताती है।

मैं सदा तेरे इस गुण के प्रभाव में रहा,
किस सरलता से तू कठिन बातें कह जाती है।

तुम ना तो खुश दिखते हो, ना दुःखी
ये कैसी मुस्कान चेहरे पर तुमने पाली है।

मेरी आँखें नम ना हुई है,
तुम्हे ग़लतफहमी हुई है।

जाते-जाते जहाँ बसो वहाँ का पता लिख जाना,
आज से उस पते कदमों को मनाही है।

अब तो परदे कर लो खिड़कियों पर,
सब की ख़ुशी सब से देखी ना जाती है।

खाली हुआ गिलास, थोड़ी मय तो डालो
रुदन बाद में छेड़ेंगे, अभी विरह कमसिन है।

Short Story: माँ, शादी उलझन है (भाग 1)

आधी रात हो चली है। प्रतीक्षा अपने कमरे में बैठी है। दुल्हन की वेशभूषा में, सिर से पैर तक आभूषणों में सज्जित, वो दीवार की ओर देखती है। चेहरे पर कोई भाव दृश्य नहीं है, मानो मेकअप ने उन्हें नजरों से छिपा दिया हो। वह बस बैठी हुई दीवार को ताकती है। उसकी सखी उसके साथ है, परन्तु वह बालकनी में खड़ी है। दूर में बारात दिखती है, वो उसके बारे में बोल रही है।

प्रतीक्षा के आसपास इतना कुछ घटित हो रहा है, फिर भी वह इन सब से बेखबर लगती है। चुपचाप बैठी बस दीवार की और देखती है।

*****

सुबह के आठ बज रहे है। प्रतीक्षा घर के बाहर स्कूल बस के इंतजार में खड़ी है। उसकी सहेली पूजा अभी तक ना आई थी।

प्रतीक्षा सत्रह वर्ष की है। वह कदकाठी में कम, परन्त आवाज में बुलंद थी। बचपन ख़त्म होने तक उसे बाल छोटे रखने का शौक था। माँ ने कई बार बाल बड़े करनें को लेकर टोका था। छोटे बाल लड़कियों पर अच्छे नहीं लगते, माँ ने कहा था। पर उसने माँ की बाकी बातों की तरह ये बात भी टाल दी थी। पर जब से पूजा न अपने बड़े बालों में चोटी करनी शुरू कर दी थी, तब से उसने बाल बढ़ाने की ठान ली थी। अब वो रोजाना माँ से बालों में तेल की चम्पी कराती और चोटी करने को कहती। शुरू के एक-दो दिन माँ को ये अजीब लगा। लड़की बात कभी ना सुनती और अब अचानक बालो में तेल और चोटी, सोचकर माँ भी हैरान थी। सब सही था, परंतु उसके बाल छोटे थे। चोटी घनी ना बन पाती थी। इसके ऊपर उसकी छोटी बहन उसे ‘चोटी चुहिया’ कहकर चिढ़ाती थी। माँ-बाप सामने होते तो प्रतीक्षा स्वयं को रोक लेती थी, पर अकेले में पाकर वो भी उसको एक-दो थप्पड़ रसीद कर देती थी। फिर जब सुप्रिया कहती कि वो थप्पड़ की बात माँ को बताएगी, तो प्रतीक्षा उसे चुप रहने के प्रलोभन भी देती थी।

प्रतीक्षा घर के बाहर खड़ी है। घर के सामने रखे बड़े गमलों में फूल खिले है। सवेरे मोगरा के सफ़ेद फूल अच्छे लग रहे थे। वो उनकी ही तरफ देख रही थी, कि अचानक उसे कन्धे पर हाथ रखे जाने का आभास हुआ। शरीर में एक पल के लिए स्तब्धता उठती है, परंतु ज्यों ही वो मुड़ती है, पूजा को पाती है। पूजा आ गयी थी, पर हांफ रही थी।

“आज फिर तुझसे उठा ना गया क्या?”, सुबह की वार्ता प्रतीक्षा शुरू कर देती है।

“उठ गयी थी। पर फिर वो हिस्ट्री का असाइनमेंट भी तो पूरा करना था।”, पूजा बोलती है।

“आलसी कही की। एक हफ्ते पहले दिया था असाइनमेंट, तू अब तक पूरा ना कर पायी क्या?”

“अब तेरे जैसी पढनतरु तो हूँ नहीं मैं। बस आज सुबह किया पूरा।”

“ना पता तेरा आलसपन कब हिस्ट्री बनेगा। मैं तो…”

इससे पहले की प्रतीक्षा बात पूरी कर पाती, नजदीक आती बस के हॉर्न ने उस पर पूर्ण विराम लगा दिया था।