चिर पहले सुना कि तेरी शादी आती है

चिर पहले सुना कि तेरी शादी आती है,
अब सामने आकर तू क्या बताती है।

मैं सदा तेरे इस गुण के प्रभाव में रहा,
किस सरलता से तू कठिन बातें कह जाती है।

तुम ना तो खुश दिखते हो, ना दुःखी
ये कैसी मुस्कान चेहरे पर तुमने पाली है।

मेरी आँखें नम ना हुई है,
तुम्हे ग़लतफहमी हुई है।

जाते-जाते जहाँ बसो वहाँ का पता लिख जाना,
आज से उस पते कदमों को मनाही है।

अब तो परदे कर लो खिड़कियों पर,
सब की ख़ुशी सब से देखी ना जाती है।

खाली हुआ गिलास, थोड़ी मय तो डालो
रुदन बाद में छेड़ेंगे, अभी विरह कमसिन है।

दिल टूटा और पूरी गली में आवाज़ उठी

बिलकुल अभी जागा हूँ। नींद गहरी भी नही हुई थी, कि अचानक हुए शोर ने उठा दिया। उठकर घर से बाहर आया तो देखा कि मैं अकेला ना था। सब अपने घर के बाहर थे। खुसर-पुसर चल रही थी। इनके बीच, वो शोर जोर-जोर से रोने की आवाज़ में तब्दील हो गया था।

मुझे ये जानने में रूचि ना थी कि इतना रोया क्यों जा रहा है या फिर सब अपने घर के बाहर क्यों है। दूसरो की खोज-खबर क्या रखता जब मेरी खुद की दुनिया ख़त्म हो रही थी। सोने से पहले एक दोस्त ने बताया था कि मेरे क्रश की शादी की तैयारी शुरू हो चुकी थी। उसके घरवालों ने उसका रिश्ता तय कर दिया था। ये सुनकर पहले तो अपने दोस्त को कोसा कि उसकी जुबान काली है, फिर उसके घरवालों को कोसा और अंत में दुनिया को बुरा-बुरा कहा। मुझे गुस्सा आ रहा था अपने आप पर और उसके घरवालों पर। उसके माँ-बाप अव्वल दर्जे के कंजर लग रहे थे। उसकी उम्र कोई 19 बरस भी मुश्किल होगी, कि शादी का प्लान बना दिया। जैसे कि वो बूढी गाय हो चली थी जो अब दूसरे के गले डालनी थी। मेरे प्यार का परिंदा उड़ा भी ना था, इससे पहले उसके किसी ने पर काट दिए थे। मैं असहाय था, बिल्कुल शोले के ठाकुर की तरह। चित्त में आया था कि गाँव की पानी की टंकी पर चढ़कर उसे माँगू। फिर याद आया कि गाँव में कोई पानी की टंकी नही है और ऐसी गर्मी में कोई अपने ए०सी० वाले कमरो से ना निकलेगा। ऊपर पंखा अपनी चाल चल रहा था, नीचे मैं बेहाल हो रहा था। कुछ बस में ना था। अंत में झक मारकर सो गया।

*****

जनता खुसर-पुसर कर रही थी। एक से पूछा तो पता लगा कि अगली गली में कनखू मर गया था। उसी के परिवार वाले रुदन कर रहे थे।

रविवार का दिन है। छुट्टी है। सब फुरसत में है। सब को आज ही मरना है, रोना है, रिश्ता तय करना है, दिल तोडना है और मुझे कड़वाहट का एहसास दिलाना है। कहते भी है कि फुरसत का काम इंसान का और जल्दबाज़ी का काम शैतान का।

कनखू की बात करुँ तो उससे जीवन में बात कम, पर उसके बारे में बात बहुत सुनी। वो देसी दारू का मग्गा मारके पांच  खेतो को भी एक बार में जोत देने के लिए मशहूर था। लोग तो यहाँ तक कहते थे कि वो पूरा मग्गा एक सांस में गटक जाता है। लोगो की बातें कितनी सच और कितनी झूठ, ये तो शायद उन्हें भी ना पता हो। खुद की बात करू तो आखरी बार उसे रेल स्टेशन के नजदीक देखा था। एक पेड़ तले पड़ा था। मुँह पर मक्खियां भिनभिना रही थी। पैरो में चप्पल ना थी। कपड़े तार-तार थे। बालों में रेत भरा पड़ा था। शायद अफवाह थोड़ी सच थी, और वो मग्गा मारके पड़ा था। थोड़ी दूर निकल जाने के बाद मुड़कर नजर डाली तो मक्खियां नजर से ओझल थी और उसकी बद-हालत छुप सी गयी थी। पेड़ के नीचे मानो आराम वाली नींद सो रहा था। बस वो दिन और आज का दिन, वो सो ही रहा है। बस उस वक़्त उसके आसपास भीड़ ना थी, मक्खियां थी।

बचपन में मैं और उसका लड़का, हम दोनों साथ खेलते थे। कंचा, गली वाली बैट-बॉल, पिट्ठू-गिंडी; बहुत खेल खेले थे हमने। मशहूर चलन है कि दारु वाले घर में क्लेश रहता है। सब इससे पीड़ित रहते है चाहे वो माँ-पिता हो या बच्चे। अब इस बात को ध्यान करुँ और पीछे का वाकया टटोलूँ तो पाता हूँ कि ऐसा कुछ ना था। वो मुझसे ज्यादा मोटा था। भागता भी मुझसे तेज था। पढाई का पता ना, मुझसे पीछे था दर्जे में। और कुछ ध्यान ना, बड़े होते हमारे मित्तर और वक़्त बिताने के साधन बदल चुके थे। पर जब भी उसे देखा, दूर से मौज में पाया।

अब मुझे उसके ऊपर रुदन बुरा लगता है। कानों में इसका स्वर घुसे आता है। लोगो और दुनिया पर फिर गुस्सा आता है। दोगलेपन की भी हद होती है। जब जिन्दा था तब किसी से ना सुध ना ली थी। सब बिजी थे। उलझे हुए थे जिंदगी में। अब मरणोपरांत क्या दिखा रहे है, खुद जाने।

*****

शाम हो आई है। अब किसी की आवाज़ ना आती है। बस पंखे की चर्र-चर्र सुनाई देती है।

मैं अभी भी गुस्से में हूँ। ये क्षणिक आवेश है, जानता हूँ वक़्त के साथ निकल जायेगा। दिन की गर्मी कुछ भारी भी लगने लगी है। विचार बिजली की तरह आ-जा रहे है। कभी उस पर, खुद पर, तो दुनिया पर गुस्सा आता है। उस पर गुस्सा जायज़ नही है। वो मेरे ख्यालो से अनभिज्ञ है। उसे मेरे वजूद का भी ख्याल ना होगा। गलती उसकी नही है, पर फिर भी मेरे क्रोध की भागी है। कम उम्र में ब्याह जरूर उसकी मर्जी के खिलाफ हो रहा होगा। बेचारी के सारे स्वपन टूटकर बिखर गए होंगें। अपने विवाह और अपने  माँ-पिता के बीच कैसे अपने आपको समेटती होगी वो। बिल्कुल गौ जैसी निरीह है, चुप रहेगी पर अपनी व्यथा ना कहेगी। इन सबके बावजूद क्रोध है। दुनिया पर यूँ है कि सब इसका छलावा है। सामाजिक बन्धनों को खोल दे तो मनुष्य एक-दूसरे को ख़त्म कर दे। पर फिर भी इस छलावे के सब बराबर भागीदार है। मैं, वो और सब इंसान। सब इसमें एक साथ है।

मेरे क्रोध का कोई कारण नही है। उसके विवाह का मेरे लिए कोई कारण नहीं है। दुनिया के चलने का भी कोई कारण नहीं है।

बिना किसी कारण के इस छलावे से मुक्ति, शायद मृत्यु का यही कारण है।

दिल टूटा और पूरी गली में आवाज़ उठी

बिलकुल अभी जागा हूँ। नींद गहरी भी नही हुई थी, कि अचानक हुए शोर ने उठा दिया। उठकर घर से बाहर आया तो देखा कि मैं अकेला ना था। सब अपने घर के बाहर थे। खुसर-पुसर चल रही थी। इनके बीच, वो शोर जोर-जोर से रोने की आवाज़ में तब्दील हो गया था।

मुझे ये जानने में रूचि ना थी कि इतना रोया क्यों जा रहा है या फिर सब अपने घर के बाहर क्यों है। दूसरो की खोज-खबर क्या रखता जब मेरी खुद की दुनिया ख़त्म हो रही थी। सोने से पहले एक दोस्त ने बताया था कि मेरे क्रश की शादी की तैयारी शुरू हो चुकी थी। उसके घरवालों ने उसका रिश्ता तय कर दिया था। ये सुनकर पहले तो अपने दोस्त को कोसा कि उसकी जुबान काली है, फिर उसके घरवालों को कोसा और अंत में दुनिया को बुरा-बुरा कहा। मुझे गुस्सा आ रहा था अपने आप पर और उसके घरवालों पर। उसके माँ-बाप अव्वल दर्जे के कंजर लग रहे थे। उसकी उम्र कोई 19 बरस भी मुश्किल होगी, कि शादी का प्लान बना दिया। जैसे कि वो बूढी गाय हो चली थी जो अब दूसरे के गले डालनी थी। मेरे प्यार का परिंदा उड़ा भी ना था, इससे पहले उसके किसी ने पर काट दिए थे। मैं असहाय था, बिल्कुल शोले के ठाकुर की तरह। चित्त में आया था कि गाँव की पानी की टंकी पर चढ़कर उसे माँगू। फिर याद आया कि गाँव में कोई पानी की टंकी नही है और ऐसी गर्मी में कोई अपने ए०सी० वाले कमरो से ना निकलेगा। ऊपर पंखा अपनी चाल चल रहा था, नीचे मैं बेहाल हो रहा था। कुछ बस में ना था। अंत में झक मारकर सो गया।

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जनता खुसर-पुसर कर रही थी। एक से पूछा तो पता लगा कि अगली गली में कनखू मर गया था। उसी के परिवार वाले रुदन कर रहे थे।

रविवार का दिन है। छुट्टी है। सब फुरसत में है। सब को आज ही मरना है, रोना है, रिश्ता तय करना है, दिल तोडना है और मुझे कड़वाहट का एहसास दिलाना है। कहते भी है कि फुरसत का काम इंसान का और जल्दबाज़ी का काम इंसान का।

कनखू की बात करुँ तो उससे जीवन में बात कम, पर उसके बारे में बात बहुत सुनी। वो देसी दारू का मग्गा मारके पांच  खेतो को भी एक बार में जोत देने के लिए मशहूर था। लोग तो यहाँ तक कहते थे कि वो पूरा मग्गा एक सांस में गटक जाता है। लोगो की बातें कितनी सच और कितनी झूठ, ये तो शायद उन्हें भी ना पता हो। खुद की बात करू तो आखरी बार उसे रेल स्टेशन के नजदीक देखा था। एक पेड़ तले पड़ा था। मुँह पर मक्खियां भिनभिना रही थी। पैरो में चप्पल ना थी। कपड़े तार-तार थे। बालों में रेत भरा पड़ा था। शायद अफवाह थोड़ी सच थी, और वो मग्गा मारके पड़ा था। थोड़ी दूर निकल जाने के बाद मुड़कर नजर डाली तो मक्खियां नजर से ओझल थी और उसकी बद-हालत छुप सी गयी थी। पेड़ के नीचे मानो आराम वाली नींद सो रहा था। बस वो दिन और आज का दिन, वो सो ही रहा है। बस उस वक़्त उसके आसपास भीड़ ना थी, मक्खियां थी।

बचपन में मैं और उसका लड़का, हम दोनों साथ खेलते थे। कंचा, गली वाली बैट-बॉल, पिट्ठू-गिंडी; बहुत खेल खेले थे हमने। मशहूर चलन है कि दारु वाले घर में क्लेश रहता है। सब इससे पीड़ित रहते है चाहे वो माँ-पिता हो या बच्चे। अब इस बात को ध्यान करुँ और पीछे का वाकया टटोलूँ तो पाता हूँ कि ऐसा कुछ ना था। वो मुझसे ज्यादा मोटा था। भागता भी मुझसे तेज था। पढाई का पता ना, मुझसे पीछे था दर्जे में। और कुछ ध्यान ना, बड़े होते हमारे मित्तर और वक़्त बिताने के साधन बदल चुके थे। पर जब भी उसे देखा, दूर से मौज में पाया।

अब मुझे उसके ऊपर रुदन बुरा लगता है। कानों में इसका स्वर घुसे आता है। लोगो और दुनिया पर फिर गुस्सा आता है। दोगलेपन की भी हद होती है। जब जिन्दा था तब किसी से ना सुध ना ली थी। सब बिजी थे। उलझे हुए थे जिंदगी में। अब मरणोपरांत क्या दिखा रहे है, खुद जाने।

*****

शाम हो आई है। अब किसी की आवाज़ ना आती है। बस पंखे की चर्र-चर्र सुनाई देती है।

मैं अभी भी गुस्से में हूँ। ये क्षणिक आवेश है, जानता हूँ वक़्त के साथ निकल जायेगा। दिन की गर्मी कुछ भारी भी लगने लगी है। विचार बिजली की तरह आ-जा रहे है। कभी उस पर, खुद पर, तो दुनिया पर गुस्सा आता है। उस पर गुस्सा जायज़ नही है। वो मेरे ख्यालो से अनभिज्ञ है। उसे मेरे वजूद का भी ख्याल ना होगा। गलती उसकी नही है, पर फिर भी मेरे क्रोध की भागी है। कम उम्र में ब्याह जरूर उसकी मर्जी के खिलाफ हो रहा होगा। बेचारी के सारे स्वपन टूटकर बिखर गए होंगें। अपने विवाह और अपने  माँ-पिता के बीच कैसे अपने आपको समेटती होगी वो। बिल्कुल गौ जैसी निरीह है, चुप रहेगी पर अपनी व्यथा ना कहेगी। इन सबके बावजूद क्रोध है। दुनिया पर यूँ है कि सब इसका छलावा है। सामाजिक बन्धनों को खोल दे तो मनुष्य एक-दूसरे को ख़त्म कर दे। पर फिर भी इस छलावे के सब बराबर भागीदार है। मैं, वो और सब इंसान। सब इसमें एक साथ है।

मेरे क्रोध का कोई कारण नही है। उसके विवाह का मेरे लिए कोई कारण नहीं है। दुनिया के चलने का भी कोई कारण नहीं है।

बिना किसी कारण के इस छलावे से मुक्ति, शायद मृत्यु का यही कारण है।

Free Bird

My age is less
Yet much I’ve seen
What people always say
They seldom mean
There’s line and lots of ’em
But a free bird has caught me in.

She flies and soars
High in the sky
She paints it like dream
What she saw with her mind’s eye
And people cheer while she does so
People, each and everyone, and I.

And in this bitter world
She’s an innocent child
Untouched by malice
For never she frowned, always smiled
Maybe life has been mean to her
Who knows the marks her heart has concealed.

Now all of this seems illusory
For she is not known to I
But rest assured
A free bird flies high in the sky.

Late Night Rant

The clock tells it’s 12 A.M. Midnight. Or new day. I don’t care. Silence is here. I like silence.

I was sleeping. Something woke me up. I saw around. No one was present. I tried sleeping again. It didn’t come. Tried everything. Drank water, took a short walk, listened to music, read something; sleep eluded me. And now I feel mad. All day I have to slog through to forget this wasteland and now when I was just about to do it, something woke me up.

Bad dreams. There ain’t a thing like that for me. No dream is as scary as life. And people are stupid. They talk continuously. They talk about how they find relationships and dealing with other people difficult. People are stupid. I couldn’t say it straight to their face. They’d punch me. They talk much and listen little. Everyone does so. This is the problem. No one wants to listen and everyone talks. What a circus.

Memories. I remember them. Little piece of situation stuck in head. It comes at odd times. Makes me useless. It slows me down. Too much for remembering. Now people say memories are good and bad. Keep the good ones and forget the bad ones. I said earlier that people are stupid. They really are. Memories are just time wasted doing something and time wasted again later remembering it. I reek with cynicism.

Love is fake. Or people are. Anyways, both are fake. Belittling self everytime. Telling self they aren’t good enough for someone. Crying over things. Showing affection. Later bitterness. Waiting for the perfect one to arrive. Listening to these romantic songs. Having expectations which are always unmet. Feeling low continuously because an idiot did or said something hurtful. Then picking yourself up. Loving one. Hating him/her later. Late night chats faking intimacy. Always smiling to hide insecurity. Falling in love and then falling out. Feeling low, depressed, dejected. Then the journey of picking up pieces begin. And the worst thing. This shitshow never ends. Everytime you have your head up, there is some stupid trying to mess with it. For all love is, a con job of mind. Heart pumps blood. Mind is messy.

On Losing Friends

Hey feelings
Come here and hit me hard
I promise I won’t  bleed
But I will shed tears.

I lost some friends today. One of them was my childhood friend and other was friend from the past two years. How I feel now? I don’t know. There is a numbing pain in heart which doesn’t go. It’s faint, but it is there. All I do is tell myself that this phase will pass.

What happened?
Excess of everything is bad.

I trusted my friends way too much. It was mistake on my part. But what purpose do friends serve then? Shouldn’t they be there to catch you when you fall? Or it is just that we hang out for a few days, talk about things and spend money all this time while doing nothing. Well, it wasn’t the case with me. I am not saying I did nothing wrong. I did. But i admitted my mistake and expected that they’ll forgive me. Like i forgave them earlier. But it wasn’t the case.

Men, Weakness and Society
Modern society has an interesting concept about man. It is that we are big and muscular walking bodies which are hollow from inside and the only thing we feel is hunger. If a man cries, he ain’t man then. He’s a pussy. It’s like we don’t have emotions. Who proposed this foolish notion?

I want to cry. A lot. But I won’t. Crying over past. I won’t do it anymore.

What makes you

You tell many things
Who you were
Who you are
Who you wanna be
I have listened every single thing
But still i am dazed
What makes you.

Are you the dress you wear
The things you fear
People you hold dear
Or the twitch in your eye
When the time is near

Are you the speeches you gave
The dreams you told me
The shape you said the cloud took
Or
The craziness of your laugh

Are you the music you speak
The lines from books you often say
the movies you go gaga over
Or the old stuff you hold dear

Are you the same child
I saw years ago
Or have you changed with time
And i just don’t know