अपना तो इहा और उहा, यही ट्रेवल हो लिया

छुट्टियों लगभग बीत चली है। इसका मुझे आभास है, केवल कैलेंडर पर बदलती तारीख से नहीं, पर फेसबुक पर मित्रों की लगातार पोस्ट से भी। हर हफ्ते कहीं जाते है, फ़ोटो खीचते है और हैशटैग ट्रैवल, लाइफ, जर्नी इत्यादि लिखकर डाल देते है। उनकी मौज देखकर मैं और मेरी गली का फ्यूज फूंक जाते है।

कुछ साल पहले हमारे मनीपुर के बाहर खेत-ही-खेत थे। प्रचलित कथा के अनुसार उनमे किसान फसल उगाते थे। फसल उगाने में मेहनत, पानी और बीज बराबर लगता था। किसानों की ये जाति, इनका काम जनता को विचलित करता था। गाँव में अब इनकी जाति विलुप्त हो चुकी है। शायद ये किसी को प्रिय ना थे। इनके विलुप्त होने पर ना तो सरकार ने कोई सड़क या सरकारी भवन इनके नाम किया, ना ही कोई स्कीम निकाली। कोई एनजीओ वाला भी इनकी फ़ोटो खींचने ना आया। किसान किसी को अच्छे ना लगते थे।

किसानों के जाने के बाद गाँव में बड़े-बड़े बिल्डर्स आये। महज एक महीने बाद ही गाँव में डीएलएफ, अंसल, रहेजा और बाकी बिल्डर्स के बड़े-बड़े विज्ञापन लग चुके थे। इन विज्ञापनों में बड़ी इमारते थी,  वेस्टर्न वेशभूषा में झोला लटकाये हंसती कन्याएं थी, हरे-हरे बगीचे थे और चौड़ी सड़को पर भागती कारें थी। बाकी बातों का ज्ञान कम, पर उन कन्याओं ने खुश किया था। सोचा कि इमारतों में अगर ऐसी कन्याएं आई और उनमें से एक भी अगर सहेली बन गयी, तो जिंदगी सफल हो जायेगी।

किसान जा चुके थे। खेत खाली पड़े थे। अब उनमें पूरे दिन रेत उड़ता। बंजर पड़े आँखों को चुभते थे। गांववासियों से खेतों की ये दुर्दशा देखी ना गयी। उन्होंने खेतों का प्रयोग सुबह/शाम की सैर और हगने के लिये किया। इस कार्य में गाँव के प्रत्येक पुरुष, महिला और बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। मैंने भी इसमें अपना योगदान दिया था। किसानों का चले जाना गाँव के लिए अच्छा ही था। खेतों ने पूरे गाँव को एकजुट कर दिया था। सुबह/शाम की सैर ने गाँव के लोगों को जाति और अमीर-गरीब की संकुचित मानसिकता से ऊपर उठाया था। खेतों में सैर के दौरान कोई ऊंची या नीची जात ना देखता था। जातिवाद को ख़त्म करने में जहाँ बड़े-बड़े महापुरुषों को असफलता मिली थी, वही खेतों ने इसे कुछ ही दिनों में ख़त्म कर दिया था। किसानों का विलुप्त होना अच्छा ही था।

ये महान कार्य कुछ महीनो तक चला। बिल्डर्स के आने के पश्चात ये खत्म हो गया।

किसानो ने खेतों का प्रयोग फसल उगाने के लिए किया था। गांववासियों ने सुबह/शाम की सैर, हगने और एकता स्थापित करने के लिए किया। बिल्डर्स ने खेतो का प्रयोग, बड़ी-बड़ी इमारतों को बनाने के लिए किया।

बिल्डर्स को इमारते बनानी थी। इस कार्य को करने के लिए, वे क्रेनों, ट्रैक्टरों, डम्पर, ईंट-रोड़ी, सीमेंट और भैयालोग को लेकर आये। इन भैयालोग को मैंने दूर से कई बार देखा। ये सदा काम करते रहते। इनके सर पर या तो तसला होता या फिर प्लास्टिक की टोपी। कपड़े इनके सदा पसीने और सीमेंट से गीले रहतें। भैयालोग और इनकी औरतें जब काम करती, तब इनके बच्चे सड़क किनारे पड़े रहते। बिखरे बालों में रेत पड़ा रहता और कपडे ना के बराबर। छोटी झुग्गियों में ये बसते थे, जहाँ बिजली, पानी और हगने का कोई जरिया ना था। इनसे मेरी पहले कभी बात ना हुई थी, आज को छोड़कर।

खेतों के चले जाने के बाद अब शाम की सैर सड़कों पर होती है। छुट्टियों में पूरा दिन घर पर बीतता है। रोज उबाऊपन की हद पार होती है। आज पूरा दिन बीत गया, पर किसी से बात ना हो पायी। दोपहर में पड़ोस वाली औरतो की चुगली सुन लेता था, पर आज उसमें भी मन ना रमा था। बात करने को जी मचल रहा था। पर कोई ना था।

मैं सड़क पर चल रहा था। मेरे आगे एक भैयालोग था। पूरा दिन बात ना होने के कारण मन भारी था। एक दम विचार आया कि आज इसी से बात की जाए। एक बार ये सोचा, तो अगले पल मैं भी बोल चुका था, “और भैया, कैसे हो?”

अचानक बोले जाने पर वो थोडा स्तब्ध हुआ। पर फिर पीछे मुड़कर बोला, “अच्छे है।”

“और बताओ क्या किया आज?”

“बस भैया मजूरी की। अब रुपे मिले तो राशन लाते है।”

“और कहाँ के रहने वाले हो तुम?”

जवाब में उसने बिहार और किसी गाँव का नाम लिया था। मैं याद ना रख पाया, क्योंकि मेरा कोई इरादा ना था।

“और तुम यहां इतनी दूर आये कमाने को?”

“भैया आना पड़ता है। उधर काम नही है।  आप बताओ।”

“कॉलेज में पढता हूँ। तो छुट्टियां चल रही है। अब बस घूम रहा हूँ।”

“भैया अकेले काहे।”

“सारे दोस्त ट्रेवल कर रहे है। कोई मसूरी, कोई शिमला। मैं ना गया। अच्छा तुमने किया है कही ट्रेवल?”

“नहीं भैया। अपना तो बिहार और आपका गाँव, यही ट्रेवल है।”

इससे पहले मैं और बातें पूछता, उसका फ़ोन बज चुका था। जोर-जोर से। फ़ोन शर्ट की जेब से निकालकर वो बात करने लग गया। मैं वापस मुड़कर घर आ गया। वापस आते सड़क से नजर उठाकर देखा। ईमारत बन चुकी थी। बस पेंट करना रह गया था।

मुझे भूख लगी है

मैं भूखा हूँ। कितना वक़्त बीता, मुझे पता। तब सब काला था और कुछ नही दिखता था। अब सब दिख रहा है। मैं अब भी भूखा हूँ।

बड़े डब्बे में भी कुछ ना था। मैंने मुँह मारा था। मेरे साथी ने भी देखा था। बड़ी काली शोर वाली वही थी। उसमे खाना होता है। मैं नही गया। मैं भूखा था। मैं बैठा था। मेरा एक कोना था। मेरे पास में वे मुँह चला रहे थे। कुछ खा रहे थे। मैं देख रहा था। मैं खाने के लिए बोला। उनमे से एक उठा। मुझे खाना मिलना था। पर वो चिल्लाया। मैं भाग निकला। वो हंस रहा था।

मैं पत्थर वाली जमीन से भागा। मैं रेत पर गया। पैर गर्म होते थे। मैं कोने में गया। मैं पानी में बैठ गया। मुझे भूख लगी थी। मैं वहाँ रहा। आते-जाते वो मुझे देखते। मुझे भूख लगी थी। मैंने नहीं बोला। वो फिर चिल्लाते। मुझे भागना होता। मुझे भूख लगी थी। मैं वही रहा। मैंने आँखें बंद कर ली। मैं सो गया।

मैं उठा। मैं गली में चला। अब कुछ नही दिखता था। वे खाना दे देते थे। आज कोई नहीं था। मुझे खाना ना मिला। मुझे भूख लगी थी। मैं गली में चलता रहा। कुछ नही दीखता था।

एक जगह दीखता था। वहाँ वो थे। बहुत थे। मेरे साथी भी थे। खाना मिलेगा। मैं अंदर गया। वहाँ वो थे। मैं भूखा था। सब दिख रहा था। गली जैसा नही था। खाना भी था। गली में कोई नही था। वो यहाँ थे। यहाँ खाना था। मुझे भूख लगी थी। मैं कोने में गया। वहां खाना पड़ा था। मेरे साथी खा रहे थे। मुझे भूख लगी थी। मैंने खाना खाया। वे नही चिल्लाये। मैंने खाना नही माँगा। मैंने कोने मे खाया। गली में वो नही थे। वो यहाँ थे। वो भी खाना खाते थे। वे नही चिल्लाये। मैं अब भूखा नही था।

छुट्टियां और बचपन की फालतू यादें

छुट्टियां चल रही है। घर और कॉलेज, दोनों जगह से मुक्त हूँ। एग्जाम के दौरान छुट्टियां बिताने को लेकर बहुत बातें सोची थी। वो बातें वही तक सीमित रही। अब घर पर हूँ, तो एक-एक छुट्टी काटनी भारी हूँ। पार्क में घूमना, या पड़ोस की आंटी से मोहल्ले की खबरें जानना; वक़्त काटने को घर बस यही चीजें है। आरम्भ में घरवालों की बातों में मैं वो बेचारा लड़का था जो इम्तिहान के बाद आराम कर रहा है। अभी कुछ दिन ही बीते है। बेटा निताश लामणी करिया, माँ हर रोज रोटी के साथ सुझाव देती है। छोरे बीड़ी फैक्टरी में लग जा, बापू हुक्के से मुँह हटाने के बाद कहते है। मैं ऐसे रियेक्ट करता हूँ कि मैंने उनका कहा सुना ही ना। मैं कामचोर नही हूँ, मैं जानता हूँ। कॉलेज के एक साल में कुछ नखरे पाल लिए है, जिनको संग लेकर अब लामणी करनी या बीड़ी फैक्टरी में काम करना नामुमकिन है। ये बात माँ-बापू को समझानी मुश्किल है, और पड़ोस की आंटी को भी जो कल मुझे माँ-बाप की बात ना मानने वाले चरित्रहीन आदमी के तौर पर दूसरो को बता रही थी।

आज की शाम दोस्त के घर बीती। करने को हमने खाट पर लेटकर छत को ताडा और बकवास की। इससे बेहतर कुछ करने को भी ना था। हवा में जैसे उबाऊपन घुला था। नाक से सांस ली जाती तो मुँह से उबासी निकलती। कमरे में मच्छर थे। वो काट ना रहे थे। कान के आगे पी-पी रहे थे। शायद वे भी अलसा गए थे अपनी दिनचर्या से। पूरा दिन लोगो को काटना और उनकी तालियों से बचना। इसलिए कान के पास पी-पी कर रहे थे। मानो अपनी वाणी में याचना कर रहे थे कि अपनी ताली से हमारी जीवन-लीला समाप्त करो और इस बोरियत से बचाओ।

हम खाट पर लेटे थे। बातें समाप्त हो चुकी थी और सन्नाटा था। अचानक उसने बचपन की बातें शुरू कर दी। मेरा बचपन अच्छा था, सब मुझसे प्यार करते थे, मैं जो चाहता वो खाता था, मुझे कोई काम ना करना पड़ता था; मेरे मित्र ने इनके अलावा और भी काफी बातें कही जो मैं सुन ना पाया। मेरा मन कही और था। मैं उस वक़्त अपने बचपन को याद कर रहा था। उसका बचपन अच्छा था, उसने बताया था। मेरा बचपन मजाक था, मैंने उसे ना बताया।

मुझे बचपन का जिक्र सुनके भंडारे सबसे पहले याद आते है। शिवरात्रि का भंडारा, पीर बाबा का भंडारा; कोई भंडारा ना छोड़ता था मैं। उस वक़्त जीभ पिज़्ज़े-बर्गर और बातें टिश्यू पेपर, फिंगर-बाउल जैसे शहरी चोंचलो से अनजान थी, तो आलू की सब्जी और पूरी का स्वाद भाता था। इतना भाता था कि एक साल मैंने तीन गाँवों के भंडारे भी निपटाये थे।

गाँव के भंडारों का बंदोबस्त बड़ा आसान होता है। पंडाल लगाके दरिया बिछा दी जाती है। जनता बैठती है, तब लोग पत्तल, सब्जी, पूरी आदि का वितरण करते है। भंडारे में काफी लोग आते है, इसलिए दरियों का साफ़ होना जरुरी होता है। ये साफ़ रहे, इसलिए जूतें-चप्पलो को पहले ही निकलवा लिया जाता है।

वो जमाना हवाई चप्पलों का था। मुझे इनका वास्तविक नाम भी ना पता था। काली, सफ़ेद, नीली, भूरी, उँची एड़ी वाली; मेरे लिए सब बाटा वाली चप्पल थी। इनकी बचपन में कोई कद्र नहीं थी। घर से निकलने पर पहनी जाती और खेलते वक़्त खुद पैरो से गायब हो जाती। इनपर खेलते हुए ध्यान देना वक़्त की बर्बादी थी। कोई चप्पल पर ध्यान ना देता था, जब तक कि एक लड़का फलोटर लेकर ना आया था।

पहली बार जब उन्हें देखा, तो मन में उनकी चाह उमड़ आई थी। वो लड़का उन्हें लेकर बहुत इतरा रहा था। उसकी फलोटर को किसी ने चप्पल कहा तो उसका मुँह बन आया था। फलोटर की खासियत दिखने के लिए उसने फलोटर को अपनी कमर में मरवाया भी था। मैं देखकर हैरान हुआ था। बाटा वाली चप्पल एक बार लगने पर रुला देती थी, वही ये फलोटर का कुछ असर ही ना था। बस तभी से फलोटर पहनने की जिद पकडली थी। फलोटर पहनूंगा, ये ख्याल ही राजी करता था। घर जाकर जिद सामने रख दी, तो किसी ने ध्यान ना दिया। अगले दिन जब जिद का उग्र रूप दिखलाया, तो थप्पड़ पड़े। दो-चार दिन तक तो यही चला, पर जोर-जोर से रोता देखकर माँ का दिल पिघल आया था। पांचवे दिन मेरे भी पांवो में फलोटर थी।

मैं फलोटर पाकर बड़ा खुश था। मेरे लिए वो मेरा खजाना था। उन्हें पहनकर मैं ना भागता और खेल-कूद में भी उनपर नजर रखता। खेलकर घर आता तो नहाता बाद में, पहले उन्हें पानी से धोता था। मेरी छोटी सी दुनिया में मेरे फलोटर का बहुत ही विशेष स्थान था।

शिवरात्रि आई। मैं भण्डारे में फलोटर पहनकर गया। माँ ने खूब मना किया था, पर मैं ना माना था।

खाना खाने के पहले फलोटर बाहर उतार दिए थे। जब मैं वापस आया, तो वो गायब थे। खूब ढूंढी पर ना मिली। मैं उस वक़्त रोने लगा था। घर जाकर और ज्यादा रोया। सोचा था कि माँ दोबारा फलोटर दिला देंगी। पर अबकी बार ऐसा ना हुआ, उलट ज्यादा रोने पर कमर में कसकर बाटा वाली चप्पल और लगी। मैं रोने लगा। कुछ समय बाद बापू मनाने आये। मैंने उन्हें कहा कि माँ फलोटर मारती तो वो ना लगती और मैं इतना ना रोता।

मेरे फलोटर मेरे साथ सिर्फ सात-आठ दिन रहे। पर जाते हुए भी एक अमूल्य सबक सीखा गए। उस दिन से मैंने भंडारों में टूटी चप्पल पहनकर जाना शुरू कर दिया, जो अब तक कायम है।

मैं धरती ग्रह होता और मौज लेता

रात ठंडी है। शांत है। तन को भाती है। दिन इसके विपरीत था।

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मुझे पता ना था। सवेरे उठकर अपने नित्य-क्रिया में मगन था। सुबह अच्छी लग रही थी। हौले-हौले हवा भी चल रही थी और बिजली भी बराबर आ रही थी। आज क्या करुँ, इससे पहले कि मैं विचार छेड़ता कॉलेज से एक बन्दे का फ़ोन आया। सोचा की छुट्टियों में कुशल-क्षेम पूछने के लिए किया होगा, पर इसमें बुलावा था। कॉलेज जाना था। निताश तुझे फ़ोन ना उठाना चाहिए था, सोचा। पर सोचने और करने में सदैव एक अंतर रहा है।

एक घण्टे बाद कॉलेज पहुँचा। दूर से देखा तो पाया कि बच्चे झुण्ड में घूम रहे थे। थोडा समीप गया तो देखा कि कुछ ढूंढ़ रहे थे। बिल्कुल समीप गया तो वो कूड़ा उठा रहे थे। निताश वापस हो ले बेटा, उस वक़्त ये एक ही ख्याल था। मैं अमल करता, इससे पहले गुरूजी ने देख लिया। मैं अपनी नजरो में निहायती बेशर्म हूँ, वहाँ से मुड़कर भाग जाता और ऐसा भागता कि कोई पकड़ ना पाता। पर सोचने और करने में सदैव अंतर रहा है।

मैं झुंड में घुलने-मिलने की कोशिश कर रहा था। लड़कियां अलग दिशा में थी, तो लड़के अलग दिशा में थे। उनके पास जाने का मौका देखा, पर बाकी लड़के भी पूरे हरामी थे। मैं एक कदम लेता कि हरामी कुछ काम पकड़ा देते। निताश झाड़ू ले ले, निताश इसे फेंक दे, निताश बियर की बोतल कूड़ेदान में मत डाल, निताश पानी ले आ; टुच्चे कामों में हरामियों ने लगाये रखा। गुस्सा कम, पर रहा, जब तक कि गुरूजी ने हमें इमारतों का चक्कर लगाने को भेजा।

कॉलेज में अभी एग्जाम सम्पन्न हुए थे। एग्जाम में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली उपयोगी चीज, पर्ची, जमीन पर पड़ी थी। दूर से एक नजर डाली, बिल्कुल भोली सी लग रही थी। वो सफ़ेद कागज़ का एक टुकड़ा बेफिक्री के साथ घास और पेड़ो के नीचे पड़ा था। लगता ही नही था इन कागज़ के टुकड़ो में वो जहर है जो टीचर्स और फ्लाइंग वालों को कतई अच्छा नही लगता है। उसने आसपास में घुलने-मिलने की भी कोशिश शुरू कर दी थी। जीरो फोटोकॉपी, हस्तलिखित, किताबों के अंश; सभी प्रकार की पर्चियाँ गलने लग रही थी। उनको उठाना बुरा लग रहा था। उठाने का फ़ायदा भी क्या, पर्चियाँ सड़-गल कर मिट्टी का अंश बनेगी और खाद बन जायेगी। और कागज़ बनता भी तो पेड़ से है। जीवन-मृत्यु का चक्र पूरा होते अगर किसी को अपने जन्मदाता तक ले आये, तो इससे बड़ा पुण्य क्या हो सकता है। इसलिये उनको उठाते अच्छा ना लग रहा था। दूसरा कारण ये भी कि दूसरो का फैलाया कूड़ा उठाने में मुझे रूचि ना थी। मेरा इतना महान व्यक्तित्व ना है कि मैं दूसरो के हित में काम करुँ। ये तो कहने वाले कारण, असली वजह तो ये थी कि मैं लड़कियों से दूर था।

आधे घण्टे बाद इसका अंत हुआ। गुरूजी ने बताया कि आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इसलिए आज हमने कूड़ा उठाया। इससे पर्यावरण कैसे बचा, मुझे ना पता। सब ढकोसलेबाजी लगी। गुरूजी को प्रिंसिपल ने आर्डर दिया होगा। प्रिंसिपल को यूनिवर्सिटी वालो ने आर्डर दिया होगा। यूनिवर्सिटी वालो के पीछे मंत्री महकमा के सेक्रेटरी ने आर्डर दिया होगा। उनको भी आर्डर उनके पिताजी ने दिया होगा। इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी हम थे। सब आर्डर-आर्डर खेल रहे थे, और हम पर आकर खेल खत्म हुआ।

किसी को है पर्यावरण की चिंता? मुझे तो नही है। मुझे सहेली चाहिये और एक सरकारी नौकरी। फिर साल-दर-साल जिंदगी के शौक पूरे करते करते बुढ़ापे में एक-दो पेड़ लगा कर पर्यावरण बचाने की फॉर्मेलिटी भी निभा लूंगा।

कई बार खाली वक़्त में इस ग्रह के बारे सोचता हूँ और जॉर्ज कार्लिन साब का कथन याद आता है, “धरती यही रहेगी, हम यहाँ से चले जायेंगे।” सत्य लगती है ये बात, खुद आदमी ने पर्यावरण की ऐसी-तैसी कि और जब पता लगा कि रहने को और कोई स्थान ना है, तब वो इसे बचाने के ढोंग रचाने चला। वो पर्यावरण को ना बचाता है, वरन खुद को। और बुजदिल इंसान अपने इस कार्य को धरती बचाने के नाम की चादर उढ़ा देता है।

मैं अगर धरती ग्रह होता, तो आदमी ना होता। ढकोसलो से परे होता।

मैं धरती ग्रह होता और मौज लेता

रात ठंडी है। शांत है। तन को भाती है। दिन इसके विपरीत था।

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मुझे पता ना था। सवेरे उठकर अपने नित्य-क्रिया में मगन था। सुबह अच्छी लग रही थी। हौले-हौले हवा भी चल रही थी और बिजली भी बराबर आ रही थी। आज क्या करुँ, इससे पहले कि मैं विचार छेड़ता कॉलेज से एक बन्दे का फ़ोन आया। सोचा की छुट्टियों में कुशल-क्षेम पूछने के लिए किया होगा, पर इसमें बुलावा था। कॉलेज जाना था। निताश तुझे फ़ोन ना उठाना चाहिए था, सोचा। पर सोचने और करने में सदैव एक अंतर रहा है।

एक घण्टे बाद कॉलेज पहुँचा। दूर से देखा तो पाया कि बच्चे झुण्ड में घूम रहे थे। थोडा समीप गया तो देखा कि कुछ ढूंढ़ रहे थे। बिल्कुल समीप गया तो वो कूड़ा उठा रहे थे। निताश वापस हो ले बेटा, उस वक़्त ये एक ही ख्याल था। मैं अमल करता, इससे पहले गुरूजी ने देख लिया। मैं अपनी नजरो में निहायती बेशर्म हूँ, वहाँ से मुड़कर भाग जाता और ऐसा भागता कि कोई पकड़ ना पाता। पर सोचने और करने में सदैव अंतर रहा है।

मैं झुंड में घुलने-मिलने की कोशिश कर रहा था। लड़कियां अलग दिशा में थी, तो लड़के अलग दिशा में थे। उनके पास जाने का मौका देखा, पर बाकी लड़के भी पूरे हरामी थे। मैं एक कदम लेता कि हरामी कुछ काम पकड़ा देते। निताश झाड़ू ले ले, निताश इसे फेंक दे, निताश बियर की बोतल कूड़ेदान में मत डाल, निताश पानी ले आ; टुच्चे कामों में हरामियों ने लगाये रखा। गुस्सा कम, पर रहा, जब तक कि गुरूजी ने हमें इमारतों का चक्कर लगाने को भेजा।

कॉलेज में अभी एग्जाम सम्पन्न हुए थे। एग्जाम में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली उपयोगी चीज, पर्ची, जमीन पर पड़ी थी। दूर से एक नजर डाली, बिल्कुल भोली सी लग रही थी। वो सफ़ेद कागज़ का एक टुकड़ा बेफिक्री के साथ घास और पेड़ो के नीचे पड़ा था। लगता ही नही था इन कागज़ के टुकड़ो में वो जहर है जो टीचर्स और फ्लाइंग वालों को कतई अच्छा नही लगता है। उसने आसपास में घुलने-मिलने की भी कोशिश शुरू कर दी थी। जीरो फोटोकॉपी, हस्तलिखित, किताबों के अंश; सभी प्रकार की पर्चियाँ गलने लग रही थी। उनको उठाना बुरा लग रहा था। उठाने का फ़ायदा भी क्या, पर्चियाँ सड़-गल कर मिट्टी का अंश बनेगी और खाद बन जायेगी। और कागज़ बनता भी तो पेड़ से है। जीवन-मृत्यु का चक्र पूरा होते अगर किसी को अपने जन्मदाता तक ले आये, तो इससे बड़ा पुण्य क्या हो सकता है। इसलिये उनको उठाते अच्छा ना लग रहा था। दूसरा कारण ये भी कि दूसरो का फैलाया कूड़ा उठाने में मुझे रूचि ना थी। मेरा इतना महान व्यक्तित्व ना है कि मैं दूसरो के हित में काम करुँ। ये तो कहने वाले कारण, असली वजह तो ये थी कि मैं लड़कियों से दूर था।

आधे घण्टे बाद इसका अंत हुआ। गुरूजी ने बताया कि आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इसलिए आज हमने कूड़ा उठाया। इससे पर्यावरण कैसे बचा, मुझे ना पता। सब ढकोसलेबाजी लगी। गुरूजी को प्रिंसिपल ने आर्डर दिया होगा। प्रिंसिपल को यूनिवर्सिटी वालो ने आर्डर दिया होगा। यूनिवर्सिटी वालो के पीछे मंत्री महकमा के सेक्रेटरी ने आर्डर दिया होगा। उनको भी आर्डर उनके पिताजी ने दिया होगा। इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी हम थे। सब आर्डर-आर्डर खेल रहे थे, और हम पर आकर खेल खत्म हुआ।

किसी को है पर्यावरण की चिंता? मुझे तो नही है। मुझे सहेली चाहिये और एक सरकारी नौकरी। फिर साल-दर-साल जिंदगी के शौक पूरे करते करते बुढ़ापे में एक-दो पेड़ लगा कर पर्यावरण बचाने की फॉर्मेलिटी भी निभा लूंगा।

कई बार खाली वक़्त में इस ग्रह के बारे सोचता हूँ और जॉर्ज कार्लिन साब का कथन याद आता है, “धरती यही रहेगी, हम यहाँ से चले जायेंगे।” सत्य लगती है ये बात, खुद आदमी ने पर्यावरण की ऐसी-तैसी कि और जब पता लगा कि रहने को और कोई स्थान ना है, तब वो इसे बचाने के ढोंग रचाने चला। वो पर्यावरण को ना बचाता है, वरन खुद को। और बुजदिल इंसान अपने इस कार्य को धरती बचाने के नाम की चादर उढ़ा देता है।

मैं अगर धरती ग्रह होता, तो आदमी ना होता। ढकोसलो से परे होता।

दिल टूटा और पूरी गली में आवाज़ उठी

बिलकुल अभी जागा हूँ। नींद गहरी भी नही हुई थी, कि अचानक हुए शोर ने उठा दिया। उठकर घर से बाहर आया तो देखा कि मैं अकेला ना था। सब अपने घर के बाहर थे। खुसर-पुसर चल रही थी। इनके बीच, वो शोर जोर-जोर से रोने की आवाज़ में तब्दील हो गया था।

मुझे ये जानने में रूचि ना थी कि इतना रोया क्यों जा रहा है या फिर सब अपने घर के बाहर क्यों है। दूसरो की खोज-खबर क्या रखता जब मेरी खुद की दुनिया ख़त्म हो रही थी। सोने से पहले एक दोस्त ने बताया था कि मेरे क्रश की शादी की तैयारी शुरू हो चुकी थी। उसके घरवालों ने उसका रिश्ता तय कर दिया था। ये सुनकर पहले तो अपने दोस्त को कोसा कि उसकी जुबान काली है, फिर उसके घरवालों को कोसा और अंत में दुनिया को बुरा-बुरा कहा। मुझे गुस्सा आ रहा था अपने आप पर और उसके घरवालों पर। उसके माँ-बाप अव्वल दर्जे के कंजर लग रहे थे। उसकी उम्र कोई 19 बरस भी मुश्किल होगी, कि शादी का प्लान बना दिया। जैसे कि वो बूढी गाय हो चली थी जो अब दूसरे के गले डालनी थी। मेरे प्यार का परिंदा उड़ा भी ना था, इससे पहले उसके किसी ने पर काट दिए थे। मैं असहाय था, बिल्कुल शोले के ठाकुर की तरह। चित्त में आया था कि गाँव की पानी की टंकी पर चढ़कर उसे माँगू। फिर याद आया कि गाँव में कोई पानी की टंकी नही है और ऐसी गर्मी में कोई अपने ए०सी० वाले कमरो से ना निकलेगा। ऊपर पंखा अपनी चाल चल रहा था, नीचे मैं बेहाल हो रहा था। कुछ बस में ना था। अंत में झक मारकर सो गया।

*****

जनता खुसर-पुसर कर रही थी। एक से पूछा तो पता लगा कि अगली गली में कनखू मर गया था। उसी के परिवार वाले रुदन कर रहे थे।

रविवार का दिन है। छुट्टी है। सब फुरसत में है। सब को आज ही मरना है, रोना है, रिश्ता तय करना है, दिल तोडना है और मुझे कड़वाहट का एहसास दिलाना है। कहते भी है कि फुरसत का काम इंसान का और जल्दबाज़ी का काम शैतान का।

कनखू की बात करुँ तो उससे जीवन में बात कम, पर उसके बारे में बात बहुत सुनी। वो देसी दारू का मग्गा मारके पांच  खेतो को भी एक बार में जोत देने के लिए मशहूर था। लोग तो यहाँ तक कहते थे कि वो पूरा मग्गा एक सांस में गटक जाता है। लोगो की बातें कितनी सच और कितनी झूठ, ये तो शायद उन्हें भी ना पता हो। खुद की बात करू तो आखरी बार उसे रेल स्टेशन के नजदीक देखा था। एक पेड़ तले पड़ा था। मुँह पर मक्खियां भिनभिना रही थी। पैरो में चप्पल ना थी। कपड़े तार-तार थे। बालों में रेत भरा पड़ा था। शायद अफवाह थोड़ी सच थी, और वो मग्गा मारके पड़ा था। थोड़ी दूर निकल जाने के बाद मुड़कर नजर डाली तो मक्खियां नजर से ओझल थी और उसकी बद-हालत छुप सी गयी थी। पेड़ के नीचे मानो आराम वाली नींद सो रहा था। बस वो दिन और आज का दिन, वो सो ही रहा है। बस उस वक़्त उसके आसपास भीड़ ना थी, मक्खियां थी।

बचपन में मैं और उसका लड़का, हम दोनों साथ खेलते थे। कंचा, गली वाली बैट-बॉल, पिट्ठू-गिंडी; बहुत खेल खेले थे हमने। मशहूर चलन है कि दारु वाले घर में क्लेश रहता है। सब इससे पीड़ित रहते है चाहे वो माँ-पिता हो या बच्चे। अब इस बात को ध्यान करुँ और पीछे का वाकया टटोलूँ तो पाता हूँ कि ऐसा कुछ ना था। वो मुझसे ज्यादा मोटा था। भागता भी मुझसे तेज था। पढाई का पता ना, मुझसे पीछे था दर्जे में। और कुछ ध्यान ना, बड़े होते हमारे मित्तर और वक़्त बिताने के साधन बदल चुके थे। पर जब भी उसे देखा, दूर से मौज में पाया।

अब मुझे उसके ऊपर रुदन बुरा लगता है। कानों में इसका स्वर घुसे आता है। लोगो और दुनिया पर फिर गुस्सा आता है। दोगलेपन की भी हद होती है। जब जिन्दा था तब किसी से ना सुध ना ली थी। सब बिजी थे। उलझे हुए थे जिंदगी में। अब मरणोपरांत क्या दिखा रहे है, खुद जाने।

*****

शाम हो आई है। अब किसी की आवाज़ ना आती है। बस पंखे की चर्र-चर्र सुनाई देती है।

मैं अभी भी गुस्से में हूँ। ये क्षणिक आवेश है, जानता हूँ वक़्त के साथ निकल जायेगा। दिन की गर्मी कुछ भारी भी लगने लगी है। विचार बिजली की तरह आ-जा रहे है। कभी उस पर, खुद पर, तो दुनिया पर गुस्सा आता है। उस पर गुस्सा जायज़ नही है। वो मेरे ख्यालो से अनभिज्ञ है। उसे मेरे वजूद का भी ख्याल ना होगा। गलती उसकी नही है, पर फिर भी मेरे क्रोध की भागी है। कम उम्र में ब्याह जरूर उसकी मर्जी के खिलाफ हो रहा होगा। बेचारी के सारे स्वपन टूटकर बिखर गए होंगें। अपने विवाह और अपने  माँ-पिता के बीच कैसे अपने आपको समेटती होगी वो। बिल्कुल गौ जैसी निरीह है, चुप रहेगी पर अपनी व्यथा ना कहेगी। इन सबके बावजूद क्रोध है। दुनिया पर यूँ है कि सब इसका छलावा है। सामाजिक बन्धनों को खोल दे तो मनुष्य एक-दूसरे को ख़त्म कर दे। पर फिर भी इस छलावे के सब बराबर भागीदार है। मैं, वो और सब इंसान। सब इसमें एक साथ है।

मेरे क्रोध का कोई कारण नही है। उसके विवाह का मेरे लिए कोई कारण नहीं है। दुनिया के चलने का भी कोई कारण नहीं है।

बिना किसी कारण के इस छलावे से मुक्ति, शायद मृत्यु का यही कारण है।

दिल टूटा और पूरी गली में आवाज़ उठी

बिलकुल अभी जागा हूँ। नींद गहरी भी नही हुई थी, कि अचानक हुए शोर ने उठा दिया। उठकर घर से बाहर आया तो देखा कि मैं अकेला ना था। सब अपने घर के बाहर थे। खुसर-पुसर चल रही थी। इनके बीच, वो शोर जोर-जोर से रोने की आवाज़ में तब्दील हो गया था।

मुझे ये जानने में रूचि ना थी कि इतना रोया क्यों जा रहा है या फिर सब अपने घर के बाहर क्यों है। दूसरो की खोज-खबर क्या रखता जब मेरी खुद की दुनिया ख़त्म हो रही थी। सोने से पहले एक दोस्त ने बताया था कि मेरे क्रश की शादी की तैयारी शुरू हो चुकी थी। उसके घरवालों ने उसका रिश्ता तय कर दिया था। ये सुनकर पहले तो अपने दोस्त को कोसा कि उसकी जुबान काली है, फिर उसके घरवालों को कोसा और अंत में दुनिया को बुरा-बुरा कहा। मुझे गुस्सा आ रहा था अपने आप पर और उसके घरवालों पर। उसके माँ-बाप अव्वल दर्जे के कंजर लग रहे थे। उसकी उम्र कोई 19 बरस भी मुश्किल होगी, कि शादी का प्लान बना दिया। जैसे कि वो बूढी गाय हो चली थी जो अब दूसरे के गले डालनी थी। मेरे प्यार का परिंदा उड़ा भी ना था, इससे पहले उसके किसी ने पर काट दिए थे। मैं असहाय था, बिल्कुल शोले के ठाकुर की तरह। चित्त में आया था कि गाँव की पानी की टंकी पर चढ़कर उसे माँगू। फिर याद आया कि गाँव में कोई पानी की टंकी नही है और ऐसी गर्मी में कोई अपने ए०सी० वाले कमरो से ना निकलेगा। ऊपर पंखा अपनी चाल चल रहा था, नीचे मैं बेहाल हो रहा था। कुछ बस में ना था। अंत में झक मारकर सो गया।

*****

जनता खुसर-पुसर कर रही थी। एक से पूछा तो पता लगा कि अगली गली में कनखू मर गया था। उसी के परिवार वाले रुदन कर रहे थे।

रविवार का दिन है। छुट्टी है। सब फुरसत में है। सब को आज ही मरना है, रोना है, रिश्ता तय करना है, दिल तोडना है और मुझे कड़वाहट का एहसास दिलाना है। कहते भी है कि फुरसत का काम इंसान का और जल्दबाज़ी का काम इंसान का।

कनखू की बात करुँ तो उससे जीवन में बात कम, पर उसके बारे में बात बहुत सुनी। वो देसी दारू का मग्गा मारके पांच  खेतो को भी एक बार में जोत देने के लिए मशहूर था। लोग तो यहाँ तक कहते थे कि वो पूरा मग्गा एक सांस में गटक जाता है। लोगो की बातें कितनी सच और कितनी झूठ, ये तो शायद उन्हें भी ना पता हो। खुद की बात करू तो आखरी बार उसे रेल स्टेशन के नजदीक देखा था। एक पेड़ तले पड़ा था। मुँह पर मक्खियां भिनभिना रही थी। पैरो में चप्पल ना थी। कपड़े तार-तार थे। बालों में रेत भरा पड़ा था। शायद अफवाह थोड़ी सच थी, और वो मग्गा मारके पड़ा था। थोड़ी दूर निकल जाने के बाद मुड़कर नजर डाली तो मक्खियां नजर से ओझल थी और उसकी बद-हालत छुप सी गयी थी। पेड़ के नीचे मानो आराम वाली नींद सो रहा था। बस वो दिन और आज का दिन, वो सो ही रहा है। बस उस वक़्त उसके आसपास भीड़ ना थी, मक्खियां थी।

बचपन में मैं और उसका लड़का, हम दोनों साथ खेलते थे। कंचा, गली वाली बैट-बॉल, पिट्ठू-गिंडी; बहुत खेल खेले थे हमने। मशहूर चलन है कि दारु वाले घर में क्लेश रहता है। सब इससे पीड़ित रहते है चाहे वो माँ-पिता हो या बच्चे। अब इस बात को ध्यान करुँ और पीछे का वाकया टटोलूँ तो पाता हूँ कि ऐसा कुछ ना था। वो मुझसे ज्यादा मोटा था। भागता भी मुझसे तेज था। पढाई का पता ना, मुझसे पीछे था दर्जे में। और कुछ ध्यान ना, बड़े होते हमारे मित्तर और वक़्त बिताने के साधन बदल चुके थे। पर जब भी उसे देखा, दूर से मौज में पाया।

अब मुझे उसके ऊपर रुदन बुरा लगता है। कानों में इसका स्वर घुसे आता है। लोगो और दुनिया पर फिर गुस्सा आता है। दोगलेपन की भी हद होती है। जब जिन्दा था तब किसी से ना सुध ना ली थी। सब बिजी थे। उलझे हुए थे जिंदगी में। अब मरणोपरांत क्या दिखा रहे है, खुद जाने।

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शाम हो आई है। अब किसी की आवाज़ ना आती है। बस पंखे की चर्र-चर्र सुनाई देती है।

मैं अभी भी गुस्से में हूँ। ये क्षणिक आवेश है, जानता हूँ वक़्त के साथ निकल जायेगा। दिन की गर्मी कुछ भारी भी लगने लगी है। विचार बिजली की तरह आ-जा रहे है। कभी उस पर, खुद पर, तो दुनिया पर गुस्सा आता है। उस पर गुस्सा जायज़ नही है। वो मेरे ख्यालो से अनभिज्ञ है। उसे मेरे वजूद का भी ख्याल ना होगा। गलती उसकी नही है, पर फिर भी मेरे क्रोध की भागी है। कम उम्र में ब्याह जरूर उसकी मर्जी के खिलाफ हो रहा होगा। बेचारी के सारे स्वपन टूटकर बिखर गए होंगें। अपने विवाह और अपने  माँ-पिता के बीच कैसे अपने आपको समेटती होगी वो। बिल्कुल गौ जैसी निरीह है, चुप रहेगी पर अपनी व्यथा ना कहेगी। इन सबके बावजूद क्रोध है। दुनिया पर यूँ है कि सब इसका छलावा है। सामाजिक बन्धनों को खोल दे तो मनुष्य एक-दूसरे को ख़त्म कर दे। पर फिर भी इस छलावे के सब बराबर भागीदार है। मैं, वो और सब इंसान। सब इसमें एक साथ है।

मेरे क्रोध का कोई कारण नही है। उसके विवाह का मेरे लिए कोई कारण नहीं है। दुनिया के चलने का भी कोई कारण नहीं है।

बिना किसी कारण के इस छलावे से मुक्ति, शायद मृत्यु का यही कारण है।