On freedom of expression

In school, I was a mediocre student. So while the teachers were yapping in classroom, little I understood them. It wasn’t like I didn’t pay them any attention. It was just that half of the things they said, I didn’t understand and I was meek enough to not ask for a explaination.

All this background info was needed to tell that I have limited information about freedom of expression. I think this is a newly discovered thing among people. Recently I have seen people using this term online

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What I understand about freedom of expression is, that one is free to say things he wants to say.

This freedom often ends up hurting people. Or maybe it provokes people. People don’t like getting hurt. The thing is kinda selfish. People, these days, are like, I can say whatever I want to say because it is my birthright but if someone offends me then I will not spare them. This freedom should be two-way. If you are free to say what you want to say, then you should also listen to what others have to say. But this isn’t the way. Apparently, people like to talk but they don’t listen.

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कबाड़ी जिंदा होता तो और खुश होते

आज रविवार है। घड़ी की सुइयां चलते हुए आवाज़ करती है। इनकी टिक-टिक के अलावा, मनीपुर गांव में आज शांति है। Continue reading

सफेद रंग की चीजें अब लाल होती है

सफेद रंग की चीजें अब लाल होती है,
मेरे देस में मरे बाद क्रांति होती है।

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What’s A Man?

आदमी क्या है? What is a man?
He is a question asked by himself.
I ask this question occasionally. It is appealing to my mind. It makes me feel like a erudite man.
One couldn’t find answer at home. You can find questions or comforts at home, but the world outside has answers. So i stepped out.

Who am I?
This thing was on my mind. Constantly. It was there when I reached the limit of my village and looked at the road.
The road. It’s always been there. Answers to every journey and destination. Maybe the road can answer my question.
I walk. And I walk a little more. Sweat makes me feel sticky. The wind ain’t blowing and stench of sweat is everywhere. It is in my hands, my hair, my clothes, everywhere. It is in my mind and the things I say. It is in the roadside flowers and overgrown bushes.
I see a tree and decide to sit down. Continue reading

सुरेन्दर के सपनो वाली चुल्ल

दिनों की लड़ी लगी पड़ी है। पहला जाता है, दूसरा आता है। वार बदलते है, पर इनके टाइप एक जैसे रहते है। सारे दिन एक जैसे है। मैं तुम्हे ये सब इसलिए नही बता रहा कि मुझे तुमसे सहानुभूति चाहिए। मुझे अपना दुःख भी ना बांटना है। बस बात इतनी है कि पूरे दिन में जो मजाक होते है, उन पर मैं रोता हूँ।

आज शिवरात्रि है। सवेरे मैं मंदिर के बाहर खड़ा कांवड़ देख रहा था कि सुरेन्दर टकरा गया। उसकी आँखें सुल्फि सी थी, जैसे की सोया ना हो। निताश तुझे उससे बात ना करनी चाहिए थी, ये बात अब मेरे दिमाग में अब आती है। पर बात मैंने ना की थी। वो खुद मेरे नजदीक आया था और अपनी सपनो वाली बात बताई थी। कि किस तरह उसने अपने घूमने-फिरने का सपना पूरा किया था और कैसे वो दोबारा एक अलग जगह घूमने जायेगा। ये दुनिया के बाशिंदे है। इन सबकी तशरीफ़ में चुल्ल रहती है कि इसको जब तक कही टेका ना जाए वो शांत ना होती है। उसने अपनी चुल्ल मुझे दे दी। दिन अंत होता है, शिव की सौगंध है कि सब सच कहूँगा। मैं घर बैठा अपने कॉलेज खुलने की राह देखता काटता हूँ। घूमना-फिरना मेरा गाँव के फ्लैटों वाले रोड तक सीमित है। अब मुझे जो दुनिया देखने की ख्वाहिश है, ये पूरी ना होगी।

कोसने को मेरे पास उस सुरेन्दर को लेकर कुछ नही है। यूँ तो मैं अपने मन को कोस सकता हूँ, पर मन मेरा है। अपना है। सुरेन्दर मनीपुर का सबसे बकवास इंसान है। उसके मुँह से पहले बीड़ी निकलती है, फिर उसका धुँआ और अंत में उसकी बकवास। पहले उसकी बकवास सपना डांसर की नयी वीडियो ढूँढने को लेकर थी और अब सपना पूरा करने की है। उस पर एक नजर से कतई ना लगता है कि उसके कुछ सपने होंगे। कमतर आंकना भूल है। पर मेरे गुरूजी कहते थे कि “एस्पेक्टशन एंड एक्सेप्शन आर ऑलवेज देयर।” सुरेन्दर उन मानुसो में से ना है जिनके सपने घूमने-फिरने जैसे होते है। ये शौक शहरी चोंचला है। ये उन तक ही अच्छा है। पर इसके किटाणु संक्रामक है। बातों से फैलते है। सुरेन्दर ने घूमने-फिरने के किटाणु मुझे दे दिए है।

मैंने घूमना-फिरना दूर से देखा है। मेरे दोस्त कही ना कही घूमते रहते है। मनाली, लेह, लद्दाख, दार्जिलिंग फलाना धिमकाना। ये जगह मैंने किताबो में देखि है। वो वहां असल में घूमते है। मेरी बातों में जलन की बदबू दिखे मगर वो है नही। वो मेरी घुटन है। मेरी आसपास की घुटन। ये मुझे अच्छे से जानती है और मैं इसे। इस घुटन से बचने का तरीका है सैर सपाटा। ये बात मुझे पता है। पर इस सैर सपाटे की दवादारू महंगी पुड़िया है। सपने ऊँचे भले ही देखने बढ़िया आदत है। पर ऊँचाई महंगी होती है। यथार्थ में जमीन पैरो के लिए और नीचे मनुष्यो के लिए एक खाली जेब बड़ा ही बदसूरत आइना माफिक है।

लाईनो के मध्य अर्थ मत ढूँढना। ग़ुम जाओगे। अनेक बातों की एक बात है कि मैं एक आम आदमी है। मेरी साधारणता मेरी विशेषता है। मैं जिस चीज को छूता हूँ, वो साधारण हो जाती है। सपने महंगे है। मैंने उन्हें देखा है, पर छुआ नहीं। मैं मित्रो के साथ मॉल में घूमा हूँ। शोरूम्स में  ग्लास परे मॉडल को ताड़ा है। उनके पहने कपड़ो की कुशल कारीगरी और कपड़े की बुनावट को देखा है। शोरूम की लाइट्स और उसकी ए०सी० वाली ठण्डी हवा को महसूस किया है। उनमे आने वाली जनता के ढंग को देखा है। लड़कियों के गोरेपन पर उनकी हंसी को देखा और सुना है। मैकडोनाल्ड्स और डोमिनोस जैसे जगह पर खानपीन के वस्तुओं पर सोचा है। मॉल आगे खड़ी मर्सीडीज, ऑडी और BMW की लम्बी कारों को सराहा है। सिनेमा में एक बार घूमकर देखा है। सब कुछ ‘ए क्लास अपार्ट’ है। अब मेरे बताने के ढंग के ऊपर ना जाना कि मेरा तुम्हे बताना मेरी मजबूरी की पुकार है कि मुझे तुमसे मदद चाहिए। मुझे सब अच्छा लगा। परन्तु अच्छे लगने का अर्थ ये नहीं है कि उस वस्तु की जरूरत है। जहर का स्वाद भले ही श्रेष्ठ हो, परंतु उसे पीना श्रेष्ठ नहीं है। कुछ ऐसा ही हिसाब मेरा इन सब चीजो से है। गाँव में रहते हुए छोटी दुनिया में छोटी सोच विकसित की। अब ये जो शहरी कल्चर है, ये चोंचला है। जनता इसे फॉलो करती है क्योंकि वो कर सकते है। पर इसका मतलब ये नहीं की वो सब के लिए है। विज्ञापन देखना बुद्धि भंग करता है। अनावश्यक चीजो को जिंदगी का अभिन्न अंग दर्शाना इसका मकसद है। कुछ ऐसा ही इन सब शहरी चोंचलो के साथ है। इनका शहरी कल्चर इनकी शहरी जिंदगी का विज्ञापन है। मेरी सोच का दायरा सीमित भले हो, परन्तु सीमित सच बड़े झूठ से सही है।

सुरेन्दर बकवास इंसान है। एक दिन में सपना देखना और उसे पूरा करना, प्रेरणा मनुष्य को क्षणिक प्रेरित कर सकती है। कि वो अपने से ऊपर उठे और आगे बढे। परन्तु प्रेरणा दिमाग का नशा है। जितनी जल्दी चढ़ता है, उतनी ही जल्दी उतरता है। उसके घूमने-फिरने का बताना किस चीज की प्रेरणा थी, मुझे ना पता। वो अपनी फेंकू प्रवृति के लिये प्रसिद्ध है। उसका पिछला स्वप्न सपना डांसर के साथ पड़ोस के लखन के ब्याह में ठुमके मारने का था। उसका वो स्वप्न सच ना हुआ, पर उसने गाँव में सपना डांसर को प्रसिद्ध जरूर करवा दिया था।

मैं दिन को बैठकर देखूँ तो कुछ नया ना है। ये घूमने-फिरने की जो चुल्ल है, ये कल तक उतर जायेगी। फिर भी अभी ये दिमाग में घूम रही है, तो कुछ अजीब है। मन चंचल है। घूमने की सोच से खेलकर जब ऊब जायेगा, तो जल्दी ही कुछ नया पकड़ लेगा। बस मुझे तब तक अपने को संभालकर रखना है।

उपरोक्त लाईनो में स्वप्न है, बातें है, मज़बूरी है, दोस्त है, शौक है, गाँव है, शहर है, इनके लोग है, कार है, मदद है, बीमारी है, दवाई है, रूपए है, चोंचले है, सब है। बस वक़्त की कमी है।

आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ

आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ,
सरकार अर्जी सुने, भगवान से फरियाद करता हूँ।

जानता हूँ की चाशनी में डूबा फरेब है उनका,
हैरान हूँ हर बार किस तरह विश्वास करता हूँ।

उनके तलवे चाटकर नौकरशाही को उभरते देखा मैंने,
इस उम्मीद में रोज अपनी जीभ की सफाई करता हूँ।

मेरा ‘आम’ शब्द भी छीन लिया मुझसे पल में,
ये कैसे हुआ, सोचकर रोज हैरान होता हूँ।

लगता है मेरा रब रूठ गया मुझसे उस दिन का,
जब से मैं अपनी अर्जी सुनी जाने की फरियाद करता हूँ।

दिन ढले तो शुरुआत हुई

दिन ढले तो शुरुआत हुई,
अकेलेपन में अपनी तलाश हुई।

एक सड़क देखी, मोधि पड़ी जमीन पर,
उस पर चलकर कितनों को मंजिल प्राप्त हुई।

मंजिल पहुँचोगे अवश्य, पर दिनों की बात ना करो,
पल ऐसा देखना जिसमे तुम्हारी साँसे इसकी सौगात हुई।

मेरे साथी चुपचाप नजर आये आज मुझे,
शोर करो कुछ कि शान्ति अब नापंसद हुई।

एक कोने में बैठके देखूँ जिंदगी पलों में कटती,
बेबस मैं बेचारा, बेरोजगारी मेरी माशूक हुई।