Stupid Things in Night (Chapter – 1)

I woke up with an unwillingness to start the day’s proceedings. All I wanted to do was lie down, eat and sleep.

So I slept. Morning, afternoon and in evening. Now it is night. Everything has gone silent. I am awake. My back hurts and the bed is uncomfortable. I listen to the same songs again. Repetition is boring. And I am lonely now.

How wonderful it would be to have someone to talk to now, I think. I pick up the phone and go through my Facebook and WhatsApp list. No one to talk to.

I remember things of old days. Mostly school time. College is OK but not memorable. Memories of friends, teachers and crushes come up. And comes this sense of unease. I feel choked with these memories. I get up and walk out of the room.

There is a sudden chill in the wind. It means the arrival of winter. There are hardly any stars in the sky. The only sound comes from the road far away. I go inside.

What a boring person I have become. I was not so. I used to be fun. I remember my friends always laughed when they were with me. But a lot of them got married and have families of their own to support now. I also want to get married. I just have not found a suitable girl yet. Last year father got many proposals from other parents. I turned all of them down. I did not want to get married last year. I was fresh out of College and wanted to live a little. This went on for few months. Lately, there have been no proposals for marriage.

I think about Anjana. She was my classmate. We were best friends for a few months in College before she got herself a boyfriend. She started spending more time with him. Our interactions receded. By the time College ended, she was someone less than a friend but more than an acquaintance. It sucked and I genuinely felt bad when our talks decreased, because she was a good listener.

I want to talk to her. But her Facebook account has been inactive for some time. She must have changed her number, as her WhatsApp status have been invisible to me for a long time. Maybe she has moved on towards the next big things in her life. I feel happiness for a split second. I am happy for her, because she has got things planned. Hardly surprising, since she always knew what to do.

And there was Lata. She was my senior. We met while we participated in inter-class debate competition. From there started the hi-hello in corridors and we progressed to eating lunch and talked often during our free lectures. She was funny. But she graduated soon after.

I did not remember her until today. I search her on Facebook. We have three mutual friends. I also sent a ‘hi’ message along with my friend request.

It is midnight, so the chances of a reply and getting my request accepted are none. I close my eyes and wait for sleep to come.

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मक्खी का साथ

मक्खी मुँह पर बैठी है। इसे उड़ाना नही है। इस पल सारी दुनिया मेरे खिलाफ है, इस मक्खी का साथ अच्छा है।

कहानी का फ्लेवर मुझे नही पता। तुम पता करना। मैं बात शुरू सुबह से करूँगा।

सुबह

मैं धनंजय हूँ। मैं मनीपुर का निवासी हूँ। माँ-बाप मार चुके है। मैं अकेला हूँ। अपना खुद का मैं हूँ। सब खुद करता हूँ। यह मेरा परिचय है।

मैं उठा, हगा, सफाई की, नहाया, पूजा की, खाना बनाया, खाया और तैयार होकर नौकरी की तरफ निकल चला।

मैं कंपनी पहुँचा। चंचल की बात सुनाई दी। उसकी बात रोज वाली थी।

‘फ्लाईओवर तेरे ऊपर क्यों नही पड़ा।’

यह बात उसकी रोज की है। चंचल किसी को दिखाई ना देती है। मुझे भी नही। शुरू में मुझे समझ ना आया था। थोड़ी पूछताछ की तो पता लगा यह आवाज़ मन में है। मैंने इसे चंचल नाम दिया।

मैंने इसे परे किया और काम मे लग गया।

••

दोपहर

मैं खाना खाने के लिये बैठा।

‘पनीर की सब्जी कब खायेगा।’

मैंने सुबह आलू की सब्जी बनाई थी। हफ्ते में दो-तीन बार यही बनाता हूँ। मुझे कोई आपत्ति नही, पर चंचल को है।

मैं पानी पीने गया। मटके में पानी का तापमान सामान्य था।

‘ठंडे पानी की बोतल खरीद।’

यह नई बात थी। ब्रेक खत्म होने में अभी बीस-पच्चीस मिनट थे। मैं पेड़ नीचे बैठकर पार्किंग में लगी गाड़िया देखने लगा।

‘तू कब खरीदेगा।’

यह बात भी नई थी। फिर एक पल के लिए नजर पार्किंग में लगी घास में काम करती महिला पर पड़ी।

‘ब्याह कर ले।’

यह बात भी नई थी। आज चंचल ज्यादा बोल रही थी। मैं उठकर गेट चौकीदार के पास गया। सोचा उससे बात करता।

उसके मुँह का निचला भाग तम्बाकू से भरा था। महक मेरी नाक के बाल फूंक रही थी।

‘इस हरामी के मुँह पर थप्पड़ मार।’

मैं फालतू की बात कर काम पर वापिस लौटा।

‘तेरा हाथ इस मशीन में डाल कर देख।’

मैं पेशाब करने के लिए गया। वहां पैखाने की बदबू तेज थी।

‘सूँघ। तेरे मुँह से ऐसी ही बदबू आती है।’

मैं काम पर लौटा। ऊपर पंखा चल रहा था पर पसीने फिर आ रहे थे। सामने मैनेजर अपने ऑफिस में बैठा था। उसके कमरे में ए०सी० लगा था।

‘ऑफिस में जा और सोफे पर सो जा। मैनेजर को थप्पड़ मार दे।’

मैं काम मे लगा रहा।

एक रुक्का सुना। कंपनी की मालकिन काम देखने को आई थी। वो एक-दो महीने में कभी ही आती थी। मैनेजर और बाकी अफसर अपने ऑफिस से बाहर आ खड़े हुए थे।

‘इसकी गोरी चमड़ी पर हाथ फेर दे। तेरे जीवन के सारे पाप खत्म हो जाएँगे।’

मैं वापिस काम पर लगा रहा। छुट्टी होने में डेढ़ घंटे बचे थे। सुरेश मेरे पास आकर रुपये मांगने लगा। उसे फ़ोन ठीक कराने के लिए चाहिए थे। मेरे पास बचत के रुपये थे। मैं मना करना चाहता था, पर मना ना किया गया।

‘तू इंसान है या चटाई है।’

मैंने मैनेजर को देखा। हमे काम करते देख रहा था। उसके गले मे सोने की चैन दिखी।

‘छीन कर भाग जा। तू बनवा तो सकता नही है।’

काम खत्म हुआ। पर चंचल बोलती रही।

मैं साईकल लेकर कंपनी से चल पड़ा।

•••

शाम

मैं घर आ रहा था। साईकल को लेकर पैदल चल रहा था। एक जगह ट्यूब फट गई थी। ट्यूब के रुपये सुरेश के पास थे।

मेरे साथी और अन्य बंदे मोटरसाइकिल पर जा रहे थे। चंचल अब भी चुप ना हुई थी। मुझे बार-बार नाकारा, नालायक कहे जा रही थी। मैं थका हुआ था। इसे दूर करने की शक्ति मुझमें ना थी। मैंने चुप होने को कहा, पर उसने मेरी ना सुनी। मजाक मन मे था, दुनिया हँसती लग रही थी।

मैं पैदल चलकर, साईकल घसीटता, किसी तरह घर पहुँचा। चंचल बराबर बोल रही थी।

मैंने रुपये लिए पर साईकल को घर ही छोड़ दिया। मैं ठेके की ओर निकला।

••••

रात

मक्खी मुँह पर बैठी है। चंचल बराबर बोल रही है। उसकी बातों से लगता है दुनिया मेरे खिलाफ है।

मैं कुछ करूँ, पर अभी नशे में हूँ।

रात के इस पहर, मैं हांडू चुप होया,
कोई उठ जावै, न्यु पाप ना करणा।
एक बात सिरहाने रख सोया था सावण म्ह,
इब रात नै बीते वक़्त की बात खोजूं मैं।

हैरान होवण की कोशिश करियो मित्तर मेरे,
जब बताऊँ कि किन कमियां साथ जीया गया।
बेरा भी होवै मन नै सब किमी बेशक़,
कुणसे घूंट का स्वाद कीसा था।
मेरी शिकायत हजार, अर भ्रम एक,
पैर राह भूलगे या रास्ता नया बणा दिया।

आजादी (भाग-2)

भाग 1 पढ़ने के लिए क्लिक करे।

मैं अभी रो रहा हूँ। मेरे आँसू तुम्हे ना दिखेंगे। बता रहा हूँ, मान लो। बियर मुझे भावुक कर देती है।

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प्रश्न-उत्तर

सुबह है। पंखे के शोर से परे होकर पंछियों की आवाज़ आती है। वे चहचहा रहे है। वे खुश है, दुःखी है, संतुष्ट है, ऊब रहे है या उनकी आवाज़ शोर से अधिक ना है, मैं यह जान ना पाया हूँ। वैसे जरूरत भी ना है, क्योंकि मुझे पंछियों से कोई काम ना पड़ा है, और आगे भी ना पड़ेगा। इसका एक अपवाद कबूतर हो सकता है। किवदंती है कि एक वक्त कबूतर संदेशवाहक पक्षी था। पंछियो की आवाज़ का ज्ञान कबूतर के साथ सार्थक होता। मैं कबूतर से अपने क्रश को अनाम प्रेमपत्र भिजवाता। और जो जन मुझसे सही तरीके बात ना करते, मैं उनके सिर या उनकी गाड़ी पर कबूतर से बीट करवाता।

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यादों का पहला दिन

मैं घर से चल दिया।

मैं गाड़ी में बैठा हूँ। मुझे ज्यादा चीजें याद ना है। बस इतना है कि मैं रास्ते चलते देख रहा हूँ। रास्ते जाने-पहचाने लगते है। कुछ याद भी आता है। मेरा स्कूल, जिसे मैं सालों पहले छोड़ आया था, वह अब भी यही है। गाड़ी से उतरकर, मैं गेट के सामने खड़ा होकर इसे देखता हूँ। मन में यादें आती है। यादों के साथ वर्तमान को मिलाता हूँ। मेरी यादें वही है, बाकी सब बदल गया है।

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जै रामजी की

इस कहानी में एक लड़का-लड़की है। वो एक-दूसरे को प्रेम करते है या नही, ये मुझे नही पता है। पास खड़े बंदे ने मुझे यही बताया कि एक लड़का और एक लड़की है।

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