मक्खी का साथ

मक्खी मुँह पर बैठी है। इसे उड़ाना नही है। इस पल सारी दुनिया मेरे खिलाफ है, इस मक्खी का साथ अच्छा है।

कहानी का फ्लेवर मुझे नही पता। तुम पता करना। मैं बात शुरू सुबह से करूँगा।

सुबह

मैं धनंजय हूँ। मैं मनीपुर का निवासी हूँ। माँ-बाप मार चुके है। मैं अकेला हूँ। अपना खुद का मैं हूँ। सब खुद करता हूँ। यह मेरा परिचय है।

मैं उठा, हगा, सफाई की, नहाया, पूजा की, खाना बनाया, खाया और तैयार होकर नौकरी की तरफ निकल चला।

मैं कंपनी पहुँचा। चंचल की बात सुनाई दी। उसकी बात रोज वाली थी।

‘फ्लाईओवर तेरे ऊपर क्यों नही पड़ा।’

यह बात उसकी रोज की है। चंचल किसी को दिखाई ना देती है। मुझे भी नही। शुरू में मुझे समझ ना आया था। थोड़ी पूछताछ की तो पता लगा यह आवाज़ मन में है। मैंने इसे चंचल नाम दिया।

मैंने इसे परे किया और काम मे लग गया।

••

दोपहर

मैं खाना खाने के लिये बैठा।

‘पनीर की सब्जी कब खायेगा।’

मैंने सुबह आलू की सब्जी बनाई थी। हफ्ते में दो-तीन बार यही बनाता हूँ। मुझे कोई आपत्ति नही, पर चंचल को है।

मैं पानी पीने गया। मटके में पानी का तापमान सामान्य था।

‘ठंडे पानी की बोतल खरीद।’

यह नई बात थी। ब्रेक खत्म होने में अभी बीस-पच्चीस मिनट थे। मैं पेड़ नीचे बैठकर पार्किंग में लगी गाड़िया देखने लगा।

‘तू कब खरीदेगा।’

यह बात भी नई थी। फिर एक पल के लिए नजर पार्किंग में लगी घास में काम करती महिला पर पड़ी।

‘ब्याह कर ले।’

यह बात भी नई थी। आज चंचल ज्यादा बोल रही थी। मैं उठकर गेट चौकीदार के पास गया। सोचा उससे बात करता।

उसके मुँह का निचला भाग तम्बाकू से भरा था। महक मेरी नाक के बाल फूंक रही थी।

‘इस हरामी के मुँह पर थप्पड़ मार।’

मैं फालतू की बात कर काम पर वापिस लौटा।

‘तेरा हाथ इस मशीन में डाल कर देख।’

मैं पेशाब करने के लिए गया। वहां पैखाने की बदबू तेज थी।

‘सूँघ। तेरे मुँह से ऐसी ही बदबू आती है।’

मैं काम पर लौटा। ऊपर पंखा चल रहा था पर पसीने फिर आ रहे थे। सामने मैनेजर अपने ऑफिस में बैठा था। उसके कमरे में ए०सी० लगा था।

‘ऑफिस में जा और सोफे पर सो जा। मैनेजर को थप्पड़ मार दे।’

मैं काम मे लगा रहा।

एक रुक्का सुना। कंपनी की मालकिन काम देखने को आई थी। वो एक-दो महीने में कभी ही आती थी। मैनेजर और बाकी अफसर अपने ऑफिस से बाहर आ खड़े हुए थे।

‘इसकी गोरी चमड़ी पर हाथ फेर दे। तेरे जीवन के सारे पाप खत्म हो जाएँगे।’

मैं वापिस काम पर लगा रहा। छुट्टी होने में डेढ़ घंटे बचे थे। सुरेश मेरे पास आकर रुपये मांगने लगा। उसे फ़ोन ठीक कराने के लिए चाहिए थे। मेरे पास बचत के रुपये थे। मैं मना करना चाहता था, पर मना ना किया गया।

‘तू इंसान है या चटाई है।’

मैंने मैनेजर को देखा। हमे काम करते देख रहा था। उसके गले मे सोने की चैन दिखी।

‘छीन कर भाग जा। तू बनवा तो सकता नही है।’

काम खत्म हुआ। पर चंचल बोलती रही।

मैं साईकल लेकर कंपनी से चल पड़ा।

•••

शाम

मैं घर आ रहा था। साईकल को लेकर पैदल चल रहा था। एक जगह ट्यूब फट गई थी। ट्यूब के रुपये सुरेश के पास थे।

मेरे साथी और अन्य बंदे मोटरसाइकिल पर जा रहे थे। चंचल अब भी चुप ना हुई थी। मुझे बार-बार नाकारा, नालायक कहे जा रही थी। मैं थका हुआ था। इसे दूर करने की शक्ति मुझमें ना थी। मैंने चुप होने को कहा, पर उसने मेरी ना सुनी। मजाक मन मे था, दुनिया हँसती लग रही थी।

मैं पैदल चलकर, साईकल घसीटता, किसी तरह घर पहुँचा। चंचल बराबर बोल रही थी।

मैंने रुपये लिए पर साईकल को घर ही छोड़ दिया। मैं ठेके की ओर निकला।

••••

रात

मक्खी मुँह पर बैठी है। चंचल बराबर बोल रही है। उसकी बातों से लगता है दुनिया मेरे खिलाफ है।

मैं कुछ करूँ, पर अभी नशे में हूँ।

रात के इस पहर, मैं हांडू चुप होया,
कोई उठ जावै, न्यु पाप ना करणा।
एक बात सिरहाने रख सोया था सावण म्ह,
इब रात नै बीते वक़्त की बात खोजूं मैं।

हैरान होवण की कोशिश करियो मित्तर मेरे,
जब बताऊँ कि किन कमियां साथ जीया गया।
बेरा भी होवै मन नै सब किमी बेशक़,
कुणसे घूंट का स्वाद कीसा था।
मेरी शिकायत हजार, अर भ्रम एक,
पैर राह भूलगे या रास्ता नया बणा दिया।

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आजादी (भाग-2)

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मैं अभी रो रहा हूँ। मेरे आँसू तुम्हे ना दिखेंगे। बता रहा हूँ, मान लो। बियर मुझे भावुक कर देती है।

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खामखा फरियादी बने है

हम पूछ बैठे कि दुःख काहे इतना सारा है,

किधर शुरू और कहाँ ये खत्म हो,

हमने तनिक इतना पूछा।

आप उत्तर दे ना पाओ,

या आपका उतर हमे पसन्द ना आये,

बस स्मरण रहे कि हम केवल फिल्मी बातें ना दोहराए है।

कुछ बीस बरस की जिन्दगानी जिसमे,

पंद्रह या सौलह मुफ़्तख़ोरी के है,

अब जब हम यहां तक ऐसे आये,

तो क्यों आज हम निकम्मे और नालायक कहलाए।

बड़ी इमारतें, गाड़ी और इनमें बसते बड़े लोग,

क्यों ना हमें भी अपने बीच स्थान दिलवाओ।

मानते है औकात कम है और,

फकीरी का रुतबा पहले जैसा ना है,

परन्तु इंसानियत अभी भी जिंदा होनी तो चाहिए ही।

कामचोरी की दिक्कत ना है हमें,

भरपूर किस्म के दंश झेले फिरते है हम,

पर पुश्तैनी नाम हमारा इतना मजबूत ना हुआ,

कि हम उसको जोड़कर अपना दुःख बाजारू करें।

मेरे सरकारी माईबाप,

बस कदम चूमेंगे या पैर दबाएंगे,

तुम कहो तो तुम्हारे बोले को गीतापाठ समझ बोल जाएंगे,

तुम कहो तो हम पानी समझ तेजाब पी जाएंगे,

केवल सरकारी नौकरी दे देना।

दरअसल मुद्दा यह है कि तंगी केवल रुपयों की ही ना है,

पर रिश्तेदारों और अजीज जानकारों के बीच इज्जत की भी है।

सब कामचोर समझते है।

तुम्हारी कृपा होगी तो इज्जत भतेरी होगी।

दुःख झेलना हमारा रोज का कार्य है,

कहो कि आदत हुई है अब यह,

बस ये इज्जत का मामला रुलाता है।

दुःख रोज मिले पर रिश्तेदार साल में एक बार,

तो उनकी हँसी हमें तीखा कुरेदती है।

अंत करे तो अब किस्मत को कहते है,

कि क्यों हमसे रूठी हुई हो।

क्यों हमारे मन मुताबिक ना बनती है।

कहो तो मनाने के लिए व्रत करे या उपवास।

बल्कि यह बात तो हम संसार से कहेंगे,

कि क्या उपाय करें कि तुम अपनी विशालता का एक हिस्सा या एक कोना,

हमारे साथ बाँटो।

हम जुगाड़ी बंधु है सारे।

कमी पड़ने पर सब मिलजुल हिसाब बैठा लेते है।

तुम्हारा कोना अगर हमारे पैरो को छोटा भी पड़े,

तो घुटनो के बल भी हम किसी तरह,

उसमे चले जायेंगे और खुश रहेंगे।

उस पल का एक कष्टदायक सुख,

हमारे वर्तमान की तुलना में बेहतर ही होगा।

तो अब बताओ कि कब यह सब हो रहा है,

हुक्म करो तो पंडित से मुहूर्त निकलवाए,

कोई कमी पड़े तो फौरन बताओ,

हम अभी जुगाड़ बैठाए।

हम अभी जुगाड़ बैठाए।

बस इन दुःखो का टिकाऊ इलाज कर दो,

फिर हम भी चैन-सुख से सो जाएं।

प्रश्न-उत्तर

सुबह है। पंखे के शोर से परे होकर पंछियों की आवाज़ आती है। वे चहचहा रहे है। वे खुश है, दुःखी है, संतुष्ट है, ऊब रहे है या उनकी आवाज़ शोर से अधिक ना है, मैं यह जान ना पाया हूँ। वैसे जरूरत भी ना है, क्योंकि मुझे पंछियों से कोई काम ना पड़ा है, और आगे भी ना पड़ेगा। इसका एक अपवाद कबूतर हो सकता है। किवदंती है कि एक वक्त कबूतर संदेशवाहक पक्षी था। पंछियो की आवाज़ का ज्ञान कबूतर के साथ सार्थक होता। मैं कबूतर से अपने क्रश को अनाम प्रेमपत्र भिजवाता। और जो जन मुझसे सही तरीके बात ना करते, मैं उनके सिर या उनकी गाड़ी पर कबूतर से बीट करवाता।

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यादों का पहला दिन

मैं घर से चल दिया।

मैं गाड़ी में बैठा हूँ। मुझे ज्यादा चीजें याद ना है। बस इतना है कि मैं रास्ते चलते देख रहा हूँ। रास्ते जाने-पहचाने लगते है। कुछ याद भी आता है। मेरा स्कूल, जिसे मैं सालों पहले छोड़ आया था, वह अब भी यही है। गाड़ी से उतरकर, मैं गेट के सामने खड़ा होकर इसे देखता हूँ। मन में यादें आती है। यादों के साथ वर्तमान को मिलाता हूँ। मेरी यादें वही है, बाकी सब बदल गया है।

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जै रामजी की

इस कहानी में एक लड़का-लड़की है। वो एक-दूसरे को प्रेम करते है या नही, ये मुझे नही पता है। पास खड़े बंदे ने मुझे यही बताया कि एक लड़का और एक लड़की है।

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