प्रश्न-उत्तर

सुबह है। पंखे के शोर से परे होकर पंछियों की आवाज़ आती है। वे चहचहा रहे है। वे खुश है, दुःखी है, संतुष्ट है, ऊब रहे है या उनकी आवाज़ शोर से अधिक ना है, मैं यह जान ना पाया हूँ। वैसे जरूरत भी ना है, क्योंकि मुझे पंछियों से कोई काम ना पड़ा है, और आगे भी ना पड़ेगा। इसका एक अपवाद कबूतर हो सकता है। किवदंती है कि एक वक्त कबूतर संदेशवाहक पक्षी था। पंछियो की आवाज़ का ज्ञान कबूतर के साथ सार्थक होता। मैं कबूतर से अपने क्रश को अनाम प्रेमपत्र भिजवाता। और जो जन मुझसे सही तरीके बात ना करते, मैं उनके सिर या उनकी गाड़ी पर कबूतर से बीट करवाता।

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यादों का पहला दिन

मैं घर से चल दिया।

मैं गाड़ी में बैठा हूँ। मुझे ज्यादा चीजें याद ना है। बस इतना है कि मैं रास्ते चलते देख रहा हूँ। रास्ते जाने-पहचाने लगते है। कुछ याद भी आता है। मेरा स्कूल, जिसे मैं सालों पहले छोड़ आया था, वह अब भी यही है। गाड़ी से उतरकर, मैं गेट के सामने खड़ा होकर इसे देखता हूँ। मन में यादें आती है। यादों के साथ वर्तमान को मिलाता हूँ। मेरी यादें वही है, बाकी सब बदल गया है।

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जै रामजी की

इस कहानी में एक लड़का-लड़की है। वो एक-दूसरे को प्रेम करते है या नही, ये मुझे नही पता है। पास खड़े बंदे ने मुझे यही बताया कि एक लड़का और एक लड़की है।

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कुछ स्वार्थी पंक्तिया

तू न आती है
मुझे कविता ना आती है
मेरे यार रूठे जैसे मुझसे
मेरी बाते मेरा मखौल बन जाती है।

समीप ना थे यार मेरे
बड़ी दूर जाना पड़ता था
फिर भी बाते फासला काटती थी,
अब बाते खत्म है।

मन चंचल है, अवश्य,
परंतु वर्तमान परिस्तिथियो में मेरी कमजोरी आवश्यक है,
जिंदगी का हर क्षण जो बेहतर बनने-बिगड़ने में व्यतीत हुआ,
उसकी प्रेरणा मैंने स्वयं दूसरो की प्रगति को देखकर जलते हुए ग्रहण की थी,
किन्तु अब व्यथित मन के समक्ष सब भेद साफ है,
जिंदगी के पक्षो में सामंजस्य बिठाना जरूरत है।

अब सोचने को भी कुछ ना आया है,
याद आयी है, कि मुड़ते हुए राह चलो।
मित्रो, मैं गिरा हुआ हूँ सामने तुम्हारे,
काबिल ना तुम्हारी मित्रता के,
फिर भी हाथ आगे बढाओ।

सफेद रंग की चीजें अब लाल होती है

सफेद रंग की चीजें अब लाल होती है,
मेरे देस में मरे बाद क्रांति होती है।

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दादी बुंदिया

आज कॉलेज जाने को घर से जल्दी निकला था। रोज-रोज आशीष कहा है, कहा है की रट लगाए फ़ोन करता रहता था। आज उसे ये मौका ना देना था।

“रै बेटा कित जावै है?”

मैं गांव के अड्डे की ओर चला जा रहा था। अचानक पीछे से आवाज़ आयी। आवाज़ दादी बुंदिया की थी।

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भाई, लड़की से बात करना मुश्किल ना है

लड़की से बात करना कितना मुश्किल है?

मैं इस हलचल को बेंच पर बैठकर देखता हूँ। मेरे सामने अनेक लड़कियाँ है, उनसे बात करते लड़के है। जब कोई काम बन्दा खुद ना कर पाता है, उस काम को कोई दूसरा कर जाता है तो उसे दूसरे की अचीवमेंट कहा जाता है। कम से कम पहला बन्दा तो उसे अचीवमेंट ही कहेगा। तो क्या लड़कियों से बात करना एक अचीवमेंट है? मुझे ना पता। पर मुझे बेहतर ख्याल सोचने की जरूरत है।

आज कॉलेज आने का ख्याल नाहक किया। इतने दिनों का आलस चढ़ा हुआ है, उसे एक दिन में उतार फेंकना मुश्किल है। बेंच पर बैठे-बैठे उबासी आती है। उमस में गर्मी भी ज्यादा है। दिन कैसे कटेगा? मुझे ना पता।

“निताश भाई आज कॉलेज चलना है?”
सवेरे की पहली बात मुझे आज आशीष की सुनाई दी थी।

आशीष मेरा एक मित्र है। वो कॉलेज के उन मनुष्यो में है जो मेरी बातें सुनकर मुझसे दूर ना भागे थे। वो मेरे साथ बना रहा, और कब वो जान-पहचान से आगे बढ़कर क्लासमेट और फिर मित्र बन गया, इसका मुझे ना पता। मेरा कॉलेज में एक मित्र है। वो आशीष है।

अभी मैं बेंच पर बैठा उसी का इंतजार कर रहा हूँ। बात करने वाले लड़के-लड़कियां निकल चुके है। लड़कियों से बात करना क्या अचीवमेंट है? ये बात मेरे दिमाग में घूम रही है।

लड़कियों से बात करने की चुल्ल जवानी का एक रोग है। शायद ये इसका लक्षण है। मुझे ना पता। बचपन का पता है कि दूसरे दर्जे में इनसे पेंसिल मांगने पर भी अन्य लड़के मजाक बना देते थे। वो उस वक़्त हंसते थे। बस हंसते रहते थे। उनकी हंसी से सतर्क होकर मैंने लड़कियों से बात करना त्याग ही दिया था। त्याग महान बताया गया है। ये त्याग उस समय मुझे महान लगा था, पर दर्जे का नम्बर बढ़ते-बढ़ते जब दस पर आ रुका और मुझ पर हंसने वाले खुद हंसकर लड़कियों से बतियाने लगे थे, उस वक़्त मैं झेंपकर रह गया था। उनकी हंसी और हंसने में परिवर्तन आया था। और वो यहां तक सीमित ना था कि वो पहले मुझ पर लड़कियों से बात करने पर हंसते थे और बाद में उनके साथ हंसने लगे थे। वो हंसी मेरे ऊपर ही केंद्रित रही थी। मैंने झेंपना उस हंसी से ही सीखा था। अब कॉलेज के दूसरे साल में झेंपना तो कम हुआ है , पर बातों की कमी अभी भी है।

बेंच पर बैठे, दूर से आशीष आता दिखता है। उसके साथ अजंता भी है। अजंता का दिखना कॉलेज में मेरे झेंपने का एक कारण है। ये कारण पहले साल से बना हुआ है। मुझे याद है पहले साल में जब उसे देखा था तो मैंने बात करनी चाही थी। हम क्लास में बैठे थे और उसने स्टेज पर एक ‘ब्यूटीफुल स्पीच’ दी थी। उस वक़्त उसे इम्प्रेस करने की चाह में मैंने सबसे ज्यादा तालिया बजायी थी और आशीष से भी बजवाई थी। मेरे तालिया पीटने से वो इम्प्रेस तो ना हुई, पर वो स्पीच खत्म करके आई तो मैं बात करने को खड़ा हुआ था। बेंच पर खड़े होते ही मुझे चेहरे दिखे और मैं झेप गया था। लेक्चरर ने मेरे बेंच पर खड़े होने का गलत अनुमान लगाया था और मुझे आगे बुला लिया था। आगे जाकर उन्होंने मुझे सिंधु घाटी सभ्यता पर अपने विचार रखने को बोला था। ‘सिंधु घाटी सभ्यता एक प्राचीन सभ्यता है, जो सिंधु नदी के किनारे किसी समय फली-फूली थी। प्राचीन वक़्त होते हुए भी वो कई चीजों में हमसे आधुनिक थे, जैसे कि नगर में गन्दे पानी की निकासी हेतु पक्की नालियों का प्रबंध, सभी के रहने के लिए पक्के घरो का प्रबंध इत्यादि। आधुनिक समय में हमे उनकी सभ्यता के अवशेष मिले है। पर इस सभ्यता का अंत,  कुदरती कारण या बाहरी मनुष्यो का हमला, इसके क्या कारण है। ये सवाल आज भी अचंभित करता है। सिर्फ मुझे ही नही, पर सभी को जिनके सामने इसका जिक्र होता है।’ ये सब विचार मेरे मन में थे। मैंने इन्हें बोलने के लिए मुख भी खोला था। सोचा था कि जल्दी विचार बाहर निकलकर इसे बंद कर लूंगा। बचपन में मां ने मेरे ज्यादा बोलने पर मुझे बंदर कहा था। मुझे स्टेज पर सभी के सामने बंदर ना लगना था। पर मुख खोलने पर विचार ना आये, सिर्फ सांस आयी। मैं शायद बंदर जैसा लगने लगा था, क्योंकि क्लास में सारे बच्चे हंसने लगे थे। लेक्चरर ने ये सब देखकर मुझे वापस जाने को बोल दिया। वापस आने पर देखा कि आशीष हंसकर अजंता से बात कर रहा है।
हा-हा, ही-ही, ये मेरा बैकग्राउंड म्यूजिक बन गया था। पूरी क्लास मेरे ऊपर हंस रही थी। आशीष भी, अजंता भी। उनकी हंसी मुझे विचलित ना कर रही थी, पर मेरे खुद के विचारों का बाहर ना आना। उस दिन के बाद मैंने अजंता से बात करने का ख्याल छोड़ दिया। सिर्फ ख्याल के सोचने पर पूरी क्लास हंसने लगी थी, विचारो ने मुझे छोड़ दिया था। उससे बात करने को हिम्मत की तो पूरा कॉलेज हँसेगा। ऐसा सोचकर और उसे देखकर मैं झेंप गया था।

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आशीष मेरे पास आकर बैठ गया। अजंता ने जाते हुए हाथ हिलाया था, पर वो शायद आशीष के लिए था। झेंपते हुए मैं दुनिया भूल जाता हूँ।

“भाई तू लड़कियों से बात कैसे कर लेता है?” मैं बोला, “मतलब इतना आसान तो होता ना होगा?”

“भाई आसान है। कुछ मुश्किल ना है।”, आशीष बोला।

“भाई फिर कौनसी बात करता है तू कि लड़की हंसी रहती है। कोई जोक सुनाता है क्या?”

ये सुनकर आशीष हंसने लगा।

“चूतिये हंस मत। पूरी बात बता।”, आशीष अजंता ना था, जिसका हंसना मुझे झेंप करने को मजबूर करता।

“सच भाई, कोई जोक ना है। लड़की से बात करना कोई मुश्किल ना है। बस तू बात कर, वो भी करेंगी।”, आशीष बोला।

“बात तो तेरी सही है। अच्छा यूं बता कि ये खुद भी किसी से बात करती है क्या?”

“खुद भी बात करती है भाई। अभी अजंता को देखा तूने। वो मुझे गेट पर मिली और खुद बातें करने लगी।”

“भाई मीठी मिर्च मत खिला। मैंने तो देखा उनको बात की शुरुआत करते।”

“भाई अब तू फुद्दू बात कर रहा है। तू साले देखेगा क्या, तेरी नजर उस फ़ोन से ना हटती कभी।”

“ना भाई ऐसा थोड़ी है।”, आशीष सच्ची बात बोल गया था। मैं हड़बड़ा उठा था।

“ऐसा ही है भाई। तू फ़ोन से तो हटता ना, लड़की से क्या बात करेगा?”

“भाई ऐसा ना है। वो कई बार फ़ोन में अपडेट आ जाती है तो कई बार मैं ऑनलाइन फॉर्म भर रहा होता हूं।”

“भाई अपडेट तेरी कॉलेज में ही क्यों आती है, घर क्यों ना आती।”

“भाई मुझे ना पता।”

“मुझे पता है। तू लड़कियों से शर्माता है।”

“भाई मैं ना शर्माता किसी से। बस बात इतनी है कि समझ ना आता कि उनसे क्या बात करूं?”

“तू मुझसे कौनसी बात करता है? भाई लड़कियों से बात करने को इतना ना सोचना चाहिए।”

“भाई सोचना चाहिए। कोई बेवकूफ बात कही जाए और वो हंस दे तो।”

“तू अजीब है यार। अभी तू उन्हें हँसाने की बात कर रहा था और अभी ना हँसाने को कह रहा है। भाई वो हंस दे तो तू भी हंस और आगे बात कर।”

“ना भाई। इतना आसान ना है।”, इतना कहकर मैं खड़ा हो गया।, “चल अब, पहला लेक्चर अटेंड करना है।”

वो भी मेरे साथ चल पड़ा।

•••

कॉलेज के दूसरे साल का पहला लेक्चर। मेरे साथ वाले बेंच पर अजंता बैठी है। वो अपनी सहेली से बातें करती है। आशीष अगले बेंच पर बैठी लड़की से बातें कर रहा है। लेक्चरर औरंगज़ेब की कुछ कहानी बता रहा है।

अजंता अब लेक्चरर की और देख रही है। शायद उसे औरंगज़ेब की कहानी अच्छी लग रही है। जब वो सहेली से बात कर चुकी थी, तब उसने नजर घुमाकर पूरी क्लास देखा था। शायद मुझे भी देखा था। उस पल झेंपने का मन ना था, बस किसी तरह बात करनी थी।

दूसरा साल कैसा निकलेगा? लड़कियों से बात करना क्या मुश्किल है? औरंगज़ेब इतना इंटरेस्टिंग क्यों है? ऊपर कोई खुदा है जो इंसानो की मदद करता है, उनकी बात सुनता है? इन सवालों के क्या कोई जवाब है?

मुझे ना पता।

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