दादी बुंदिया

आज कॉलेज जाने को घर से जल्दी निकला था। रोज-रोज आशीष कहा है, कहा है की रट लगाए फ़ोन करता रहता था। आज उसे ये मौका ना देना था।

“रै बेटा कित जावै है?”

मैं गांव के अड्डे की ओर चला जा रहा था। अचानक पीछे से आवाज़ आयी। आवाज़ दादी बुंदिया की थी।

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मुझे सपनो का डांसर बनना है

मैं सुरेन्द्र हूँ। इस वक़्त गाँव के टेसन पर बैठा हूँ। मेरी कमर में दर्द है और गांड फटी पड़ी है।

कल रात मैं अपनी नौकरी पर था। मैं बिल्डिंग का एक पूरा चक्कर लगाकर कुर्सी पर बैठा था। फ़ोन हाथ में था और मैं यूटूब पर सपना डांसर की नई वीडियो ढूंढ रहा था। फ़ोन पर उसकी वीडियो और फ़ोटो आ रहे थे। जितनी आई, सारी देख रखी थी। मैं जितना नीचे जाता, उतनी ज्यादा वीडियो आती। उनमे से एक पर मेरा ध्यान गया। उस पर सपना को फोटो नही थी। मैं बोर हो रहा हूँ, सोचकर उसे चलाया। फिर उसमे एक लुगाई बोली। उसने सपनो का डांसर बनने को कहा। उसने बात की कि सपनो का पीछा करना चाहिए। कुछ देर तक उसकी बात चली, फिर मैं बिल्डिंग का चक्कर लगाने को चल दिया।

नौकरी करके मैं घर पहुँचा। मैं थका हुआ था। बिजली नही थी। कपड़ो से पसीने की बदबू आ रही थी। मैंने बीड़ी चसाईं और रोटी तोड़ी। सोने को लेटा तो बार-बार वीडियो पर ध्यान जाता। सपनो का डांसर बनो। उनका पीछा करो।

मैं सो गया।

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आज सुबह अजीब लग रहा था। सपनो का डांसर बनो, उनका पीछा करो। बातें मन में जम गयी थी। मेरा सपना क्या है? मुझे ना पता था। छोटी उम्र में भागना, खेलना और घूमना पसंद था। बड़ा हुआ तो बीड़ी, लड़की और घूमना पसन्द था। पिताजी की साइकिल पर पूरा गाँव घूमना, पैदल चलकर अगले गाँव जाना, जोहड़ में भैसों को घूमाना, लड़कियां घुमाने के लिए उनकी क्लास के बाहर घूमना। ये सब घूमना-घुमाना मुझे अच्छा लगता था और शायद यही मेरा सपना था।

आज मैं नौकरी की जगह टेसन गया। वहाँ मैं दिल्ली की रेल में चढ़ लिया। मुझे सपना आज ही पूरा करना था।

रेल में भीड़ थीं। डब्बे के गेट पर भी खड़ा होना मुश्किल था। डब्बे के पाखाने महक मार रहे थे। हवा उनसे होकर आती। भीड़ का पसीना भी नाक तक आता। हालत बुरी थी, पर सहनी पड़ी। दिल्ली का टेसन कब आया, मुझे पता ना चला। मैंने उतरकर कमर पकड़ ली थी। दर्द हो रहा था।

मैंने घर से चलते चाय ना पी थी, टेसन पर याद आया। चाय की तलब थी। टेसन पर एक टपरी पर गया और चाय के लिए बोला। उसने मुझे एक कप में चाय दी। कप मैंने देखा, मेरी छोटी ऊँगली से भी छोटा था। मैंने चाय का पतीला और छलनी देखी। छलनी पर चायपत्ती काली का जगह भूरी पड़ी थी और उन पर मक्खी उड़ती थी। उस चायपत्ती के ढेर में शायद मक्खी भी पड़ी थी और बाकी मक्खी अपनी साथी को ढूंढती उड़ती थी।  बाहर ऐसा ही है, ये सोचकर मैंने चाय पी। चाय का एक घूँट लेने पर पता चला, वो चाय का गर्म जूस था। जी में आया कि कुल्ला करके इस टपरी वाले के मुँह पर फेंक दूँ। मैंने ऐसा कर भी देता, पर 10 रूपए की चाय बर्बाद ना करनी थी।

मैं घर से घूमने को निकला था। चीजें देखने निकला था। दिल्ली के टेसन पर जो पहली चीज मैंने देखी, वो भीड़ थी। बस भीड़। उसमें दुनिया थी। आदमी थे, औरत थी, भिखारी थे और कुत्ते भी थे। उसमे गन्दगी भी थी। मैंने ये सब देखा पर ये चीजें मैंने गाँव में भी खूब देखी थी। पर यहाँ एक चीज अलग थी, औरतें। गाँव की लुगाई सदा ढकी रहती थी। पर यहाँ अलग था। यहाँ इनकी चमड़ी गौरी थी। और ये ढकी हुई भी ना थी। आदमी वाले कपड़े पहन रखी थी। आदमी वाले कपड़ो में उनका सब नजर आता। बाहर ऐसा ही है। मैं ये सब पूरे दिन देखता, पर मुझे दिल्ली भी घूमनी थी।

टेसन से निकलकर मैं टम्पू वाले के पास गया और उसे चिड़ियाघर जाने को बोला। वो चल दिया। उसका टम्पू बढ़िया था। मैं कमर टिकाकर बैठा ताकि कमर में दर्द ना हो। उसका टम्पू आवाज़ भी कम करता था और तेज था। सब सही था, पर हरामी ने किराये के 70 रूपए लिए। मैंने 10 रूपए की कही, पर वो ना माना। पूरे 70 रूपए लिए। पर दिल्ली बड़ा शहर है और यहाँ ऐसा ही है। टेसन वापिस पैदल जाऊंगा, ये सोचकर मैं चिड़ियाघर के अंदर गया।

मैं चिड़ियाघर में गया। चीते, शेर, हाथी, बहुत सारे जानवर थे। अब तक इनका फ़ोटो देखा था। वो सब सही थे, पर वो जाली किसलिए लगा रखी थी। बचपन में पिताजी खेतों पर कांटे वाले तार लगाते थे। रात को गाय, भैंस खेत में घुसकर फसल खाती थी। उनसे बचाने के लिए पिताजी तार लगाते थे। ये जाली भी इसलिए ही लगायी होगी ताकि शेर बाकियो को खा ना ले। पर बाकी जानवर तो फिर खुले घूमने चाहिए, बिलकुल मेरी तरह। मैं ये सब सोच रहा था। मुझे भूख भी लग रही थी। इन चिड़ियाघर वालो को यहाँ मुर्गे भी रखने चाहिए। बाकी जानवरो के खाने का हिसाब तो सही है पर कुछ यहाँ पर इंसानो का भी तो होना चाहिए।

मैं चिड़ियाघर से बाहर आ गया। मुझे भूख लगी थी। सपना पूरा करने के चक्कर में मैंने सुबह रोटी भी ना खायी थी। अब दोपहर हो आई थी। मुझे भूख जबरदस्त लग रही थी। अब मुझे कुछ खाना था। सड़क के किनारे एक ठेला था। वो छोले-भठूरे बना रहा था। एक प्लेट का दाम 40 रूपए था। मौल-करने की हिम्मत ना थी। बाहर ऐसी भूख थी। मैंने उसे एक प्लेट के लिए कह दिया।

उसने मुझे एक प्लेट में थोड़े से छोले और दो भठूरे दिए। कोने में थोडा प्याज भी था। उन छोले-भठूरो की शक्ल 40 रूपए की ना थी। भठूरे साबुन के बुलबुले जैसे थे। लगता था कि फूंक मारी तो उड़ जायेंगे और ऊपर जाकर फट जायेंगे। छोले भी ऐसे ही थे। पूरी सब्जी में बस तीन या चार छोले के दाने थे। और सारा भूरा पानी। मैं ना खाता, पर भूख लग रही थी और 40 रूपए भी बर्बाद ना करने थे।

मैंने छोले-भठूरे खाये। मैं चल दिया। मेरे पास बीड़ी भी नही थी। सपना पूरा करने के चक्कर में घर ही रह गयी थी। और अब पेट में गैस बन रही थी। मुझे बीड़ी पीनी थी। मैंने आसपास देखा। थोड़ी दूरी पर एक खोखा था। मैं खोखे पर गया और शिव के मंडल के लिए कहा। उसने   अपने सुपारी वाले दांतो के बीच से उसका रेट 8 रूपए बताया। इतना सुनना था और मुझे गुस्सा आ गया। मैं उसकी गांड तोड़ता। बेहतरीन तोड़ता। शिव का मंडल गाँव में 5 रूपए का और 512 वाला मंडल 10 का मिलता है। ये साला दिनदहाड़े लूट रहा था। मैं उसको पीटता, पर पेट में गैस बन रही थी। बाहर ऐसा ही है, सोचकर मैंने मंडल लेने के लिए रूपए निकाले। बस 50 रूपए बचे थे। सुबह सपना पूरा करने के चक्कर में मैं रूपए लेना भी भूल गया था। इसका रोना मैं रोता, पर इससे पहले मुझे बीड़ी पीनी थी।

मेरे पास रूपए कम थे। मुझे दिल्ली में और घूमना था। ये हो ना पाता, इसलिए मैं वापस टेसन की तरफ चल दिया। दोपहर में बड़ी दूर पैदल चलना पड़ा। गैस भी हो रही थी। पसीने लगातार आ रहे थे। कमर का दर्द भी वापस आ गया था। पैर उठाना मुश्किल था। किसी तरह टेसन पंहुचा।

टेसन पर पहुँचकर देखा कि 1 बज गया था। गुडगाँव वाली रेल 3 बजे आती। मैं एक बेंच पर जाकर बैठ गया। कमर में दर्द था।

3 बजे रेल आई तो उसमें चढ़ लिया। बिल्कुल सुबह वाला हाल था। भीड़ थी, पसीना था और पाखाने वाली मुँह को लगती हवा। बस कमर दर्द नया था। भीड़ में बीड़ी भी ना पी गयी। हाल गर्मी और भीड़ ने पहले ही बुरा कर दिया था, जब रेल हर एक टेसन पर रूकती तो भीड़ और ज्यादा दिमाग ख़राब करती। बाहर वाले अंदर आने को धक्का मारते और अंदर वाले बाहर जाने को धक्का मारते। इन धक्को, भीड़, पसीनें और गर्मी की वजह से गुस्सा आ रहा था। मैं एक-एक करके सबकी गांड तोड़ता, पर भीड़ में हिलना भी मुश्किल था। सोचा, बाहर ऐसा ही है।

गाँव के टेसन तक आते भीड़ कम हुई, पर सीट ना मिली। टेसन पर उतरा तो राहत मिली। 5 बज रहे थे। मेरी कमर अब और दर्द कर रही थी। पर अभी घर ना जा सकता था। घर जाता तो पिताजी डण्डा करते। मैं टेसन पर ही एक बेंच पर बैठ गया।

मैं बैठा था। सपनो का डांसर बनो और उनका पीछा करो। आज मैंने कौनसा सपना पूरा किया, मेरे समझ में ना आया। और ये घूमने का सपना मेरा कब था? मैं कौन से सपनो का डांसर बना?

मैं रात तक बैठा रहा। सपनो के डांसर ने मुझे बढ़िया चुतिया बनाया था।