भाई, लड़की से बात करना मुश्किल ना है

लड़की से बात करना कितना मुश्किल है?

मैं इस हलचल को बेंच पर बैठकर देखता हूँ। मेरे सामने अनेक लड़कियाँ है, उनसे बात करते लड़के है। जब कोई काम बन्दा खुद ना कर पाता है, उस काम को कोई दूसरा कर जाता है तो उसे दूसरे की अचीवमेंट कहा जाता है। कम से कम पहला बन्दा तो उसे अचीवमेंट ही कहेगा। तो क्या लड़कियों से बात करना एक अचीवमेंट है? मुझे ना पता। पर मुझे बेहतर ख्याल सोचने की जरूरत है।

आज कॉलेज आने का ख्याल नाहक किया। इतने दिनों का आलस चढ़ा हुआ है, उसे एक दिन में उतार फेंकना मुश्किल है। बेंच पर बैठे-बैठे उबासी आती है। उमस में गर्मी भी ज्यादा है। दिन कैसे कटेगा? मुझे ना पता।

“निताश भाई आज कॉलेज चलना है?”
सवेरे की पहली बात मुझे आज आशीष की सुनाई दी थी।

आशीष मेरा एक मित्र है। वो कॉलेज के उन मनुष्यो में है जो मेरी बातें सुनकर मुझसे दूर ना भागे थे। वो मेरे साथ बना रहा, और कब वो जान-पहचान से आगे बढ़कर क्लासमेट और फिर मित्र बन गया, इसका मुझे ना पता। मेरा कॉलेज में एक मित्र है। वो आशीष है।

अभी मैं बेंच पर बैठा उसी का इंतजार कर रहा हूँ। बात करने वाले लड़के-लड़कियां निकल चुके है। लड़कियों से बात करना क्या अचीवमेंट है? ये बात मेरे दिमाग में घूम रही है।

लड़कियों से बात करने की चुल्ल जवानी का एक रोग है। शायद ये इसका लक्षण है। मुझे ना पता। बचपन का पता है कि दूसरे दर्जे में इनसे पेंसिल मांगने पर भी अन्य लड़के मजाक बना देते थे। वो उस वक़्त हंसते थे। बस हंसते रहते थे। उनकी हंसी से सतर्क होकर मैंने लड़कियों से बात करना त्याग ही दिया था। त्याग महान बताया गया है। ये त्याग उस समय मुझे महान लगा था, पर दर्जे का नम्बर बढ़ते-बढ़ते जब दस पर आ रुका और मुझ पर हंसने वाले खुद हंसकर लड़कियों से बतियाने लगे थे, उस वक़्त मैं झेंपकर रह गया था। उनकी हंसी और हंसने में परिवर्तन आया था। और वो यहां तक सीमित ना था कि वो पहले मुझ पर लड़कियों से बात करने पर हंसते थे और बाद में उनके साथ हंसने लगे थे। वो हंसी मेरे ऊपर ही केंद्रित रही थी। मैंने झेंपना उस हंसी से ही सीखा था। अब कॉलेज के दूसरे साल में झेंपना तो कम हुआ है , पर बातों की कमी अभी भी है।

बेंच पर बैठे, दूर से आशीष आता दिखता है। उसके साथ अजंता भी है। अजंता का दिखना कॉलेज में मेरे झेंपने का एक कारण है। ये कारण पहले साल से बना हुआ है। मुझे याद है पहले साल में जब उसे देखा था तो मैंने बात करनी चाही थी। हम क्लास में बैठे थे और उसने स्टेज पर एक ‘ब्यूटीफुल स्पीच’ दी थी। उस वक़्त उसे इम्प्रेस करने की चाह में मैंने सबसे ज्यादा तालिया बजायी थी और आशीष से भी बजवाई थी। मेरे तालिया पीटने से वो इम्प्रेस तो ना हुई, पर वो स्पीच खत्म करके आई तो मैं बात करने को खड़ा हुआ था। बेंच पर खड़े होते ही मुझे चेहरे दिखे और मैं झेप गया था। लेक्चरर ने मेरे बेंच पर खड़े होने का गलत अनुमान लगाया था और मुझे आगे बुला लिया था। आगे जाकर उन्होंने मुझे सिंधु घाटी सभ्यता पर अपने विचार रखने को बोला था। ‘सिंधु घाटी सभ्यता एक प्राचीन सभ्यता है, जो सिंधु नदी के किनारे किसी समय फली-फूली थी। प्राचीन वक़्त होते हुए भी वो कई चीजों में हमसे आधुनिक थे, जैसे कि नगर में गन्दे पानी की निकासी हेतु पक्की नालियों का प्रबंध, सभी के रहने के लिए पक्के घरो का प्रबंध इत्यादि। आधुनिक समय में हमे उनकी सभ्यता के अवशेष मिले है। पर इस सभ्यता का अंत,  कुदरती कारण या बाहरी मनुष्यो का हमला, इसके क्या कारण है। ये सवाल आज भी अचंभित करता है। सिर्फ मुझे ही नही, पर सभी को जिनके सामने इसका जिक्र होता है।’ ये सब विचार मेरे मन में थे। मैंने इन्हें बोलने के लिए मुख भी खोला था। सोचा था कि जल्दी विचार बाहर निकलकर इसे बंद कर लूंगा। बचपन में मां ने मेरे ज्यादा बोलने पर मुझे बंदर कहा था। मुझे स्टेज पर सभी के सामने बंदर ना लगना था। पर मुख खोलने पर विचार ना आये, सिर्फ सांस आयी। मैं शायद बंदर जैसा लगने लगा था, क्योंकि क्लास में सारे बच्चे हंसने लगे थे। लेक्चरर ने ये सब देखकर मुझे वापस जाने को बोल दिया। वापस आने पर देखा कि आशीष हंसकर अजंता से बात कर रहा है।
हा-हा, ही-ही, ये मेरा बैकग्राउंड म्यूजिक बन गया था। पूरी क्लास मेरे ऊपर हंस रही थी। आशीष भी, अजंता भी। उनकी हंसी मुझे विचलित ना कर रही थी, पर मेरे खुद के विचारों का बाहर ना आना। उस दिन के बाद मैंने अजंता से बात करने का ख्याल छोड़ दिया। सिर्फ ख्याल के सोचने पर पूरी क्लास हंसने लगी थी, विचारो ने मुझे छोड़ दिया था। उससे बात करने को हिम्मत की तो पूरा कॉलेज हँसेगा। ऐसा सोचकर और उसे देखकर मैं झेंप गया था।

••

आशीष मेरे पास आकर बैठ गया। अजंता ने जाते हुए हाथ हिलाया था, पर वो शायद आशीष के लिए था। झेंपते हुए मैं दुनिया भूल जाता हूँ।

“भाई तू लड़कियों से बात कैसे कर लेता है?” मैं बोला, “मतलब इतना आसान तो होता ना होगा?”

“भाई आसान है। कुछ मुश्किल ना है।”, आशीष बोला।

“भाई फिर कौनसी बात करता है तू कि लड़की हंसी रहती है। कोई जोक सुनाता है क्या?”

ये सुनकर आशीष हंसने लगा।

“चूतिये हंस मत। पूरी बात बता।”, आशीष अजंता ना था, जिसका हंसना मुझे झेंप करने को मजबूर करता।

“सच भाई, कोई जोक ना है। लड़की से बात करना कोई मुश्किल ना है। बस तू बात कर, वो भी करेंगी।”, आशीष बोला।

“बात तो तेरी सही है। अच्छा यूं बता कि ये खुद भी किसी से बात करती है क्या?”

“खुद भी बात करती है भाई। अभी अजंता को देखा तूने। वो मुझे गेट पर मिली और खुद बातें करने लगी।”

“भाई मीठी मिर्च मत खिला। मैंने तो देखा उनको बात की शुरुआत करते।”

“भाई अब तू फुद्दू बात कर रहा है। तू साले देखेगा क्या, तेरी नजर उस फ़ोन से ना हटती कभी।”

“ना भाई ऐसा थोड़ी है।”, आशीष सच्ची बात बोल गया था। मैं हड़बड़ा उठा था।

“ऐसा ही है भाई। तू फ़ोन से तो हटता ना, लड़की से क्या बात करेगा?”

“भाई ऐसा ना है। वो कई बार फ़ोन में अपडेट आ जाती है तो कई बार मैं ऑनलाइन फॉर्म भर रहा होता हूं।”

“भाई अपडेट तेरी कॉलेज में ही क्यों आती है, घर क्यों ना आती।”

“भाई मुझे ना पता।”

“मुझे पता है। तू लड़कियों से शर्माता है।”

“भाई मैं ना शर्माता किसी से। बस बात इतनी है कि समझ ना आता कि उनसे क्या बात करूं?”

“तू मुझसे कौनसी बात करता है? भाई लड़कियों से बात करने को इतना ना सोचना चाहिए।”

“भाई सोचना चाहिए। कोई बेवकूफ बात कही जाए और वो हंस दे तो।”

“तू अजीब है यार। अभी तू उन्हें हँसाने की बात कर रहा था और अभी ना हँसाने को कह रहा है। भाई वो हंस दे तो तू भी हंस और आगे बात कर।”

“ना भाई। इतना आसान ना है।”, इतना कहकर मैं खड़ा हो गया।, “चल अब, पहला लेक्चर अटेंड करना है।”

वो भी मेरे साथ चल पड़ा।

•••

कॉलेज के दूसरे साल का पहला लेक्चर। मेरे साथ वाले बेंच पर अजंता बैठी है। वो अपनी सहेली से बातें करती है। आशीष अगले बेंच पर बैठी लड़की से बातें कर रहा है। लेक्चरर औरंगज़ेब की कुछ कहानी बता रहा है।

अजंता अब लेक्चरर की और देख रही है। शायद उसे औरंगज़ेब की कहानी अच्छी लग रही है। जब वो सहेली से बात कर चुकी थी, तब उसने नजर घुमाकर पूरी क्लास देखा था। शायद मुझे भी देखा था। उस पल झेंपने का मन ना था, बस किसी तरह बात करनी थी।

दूसरा साल कैसा निकलेगा? लड़कियों से बात करना क्या मुश्किल है? औरंगज़ेब इतना इंटरेस्टिंग क्यों है? ऊपर कोई खुदा है जो इंसानो की मदद करता है, उनकी बात सुनता है? इन सवालों के क्या कोई जवाब है?

मुझे ना पता।

●●●●

Advertisements

मुझे भूख लगी है

मैं भूखा हूँ। कितना वक़्त बीता, मुझे पता। तब सब काला था और कुछ नही दिखता था। अब सब दिख रहा है। मैं अब भी भूखा हूँ।

बड़े डब्बे में भी कुछ ना था। मैंने मुँह मारा था। मेरे साथी ने भी देखा था। बड़ी काली शोर वाली वही थी। उसमे खाना होता है। मैं नही गया। मैं भूखा था। मैं बैठा था। मेरा एक कोना था। मेरे पास में वे मुँह चला रहे थे। कुछ खा रहे थे। मैं देख रहा था। मैं खाने के लिए बोला। उनमे से एक उठा। मुझे खाना मिलना था। पर वो चिल्लाया। मैं भाग निकला। वो हंस रहा था।

मैं पत्थर वाली जमीन से भागा। मैं रेत पर गया। पैर गर्म होते थे। मैं कोने में गया। मैं पानी में बैठ गया। मुझे भूख लगी थी। मैं वहाँ रहा। आते-जाते वो मुझे देखते। मुझे भूख लगी थी। मैंने नहीं बोला। वो फिर चिल्लाते। मुझे भागना होता। मुझे भूख लगी थी। मैं वही रहा। मैंने आँखें बंद कर ली। मैं सो गया।

मैं उठा। मैं गली में चला। अब कुछ नही दिखता था। वे खाना दे देते थे। आज कोई नहीं था। मुझे खाना ना मिला। मुझे भूख लगी थी। मैं गली में चलता रहा। कुछ नही दीखता था।

एक जगह दीखता था। वहाँ वो थे। बहुत थे। मेरे साथी भी थे। खाना मिलेगा। मैं अंदर गया। वहाँ वो थे। मैं भूखा था। सब दिख रहा था। गली जैसा नही था। खाना भी था। गली में कोई नही था। वो यहाँ थे। यहाँ खाना था। मुझे भूख लगी थी। मैं कोने में गया। वहां खाना पड़ा था। मेरे साथी खा रहे थे। मुझे भूख लगी थी। मैंने खाना खाया। वे नही चिल्लाये। मैंने खाना नही माँगा। मैंने कोने मे खाया। गली में वो नही थे। वो यहाँ थे। वो भी खाना खाते थे। वे नही चिल्लाये। मैं अब भूखा नही था।

Tales from Moneypur: ए०सी०

मनीपुर की शाम। सूरज इस साल से जल्दी ढलने लगा है। पिछले साल खेतो में उसे वक़्त लगता था। फसले ज्यादा लम्बी ना होती थी। अब खेत बिक चुके है तो उनमे बड़ी-बड़ी ईमारतें है। उनमे सूरज ढलने में ज्यादा वक़्त ना लगता है।

निताश छत पर है। शाम को हवा चल रही है तो गर्मी से थोडा सुकून मिला है। बनियान पसीने से भीगी हुई है। नीचे कमरे में बदबू भी मारती थी। पूरे दिन लाइट ना आई। अब जब हवा उसकी गीली बनियान से टकराकर देह को ठंडक देती है तो लगता है कि पूरे दिन का पसीना आना इसी एक पल के लिए था। पूरे दिन गर्मी में पसीना पूछना और उसकी बू सहना, सिर्फ उस एक पल के लिए।

छत पर टहलते हुए वो सामने वाली छत की और देखता है। उसकी ये सालो की आदत है; किसी भी चीज की ओर एकटक घूरना और फिर खो जाना। आज भी यही करता, पर रोज सूनी होने वाली छत पर आज हलचल है। उसके पडोसी पत्री के हाथ में तार है। ‘जरूर साला ए०सी० के तार डालेगा’, निताश सोचता है। फिर अगले पल नीचे आ जाता है।

निताश को ए०सी० पसंद है। उसे ए०सी० की बनावटी ठण्ड पसंद है। पिछले साल जब पत्री ने ए०सी० लगवाया था, तब उसने ए०सी० देखा था। दीवार पर लगे सफ़ेद प्लास्टिक के डिब्बे में एक भीड़ी सी लाइन से आती ठंडी हवा उसे अच्छी लगी थी। पत्री की बहू ने उसे रिमोट से ए०सी० के फंक्शन भी दिखाए थे, वो भी अच्छा लगा था। कीमत निताश पूछता इससे पहले पत्री की माँ उसके पास आके कहने लगी थी।

“पूरा तीस हजार को लागो है। तीस हजार। पूरे मुहल्ले में सबतै पहली वो भी।”

निताश ने हिसाब लगाया था तीस हजार के हिसाब से अगर वो हर महीने भी रूपए बचाये, तो भी उसे ए०सी० लगवाने में पंद्रह महीने कम-से-कम लगेंगे।

“रै छोरे दीदे पाड़ के मतना देख् इसने। किती नजर लाग्गी तो।”

ये बात निताश को अच्छी ना लगी थी।

*****

गाँव के सरकारी स्कूल का प्लेग्राउंड। पहले बंजर पड़ा रहता था। पूरे दिन धूल-मिट्टी उड़ती थी। पर अब घास लगवा दी गयी है। अब शाम को वहाँ पूरा मनीपुर घूमता है। कोई वक़्त बिताने के लिए, कोई फ़ोन पे बतियाने के लिए, कोई कोने में पेपर पीने के लिये; सबकी जरुरत अलग-अलग है, पर इन सबकी जरुरत को सरकारी इस्कूल का प्लेग्राउंड पूरा करता है। गाँव की पंचायत से ज्यादा गाँव के लिए इस प्लेग्राउंड ने किया है।

निताश ग्राउंड के एक हिस्से में बैठा है। नजरें सामने टहलते लोगो पर तो हाथ घास उखाड़ रहे है।

“भाई निताश, यहाँ आज किस तरहिया?”

बिरजू पीछे से आकर निताश के बाजू बैठ जाता है। और इस से पहले की जवाब मिले, वो भी घास उखाड़ने में व्यस्त हो जाता है।

“आज घर मन ना लग रहा था। सोचा यूँ ही घूम लूँ।”

“भाई शाम को निकल ही लेना चाहिए घर से।”

“तेरा वो तहसील वाला काम पूरा हुआ?”

“हां भाई हो तो गया। पटवारी ने थोडा वक़्त लगाया पर होगा।”

“चल सही है। बस दो महीने और, फिर दोनों एडमिशन देखेंगे कॉलेज में।”

“हां भाई। और तेरा वो इंग्लिश वाला कोर्स कैसा है?”

“भाई कुछ ना है सिवाय वक़्त की बर्बादी के। ग्रामर पढ़ा रहे है और वो भी छठी क्लास वाली।”

“भाई इब वक़्त तो ख़राब हुआ ही करे। पर तू कुछ कर तो रहा है।”

“भाई ना के बराबर है वो। अब पता लगा इस्कूल से निकलने के बाद बन्दे की के औकात हो जाया करे।”

“भाई कुछ ज्यादा भारी बात ना कर रहा तू?”

“साफ़-साफ़ बोल रहा हूँ। इस्कूल से निकलने के बाद खुद देख रहा हूँ की बन्दे की कोई औकात ना रहती। कभी यहाँ घूम तो कभी वहाँ। और ये सारे कोर्स भी मजाक ही है।”

“भाई वो किस तरह?”

“भाई मजाक ही है। कहने को इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स है पर पढ़नी इस्कूल वाली ग्रामर ही है। इस्कूल में ध्यान देता थोडा तो आज वक़्त और रूपए इसमें ना बर्बाद करता।”

“भाई रूपए की तो समझ में आई बात। पर वक़्त कैसे बर्बाद कर रहा है?”

“भाई पेपर देने और कॉलेज में एडमिशन के बीच तीन महीने रहा करे। अब तीन महीने उस कोर्स में बर्बाद ही होवेंगे। इससे अच्छा तो कोई नौकरी कर लेता।”

“भाई ये तीन महीने खाली है। और खाली वक़्त बर्बाद ही हुआ करे। और नौकरी की बात मत कर।”

“नौकरी की बात क्यों ना करूँ?”

“भाई अपने गाँव के आस-पास देख। दो ही नौकरी दिखेगी – या तो गार्ड की या फिर बीड़ी फैक्टरी की। और ये काम करने से अच्छा है की घर ही रह ले।”

“पर शहर में भी तो है नौकरी करने को।”

“भाई शहर में कहाँ नौकरी करता तू और कहाँ इंटरव्यू देता। बात मान, 12वीं पास को कोई ना पूछता आज कल।”

“बात तो तेरी सही है बिरजू। और कोई बिज़नेस करने की सोचे तो?”

“भाई गाँव में लड़को का बिज़नस तो परचून की दुकान और लड़कियों का ब्यूटी पार्लर। और कौन सा बिज़नस हो सकता है यहाँ।”

कुछ खानेपीने की दुकान या फिर बुक डिपो जैसा कुछ। ये तो हो सके है।”

“भाई इस गाँव में तो समोसे और जलेबी ही बिकेगी। और बुक डिपो के लिए नकदी?”

“कह तो सही रहा है तू। पर अभी हमारे पास वक़्त है खूब। ये छोटी-मोटी कमी पूरी हो सके है।”

“भाई अपना वक़्त इन्ही कमियो के लिए कटेगा। और तो मुझे ना पता।”

“तो भाई इस जवानी का क्या करे? दुनिया बदलनी है और वक़्त भी है। तो कुछ भी तो क्या करें।”

“भाई दुनिया अपनी खुद सोच लेगी। जवानी में मजे ले। तू यूँ बता तेरी क्लास में तो लड़कियां होगी शहर वाली।”

“है तो सही। पर बात ना होती उन से।”

“करता ना होगा तू।”

“भाई फटती है उनकी तरफ देखते भी। हाई-फाई है वो और…”

इससे पहले की निताश पूरी बात कर पाता, बिरजू उठकर चल देता है। शायद बिरजू खम्भे में चसे बल्ब को देख कर उठता है। निताश एक पल उसकी और देखता है और फिर खुद उठकर चल देता है।