कुछ स्वार्थी पंक्तिया

तू न आती है
मुझे कविता ना आती है
मेरे यार रूठे जैसे मुझसे
मेरी बाते मेरा मखौल बन जाती है।

समीप ना थे यार मेरे
बड़ी दूर जाना पड़ता था
फिर भी बाते फासला काटती थी,
अब बाते खत्म है।

मन चंचल है, अवश्य,
परंतु वर्तमान परिस्तिथियो में मेरी कमजोरी आवश्यक है,
जिंदगी का हर क्षण जो बेहतर बनने-बिगड़ने में व्यतीत हुआ,
उसकी प्रेरणा मैंने स्वयं दूसरो की प्रगति को देखकर जलते हुए ग्रहण की थी,
किन्तु अब व्यथित मन के समक्ष सब भेद साफ है,
जिंदगी के पक्षो में सामंजस्य बिठाना जरूरत है।

अब सोचने को भी कुछ ना आया है,
याद आयी है, कि मुड़ते हुए राह चलो।
मित्रो, मैं गिरा हुआ हूँ सामने तुम्हारे,
काबिल ना तुम्हारी मित्रता के,
फिर भी हाथ आगे बढाओ।

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आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ

आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ,
सरकार अर्जी सुने, भगवान से फरियाद करता हूँ।

जानता हूँ की चाशनी में डूबा फरेब है उनका,
हैरान हूँ हर बार किस तरह विश्वास करता हूँ।

उनके तलवे चाटकर नौकरशाही को उभरते देखा मैंने,
इस उम्मीद में रोज अपनी जीभ की सफाई करता हूँ।

मेरा ‘आम’ शब्द भी छीन लिया मुझसे पल में,
ये कैसे हुआ, सोचकर रोज हैरान होता हूँ।

लगता है मेरा रब रूठ गया मुझसे उस दिन का,
जब से मैं अपनी अर्जी सुनी जाने की फरियाद करता हूँ।

दिन ढले तो शुरुआत हुई

दिन ढले तो शुरुआत हुई,
अकेलेपन में अपनी तलाश हुई।

एक सड़क देखी, मोधि पड़ी जमीन पर,
उस पर चलकर कितनों को मंजिल प्राप्त हुई।

मंजिल पहुँचोगे अवश्य, पर दिनों की बात ना करो,
पल ऐसा देखना जिसमे तुम्हारी साँसे इसकी सौगात हुई।

मेरे साथी चुपचाप नजर आये आज मुझे,
शोर करो कुछ कि शान्ति अब नापंसद हुई।

एक कोने में बैठके देखूँ जिंदगी पलों में कटती,
बेबस मैं बेचारा, बेरोजगारी मेरी माशूक हुई।

आज दुनिया का जादू हटाया जाए

आज दुनिया का जादू हटाया जाए,
आज इस शाम की कदर हो जाए।

नारों से मोहित जनता रस्ता देखे बहारों का,
बेहतर हो अगर क़यामत का इंतजार किया जाए।

खुदा, इंसान, शैतान; क्या बने फिरते हो,
तुम बिको औकात-अनुसार जे रूपया रब कहाए।

भूला दो गाय, सूअर, बकरो को,
मुद्दा इंसान है, इनपर विचार बतलाएं।

क्या पर्दे, हिजाब, नक़ाब करे हो,
हटाओ तो चेहरा नजर आये।

चिर पहले सुना कि तेरी शादी आती है

चिर पहले सुना कि तेरी शादी आती है,
अब सामने आकर तू क्या बताती है।

मैं सदा तेरे इस गुण के प्रभाव में रहा,
किस सरलता से तू कठिन बातें कह जाती है।

तुम ना तो खुश दिखते हो, ना दुःखी
ये कैसी मुस्कान चेहरे पर तुमने पाली है।

मेरी आँखें नम ना हुई है,
तुम्हे ग़लतफहमी हुई है।

जाते-जाते जहाँ बसो वहाँ का पता लिख जाना,
आज से उस पते कदमों को मनाही है।

अब तो परदे कर लो खिड़कियों पर,
सब की ख़ुशी सब से देखी ना जाती है।

खाली हुआ गिलास, थोड़ी मय तो डालो
रुदन बाद में छेड़ेंगे, अभी विरह कमसिन है।

उम्मीद लेकर एक भीड़ उनके दर जायेगी

उम्मीद लेकर एक भीड़ उनके दर जाएगी,
उम्मीद देकर आश्वाशन लिए वापस आएगी।

कसकर पकड़ना एक-दूसरे को आज,
तूफ़ान में अकेली अपनी कश्ती होगी।

इनकी जमात के किसी को हमदर्द ना समझना तुम,
अब भेडियो से फ़क़त खाल ना ओढ़ी जायेगी।

रोने-चिल्लाने से आवाज अब ना सुनाई देती है,
गर मरे तो शायद बात दिल्ली जायेगी।

उम्मीदों का भार मन-भवन जर्जर करता आया है,
जे त्यागे तो पल में जिंदगानी बिखरेगी।

क्या कहलाता हूँ (Kya Kehlata Hoon)

तुम्हारी बातों में जाने क्या कहलाता हूँ,
बात सुनो, मैं सच बतलाता हूँ।

अपनी जलायी आग पे हाथ सेंकते हो,
मैं अगर बुझाऊँ तो बागी हो जाता हूँ।

हाथ-पाँव कीचड़ में सने रहते है तुम्हारे,
दामन साफ़ रहे मैं शहीद हो जाता हूँ।

मैं लूटता-पिटता खेत से बाजारों तक,
प्राण देकर तुम्हारा बेचारा किसान कहलाता हूँ।

तुम दुनिया ख़त्म करके भी महान हो जाते है,
तुम्हारे कहे इंसान मारके कौनसा इंसान रह जाता हूँ।