दादी बुंदिया

आज कॉलेज जाने को घर से जल्दी निकला था। रोज-रोज आशीष कहा है, कहा है की रट लगाए फ़ोन करता रहता था। आज उसे ये मौका ना देना था।

“रै बेटा कित जावै है?”

मैं गांव के अड्डे की ओर चला जा रहा था। अचानक पीछे से आवाज़ आयी। आवाज़ दादी बुंदिया की थी।

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आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ

आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ,
सरकार अर्जी सुने, भगवान से फरियाद करता हूँ।

जानता हूँ की चाशनी में डूबा फरेब है उनका,
हैरान हूँ हर बार किस तरह विश्वास करता हूँ।

उनके तलवे चाटकर नौकरशाही को उभरते देखा मैंने,
इस उम्मीद में रोज अपनी जीभ की सफाई करता हूँ।

मेरा ‘आम’ शब्द भी छीन लिया मुझसे पल में,
ये कैसे हुआ, सोचकर रोज हैरान होता हूँ।

लगता है मेरा रब रूठ गया मुझसे उस दिन का,
जब से मैं अपनी अर्जी सुनी जाने की फरियाद करता हूँ।

बेटा, तूने सारी इज्जत लुटवा दी

मनीपुर में बीते सालों में पंचायत के चुनाव ना हुए थे। आसपास के गाँवों में हो चुके थे। पुराने सरपंच, पंचो को देखकर गाँव की जनता भी बोर हो गयी थी। पहले, उनको देखकर गांववाले जी-जी करते ना रुकते थे। जी आओ बैठो, जी सरकार हुक्का पी लो, जी सरकार बताओ नयी ताजा, जी म्हारा काम करवा दियो; सरपंच के लिए ये सब रोज की बात थी। बीते दिनों में ये सब चुकने लगा था। हुक्का तो दूर की बात, लोग बात भी मुँह बनाकर करने लगे थे। सरपंच मूर्ख ना था। वो सच जानता था। गांववाले उससे ऊब चले थे। पर चुनाव करवाना सरकार का कार्य था, इसलिए वो मजबूर था।

तो जब गाँव में चुनाव होने की खबर फैली, तो सारा गाँव खुश हुआ। सरपंच भी खुश था। अब उसे दोबारा इज्जत मिलने वाली थी।

चुनाव की खबर से सारा गाँव खुश था। पूरे गाँव का माहौल त्यौहार वरगा हो गया था। बैठके जमने लगी थी और हुक्के की मांग बढ़ चली थीं। चुनाव में कौन खड़ा होगा, किसकी क्या चाल रहेगी, कौन जीतेगा; बैठकों में इन मुद्दों पर हुक्कों की गुड़गुड के बीच जोर से बहस होती। इन बैठकों में बुजुर्ग अपनी खाट और पीपल के पेड़ तक सीमित रहे। युवा शक्ति इन्हें ठेकों तक लेकर गयी।

इस चहल के बीच सरपंच अपने घर पर रहा। वो उदास था। सरपंच रहते हुए उसे इज्जत की आदत पड़ गयी थी। अब उसे वो दोबारा ना मिलने वाली थी, इसलिए वो उदास था। चुनाव उसकी जगह उसका बेटा हरचंद लड़ने वाला था।

*****

हरचंद चुनाव को लेकर उत्साहित है। गाँव का सरपंच बनना उसका सपना है।

पिछले चुनावो में जब उसके पिता सरपंच बने, तो उसे कोई फर्क ना पड़ा था। सरपंच बनना कोई ऐसी उपलब्धि ना थी, जिस पर फकर किया जाए। उसकी यह सोच थी। पर इसे बदलते देर ना लगी थी। सरपंच बनते ही उसके पिता को ज्यादा इज्जत मिलने लगी थी। गलियों में चलते लोग राम-राम करते। हुक्के का पहला घूंठ उन्हें मिलता। ग्रामीण उन्हें सदा घेरे रहते। इज्जत का असर उनके घर पर भी पड़ा था। उसकी लिपाई-पुताई तो हुई ही, एक नया कमरा भी बना था। इज्जत भरपूर मात्रा में मिल रही थी, और सरपंच उसे चटकारे लेकर बटोर रहे थे। हरचंद ने इज्जत की पॉवर को अचंभित होकर देखा था। प्रभाव उस पर स्वाभाविक था। उसने गाँव का अगला सरपंच बनने की बात ठान ली थी।

*****

चुनाव में गाँव सरपंच के पद के दो उम्मीदवार आगे आये। पहला हरचंद, और दूसरा अर्जुन।

यह चुनाव पिछलों से भिन्न था। पिछले चुनाव बड़े-बुजुर्ग लोगो तक सीमित रहे थे। कारण दिया जाता रहा था कि गाँव का सरपंच एक अनुभवी और पढ़ा-सीखा हुआ इंसान होना चाहिए। एक जिसने घाट-घाट का पानी पिया हो और वक़्त देखा हो। पिछले चुनावों तक ये कारण चला। इस चुनाव में सरकार ने इस्कूल पढ़े-लिखे होने का नियम अड़ा दिया था। तर्क था कि सरपंच इंसान पढ़ा ना पर अक्षर पढ़ा हो। इस नियम के आगे सारे बुजुर्ग फेल हो गए थे। अब चुनाव युवा शक्ति लड़ रही थी।

हरचंद अपनी जीत को लेकर आश्वस्त था। अर्जुन को पूरा गाँव जानता था। वह सदा ठेकों या खेतों में पड़ा रहता था। ठेकों पर रहता तो दारू और खेतो पर सुट्टा पीता। वो भारी जेब वाला दिलदार था, तो गाँव की आधी युवा शक्ति उसके साथ रहती। उसके चुनाव लड़ने की बात से वो अचंभित हुआ था, पर खुश था। गांववाले कभी एक नशेड़ी को सरपंच ना बनायेंगे, वो ये सोचकर खुश था। अर्जुन के चुनाव लड़ने ने उसके सरपंच बनने का कार्य आसान कर दिया था।

*****

मनीपुर गाँव में चुनाव जीतने की तैयारियां शुरू हो चुकी है।

हरचंद को तैयारियों के लिए ज्यादा सोचना ना पड़ा था। बड़े-बुजुर्गो से उसे कोई मतलब ना था। उसके हिसाब से बड़े-बुजुर्गो का कार्य बस हुक्का पीना और खाट पर पड़े-पड़े शिकायत करना था। बदले में उसने किसी बड़े-बुजुर्ग के ना तो पैर छुए ना ही उन्हें इज्जत दी। उसके पिता सरपंच ने उसे चेताने की कोशिश की। बेटा बड़े लोगो की इज्जत करनी चाहिए, पिता सरपंच ने उसे कहा था। पर हरचंद ने उन्हें अनसुना कर दिया था। उसने अपना सारा ध्यान युवा शक्ति को खुश करने पर लगा दिया था। युवा शक्ति के हर वाहक को उसने अंग्रेजी दारु की बोतल तो दी ही, पर चकणे की दुकान पर अपने नाम से उनके लिए खाता भी खुलवा दिया था। उसने बड़े-बुजुर्गो का ख्याल ना किया, पर उन्हें मना भी ना किया। दिन में एक दो बुजुर्ग लोग जब उसके पास आते, तो खासी-ठण्ड की वजह बताकर लिटिल-लिटिल कहके बोतल ले जाते थे। उनका तर्क था कि लिटिल-लिटिल खाँसी का इलाज कर देती है।

हरचंद अपनी तैयारियों में लगा हुआ था। वही उसका प्रतिद्वंदी अपनी दिनचर्या में लगा रहता। उसने चुनाव जीतने के लिए कोई कार्य ना किया। रोज उठकर या तो ठेकों पर जाता या फिर खेतों में रहता। ऐसा प्रतीत होता था कि उसे चुनाव से कोई फर्क ना पड़ा था।

एक दिन, हरचंद अपने घर के बाहर खाट पर बैठा था। अभी एक पेटी युवा शक्ति को देकर आया था, तो आराम कर रहा था। सामने से अर्जुन आता दिखा तो बोला, “अर्जुन आज इस गली किस तरह?”

“भाई तुझसे मिलने आया बस।”, अर्जुन ने उत्तर दिया।

“आजा भाई। बैठके बात करेंगे।”

“और चुनाव की तैयारी कैसी चल रही है तेरी?”

“बस भाई सही है। तू बता।”

“भाई मैं भी कर ही रहा हूँ। सुन, कल पंचायत करवाई है। तुझे भी आना है। दोनों अपने-अपने विचार गांव के आगे रख लेवेंगे।”

“अरे भाई पंचायत तो ना आया जावेगा। खैर कुछ सेवा कर सकूँ तो बता दे?”

“यार ठेके पे बोतल ना मिल रही। तेरे पास बताई।”

इसके पश्चात, अर्जुन बोतल लेकर अपनी राह चला गया। हरचंद खाट उठाकर घर के अंदर चला गया।

*****

आज पंचायत है। पूरा गाँव पीपल के पेड़ तले इकट्ठा हुआ है। अर्जुन आराम से बैठा है। हरचंद नदारद है।

“हरचंद कहाँ है”, एक बुजुर्ग पूछते है।

“ताऊ घर पे ही है। बुलाया पर वो ना आता।”, एक युवा शक्ति का वाहक बोला।

“तो कोई ना। अर्जुन बेटा, तू शुरू कर।”

अर्जुन अपने स्थान से खड़ा हुआ। उसकी आँखें लाल है।

“गाँववालो, मैं अर्जुन हूँ। इस गाँव का निवासी। मेरे युवा भाइयो को मेरा नमस्कार, तो बड़े-बुजुर्गो को मेरा प्रणाम। पीछे बैठी मेरी माताओ को मेरा चरणस्पर्श। मैं सरपंच पद के लिए उम्मीदवार हूँ। मेरे पास कहने को ज्यादा कुछ नहीं है। आप ही की तरह, मैं भी इस गाँव में रहता हूँ और देखता हूँ कि इसमें कितने अभाव है। बच्चे इस्कूल नहीं जाते, गलियो में पानी भरा रहता है, बिजली मुश्किल से आती है इत्यादि। ये सब छोटी मुसीबतें है। सबसे बड़ी मुसीबत है कि गाँव का नौजवान नशे में फंसा है। इसकी वजह से वह निकम्मा हो गया है। गाँववालो, अगर मैं सरपंच बनता हूँ तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इस नशे की बुराई को जड़ से मिटाऊंगा।”

ये कहकर अर्जुन बैठ गया। गाँव के बुजुर्गो ने हरचंद के लिये दोबारा बुलावा भेजा, पर वो ना आया। अंत में उसके पिता सरपंच गए, पर वो फिर भी ना आया।

“वो पंचायत और गांव को कुछ ना समझता है। ऐसा सरपंच अपने किसी काम का ना।”, एक बुजुर्ग बोले।

“सही कहते हो आप। और तो पूरे गाँव में ये नशे वाली बुराई उसी की तो है।”, एक और बुजुर्ग बोल पड़े।

इसके बाद पूरा गाँव कुछ-कुछ बोलता रहा। इसका अंत अर्जुन को सबकी सहमति से सरपंच बनाकर हुआ।

*****
रात है।

हरचंद अपने कमरे में बैठा है। किवाड़ बंद है। किवाड़ पर हल्की दस्तक देकर उसके पिता बोलते है,
“बेटा, तूने कमाई हुई साड़ी इज्जत लुटवा दी।”

अपना तो इहा और उहा, यही ट्रेवल हो लिया

छुट्टियों लगभग बीत चली है। इसका मुझे आभास है, केवल कैलेंडर पर बदलती तारीख से नहीं, पर फेसबुक पर मित्रों की लगातार पोस्ट से भी। हर हफ्ते कहीं जाते है, फ़ोटो खीचते है और हैशटैग ट्रैवल, लाइफ, जर्नी इत्यादि लिखकर डाल देते है। उनकी मौज देखकर मैं और मेरी गली का फ्यूज फूंक जाते है।

कुछ साल पहले हमारे मनीपुर के बाहर खेत-ही-खेत थे। प्रचलित कथा के अनुसार उनमे किसान फसल उगाते थे। फसल उगाने में मेहनत, पानी और बीज बराबर लगता था। किसानों की ये जाति, इनका काम जनता को विचलित करता था। गाँव में अब इनकी जाति विलुप्त हो चुकी है। शायद ये किसी को प्रिय ना थे। इनके विलुप्त होने पर ना तो सरकार ने कोई सड़क या सरकारी भवन इनके नाम किया, ना ही कोई स्कीम निकाली। कोई एनजीओ वाला भी इनकी फ़ोटो खींचने ना आया। किसान किसी को अच्छे ना लगते थे।

किसानों के जाने के बाद गाँव में बड़े-बड़े बिल्डर्स आये। महज एक महीने बाद ही गाँव में डीएलएफ, अंसल, रहेजा और बाकी बिल्डर्स के बड़े-बड़े विज्ञापन लग चुके थे। इन विज्ञापनों में बड़ी इमारते थी,  वेस्टर्न वेशभूषा में झोला लटकाये हंसती कन्याएं थी, हरे-हरे बगीचे थे और चौड़ी सड़को पर भागती कारें थी। बाकी बातों का ज्ञान कम, पर उन कन्याओं ने खुश किया था। सोचा कि इमारतों में अगर ऐसी कन्याएं आई और उनमें से एक भी अगर सहेली बन गयी, तो जिंदगी सफल हो जायेगी।

किसान जा चुके थे। खेत खाली पड़े थे। अब उनमें पूरे दिन रेत उड़ता। बंजर पड़े आँखों को चुभते थे। गांववासियों से खेतों की ये दुर्दशा देखी ना गयी। उन्होंने खेतों का प्रयोग सुबह/शाम की सैर और हगने के लिये किया। इस कार्य में गाँव के प्रत्येक पुरुष, महिला और बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। मैंने भी इसमें अपना योगदान दिया था। किसानों का चले जाना गाँव के लिए अच्छा ही था। खेतों ने पूरे गाँव को एकजुट कर दिया था। सुबह/शाम की सैर ने गाँव के लोगों को जाति और अमीर-गरीब की संकुचित मानसिकता से ऊपर उठाया था। खेतों में सैर के दौरान कोई ऊंची या नीची जात ना देखता था। जातिवाद को ख़त्म करने में जहाँ बड़े-बड़े महापुरुषों को असफलता मिली थी, वही खेतों ने इसे कुछ ही दिनों में ख़त्म कर दिया था। किसानों का विलुप्त होना अच्छा ही था।

ये महान कार्य कुछ महीनो तक चला। बिल्डर्स के आने के पश्चात ये खत्म हो गया।

किसानो ने खेतों का प्रयोग फसल उगाने के लिए किया था। गांववासियों ने सुबह/शाम की सैर, हगने और एकता स्थापित करने के लिए किया। बिल्डर्स ने खेतो का प्रयोग, बड़ी-बड़ी इमारतों को बनाने के लिए किया।

बिल्डर्स को इमारते बनानी थी। इस कार्य को करने के लिए, वे क्रेनों, ट्रैक्टरों, डम्पर, ईंट-रोड़ी, सीमेंट और भैयालोग को लेकर आये। इन भैयालोग को मैंने दूर से कई बार देखा। ये सदा काम करते रहते। इनके सर पर या तो तसला होता या फिर प्लास्टिक की टोपी। कपड़े इनके सदा पसीने और सीमेंट से गीले रहतें। भैयालोग और इनकी औरतें जब काम करती, तब इनके बच्चे सड़क किनारे पड़े रहते। बिखरे बालों में रेत पड़ा रहता और कपडे ना के बराबर। छोटी झुग्गियों में ये बसते थे, जहाँ बिजली, पानी और हगने का कोई जरिया ना था। इनसे मेरी पहले कभी बात ना हुई थी, आज को छोड़कर।

खेतों के चले जाने के बाद अब शाम की सैर सड़कों पर होती है। छुट्टियों में पूरा दिन घर पर बीतता है। रोज उबाऊपन की हद पार होती है। आज पूरा दिन बीत गया, पर किसी से बात ना हो पायी। दोपहर में पड़ोस वाली औरतो की चुगली सुन लेता था, पर आज उसमें भी मन ना रमा था। बात करने को जी मचल रहा था। पर कोई ना था।

मैं सड़क पर चल रहा था। मेरे आगे एक भैयालोग था। पूरा दिन बात ना होने के कारण मन भारी था। एक दम विचार आया कि आज इसी से बात की जाए। एक बार ये सोचा, तो अगले पल मैं भी बोल चुका था, “और भैया, कैसे हो?”

अचानक बोले जाने पर वो थोडा स्तब्ध हुआ। पर फिर पीछे मुड़कर बोला, “अच्छे है।”

“और बताओ क्या किया आज?”

“बस भैया मजूरी की। अब रुपे मिले तो राशन लाते है।”

“और कहाँ के रहने वाले हो तुम?”

जवाब में उसने बिहार और किसी गाँव का नाम लिया था। मैं याद ना रख पाया, क्योंकि मेरा कोई इरादा ना था।

“और तुम यहां इतनी दूर आये कमाने को?”

“भैया आना पड़ता है। उधर काम नही है।  आप बताओ।”

“कॉलेज में पढता हूँ। तो छुट्टियां चल रही है। अब बस घूम रहा हूँ।”

“भैया अकेले काहे।”

“सारे दोस्त ट्रेवल कर रहे है। कोई मसूरी, कोई शिमला। मैं ना गया। अच्छा तुमने किया है कही ट्रेवल?”

“नहीं भैया। अपना तो बिहार और आपका गाँव, यही ट्रेवल है।”

इससे पहले मैं और बातें पूछता, उसका फ़ोन बज चुका था। जोर-जोर से। फ़ोन शर्ट की जेब से निकालकर वो बात करने लग गया। मैं वापस मुड़कर घर आ गया। वापस आते सड़क से नजर उठाकर देखा। ईमारत बन चुकी थी। बस पेंट करना रह गया था।

मैं धरती ग्रह होता और मौज लेता

रात ठंडी है। शांत है। तन को भाती है। दिन इसके विपरीत था।

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मुझे पता ना था। सवेरे उठकर अपने नित्य-क्रिया में मगन था। सुबह अच्छी लग रही थी। हौले-हौले हवा भी चल रही थी और बिजली भी बराबर आ रही थी। आज क्या करुँ, इससे पहले कि मैं विचार छेड़ता कॉलेज से एक बन्दे का फ़ोन आया। सोचा की छुट्टियों में कुशल-क्षेम पूछने के लिए किया होगा, पर इसमें बुलावा था। कॉलेज जाना था। निताश तुझे फ़ोन ना उठाना चाहिए था, सोचा। पर सोचने और करने में सदैव एक अंतर रहा है।

एक घण्टे बाद कॉलेज पहुँचा। दूर से देखा तो पाया कि बच्चे झुण्ड में घूम रहे थे। थोडा समीप गया तो देखा कि कुछ ढूंढ़ रहे थे। बिल्कुल समीप गया तो वो कूड़ा उठा रहे थे। निताश वापस हो ले बेटा, उस वक़्त ये एक ही ख्याल था। मैं अमल करता, इससे पहले गुरूजी ने देख लिया। मैं अपनी नजरो में निहायती बेशर्म हूँ, वहाँ से मुड़कर भाग जाता और ऐसा भागता कि कोई पकड़ ना पाता। पर सोचने और करने में सदैव अंतर रहा है।

मैं झुंड में घुलने-मिलने की कोशिश कर रहा था। लड़कियां अलग दिशा में थी, तो लड़के अलग दिशा में थे। उनके पास जाने का मौका देखा, पर बाकी लड़के भी पूरे हरामी थे। मैं एक कदम लेता कि हरामी कुछ काम पकड़ा देते। निताश झाड़ू ले ले, निताश इसे फेंक दे, निताश बियर की बोतल कूड़ेदान में मत डाल, निताश पानी ले आ; टुच्चे कामों में हरामियों ने लगाये रखा। गुस्सा कम, पर रहा, जब तक कि गुरूजी ने हमें इमारतों का चक्कर लगाने को भेजा।

कॉलेज में अभी एग्जाम सम्पन्न हुए थे। एग्जाम में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली उपयोगी चीज, पर्ची, जमीन पर पड़ी थी। दूर से एक नजर डाली, बिल्कुल भोली सी लग रही थी। वो सफ़ेद कागज़ का एक टुकड़ा बेफिक्री के साथ घास और पेड़ो के नीचे पड़ा था। लगता ही नही था इन कागज़ के टुकड़ो में वो जहर है जो टीचर्स और फ्लाइंग वालों को कतई अच्छा नही लगता है। उसने आसपास में घुलने-मिलने की भी कोशिश शुरू कर दी थी। जीरो फोटोकॉपी, हस्तलिखित, किताबों के अंश; सभी प्रकार की पर्चियाँ गलने लग रही थी। उनको उठाना बुरा लग रहा था। उठाने का फ़ायदा भी क्या, पर्चियाँ सड़-गल कर मिट्टी का अंश बनेगी और खाद बन जायेगी। और कागज़ बनता भी तो पेड़ से है। जीवन-मृत्यु का चक्र पूरा होते अगर किसी को अपने जन्मदाता तक ले आये, तो इससे बड़ा पुण्य क्या हो सकता है। इसलिये उनको उठाते अच्छा ना लग रहा था। दूसरा कारण ये भी कि दूसरो का फैलाया कूड़ा उठाने में मुझे रूचि ना थी। मेरा इतना महान व्यक्तित्व ना है कि मैं दूसरो के हित में काम करुँ। ये तो कहने वाले कारण, असली वजह तो ये थी कि मैं लड़कियों से दूर था।

आधे घण्टे बाद इसका अंत हुआ। गुरूजी ने बताया कि आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इसलिए आज हमने कूड़ा उठाया। इससे पर्यावरण कैसे बचा, मुझे ना पता। सब ढकोसलेबाजी लगी। गुरूजी को प्रिंसिपल ने आर्डर दिया होगा। प्रिंसिपल को यूनिवर्सिटी वालो ने आर्डर दिया होगा। यूनिवर्सिटी वालो के पीछे मंत्री महकमा के सेक्रेटरी ने आर्डर दिया होगा। उनको भी आर्डर उनके पिताजी ने दिया होगा। इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी हम थे। सब आर्डर-आर्डर खेल रहे थे, और हम पर आकर खेल खत्म हुआ।

किसी को है पर्यावरण की चिंता? मुझे तो नही है। मुझे सहेली चाहिये और एक सरकारी नौकरी। फिर साल-दर-साल जिंदगी के शौक पूरे करते करते बुढ़ापे में एक-दो पेड़ लगा कर पर्यावरण बचाने की फॉर्मेलिटी भी निभा लूंगा।

कई बार खाली वक़्त में इस ग्रह के बारे सोचता हूँ और जॉर्ज कार्लिन साब का कथन याद आता है, “धरती यही रहेगी, हम यहाँ से चले जायेंगे।” सत्य लगती है ये बात, खुद आदमी ने पर्यावरण की ऐसी-तैसी कि और जब पता लगा कि रहने को और कोई स्थान ना है, तब वो इसे बचाने के ढोंग रचाने चला। वो पर्यावरण को ना बचाता है, वरन खुद को। और बुजदिल इंसान अपने इस कार्य को धरती बचाने के नाम की चादर उढ़ा देता है।

मैं अगर धरती ग्रह होता, तो आदमी ना होता। ढकोसलो से परे होता।

मैं धरती ग्रह होता और मौज लेता

रात ठंडी है। शांत है। तन को भाती है। दिन इसके विपरीत था।

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मुझे पता ना था। सवेरे उठकर अपने नित्य-क्रिया में मगन था। सुबह अच्छी लग रही थी। हौले-हौले हवा भी चल रही थी और बिजली भी बराबर आ रही थी। आज क्या करुँ, इससे पहले कि मैं विचार छेड़ता कॉलेज से एक बन्दे का फ़ोन आया। सोचा की छुट्टियों में कुशल-क्षेम पूछने के लिए किया होगा, पर इसमें बुलावा था। कॉलेज जाना था। निताश तुझे फ़ोन ना उठाना चाहिए था, सोचा। पर सोचने और करने में सदैव एक अंतर रहा है।

एक घण्टे बाद कॉलेज पहुँचा। दूर से देखा तो पाया कि बच्चे झुण्ड में घूम रहे थे। थोडा समीप गया तो देखा कि कुछ ढूंढ़ रहे थे। बिल्कुल समीप गया तो वो कूड़ा उठा रहे थे। निताश वापस हो ले बेटा, उस वक़्त ये एक ही ख्याल था। मैं अमल करता, इससे पहले गुरूजी ने देख लिया। मैं अपनी नजरो में निहायती बेशर्म हूँ, वहाँ से मुड़कर भाग जाता और ऐसा भागता कि कोई पकड़ ना पाता। पर सोचने और करने में सदैव अंतर रहा है।

मैं झुंड में घुलने-मिलने की कोशिश कर रहा था। लड़कियां अलग दिशा में थी, तो लड़के अलग दिशा में थे। उनके पास जाने का मौका देखा, पर बाकी लड़के भी पूरे हरामी थे। मैं एक कदम लेता कि हरामी कुछ काम पकड़ा देते। निताश झाड़ू ले ले, निताश इसे फेंक दे, निताश बियर की बोतल कूड़ेदान में मत डाल, निताश पानी ले आ; टुच्चे कामों में हरामियों ने लगाये रखा। गुस्सा कम, पर रहा, जब तक कि गुरूजी ने हमें इमारतों का चक्कर लगाने को भेजा।

कॉलेज में अभी एग्जाम सम्पन्न हुए थे। एग्जाम में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली उपयोगी चीज, पर्ची, जमीन पर पड़ी थी। दूर से एक नजर डाली, बिल्कुल भोली सी लग रही थी। वो सफ़ेद कागज़ का एक टुकड़ा बेफिक्री के साथ घास और पेड़ो के नीचे पड़ा था। लगता ही नही था इन कागज़ के टुकड़ो में वो जहर है जो टीचर्स और फ्लाइंग वालों को कतई अच्छा नही लगता है। उसने आसपास में घुलने-मिलने की भी कोशिश शुरू कर दी थी। जीरो फोटोकॉपी, हस्तलिखित, किताबों के अंश; सभी प्रकार की पर्चियाँ गलने लग रही थी। उनको उठाना बुरा लग रहा था। उठाने का फ़ायदा भी क्या, पर्चियाँ सड़-गल कर मिट्टी का अंश बनेगी और खाद बन जायेगी। और कागज़ बनता भी तो पेड़ से है। जीवन-मृत्यु का चक्र पूरा होते अगर किसी को अपने जन्मदाता तक ले आये, तो इससे बड़ा पुण्य क्या हो सकता है। इसलिये उनको उठाते अच्छा ना लग रहा था। दूसरा कारण ये भी कि दूसरो का फैलाया कूड़ा उठाने में मुझे रूचि ना थी। मेरा इतना महान व्यक्तित्व ना है कि मैं दूसरो के हित में काम करुँ। ये तो कहने वाले कारण, असली वजह तो ये थी कि मैं लड़कियों से दूर था।

आधे घण्टे बाद इसका अंत हुआ। गुरूजी ने बताया कि आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इसलिए आज हमने कूड़ा उठाया। इससे पर्यावरण कैसे बचा, मुझे ना पता। सब ढकोसलेबाजी लगी। गुरूजी को प्रिंसिपल ने आर्डर दिया होगा। प्रिंसिपल को यूनिवर्सिटी वालो ने आर्डर दिया होगा। यूनिवर्सिटी वालो के पीछे मंत्री महकमा के सेक्रेटरी ने आर्डर दिया होगा। उनको भी आर्डर उनके पिताजी ने दिया होगा। इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी हम थे। सब आर्डर-आर्डर खेल रहे थे, और हम पर आकर खेल खत्म हुआ।

किसी को है पर्यावरण की चिंता? मुझे तो नही है। मुझे सहेली चाहिये और एक सरकारी नौकरी। फिर साल-दर-साल जिंदगी के शौक पूरे करते करते बुढ़ापे में एक-दो पेड़ लगा कर पर्यावरण बचाने की फॉर्मेलिटी भी निभा लूंगा।

कई बार खाली वक़्त में इस ग्रह के बारे सोचता हूँ और जॉर्ज कार्लिन साब का कथन याद आता है, “धरती यही रहेगी, हम यहाँ से चले जायेंगे।” सत्य लगती है ये बात, खुद आदमी ने पर्यावरण की ऐसी-तैसी कि और जब पता लगा कि रहने को और कोई स्थान ना है, तब वो इसे बचाने के ढोंग रचाने चला। वो पर्यावरण को ना बचाता है, वरन खुद को। और बुजदिल इंसान अपने इस कार्य को धरती बचाने के नाम की चादर उढ़ा देता है।

मैं अगर धरती ग्रह होता, तो आदमी ना होता। ढकोसलो से परे होता।

Tales from Moneypur : Angreji Speaking Course

अप्रैल चल चुका है।
मनीपुर में धीरे-धीरे गर्मी अपने आने का आभास करा रही है। धूप सवेरे जल्दी निकल आती है। दोपहर को गर्म हवा जिस्म को झुलसाती है। गाँव के बाहर गन्दा तालाब दिनोदिन सूखता जाता है। दिन में बिजली नहीं आती है। निकलते-मिलते लोग अपनी बातों में गर्मी का भी जिक्र कर देते है। और शाम को चुगलियों के आदान-प्रदान को महिलाएं भी देर से निकलती है। गर्मी आ गयी है, मनीपुर की हर इक चीज इस बात को दर्शाती है।

बीतें मार्च में 12वे दर्जे की परीक्षाएं हुई थी। परिणाम बाद में आएगा, सो तब तक गाँव की नयी जनता के काफी लोग बेरोजगार है। जो नहीं है, वो कुछ लोग खेतों में लावणी में लगे है, तो कुछ पास गाँव की बीड़ी कारखाने में चले जाते है।

निताश कुछ दिनों से घर पर था। तीन-चार दिन सब सही रहा है। पर पांचवे दिन से घर से कटने लगा। वो घर से उबा नहीं। बस घरवालों से हर इक बात पे बीड़ी फेक्टरी में जाने की जो सलाह मिलती, वो अब सही ना जाती। तो अब कुछ करने को, वो घर से निकल कर गुरुग्राम की राह पकड़ता है। इस सब में उसे पड़ोस का बिरजू मिलता है। बिरजू भी नया-नया बेरोजगार है।

“और भाई निताश, आज कहाँ?”
“कही ना यार। गुड़गांव जाऊंगा।”
“भाई गुड़गांव तो मैं भी जा रहा हूँ। मैं पूंछू क्या करने जा रहा है?”
“रेलवे रोड पे कुछ इंस्टिट्यूट है। उनमे जाकर इंग्लिश या कंप्यूटर के कोर्स की पूछ कर आऊंगा।”
“सही है भाई। अब कही जाकर पढ़ने से छुटकारा मिला तो अब भी तू पढ़ेगा।”
“पढता कौन है, बस टेम पास करने जाऊंगा। अपनी बता। क्या काम है तुझे आज?”
“भाई जाति प्रमाण पत्र बनवा रहा हूँ। आज तीसरा दिन है तहसील में। सरपंच ने तो साइन मार दिए पर ये पटवारी टरका रहा है।”
“इसका क्या करेगा तू?”
“दाखिला लूँगा कालिज में। इससे हो जायेगा।”
“अबे कॉलेज में क्या करेगा तू?”
“भाई बी०ए० करूँगा। सब वही तो करते है।”
“अबे वो सब तो सही है। पर 12वीं तो तेरी पर्चियों के बिसर कटी, कॉलेज में क्या हाल होगा।”
“वो सब देखा जायेगा। और पढ़ने को कौन साला कॉलेज जाता है। भाई कॉलेज में सैक्टरो की लडकिया आएँगी। बिलकुल शहरी। अंग्रेजी बोलने वाली। उनके साथ सेटिंग करूँगा।”

इस बात को ज्यों ही निताश सुनता है, हँसना शुरू कर देता है।

“भाई हँस मत। तू देखियो पटा लूँगा दो महीनो में।”

इतना कहते ही, तहसील का रास्ता नजर आता है। बिरजू टेम्पो वाले को रुकने को बोलके किराया देता है। टेम्पो किनारे पे लगते ही, बिरजू उतरकर तहसील ओर चल देता है।

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अमेरिकन इंस्टिट्यूट फॉर स्पोकन लैंग्वेज।

रेलवे रोड के बायीं तरफ, एक दो मंजिला ईमारत पर तीन बड़े-बड़े बोर्ड पर अंग्रेजी और हिंदी में ये लिखा है। एक हंसती हुई फिरंगी गोरी कन्या भी एक किताब लिए साइड में छपी है। नीचे अंग्रेजी में लिखा है – Spoken English Courses, Basic Computer, Tally ERP, Personality Development Classes. ईमारत के सामने दुपहिए आराम से खड़े है। टेम्पो से उतरकर थोड़ी देर चलने के बाद निताश इस बिल्डिंग के सामने खड़ा हैं। धूप ज्यादा है, तो अंदर चल देता है।

अंदर जाने के बाद ए०सी० की बनावटी ठण्ड उसे मिलती है। बाहर जहाँ धूप में सब जलता लगता है, अंदर आकर जन्नत लगती है। अच्छा लगता है। फिर जब सामने रिसेप्शन पर वो एक कन्या को देखता है, तो उसे और अच्छा लगता है।

“इंग्लिश स्पीकिंग क्लास्सो की जानकारी चाहिए।”

निताश के कंठ से मुश्किल से निकले ये बोल, रेसेप्शनसिस्ट को शायद सुनाई नहीं दिए। उनकी भी गलती नहीं है, उनका पूरा ध्यान उनके फ़ोन पर था। निताश के तीसरी बार बोलने पर, नजर उठाये बिना वे जवाब देती है,

” ₹1000 एडमिशन फीस है और ₹1250 मंथली। तीन महीने का कोर्स है। एडवांस पेमेंट पर 10% ऑफ है।”

“क्या-क्या सिखाएंगे?”
“इंग्लिश स्पीकिंग एंड थिंग्स।”
“अखबार में पढ़ा था की डैमो क्लास्से भी है?”
“अभी फुल है वे।”
“कोई किताब लेनी होगी?”

निताश के लगातार पूछताछ से शायद वो झल्ला गयी थी। एक पल नजर फ़ोन पे से उठायी, और निताश की तरफ एक पर्चा बढ़ा दिया। उस पल निताश ने गौर से उसके चेहरे पर लगा हुआ मेकअप देखा। कहाँ से लिपस्टिक की आउटलाइन शुरू होती है, कैसे-कैसे गालो पे पुताई हुई लगती है, नाक से निकलते एक-दो बाल, भड़कीली लाल रंग की लिपस्टिक, करीने से बनायीं हुई आइब्रो; उस पल निताश ने बहुत कुछ देखा।

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निताश इंस्टिट्यूट के बाहर खड़ा है। दूसरे किसी इंस्टिट्यूट में जाने की उसकी हिम्मत ना हुई।

साइड में एक जूस का ठेला है। उसके पास जाकर एक गिलास जूस बनाने को कहता है। जब तक की जूस बने और उसे मिले, उस खाली वक़्त में यहाँ वहां नजर मारता है। अचानक देखता है की अमेरिकन इंस्टिट्यूट फॉर लैंग्वेजेज की बिल्डिंग में से चार गोरी-गोरी कन्याएं निकलती है, दो स्कूटी पर सवार होती है और अगले पल निकल लेती है।

जूस वाला उसे गिलास थमा देता है। उसे हाथ में पकडे निताश मंद-मंद मुस्काता है।

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रात का वक़्त। बिजली नदारद। निताश के पिता खाट पर बैठके हुक्का गुड़गुड़ाते रहे थे की निताश की सामने खड़ा देखते है।

“हां इब के चाहिए?”
“आपा वो दाखिला लेना है।”
“इभी तो पेपर करकै हटा है। नम्बर भी ना आये पेपरआन के। इभी कित दाखिले लेवेगा?”
“वो आपा इंग्लिश सीखनी है।”
“आच्छा। कितने लेवेगा?”
“आपा पांच हजार।”
“रे बीड़ी फैक्टरी में चला जा इतने रपिये चाहिए तो। मैं ना देता।”

इतना सुनकर निताश अम्मी-अम्मी चिल्लाता है। चूल्हे आगे बैठी उसकी माँ नजर उठाकर देखती है। चूल्हे की आंच में धुएं की वजह से आँखों में आया पानी किसी को नही दीखता। आँखें मलती हुई वो बोलती है,

“रे निताश के बापू दे दे रपिये। के इन्हें धरर् के पूजेगा। इब तेरे तकिये नीचे पड़े ये रपिये न्यू तो ना है की रातू-रात बियावेंगे।”

“क्यूँ दूँ रपिये। बियाते ना तो ये फरी में भी ना आते। खेतां का काम करती हानी तो इसके जोर पड़े है। इब रपिये मांगते जोर ना पड़ता।”

“रे दे दे रपिये। तूने ना बेरा। घर पड़ा-पड़ा किमी करता तो ना, ऊपर तें इतणा काम खिंडा दिया करे। काल सारे लीकडे तोड़ दिए। पूछन पे कव्हे है की नुही तोड़ दिए। सारे फेर दुबारा लाने पड़े। इब तने के-के बताऊँ।”

“इसने बीड़ी फेक्टरी में भेज दे। सबतै सही रव्हेगा यो काम।”

“अर बना दे फेर नशेड़ी। मैं ना भेजु। तू चुपचाप रपिये दे दिए कल। किमी सीख ही लेवेगा।”

“चाल तो फेर टीक है। दे दूंगा काल रपिये। अर सुन छोरे तू, इबे इतणे रपिये देरा हूँ तो इनका बराबर की किमी बात भी सीखिये। चाल इब हुक्का भर ला।”

निताश हौले-हौले मुस्कुराते हुए हुक्का भरने चल देता है। पर अँधेरे में किसी को कुछ नजर ना आता है।