मैं धरती ग्रह होता और मौज लेता

रात ठंडी है। शांत है। तन को भाती है। दिन इसके विपरीत था।

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मुझे पता ना था। सवेरे उठकर अपने नित्य-क्रिया में मगन था। सुबह अच्छी लग रही थी। हौले-हौले हवा भी चल रही थी और बिजली भी बराबर आ रही थी। आज क्या करुँ, इससे पहले कि मैं विचार छेड़ता कॉलेज से एक बन्दे का फ़ोन आया। सोचा की छुट्टियों में कुशल-क्षेम पूछने के लिए किया होगा, पर इसमें बुलावा था। कॉलेज जाना था। निताश तुझे फ़ोन ना उठाना चाहिए था, सोचा। पर सोचने और करने में सदैव एक अंतर रहा है।

एक घण्टे बाद कॉलेज पहुँचा। दूर से देखा तो पाया कि बच्चे झुण्ड में घूम रहे थे। थोडा समीप गया तो देखा कि कुछ ढूंढ़ रहे थे। बिल्कुल समीप गया तो वो कूड़ा उठा रहे थे। निताश वापस हो ले बेटा, उस वक़्त ये एक ही ख्याल था। मैं अमल करता, इससे पहले गुरूजी ने देख लिया। मैं अपनी नजरो में निहायती बेशर्म हूँ, वहाँ से मुड़कर भाग जाता और ऐसा भागता कि कोई पकड़ ना पाता। पर सोचने और करने में सदैव अंतर रहा है।

मैं झुंड में घुलने-मिलने की कोशिश कर रहा था। लड़कियां अलग दिशा में थी, तो लड़के अलग दिशा में थे। उनके पास जाने का मौका देखा, पर बाकी लड़के भी पूरे हरामी थे। मैं एक कदम लेता कि हरामी कुछ काम पकड़ा देते। निताश झाड़ू ले ले, निताश इसे फेंक दे, निताश बियर की बोतल कूड़ेदान में मत डाल, निताश पानी ले आ; टुच्चे कामों में हरामियों ने लगाये रखा। गुस्सा कम, पर रहा, जब तक कि गुरूजी ने हमें इमारतों का चक्कर लगाने को भेजा।

कॉलेज में अभी एग्जाम सम्पन्न हुए थे। एग्जाम में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली उपयोगी चीज, पर्ची, जमीन पर पड़ी थी। दूर से एक नजर डाली, बिल्कुल भोली सी लग रही थी। वो सफ़ेद कागज़ का एक टुकड़ा बेफिक्री के साथ घास और पेड़ो के नीचे पड़ा था। लगता ही नही था इन कागज़ के टुकड़ो में वो जहर है जो टीचर्स और फ्लाइंग वालों को कतई अच्छा नही लगता है। उसने आसपास में घुलने-मिलने की भी कोशिश शुरू कर दी थी। जीरो फोटोकॉपी, हस्तलिखित, किताबों के अंश; सभी प्रकार की पर्चियाँ गलने लग रही थी। उनको उठाना बुरा लग रहा था। उठाने का फ़ायदा भी क्या, पर्चियाँ सड़-गल कर मिट्टी का अंश बनेगी और खाद बन जायेगी। और कागज़ बनता भी तो पेड़ से है। जीवन-मृत्यु का चक्र पूरा होते अगर किसी को अपने जन्मदाता तक ले आये, तो इससे बड़ा पुण्य क्या हो सकता है। इसलिये उनको उठाते अच्छा ना लग रहा था। दूसरा कारण ये भी कि दूसरो का फैलाया कूड़ा उठाने में मुझे रूचि ना थी। मेरा इतना महान व्यक्तित्व ना है कि मैं दूसरो के हित में काम करुँ। ये तो कहने वाले कारण, असली वजह तो ये थी कि मैं लड़कियों से दूर था।

आधे घण्टे बाद इसका अंत हुआ। गुरूजी ने बताया कि आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इसलिए आज हमने कूड़ा उठाया। इससे पर्यावरण कैसे बचा, मुझे ना पता। सब ढकोसलेबाजी लगी। गुरूजी को प्रिंसिपल ने आर्डर दिया होगा। प्रिंसिपल को यूनिवर्सिटी वालो ने आर्डर दिया होगा। यूनिवर्सिटी वालो के पीछे मंत्री महकमा के सेक्रेटरी ने आर्डर दिया होगा। उनको भी आर्डर उनके पिताजी ने दिया होगा। इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी हम थे। सब आर्डर-आर्डर खेल रहे थे, और हम पर आकर खेल खत्म हुआ।

किसी को है पर्यावरण की चिंता? मुझे तो नही है। मुझे सहेली चाहिये और एक सरकारी नौकरी। फिर साल-दर-साल जिंदगी के शौक पूरे करते करते बुढ़ापे में एक-दो पेड़ लगा कर पर्यावरण बचाने की फॉर्मेलिटी भी निभा लूंगा।

कई बार खाली वक़्त में इस ग्रह के बारे सोचता हूँ और जॉर्ज कार्लिन साब का कथन याद आता है, “धरती यही रहेगी, हम यहाँ से चले जायेंगे।” सत्य लगती है ये बात, खुद आदमी ने पर्यावरण की ऐसी-तैसी कि और जब पता लगा कि रहने को और कोई स्थान ना है, तब वो इसे बचाने के ढोंग रचाने चला। वो पर्यावरण को ना बचाता है, वरन खुद को। और बुजदिल इंसान अपने इस कार्य को धरती बचाने के नाम की चादर उढ़ा देता है।

मैं अगर धरती ग्रह होता, तो आदमी ना होता। ढकोसलो से परे होता।

मैं धरती ग्रह होता और मौज लेता

रात ठंडी है। शांत है। तन को भाती है। दिन इसके विपरीत था।

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मुझे पता ना था। सवेरे उठकर अपने नित्य-क्रिया में मगन था। सुबह अच्छी लग रही थी। हौले-हौले हवा भी चल रही थी और बिजली भी बराबर आ रही थी। आज क्या करुँ, इससे पहले कि मैं विचार छेड़ता कॉलेज से एक बन्दे का फ़ोन आया। सोचा की छुट्टियों में कुशल-क्षेम पूछने के लिए किया होगा, पर इसमें बुलावा था। कॉलेज जाना था। निताश तुझे फ़ोन ना उठाना चाहिए था, सोचा। पर सोचने और करने में सदैव एक अंतर रहा है।

एक घण्टे बाद कॉलेज पहुँचा। दूर से देखा तो पाया कि बच्चे झुण्ड में घूम रहे थे। थोडा समीप गया तो देखा कि कुछ ढूंढ़ रहे थे। बिल्कुल समीप गया तो वो कूड़ा उठा रहे थे। निताश वापस हो ले बेटा, उस वक़्त ये एक ही ख्याल था। मैं अमल करता, इससे पहले गुरूजी ने देख लिया। मैं अपनी नजरो में निहायती बेशर्म हूँ, वहाँ से मुड़कर भाग जाता और ऐसा भागता कि कोई पकड़ ना पाता। पर सोचने और करने में सदैव अंतर रहा है।

मैं झुंड में घुलने-मिलने की कोशिश कर रहा था। लड़कियां अलग दिशा में थी, तो लड़के अलग दिशा में थे। उनके पास जाने का मौका देखा, पर बाकी लड़के भी पूरे हरामी थे। मैं एक कदम लेता कि हरामी कुछ काम पकड़ा देते। निताश झाड़ू ले ले, निताश इसे फेंक दे, निताश बियर की बोतल कूड़ेदान में मत डाल, निताश पानी ले आ; टुच्चे कामों में हरामियों ने लगाये रखा। गुस्सा कम, पर रहा, जब तक कि गुरूजी ने हमें इमारतों का चक्कर लगाने को भेजा।

कॉलेज में अभी एग्जाम सम्पन्न हुए थे। एग्जाम में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली उपयोगी चीज, पर्ची, जमीन पर पड़ी थी। दूर से एक नजर डाली, बिल्कुल भोली सी लग रही थी। वो सफ़ेद कागज़ का एक टुकड़ा बेफिक्री के साथ घास और पेड़ो के नीचे पड़ा था। लगता ही नही था इन कागज़ के टुकड़ो में वो जहर है जो टीचर्स और फ्लाइंग वालों को कतई अच्छा नही लगता है। उसने आसपास में घुलने-मिलने की भी कोशिश शुरू कर दी थी। जीरो फोटोकॉपी, हस्तलिखित, किताबों के अंश; सभी प्रकार की पर्चियाँ गलने लग रही थी। उनको उठाना बुरा लग रहा था। उठाने का फ़ायदा भी क्या, पर्चियाँ सड़-गल कर मिट्टी का अंश बनेगी और खाद बन जायेगी। और कागज़ बनता भी तो पेड़ से है। जीवन-मृत्यु का चक्र पूरा होते अगर किसी को अपने जन्मदाता तक ले आये, तो इससे बड़ा पुण्य क्या हो सकता है। इसलिये उनको उठाते अच्छा ना लग रहा था। दूसरा कारण ये भी कि दूसरो का फैलाया कूड़ा उठाने में मुझे रूचि ना थी। मेरा इतना महान व्यक्तित्व ना है कि मैं दूसरो के हित में काम करुँ। ये तो कहने वाले कारण, असली वजह तो ये थी कि मैं लड़कियों से दूर था।

आधे घण्टे बाद इसका अंत हुआ। गुरूजी ने बताया कि आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इसलिए आज हमने कूड़ा उठाया। इससे पर्यावरण कैसे बचा, मुझे ना पता। सब ढकोसलेबाजी लगी। गुरूजी को प्रिंसिपल ने आर्डर दिया होगा। प्रिंसिपल को यूनिवर्सिटी वालो ने आर्डर दिया होगा। यूनिवर्सिटी वालो के पीछे मंत्री महकमा के सेक्रेटरी ने आर्डर दिया होगा। उनको भी आर्डर उनके पिताजी ने दिया होगा। इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी हम थे। सब आर्डर-आर्डर खेल रहे थे, और हम पर आकर खेल खत्म हुआ।

किसी को है पर्यावरण की चिंता? मुझे तो नही है। मुझे सहेली चाहिये और एक सरकारी नौकरी। फिर साल-दर-साल जिंदगी के शौक पूरे करते करते बुढ़ापे में एक-दो पेड़ लगा कर पर्यावरण बचाने की फॉर्मेलिटी भी निभा लूंगा।

कई बार खाली वक़्त में इस ग्रह के बारे सोचता हूँ और जॉर्ज कार्लिन साब का कथन याद आता है, “धरती यही रहेगी, हम यहाँ से चले जायेंगे।” सत्य लगती है ये बात, खुद आदमी ने पर्यावरण की ऐसी-तैसी कि और जब पता लगा कि रहने को और कोई स्थान ना है, तब वो इसे बचाने के ढोंग रचाने चला। वो पर्यावरण को ना बचाता है, वरन खुद को। और बुजदिल इंसान अपने इस कार्य को धरती बचाने के नाम की चादर उढ़ा देता है।

मैं अगर धरती ग्रह होता, तो आदमी ना होता। ढकोसलो से परे होता।

बातें जो मैं लिखना चाहूँ।

दिन के अंत में, जब सारे वाकये घटित हो चुके होते है, कुछ लिखने को जी करता है। अच्छा, बुरा, इस पर, उस पर, मुझ पर, समाज पर, जिंदगी पर, प्यार पर, उस निरीह लड़की पर जिस पर नजर एक पल के लिए रुकी, सड़क किनारे उस बच्चे पर जो नंगे पाँव वाहनों के शीशे पर थपकी करता है; लिखने को विषय काफी है। पर इन पर लिखना मुझे नापसन्द है। इन पर लिखा फेक लगता है। लगता है की इन पर लिखकर मैं दूसरे जनों से शाबासी या वाहवाही की उम्मीद करता हूँ, जोकि मेरे स्वभाव के विपरीत है। खैर इसे यही खत्म करता हूँ, और थोड़ा आने वाले कल को छेड़ता हूँ।

कल हिस्ट्री का एग्जाम है। दूसरे सेमेस्टर का तीसरा एग्जाम। केवल तीन दिन की छुट्टी मिली थी पढ़न-पाठन हेतु। अब वे आज ख़त्म होती है, तो सोचता हूँ कि कल क्या लिखूंगा आंसर शीट में।

ऐसा कतई नहीं है की मुझे हिस्ट्री पसंद ना है। उलट मुझे हिस्ट्री भाती है। पुराने वक्त में जो घटा, उसको पढ़कर और सोचकर, अच्छा लगता है। पर जब मुझे उस पढ़े हुए पर लिखने को कहा जाता है, तो मुझे पसंद ना आता है। इसका कारण, मेरे मुताबिक, सिर्फ एक है; लिखते वक़्त मैं रुक जाता हूँ।

सड़क किनारे ग्रीन बेल्ट में बैठा हूँ। वाहनों की आवाजाही कम है, तो शोर भी कम है। पेड़ो से पंछियों की आवाज आती है। दिन भर तपने के बाद और पैर जलाने के बाद, अभी शाम को जमीन नंगे पर को सुहाती है। नमी है। अँधेरा हो चला है। स्ट्रीट लाइट्स जल चुकी है। घर जाने का समय होता है। जाएंगे, पर घर जाकर भी कल के एग्जाम की चिंता कम ना होगी।

A Good Day

I have just woken up from a deep slumber. Something shook me. It is like, there is a burden on my conscience I can’t get rid of easily.  Writing, maybe, will help me here.

The Day
Today was a simple day. I woke up, got dressed and reach College. The traffic was less than usual. The roads were less occupied.

I reached College and started going after teachers for signatures. I needed them for my important work. I agree being a little selfish asking them for it. Two months have happened since I took their lectures.

While I was there, a friend asked me for help. The help was making lists. College was hosting an Inter-College debate competition. And as soon as I knew it, I was writing down names of students who were in it.

I have always loved competitions. I love helping people. And I love receiving appreciation for it. The funny thing is, no one appreciated me or anything. No one. Nada. For everyone I met today, save for one person, everyone took me for granted. I felt the amount of work done in organising an event. I felt what those people go through. People come and go. All without taking a second to thank a nameless and faceless person who arranged their seat or offered them water.

The online and offline dilemma
I wrote down names. Names of students from neighbouring college and my College. And there were names I remembered. I remembered them because they were interesting people. People whom I wanted to talk with. Now it’s a different matter all of them were girls.

I am here to generalise my fellow young fellas.
Life, in its monotone, is boring. It is people who make it worth living. And there are times when you are engrossed with a person that you want more of them. But we walk around with a shyness so great that we are simply unable to go upto them and ask for it. Now it is different if we gets turn down, but the gist is that we strived for what we wanted. Now we’ve taken shyness into picture, it is essential to include the fact that I also lack the courage to talk to a girl.

I didn’t talk to them. But I remembered their names. I reached home and searched them on facebook. And when I visited their profile, it was starkly opposite to my expectiations.

Today, there was this girl who was headstrong and confident. It was evident in the way she talked and spoke during the debate. She was beautiful too, breathtakingly beautiful. It was like she personified beauty. Hair tied in a ponytail and the occasional giggles. The eyes behind the specs. The aura she had. Truth be told, I am unable to explain how beautiful a girl is.

So when I visited her profile, there were pictures which had inspirational quotes. Inspirational quotes for a girl to remember she’s beautiful the way she is. It felt like she was doubtful about herself. There wasn’t one, but multiple of the same kind. It was aweful, seeing someone doubt their wonderful individuality. Society, what have you done.

Now let’s tackle the question that why do I stress so much on what a person has put up on their facebook.
Facebook is like a commodity for today. It is amazing too. It offers one the independence to say what he wants to say without any sort of fear of getting judged by people for it.

Now what I want to say is, social media is a platform for our thoughts. It has become a medium for us to express ourselves. So naturally, our facebook profile is an extension of our existence and what we post is things we want to say or tell people. Or rather taken as.

If thoughts above sound stupid to you, then please tell me.

A bit about stalking
Above here I have talked about looking up a girl’s facebook profile. And honestly it sounds a lot like stalking.

The thing with me is, a talk with an interesting person makes my day rather than seeing them. And real life doesn’t always align itself to my expectations. So while looking up them online, what I merely want is a glimpse of the goodness they are and what they are like.

Work be of any kind, it is the intentions with which they are done which makes them good or bad. And here, I cross my heart and (figuratively) I am ready to walk through burning pyre if it helps me in conveying that my intentions were good.

A good thing
The debate was good. The result was a mess.

Now there was this girl from Govt. College sector 14. She was enchanting and when she spoke, one was forced to pay attention. Such powerful her public speaking was.

When the debate was done and they were ready to go home, I walked up to her and said that she did good today. She thanked me. Perhaps she knew how awesome she was and was just being modest about it. Anyways, she made my day better. Count the little blessings they say. Her thank you was the best little thing today.

Now I am shy around girls and I still wonder how I talked to her. But for the moment, I am just glad that I talked.

LOVE LOVE LOVE

There is an ache in my heart. I am not being poetic, just speaking figuratively. I think I have fallen in love.

बीते सात दिन घर से बाहर थे। कल रात घर आया। सुबह सबने पूछा, कहाँ थे? जवाब मे इतना कहा की यही था। अब यही के रूप में तो मुझे खुद नहीं पता की किसको क्या कहूँ। दूसरो की लिखी बातों को सच मानता हूँ, तो शायद कुछ सच लिखने की जुर्रत करू।

मेरे 7 दिन एक कैंप में बीतें। कैंप किस चीज का था, ये ना बताऊंगा। अपने तक रखूँगा। बस यह जान लो की कॉलेज में था। अगला मुद्दा यह की इस कैंप में, सात दिन में, मैं काफी तौर पर ढला और बदला।

सात दिन पहले
मेरी कैंप में जाने की कोई ख्वाहिश ना थी। 8 बजे पहुँचना था। मंजिल दूर थी तो घर से एक घंटे पहले निकलना जरुरी था। अब 7 बजे अनमने ढंग से अनमने काम के लिए निकलना मुझे किसी बुद्धिमता वाला काम ना लगा। पर दोस्तों का जोर था, तो करना पड़ा।

8 बजे से कुछ समय पहले ही कैंप पहुँच गया। थोड़ी देर बाद और जनता आने लगी। फिर इसमें थोड़ी देर और लगाकर गुरूजी भी आ गए।

सारे स्टूडेंट्स आ चुके थे। हम दरी के ऊपर पेड़ के नीचे बैठे थे। हवा मंद पर शीतल थीं। किसी किसी वक़्त जब देह से टकराती तो थोड़ी सिहरन सी दौड़ जाती। पर धूप पूरे शबाब पर थी। शरीर से टकराके उसे झुलसाती नही पर गर्माती थीं। उस पल अच्छा लगता था।

हम सब लाईनो में बैठे थे। एक और लड़के तो दूसरी और लड़कियां। जैसी की  जवानी की चुल्ल है कि विपरीत लिंग वाले इंसान को सदा प्रभावित करना है। ठेठ शब्दों में लड़को को लड़कियो को सेट  करने के चक्कर में सब लड़के कुछ ना कुछ कर रहे थे। एक दूसरे के ऊपर पॉइंट मार रहे थे, व्हाट्सअप जोक्स का जोर से उच्चारण कर रहे थे और इन सब के बीच हो-हो करके हंस भी रहे थे। एक बार बात हो जाए बस कुछ यूँही पूरा जोर लगा रखा था। इन सब के बीच मैं मोबाइल में नजरें गड़ायें बैठा था। लड़कियों से बात करने में झिझक सदा अंदर रही थी, पर अब फटती थी। सो इसके डर से मुँह बंद था और नजर नीचे।

टीचर आये। आकर उन्होंने कैंप के बारे में थोडा बताया। बताया की क्यों हम वहां थे, हम वहां क्या करेंगे, हमे क्या करना चाहिए इत्यादि। किताबी सवालो के सभी जवाब उनके पास रटे-रटाये थे, वो बता रहे थे। असली सवाल जैसे की लड़कियो से बात करवाने को कहने की हिम्मत हम में ना थी, तो हम पूछ नहीं रहे थे।

जैसे उनका कहना शुरू हुआ, हमारा समाप्त हुआ। हम सबको परिचय देना था, और वो भी स्टेज पर जाकर। स्टेज से मुझे बचपन से डर लगता रहा है। वो अब भी लगता है। स्टेज पर जाकर विचार थम जाते हैं और मुँह बंद हो जाता है। मुझे बचपन में लगता था की किसी शोर मचाती क्लास को चुप कराने का साहस अच्छा तरीका था की उसे स्टेज पर चढ़ा दिया जाए। खैर सब परिचय दे रहे थे। पहले एक लड़का, फिर लड़की। मेरी बारी आने वाली थी, पर मुझसे पहले एक लड़की की बारी थी।

वो उठी और स्टेज पर गयी। नजरों को वो सुन्दर लगी। अत्यंत सुन्दर। पर जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो सच में, दिल आ गया उनपर। हर शब्द उनके मुख से जो निकला, जब मैंने सुना तो लगा की दुनिया कितनी बेहतर जगह है। उनकी बात जब तक समाप्त ना हुई नजरें उन पर रही। ज्यादा कुछ ना कह पाउँगा उनकें बारे में, अगर कोशिश भी करूंगा तो सब बनावटी लगेगा। फेक लगेगा। पर ऐसा नहीं है। बात यह की औरतो की प्रशंसा में पहले ही बहुत कुछ लिखा या कहा जा चुका है और जिंदगी ने पहले इसके ज्यादा मौके ना दिए की किसी औरत की प्रशंसा कर पाऊं। पर कुछ लिखूँ तो शायद उनके लिए कम हो। वो अपना परिचय हंस कर दे रही थी। खुश लग रही थी। एक किताब उनके सामने रखी थी। उसमे एक पल देखती तो फिर बोलती। अपने बारे में उस किताब में लिखा होगा। और लिखा होगा तो जरूर वो पढ़ती भी होंगी। मन में ख्वाहिश हुई की उनसे बात हुई तो किताबों के बारें में जरूर बतियाएंगे। इस बीच उनका बोलना समाप्त हुआ तो तालियां गूंज उठी। हमने भी अंत तक बजायी। दिल को तो पहले ही पसंद थी, अब दिमाग ने भी हामी भर दी थी।

अगली बारी मेरी थी। डरते, गिरते, पड़ते स्टेज पर पहुँचा। वहां जाकर वही काम हुआ। मैं चुप हो गया। इसके बाद क्या हुआ, मुझे पता नहीं। बस मैं लौट आया ये कसम खाता हुआ की मैं अब कभी ऐसे काम ना करूँगा।

खैर पहला दिन बीता। कुछ यूँ बाकी दिन भी बीते। वो नजरो के सामने थी। वक़्त बेवक़्त नजरे घुमाकर दीदार भी किया। सदैव हंसती, खुश दिखती। लगा की धरती पर उनका आना भी हँसते-हँसते ही हुआ था। दो तीन बार उन्होंने स्टेज पर जाकर बोला भी। ख्वाहिश थी सुनते रहे। सुनने के लिए बोलना भी जरुरी है, पर कभी उनसे बात करने की हिम्मत ना हुई। झिझक मुझे ले बैठी। और मैं मेरी झिझक को लेके कोने में बैठ गया। प्यार हो गया लगता था मुझे।

आज आठवाँ दिन है। कैंप ख़त्म हो चुका है। उनकी बातें ख़त्म हो चुकी है। उनके दीदार के मौके समाप्त हो चुके है। पर मेरे विचारो में वो अब भी है। और शायद चिर तक रहे।

रात के 11 बज चुके है। दिन ख़त्म होने को है, तो सच बोलने को जी करता है। और सच ये है की उस वक़्त जब उनके तालिया बजी, तब मैं अकेला नहीं था। भीड़ थी। उस भीड़ में मैं एक गुमनाम चेहरा था। और उस भीड़ में हर एक बन्द उन्ही की बात कर रहा था। अब मुझ में कोई ख़ास बात तो है नहीं। औसत छोटे गाँव का बन्दा हूँ जिसकी कोई वास्तविक पहचान नहीं। खुद को कमतर नहीं आँकता, पर फिर भी सच कहता हूँ। झिझक से मैं उनसे बात भी ना कर पाया। अब जब दिन कट चुके है तो खुद को रात के इस वक़्त में कोसता हूँ।