मुझे भूख लगी है

मैं भूखा हूँ। कितना वक़्त बीता, मुझे पता। तब सब काला था और कुछ नही दिखता था। अब सब दिख रहा है। मैं अब भी भूखा हूँ।

बड़े डब्बे में भी कुछ ना था। मैंने मुँह मारा था। मेरे साथी ने भी देखा था। बड़ी काली शोर वाली वही थी। उसमे खाना होता है। मैं नही गया। मैं भूखा था। मैं बैठा था। मेरा एक कोना था। मेरे पास में वे मुँह चला रहे थे। कुछ खा रहे थे। मैं देख रहा था। मैं खाने के लिए बोला। उनमे से एक उठा। मुझे खाना मिलना था। पर वो चिल्लाया। मैं भाग निकला। वो हंस रहा था।

मैं पत्थर वाली जमीन से भागा। मैं रेत पर गया। पैर गर्म होते थे। मैं कोने में गया। मैं पानी में बैठ गया। मुझे भूख लगी थी। मैं वहाँ रहा। आते-जाते वो मुझे देखते। मुझे भूख लगी थी। मैंने नहीं बोला। वो फिर चिल्लाते। मुझे भागना होता। मुझे भूख लगी थी। मैं वही रहा। मैंने आँखें बंद कर ली। मैं सो गया।

मैं उठा। मैं गली में चला। अब कुछ नही दिखता था। वे खाना दे देते थे। आज कोई नहीं था। मुझे खाना ना मिला। मुझे भूख लगी थी। मैं गली में चलता रहा। कुछ नही दीखता था।

एक जगह दीखता था। वहाँ वो थे। बहुत थे। मेरे साथी भी थे। खाना मिलेगा। मैं अंदर गया। वहाँ वो थे। मैं भूखा था। सब दिख रहा था। गली जैसा नही था। खाना भी था। गली में कोई नही था। वो यहाँ थे। यहाँ खाना था। मुझे भूख लगी थी। मैं कोने में गया। वहां खाना पड़ा था। मेरे साथी खा रहे थे। मुझे भूख लगी थी। मैंने खाना खाया। वे नही चिल्लाये। मैंने खाना नही माँगा। मैंने कोने मे खाया। गली में वो नही थे। वो यहाँ थे। वो भी खाना खाते थे। वे नही चिल्लाये। मैं अब भूखा नही था।

छुट्टियां और बचपन की फालतू यादें

छुट्टियां चल रही है। घर और कॉलेज, दोनों जगह से मुक्त हूँ। एग्जाम के दौरान छुट्टियां बिताने को लेकर बहुत बातें सोची थी। वो बातें वही तक सीमित रही। अब घर पर हूँ, तो एक-एक छुट्टी काटनी भारी हूँ। पार्क में घूमना, या पड़ोस की आंटी से मोहल्ले की खबरें जानना; वक़्त काटने को घर बस यही चीजें है। आरम्भ में घरवालों की बातों में मैं वो बेचारा लड़का था जो इम्तिहान के बाद आराम कर रहा है। अभी कुछ दिन ही बीते है। बेटा निताश लामणी करिया, माँ हर रोज रोटी के साथ सुझाव देती है। छोरे बीड़ी फैक्टरी में लग जा, बापू हुक्के से मुँह हटाने के बाद कहते है। मैं ऐसे रियेक्ट करता हूँ कि मैंने उनका कहा सुना ही ना। मैं कामचोर नही हूँ, मैं जानता हूँ। कॉलेज के एक साल में कुछ नखरे पाल लिए है, जिनको संग लेकर अब लामणी करनी या बीड़ी फैक्टरी में काम करना नामुमकिन है। ये बात माँ-बापू को समझानी मुश्किल है, और पड़ोस की आंटी को भी जो कल मुझे माँ-बाप की बात ना मानने वाले चरित्रहीन आदमी के तौर पर दूसरो को बता रही थी।

आज की शाम दोस्त के घर बीती। करने को हमने खाट पर लेटकर छत को ताडा और बकवास की। इससे बेहतर कुछ करने को भी ना था। हवा में जैसे उबाऊपन घुला था। नाक से सांस ली जाती तो मुँह से उबासी निकलती। कमरे में मच्छर थे। वो काट ना रहे थे। कान के आगे पी-पी रहे थे। शायद वे भी अलसा गए थे अपनी दिनचर्या से। पूरा दिन लोगो को काटना और उनकी तालियों से बचना। इसलिए कान के पास पी-पी कर रहे थे। मानो अपनी वाणी में याचना कर रहे थे कि अपनी ताली से हमारी जीवन-लीला समाप्त करो और इस बोरियत से बचाओ।

हम खाट पर लेटे थे। बातें समाप्त हो चुकी थी और सन्नाटा था। अचानक उसने बचपन की बातें शुरू कर दी। मेरा बचपन अच्छा था, सब मुझसे प्यार करते थे, मैं जो चाहता वो खाता था, मुझे कोई काम ना करना पड़ता था; मेरे मित्र ने इनके अलावा और भी काफी बातें कही जो मैं सुन ना पाया। मेरा मन कही और था। मैं उस वक़्त अपने बचपन को याद कर रहा था। उसका बचपन अच्छा था, उसने बताया था। मेरा बचपन मजाक था, मैंने उसे ना बताया।

मुझे बचपन का जिक्र सुनके भंडारे सबसे पहले याद आते है। शिवरात्रि का भंडारा, पीर बाबा का भंडारा; कोई भंडारा ना छोड़ता था मैं। उस वक़्त जीभ पिज़्ज़े-बर्गर और बातें टिश्यू पेपर, फिंगर-बाउल जैसे शहरी चोंचलो से अनजान थी, तो आलू की सब्जी और पूरी का स्वाद भाता था। इतना भाता था कि एक साल मैंने तीन गाँवों के भंडारे भी निपटाये थे।

गाँव के भंडारों का बंदोबस्त बड़ा आसान होता है। पंडाल लगाके दरिया बिछा दी जाती है। जनता बैठती है, तब लोग पत्तल, सब्जी, पूरी आदि का वितरण करते है। भंडारे में काफी लोग आते है, इसलिए दरियों का साफ़ होना जरुरी होता है। ये साफ़ रहे, इसलिए जूतें-चप्पलो को पहले ही निकलवा लिया जाता है।

वो जमाना हवाई चप्पलों का था। मुझे इनका वास्तविक नाम भी ना पता था। काली, सफ़ेद, नीली, भूरी, उँची एड़ी वाली; मेरे लिए सब बाटा वाली चप्पल थी। इनकी बचपन में कोई कद्र नहीं थी। घर से निकलने पर पहनी जाती और खेलते वक़्त खुद पैरो से गायब हो जाती। इनपर खेलते हुए ध्यान देना वक़्त की बर्बादी थी। कोई चप्पल पर ध्यान ना देता था, जब तक कि एक लड़का फलोटर लेकर ना आया था।

पहली बार जब उन्हें देखा, तो मन में उनकी चाह उमड़ आई थी। वो लड़का उन्हें लेकर बहुत इतरा रहा था। उसकी फलोटर को किसी ने चप्पल कहा तो उसका मुँह बन आया था। फलोटर की खासियत दिखने के लिए उसने फलोटर को अपनी कमर में मरवाया भी था। मैं देखकर हैरान हुआ था। बाटा वाली चप्पल एक बार लगने पर रुला देती थी, वही ये फलोटर का कुछ असर ही ना था। बस तभी से फलोटर पहनने की जिद पकडली थी। फलोटर पहनूंगा, ये ख्याल ही राजी करता था। घर जाकर जिद सामने रख दी, तो किसी ने ध्यान ना दिया। अगले दिन जब जिद का उग्र रूप दिखलाया, तो थप्पड़ पड़े। दो-चार दिन तक तो यही चला, पर जोर-जोर से रोता देखकर माँ का दिल पिघल आया था। पांचवे दिन मेरे भी पांवो में फलोटर थी।

मैं फलोटर पाकर बड़ा खुश था। मेरे लिए वो मेरा खजाना था। उन्हें पहनकर मैं ना भागता और खेल-कूद में भी उनपर नजर रखता। खेलकर घर आता तो नहाता बाद में, पहले उन्हें पानी से धोता था। मेरी छोटी सी दुनिया में मेरे फलोटर का बहुत ही विशेष स्थान था।

शिवरात्रि आई। मैं भण्डारे में फलोटर पहनकर गया। माँ ने खूब मना किया था, पर मैं ना माना था।

खाना खाने के पहले फलोटर बाहर उतार दिए थे। जब मैं वापस आया, तो वो गायब थे। खूब ढूंढी पर ना मिली। मैं उस वक़्त रोने लगा था। घर जाकर और ज्यादा रोया। सोचा था कि माँ दोबारा फलोटर दिला देंगी। पर अबकी बार ऐसा ना हुआ, उलट ज्यादा रोने पर कमर में कसकर बाटा वाली चप्पल और लगी। मैं रोने लगा। कुछ समय बाद बापू मनाने आये। मैंने उन्हें कहा कि माँ फलोटर मारती तो वो ना लगती और मैं इतना ना रोता।

मेरे फलोटर मेरे साथ सिर्फ सात-आठ दिन रहे। पर जाते हुए भी एक अमूल्य सबक सीखा गए। उस दिन से मैंने भंडारों में टूटी चप्पल पहनकर जाना शुरू कर दिया, जो अब तक कायम है।

और क्या करू (Aur Kya Karoon)

आज कुछ और सैनिक मारे गए
कल कुछ और मारे जायेंगे
परसो और भी ज्यादा मारे जायेंगे
हम आज कड़ी निंदा करते है
और कल भी कर देंगे।

मैं जनता हूँ
इसका एक हिस्सा हूँ
नया खून हूँ जोकि उबलता और खौलता है
मैं सोशल-नेटवर्किंग साइट्स पे निंदा कर दूंगा
बड़े-बड़े वाक्यो में तुम्हारी मौत पर शौक जताऊंगा
इससे निपटने के दस तरीके बता दूंगा
सरकार की निंदा कर दूंगा
पाकिस्तान की माँ-बहन कर दूंगा
मृतको को रिप-रिप कर दूंगा
मेरे मोहल्ले की चाय की दूकान पर
रोज शाम को बुढ़ों और जवानो की बैठक लगती है
वहां मैं बैठकर कुछ तगड़ा सा वाक्य बोलकर
अपना जोर मनवा लूँगा
मैं मोमबत्ती लेके सड़को पर निकलूंगा
मैं ए०सी० वाली दुकानों पर बैठके कॉफ़ी गटकूँगा
और अंग्रेजी में दो-चार चबड़-चबड़ कर दूंगा
मैं न्यूज़ चैनल्स पे दुनिया भर की बकचोदी सुनूंगा
और अंत में उन्हें चुतिया कहकर अपना गुस्सा व्यक्त कर दूंगा
मैं चुनावी रैलियों और सम्मेलनों में जाऊंगा
नेता कोई भाषण देगा और तुम्हारी बहादुरी का जिक्र करेगा
मैं गदगद होकर तालियां ठोकुंगा
मैं कल सुबह अपने कुत्ते और स्वयं को घुमाने निकलूंगा
कोई मिला तो हम दोनों साथ मिलकर
अपनी व्यस्तता से समय निकालकर
तुम्हारे ऊपर चर्चा जरूर करेंगे
मैं कवि भी हूँ
एक कोने में बैठकर कुछ तुकबंदी लगाउँगा
कुछ लंबी-लंबी पंक्तिया तुम पर लिख लिख दूंगा
फिर उन्हें तुम्हारे नाम पर कही छपवा दूंगा या बोलूंगा
उस पल मेरी छाती का फुलाव देखना
और सबकी तालियाँ पिटवाऊंगा
उस पल मुझे और मेरे मैं को अच्छा लगेगा
मैं तुम्हारे लिए एक स्मारक बनवाऊंगा
उसके उद्घाटन के लिए किसी चूतिये नेता को बुलाऊंगा
फिर उसकी बकैती सहन करके उसका पक्ष पाउँगा
खैर मैं बहुत कुछ कर दूँगा
तुम्हे पता नहीं है
जनता सोया हुआ शेर है
जागेगा तो फाड़ डालेगा सब कुछ।

साधों,
मैं बहुत कुछ कर दूंगा
पर मुझे आज ना पता चला
कि ये जो जवान मरते है
ये कौन होते है?
किस बिजनेसमैन या नेता के लड़के होते है
देहात या शहर
कहाँ से निकल कर आते है
क्यों करते है ये वो नौकरी
जिसमे इन्हें साफ़ पता होता है
की मौत सदा इनके साथ चलेगी
क्या चलता है इनके मन में
की बस ये चलते जाते है
किसी को इनका पता ना चलता है
क्या किया क्या करना पड़ता है
कब इनके प्राण छूट गए
एक गोली ने इन्हें एक आदमी से एक स्टेटिस्टिक्स बना दिया
भाई कौन होते है हे लोग
इनका घर परिवार ना होता क्या
कोई पत्नी प्रेमिका या बच्चे
बस चले जाते है
चले जाते है
और एक कड़ी निंदा के मोहताज रह जाते है।

थम

मेरे जीवन में
इसके रोजमर्रा के प्रवाह में
बीते दिनों में कुछ ठहराव आया है
सोचा-खोया-पाया क्या कुछ
कुछ खबर ना है।

मन कुछ भाता ना
मानो कुछ खरा सा हो चला है
जैसे की
बीते दिन की खुशियाँ, दुःख, खेल, हाँसा
सब कुछ संजोनें में कुछ थक सा गया है
और कहना चाहता है क़ि
थोडा रुक, ठहर, सब्र रख
सफर लंबा है
थोडा आराम करने दे।

दिन आता है जाता है
रात चढ़ती है उतरती है
मेरे आँगन में रोज चिड़िया दाना चुगने आती है
रोज मेरे पड़ोस के बच्चे पढ़ने जात्ते है
प्रतीत होता है की
दुनिया चल रही है
बस मैं ही रुक गया है।

Ek baat suno meri

ना कभी किसी से उम्मीद रक्खी
ना कभी किसी को लेके चीखा चिल्लाया
बस एक चीज की ख्वाहिश है आज
मेरी आवाज़, मेरी बात सुनो।

सुना भी और देखा भी कि दुनिया बड़ी है
काफी प्रकार के लोग है इसमें
पर फिर भी इस भीड़ में
एक जिंदगी क्यों मायूस है, तन्हा है।

लोग गोरे काले ऊपर से
पर दिल के काले होने का क्या जोर है
इंसानो पे चलता खूब जोर है
क्या कभी विचारो पे किया गौर है।

सजना-संवरना भाता है
शीशे में अपने आपको बख़ूब देखा
पर ये भीतरी सुंदरता कौनसी है
कोई शीशा है इसका तो मुझे भी दिखाना।

जीभ मुलायम है
फिर इतने कटु प्रहार कैसे करती है
क्यों चुभते है बोल इसके इतने किसी को
क्या ये सब कुदरती है।

बच्चों में भगवान् बसता है
धरती पर ये भगवान् का रूप है
पर जब तुम्हारा भगवान् सिग्नल पर तुम्हे बुलाता-पुकारता है
तो उन्हें धमकाना फिर मंदिर में जा मनाना क्या है।

कहने को सब अथवा एक इंसान है
फिर कहलाने को सब क्यों अलग है
ये क्या झोल है भाई, क्या माया है
जो इस दुनिया को यही बनाना तुम्हे भाया है।

सवाल खूब उठाये मैंने
जवाब ढूँढने मेरे बस में नहीं है
बस एक बहाना है की सिर्फ इंसान ही हूँ यारो
बात सुनी आपने, सो आभार व्यक्त करता हूँ।

ज़िन्दगी क्या करती है

ये दुनिया मेरे साथ मजाक करती है,
बात सपने सच ने होने की अखरती है।

कल जिंदगी बेफिक्र हो यूँ करके रुपयो को ठुकराया था,
आज उसी को पाने के लिए जिंदगी दर-दर भटकती है।

उम्र बढ़ने पर भी माँ-पियौ मेरा सहारा है,
इनका सहारा न बनने की बात रुआंसा करती है।

बचपन में भगवान् के हरेक इंसान में बसने की बात सुनी थी,
आज इनके मुँह में राम तो बगल में छुरी झलकती है।

उनका प्यार ना मिला तो जिंदगी को माशूक़ बनाया था,
इसकी बेवफाई मालूम हुई तो अब रूह तड़पती है।

जिंदगी की कहानी

अजीब जिंदगी है मेरी,
किसी ना मिलने वाले प्यार में खोई हुई है,
रोज मेरे चारो ओर उजड़ते है बसेरे,
उनकी तरफ आँख मूंदी हुई है।

फेहरिस्त ज्यादा लंबी नहीं है,
सर्वप्रथम एक किसान आता है,
हर वक़्त जमीन पर चोट करता है,
पता न किसे अपने स्वर सुनाना चाहता है।

बाद में एक युवापन आता है,
सपनो में खोयी जिंदगी कोई उसने देखी हुई है,
साल-दर साल रपिये बटोरने में गुजर-वाकर,
उस जिंदगी को पाने की जिम्मेदारी उसने मुझे सौंपी हुई है।

ठीक बाद मे कुछ नेता संग पत्रकार आते है,
अन्य सपना ‘एक बेहतर कल’ का दे जाते है,
अजीब नजारा पेश करते है,
‘आज’ जलाते है, फिर उसकी राख पे ये ‘कल’ उगाते है।

अंत में कुछ लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराते है,
मुँह पे मुखौटे लगा परिवार-जन बन मेरे करीब आते है,
बातों के समां में अपना मतलब साधते है,
इधर मतलब पूर्ण, उधर अंतर्ध्यान हो जाते है।

कहानी जिंदगी की कुछ भी हो,
कविता, में मुकम्मल नहीं है,
ख्याल की सपने थोड़े हसीन हो,
शायद इसलिए आँखें मूंदी है।