सफेद रंग की चीजें अब लाल होती है

सफेद रंग की चीजें अब लाल होती है,
मेरे देस में मरे बाद क्रांति होती है।

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मेरे दिनों का पता

तुम्हे मेरे दिनों का पता है,
ये सारे एक उतावलेपन से पीड़ित है।
ये उतावलापन है इनके रोज की दिनचर्या से बच निकलने का।
इस बच निकलने या बचाने के धारावाहिक में कोई प्रेम या अन्य पात्र नही है।
सब कुछ एक परम्परा है इस जवानी की।
कि इस उम्र में जीवन की चल रही हकीकत से हमे छुटकारा चाहिए।
चाहे वो क्षणिक ही क्यों ना हो।
हम उसे पाकर रहेंगे और हम पाए बिना ना रुकेंगे।
ये बच निकलने की प्रवृति अंदर से उपजती है कि रोज के समान्यपन को छलकाया जाए।
पैर इतने जोर से जमीन पर टिकाये जाए की उनका जोश जमीन की स्थिरता को विचलित करे।
इस उम्मीद में कि स्थिरता में जमे हुए कुछ या कोई तो जगेगा ही।
वो आएगा और हमारे साथ खड़ा होगा इस संघर्ष में जोे जिंदगी की रोजमर्रा के खेल के खिलाफ है।
ये खेल जिसे खेलने के लिए हमे बचपन से शिक्षा, दीक्षा, लाड-मार आदि से पढ़ाया गया।
कि जब बचपन निकलेगा और जवानी दस्तक देगी तब हम बचपने के बहकावे में पड़कर कोई गलत कर्म ना करेंगे।
कोई गलत कर्म ना करने पर मेरे दिन जीवन के अंत तक सुख-पूर्ण होंगे।
मेरे दिन, इसी परिणाम को लेकर होने वाले संघर्ष से परेशान है।
कि कल के फ़िक्रे में अभी आज का क्या कुसूर है कि इन्हें गवाया जाए।
कल को बचाने के लिये आज बचाना है।
मेरे दिन इसी में है।

मुझे सपनो का डांसर बनना है

मैं सुरेन्द्र हूँ। इस वक़्त गाँव के टेसन पर बैठा हूँ। मेरी कमर में दर्द है और गांड फटी पड़ी है।

कल रात मैं अपनी नौकरी पर था। मैं बिल्डिंग का एक पूरा चक्कर लगाकर कुर्सी पर बैठा था। फ़ोन हाथ में था और मैं यूटूब पर सपना डांसर की नई वीडियो ढूंढ रहा था। फ़ोन पर उसकी वीडियो और फ़ोटो आ रहे थे। जितनी आई, सारी देख रखी थी। मैं जितना नीचे जाता, उतनी ज्यादा वीडियो आती। उनमे से एक पर मेरा ध्यान गया। उस पर सपना को फोटो नही थी। मैं बोर हो रहा हूँ, सोचकर उसे चलाया। फिर उसमे एक लुगाई बोली। उसने सपनो का डांसर बनने को कहा। उसने बात की कि सपनो का पीछा करना चाहिए। कुछ देर तक उसकी बात चली, फिर मैं बिल्डिंग का चक्कर लगाने को चल दिया।

नौकरी करके मैं घर पहुँचा। मैं थका हुआ था। बिजली नही थी। कपड़ो से पसीने की बदबू आ रही थी। मैंने बीड़ी चसाईं और रोटी तोड़ी। सोने को लेटा तो बार-बार वीडियो पर ध्यान जाता। सपनो का डांसर बनो। उनका पीछा करो।

मैं सो गया।

•••••

आज सुबह अजीब लग रहा था। सपनो का डांसर बनो, उनका पीछा करो। बातें मन में जम गयी थी। मेरा सपना क्या है? मुझे ना पता था। छोटी उम्र में भागना, खेलना और घूमना पसंद था। बड़ा हुआ तो बीड़ी, लड़की और घूमना पसन्द था। पिताजी की साइकिल पर पूरा गाँव घूमना, पैदल चलकर अगले गाँव जाना, जोहड़ में भैसों को घूमाना, लड़कियां घुमाने के लिए उनकी क्लास के बाहर घूमना। ये सब घूमना-घुमाना मुझे अच्छा लगता था और शायद यही मेरा सपना था।

आज मैं नौकरी की जगह टेसन गया। वहाँ मैं दिल्ली की रेल में चढ़ लिया। मुझे सपना आज ही पूरा करना था।

रेल में भीड़ थीं। डब्बे के गेट पर भी खड़ा होना मुश्किल था। डब्बे के पाखाने महक मार रहे थे। हवा उनसे होकर आती। भीड़ का पसीना भी नाक तक आता। हालत बुरी थी, पर सहनी पड़ी। दिल्ली का टेसन कब आया, मुझे पता ना चला। मैंने उतरकर कमर पकड़ ली थी। दर्द हो रहा था।

मैंने घर से चलते चाय ना पी थी, टेसन पर याद आया। चाय की तलब थी। टेसन पर एक टपरी पर गया और चाय के लिए बोला। उसने मुझे एक कप में चाय दी। कप मैंने देखा, मेरी छोटी ऊँगली से भी छोटा था। मैंने चाय का पतीला और छलनी देखी। छलनी पर चायपत्ती काली का जगह भूरी पड़ी थी और उन पर मक्खी उड़ती थी। उस चायपत्ती के ढेर में शायद मक्खी भी पड़ी थी और बाकी मक्खी अपनी साथी को ढूंढती उड़ती थी।  बाहर ऐसा ही है, ये सोचकर मैंने चाय पी। चाय का एक घूँट लेने पर पता चला, वो चाय का गर्म जूस था। जी में आया कि कुल्ला करके इस टपरी वाले के मुँह पर फेंक दूँ। मैंने ऐसा कर भी देता, पर 10 रूपए की चाय बर्बाद ना करनी थी।

मैं घर से घूमने को निकला था। चीजें देखने निकला था। दिल्ली के टेसन पर जो पहली चीज मैंने देखी, वो भीड़ थी। बस भीड़। उसमें दुनिया थी। आदमी थे, औरत थी, भिखारी थे और कुत्ते भी थे। उसमे गन्दगी भी थी। मैंने ये सब देखा पर ये चीजें मैंने गाँव में भी खूब देखी थी। पर यहाँ एक चीज अलग थी, औरतें। गाँव की लुगाई सदा ढकी रहती थी। पर यहाँ अलग था। यहाँ इनकी चमड़ी गौरी थी। और ये ढकी हुई भी ना थी। आदमी वाले कपड़े पहन रखी थी। आदमी वाले कपड़ो में उनका सब नजर आता। बाहर ऐसा ही है। मैं ये सब पूरे दिन देखता, पर मुझे दिल्ली भी घूमनी थी।

टेसन से निकलकर मैं टम्पू वाले के पास गया और उसे चिड़ियाघर जाने को बोला। वो चल दिया। उसका टम्पू बढ़िया था। मैं कमर टिकाकर बैठा ताकि कमर में दर्द ना हो। उसका टम्पू आवाज़ भी कम करता था और तेज था। सब सही था, पर हरामी ने किराये के 70 रूपए लिए। मैंने 10 रूपए की कही, पर वो ना माना। पूरे 70 रूपए लिए। पर दिल्ली बड़ा शहर है और यहाँ ऐसा ही है। टेसन वापिस पैदल जाऊंगा, ये सोचकर मैं चिड़ियाघर के अंदर गया।

मैं चिड़ियाघर में गया। चीते, शेर, हाथी, बहुत सारे जानवर थे। अब तक इनका फ़ोटो देखा था। वो सब सही थे, पर वो जाली किसलिए लगा रखी थी। बचपन में पिताजी खेतों पर कांटे वाले तार लगाते थे। रात को गाय, भैंस खेत में घुसकर फसल खाती थी। उनसे बचाने के लिए पिताजी तार लगाते थे। ये जाली भी इसलिए ही लगायी होगी ताकि शेर बाकियो को खा ना ले। पर बाकी जानवर तो फिर खुले घूमने चाहिए, बिलकुल मेरी तरह। मैं ये सब सोच रहा था। मुझे भूख भी लग रही थी। इन चिड़ियाघर वालो को यहाँ मुर्गे भी रखने चाहिए। बाकी जानवरो के खाने का हिसाब तो सही है पर कुछ यहाँ पर इंसानो का भी तो होना चाहिए।

मैं चिड़ियाघर से बाहर आ गया। मुझे भूख लगी थी। सपना पूरा करने के चक्कर में मैंने सुबह रोटी भी ना खायी थी। अब दोपहर हो आई थी। मुझे भूख जबरदस्त लग रही थी। अब मुझे कुछ खाना था। सड़क के किनारे एक ठेला था। वो छोले-भठूरे बना रहा था। एक प्लेट का दाम 40 रूपए था। मौल-करने की हिम्मत ना थी। बाहर ऐसी भूख थी। मैंने उसे एक प्लेट के लिए कह दिया।

उसने मुझे एक प्लेट में थोड़े से छोले और दो भठूरे दिए। कोने में थोडा प्याज भी था। उन छोले-भठूरो की शक्ल 40 रूपए की ना थी। भठूरे साबुन के बुलबुले जैसे थे। लगता था कि फूंक मारी तो उड़ जायेंगे और ऊपर जाकर फट जायेंगे। छोले भी ऐसे ही थे। पूरी सब्जी में बस तीन या चार छोले के दाने थे। और सारा भूरा पानी। मैं ना खाता, पर भूख लग रही थी और 40 रूपए भी बर्बाद ना करने थे।

मैंने छोले-भठूरे खाये। मैं चल दिया। मेरे पास बीड़ी भी नही थी। सपना पूरा करने के चक्कर में घर ही रह गयी थी। और अब पेट में गैस बन रही थी। मुझे बीड़ी पीनी थी। मैंने आसपास देखा। थोड़ी दूरी पर एक खोखा था। मैं खोखे पर गया और शिव के मंडल के लिए कहा। उसने   अपने सुपारी वाले दांतो के बीच से उसका रेट 8 रूपए बताया। इतना सुनना था और मुझे गुस्सा आ गया। मैं उसकी गांड तोड़ता। बेहतरीन तोड़ता। शिव का मंडल गाँव में 5 रूपए का और 512 वाला मंडल 10 का मिलता है। ये साला दिनदहाड़े लूट रहा था। मैं उसको पीटता, पर पेट में गैस बन रही थी। बाहर ऐसा ही है, सोचकर मैंने मंडल लेने के लिए रूपए निकाले। बस 50 रूपए बचे थे। सुबह सपना पूरा करने के चक्कर में मैं रूपए लेना भी भूल गया था। इसका रोना मैं रोता, पर इससे पहले मुझे बीड़ी पीनी थी।

मेरे पास रूपए कम थे। मुझे दिल्ली में और घूमना था। ये हो ना पाता, इसलिए मैं वापस टेसन की तरफ चल दिया। दोपहर में बड़ी दूर पैदल चलना पड़ा। गैस भी हो रही थी। पसीने लगातार आ रहे थे। कमर का दर्द भी वापस आ गया था। पैर उठाना मुश्किल था। किसी तरह टेसन पंहुचा।

टेसन पर पहुँचकर देखा कि 1 बज गया था। गुडगाँव वाली रेल 3 बजे आती। मैं एक बेंच पर जाकर बैठ गया। कमर में दर्द था।

3 बजे रेल आई तो उसमें चढ़ लिया। बिल्कुल सुबह वाला हाल था। भीड़ थी, पसीना था और पाखाने वाली मुँह को लगती हवा। बस कमर दर्द नया था। भीड़ में बीड़ी भी ना पी गयी। हाल गर्मी और भीड़ ने पहले ही बुरा कर दिया था, जब रेल हर एक टेसन पर रूकती तो भीड़ और ज्यादा दिमाग ख़राब करती। बाहर वाले अंदर आने को धक्का मारते और अंदर वाले बाहर जाने को धक्का मारते। इन धक्को, भीड़, पसीनें और गर्मी की वजह से गुस्सा आ रहा था। मैं एक-एक करके सबकी गांड तोड़ता, पर भीड़ में हिलना भी मुश्किल था। सोचा, बाहर ऐसा ही है।

गाँव के टेसन तक आते भीड़ कम हुई, पर सीट ना मिली। टेसन पर उतरा तो राहत मिली। 5 बज रहे थे। मेरी कमर अब और दर्द कर रही थी। पर अभी घर ना जा सकता था। घर जाता तो पिताजी डण्डा करते। मैं टेसन पर ही एक बेंच पर बैठ गया।

मैं बैठा था। सपनो का डांसर बनो और उनका पीछा करो। आज मैंने कौनसा सपना पूरा किया, मेरे समझ में ना आया। और ये घूमने का सपना मेरा कब था? मैं कौन से सपनो का डांसर बना?

मैं रात तक बैठा रहा। सपनो के डांसर ने मुझे बढ़िया चुतिया बनाया था।

आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ

आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ,
सरकार अर्जी सुने, भगवान से फरियाद करता हूँ।

जानता हूँ की चाशनी में डूबा फरेब है उनका,
हैरान हूँ हर बार किस तरह विश्वास करता हूँ।

उनके तलवे चाटकर नौकरशाही को उभरते देखा मैंने,
इस उम्मीद में रोज अपनी जीभ की सफाई करता हूँ।

मेरा ‘आम’ शब्द भी छीन लिया मुझसे पल में,
ये कैसे हुआ, सोचकर रोज हैरान होता हूँ।

लगता है मेरा रब रूठ गया मुझसे उस दिन का,
जब से मैं अपनी अर्जी सुनी जाने की फरियाद करता हूँ।

मुझे भूख लगी है

मैं भूखा हूँ। कितना वक़्त बीता, मुझे पता। तब सब काला था और कुछ नही दिखता था। अब सब दिख रहा है। मैं अब भी भूखा हूँ।

बड़े डब्बे में भी कुछ ना था। मैंने मुँह मारा था। मेरे साथी ने भी देखा था। बड़ी काली शोर वाली वही थी। उसमे खाना होता है। मैं नही गया। मैं भूखा था। मैं बैठा था। मेरा एक कोना था। मेरे पास में वे मुँह चला रहे थे। कुछ खा रहे थे। मैं देख रहा था। मैं खाने के लिए बोला। उनमे से एक उठा। मुझे खाना मिलना था। पर वो चिल्लाया। मैं भाग निकला। वो हंस रहा था।

मैं पत्थर वाली जमीन से भागा। मैं रेत पर गया। पैर गर्म होते थे। मैं कोने में गया। मैं पानी में बैठ गया। मुझे भूख लगी थी। मैं वहाँ रहा। आते-जाते वो मुझे देखते। मुझे भूख लगी थी। मैंने नहीं बोला। वो फिर चिल्लाते। मुझे भागना होता। मुझे भूख लगी थी। मैं वही रहा। मैंने आँखें बंद कर ली। मैं सो गया।

मैं उठा। मैं गली में चला। अब कुछ नही दिखता था। वे खाना दे देते थे। आज कोई नहीं था। मुझे खाना ना मिला। मुझे भूख लगी थी। मैं गली में चलता रहा। कुछ नही दीखता था।

एक जगह दीखता था। वहाँ वो थे। बहुत थे। मेरे साथी भी थे। खाना मिलेगा। मैं अंदर गया। वहाँ वो थे। मैं भूखा था। सब दिख रहा था। गली जैसा नही था। खाना भी था। गली में कोई नही था। वो यहाँ थे। यहाँ खाना था। मुझे भूख लगी थी। मैं कोने में गया। वहां खाना पड़ा था। मेरे साथी खा रहे थे। मुझे भूख लगी थी। मैंने खाना खाया। वे नही चिल्लाये। मैंने खाना नही माँगा। मैंने कोने मे खाया। गली में वो नही थे। वो यहाँ थे। वो भी खाना खाते थे। वे नही चिल्लाये। मैं अब भूखा नही था।

छुट्टियां और बचपन की फालतू यादें

छुट्टियां चल रही है। घर और कॉलेज, दोनों जगह से मुक्त हूँ। एग्जाम के दौरान छुट्टियां बिताने को लेकर बहुत बातें सोची थी। वो बातें वही तक सीमित रही। अब घर पर हूँ, तो एक-एक छुट्टी काटनी भारी हूँ। पार्क में घूमना, या पड़ोस की आंटी से मोहल्ले की खबरें जानना; वक़्त काटने को घर बस यही चीजें है। आरम्भ में घरवालों की बातों में मैं वो बेचारा लड़का था जो इम्तिहान के बाद आराम कर रहा है। अभी कुछ दिन ही बीते है। बेटा निताश लामणी करिया, माँ हर रोज रोटी के साथ सुझाव देती है। छोरे बीड़ी फैक्टरी में लग जा, बापू हुक्के से मुँह हटाने के बाद कहते है। मैं ऐसे रियेक्ट करता हूँ कि मैंने उनका कहा सुना ही ना। मैं कामचोर नही हूँ, मैं जानता हूँ। कॉलेज के एक साल में कुछ नखरे पाल लिए है, जिनको संग लेकर अब लामणी करनी या बीड़ी फैक्टरी में काम करना नामुमकिन है। ये बात माँ-बापू को समझानी मुश्किल है, और पड़ोस की आंटी को भी जो कल मुझे माँ-बाप की बात ना मानने वाले चरित्रहीन आदमी के तौर पर दूसरो को बता रही थी।

आज की शाम दोस्त के घर बीती। करने को हमने खाट पर लेटकर छत को ताडा और बकवास की। इससे बेहतर कुछ करने को भी ना था। हवा में जैसे उबाऊपन घुला था। नाक से सांस ली जाती तो मुँह से उबासी निकलती। कमरे में मच्छर थे। वो काट ना रहे थे। कान के आगे पी-पी रहे थे। शायद वे भी अलसा गए थे अपनी दिनचर्या से। पूरा दिन लोगो को काटना और उनकी तालियों से बचना। इसलिए कान के पास पी-पी कर रहे थे। मानो अपनी वाणी में याचना कर रहे थे कि अपनी ताली से हमारी जीवन-लीला समाप्त करो और इस बोरियत से बचाओ।

हम खाट पर लेटे थे। बातें समाप्त हो चुकी थी और सन्नाटा था। अचानक उसने बचपन की बातें शुरू कर दी। मेरा बचपन अच्छा था, सब मुझसे प्यार करते थे, मैं जो चाहता वो खाता था, मुझे कोई काम ना करना पड़ता था; मेरे मित्र ने इनके अलावा और भी काफी बातें कही जो मैं सुन ना पाया। मेरा मन कही और था। मैं उस वक़्त अपने बचपन को याद कर रहा था। उसका बचपन अच्छा था, उसने बताया था। मेरा बचपन मजाक था, मैंने उसे ना बताया।

मुझे बचपन का जिक्र सुनके भंडारे सबसे पहले याद आते है। शिवरात्रि का भंडारा, पीर बाबा का भंडारा; कोई भंडारा ना छोड़ता था मैं। उस वक़्त जीभ पिज़्ज़े-बर्गर और बातें टिश्यू पेपर, फिंगर-बाउल जैसे शहरी चोंचलो से अनजान थी, तो आलू की सब्जी और पूरी का स्वाद भाता था। इतना भाता था कि एक साल मैंने तीन गाँवों के भंडारे भी निपटाये थे।

गाँव के भंडारों का बंदोबस्त बड़ा आसान होता है। पंडाल लगाके दरिया बिछा दी जाती है। जनता बैठती है, तब लोग पत्तल, सब्जी, पूरी आदि का वितरण करते है। भंडारे में काफी लोग आते है, इसलिए दरियों का साफ़ होना जरुरी होता है। ये साफ़ रहे, इसलिए जूतें-चप्पलो को पहले ही निकलवा लिया जाता है।

वो जमाना हवाई चप्पलों का था। मुझे इनका वास्तविक नाम भी ना पता था। काली, सफ़ेद, नीली, भूरी, उँची एड़ी वाली; मेरे लिए सब बाटा वाली चप्पल थी। इनकी बचपन में कोई कद्र नहीं थी। घर से निकलने पर पहनी जाती और खेलते वक़्त खुद पैरो से गायब हो जाती। इनपर खेलते हुए ध्यान देना वक़्त की बर्बादी थी। कोई चप्पल पर ध्यान ना देता था, जब तक कि एक लड़का फलोटर लेकर ना आया था।

पहली बार जब उन्हें देखा, तो मन में उनकी चाह उमड़ आई थी। वो लड़का उन्हें लेकर बहुत इतरा रहा था। उसकी फलोटर को किसी ने चप्पल कहा तो उसका मुँह बन आया था। फलोटर की खासियत दिखने के लिए उसने फलोटर को अपनी कमर में मरवाया भी था। मैं देखकर हैरान हुआ था। बाटा वाली चप्पल एक बार लगने पर रुला देती थी, वही ये फलोटर का कुछ असर ही ना था। बस तभी से फलोटर पहनने की जिद पकडली थी। फलोटर पहनूंगा, ये ख्याल ही राजी करता था। घर जाकर जिद सामने रख दी, तो किसी ने ध्यान ना दिया। अगले दिन जब जिद का उग्र रूप दिखलाया, तो थप्पड़ पड़े। दो-चार दिन तक तो यही चला, पर जोर-जोर से रोता देखकर माँ का दिल पिघल आया था। पांचवे दिन मेरे भी पांवो में फलोटर थी।

मैं फलोटर पाकर बड़ा खुश था। मेरे लिए वो मेरा खजाना था। उन्हें पहनकर मैं ना भागता और खेल-कूद में भी उनपर नजर रखता। खेलकर घर आता तो नहाता बाद में, पहले उन्हें पानी से धोता था। मेरी छोटी सी दुनिया में मेरे फलोटर का बहुत ही विशेष स्थान था।

शिवरात्रि आई। मैं भण्डारे में फलोटर पहनकर गया। माँ ने खूब मना किया था, पर मैं ना माना था।

खाना खाने के पहले फलोटर बाहर उतार दिए थे। जब मैं वापस आया, तो वो गायब थे। खूब ढूंढी पर ना मिली। मैं उस वक़्त रोने लगा था। घर जाकर और ज्यादा रोया। सोचा था कि माँ दोबारा फलोटर दिला देंगी। पर अबकी बार ऐसा ना हुआ, उलट ज्यादा रोने पर कमर में कसकर बाटा वाली चप्पल और लगी। मैं रोने लगा। कुछ समय बाद बापू मनाने आये। मैंने उन्हें कहा कि माँ फलोटर मारती तो वो ना लगती और मैं इतना ना रोता।

मेरे फलोटर मेरे साथ सिर्फ सात-आठ दिन रहे। पर जाते हुए भी एक अमूल्य सबक सीखा गए। उस दिन से मैंने भंडारों में टूटी चप्पल पहनकर जाना शुरू कर दिया, जो अब तक कायम है।

और क्या करू (Aur Kya Karoon)

आज कुछ और सैनिक मारे गए
कल कुछ और मारे जायेंगे
परसो और भी ज्यादा मारे जायेंगे
हम आज कड़ी निंदा करते है
और कल भी कर देंगे।

मैं जनता हूँ
इसका एक हिस्सा हूँ
नया खून हूँ जोकि उबलता और खौलता है
मैं सोशल-नेटवर्किंग साइट्स पे निंदा कर दूंगा
बड़े-बड़े वाक्यो में तुम्हारी मौत पर शौक जताऊंगा
इससे निपटने के दस तरीके बता दूंगा
सरकार की निंदा कर दूंगा
पाकिस्तान की माँ-बहन कर दूंगा
मृतको को रिप-रिप कर दूंगा
मेरे मोहल्ले की चाय की दूकान पर
रोज शाम को बुढ़ों और जवानो की बैठक लगती है
वहां मैं बैठकर कुछ तगड़ा सा वाक्य बोलकर
अपना जोर मनवा लूँगा
मैं मोमबत्ती लेके सड़को पर निकलूंगा
मैं ए०सी० वाली दुकानों पर बैठके कॉफ़ी गटकूँगा
और अंग्रेजी में दो-चार चबड़-चबड़ कर दूंगा
मैं न्यूज़ चैनल्स पे दुनिया भर की बकचोदी सुनूंगा
और अंत में उन्हें चुतिया कहकर अपना गुस्सा व्यक्त कर दूंगा
मैं चुनावी रैलियों और सम्मेलनों में जाऊंगा
नेता कोई भाषण देगा और तुम्हारी बहादुरी का जिक्र करेगा
मैं गदगद होकर तालियां ठोकुंगा
मैं कल सुबह अपने कुत्ते और स्वयं को घुमाने निकलूंगा
कोई मिला तो हम दोनों साथ मिलकर
अपनी व्यस्तता से समय निकालकर
तुम्हारे ऊपर चर्चा जरूर करेंगे
मैं कवि भी हूँ
एक कोने में बैठकर कुछ तुकबंदी लगाउँगा
कुछ लंबी-लंबी पंक्तिया तुम पर लिख लिख दूंगा
फिर उन्हें तुम्हारे नाम पर कही छपवा दूंगा या बोलूंगा
उस पल मेरी छाती का फुलाव देखना
और सबकी तालियाँ पिटवाऊंगा
उस पल मुझे और मेरे मैं को अच्छा लगेगा
मैं तुम्हारे लिए एक स्मारक बनवाऊंगा
उसके उद्घाटन के लिए किसी चूतिये नेता को बुलाऊंगा
फिर उसकी बकैती सहन करके उसका पक्ष पाउँगा
खैर मैं बहुत कुछ कर दूँगा
तुम्हे पता नहीं है
जनता सोया हुआ शेर है
जागेगा तो फाड़ डालेगा सब कुछ।

साधों,
मैं बहुत कुछ कर दूंगा
पर मुझे आज ना पता चला
कि ये जो जवान मरते है
ये कौन होते है?
किस बिजनेसमैन या नेता के लड़के होते है
देहात या शहर
कहाँ से निकल कर आते है
क्यों करते है ये वो नौकरी
जिसमे इन्हें साफ़ पता होता है
की मौत सदा इनके साथ चलेगी
क्या चलता है इनके मन में
की बस ये चलते जाते है
किसी को इनका पता ना चलता है
क्या किया क्या करना पड़ता है
कब इनके प्राण छूट गए
एक गोली ने इन्हें एक आदमी से एक स्टेटिस्टिक्स बना दिया
भाई कौन होते है हे लोग
इनका घर परिवार ना होता क्या
कोई पत्नी प्रेमिका या बच्चे
बस चले जाते है
चले जाते है
और एक कड़ी निंदा के मोहताज रह जाते है।