मक्खी का साथ

मक्खी मुँह पर बैठी है। इसे उड़ाना नही है। इस पल सारी दुनिया मेरे खिलाफ है, इस मक्खी का साथ अच्छा है।

कहानी का फ्लेवर मुझे नही पता। तुम पता करना। मैं बात शुरू सुबह से करूँगा।

सुबह

मैं धनंजय हूँ। मैं मनीपुर का निवासी हूँ। माँ-बाप मार चुके है। मैं अकेला हूँ। अपना खुद का मैं हूँ। सब खुद करता हूँ। यह मेरा परिचय है।

मैं उठा, हगा, सफाई की, नहाया, पूजा की, खाना बनाया, खाया और तैयार होकर नौकरी की तरफ निकल चला।

मैं कंपनी पहुँचा। चंचल की बात सुनाई दी। उसकी बात रोज वाली थी।

‘फ्लाईओवर तेरे ऊपर क्यों नही पड़ा।’

यह बात उसकी रोज की है। चंचल किसी को दिखाई ना देती है। मुझे भी नही। शुरू में मुझे समझ ना आया था। थोड़ी पूछताछ की तो पता लगा यह आवाज़ मन में है। मैंने इसे चंचल नाम दिया।

मैंने इसे परे किया और काम मे लग गया।

••

दोपहर

मैं खाना खाने के लिये बैठा।

‘पनीर की सब्जी कब खायेगा।’

मैंने सुबह आलू की सब्जी बनाई थी। हफ्ते में दो-तीन बार यही बनाता हूँ। मुझे कोई आपत्ति नही, पर चंचल को है।

मैं पानी पीने गया। मटके में पानी का तापमान सामान्य था।

‘ठंडे पानी की बोतल खरीद।’

यह नई बात थी। ब्रेक खत्म होने में अभी बीस-पच्चीस मिनट थे। मैं पेड़ नीचे बैठकर पार्किंग में लगी गाड़िया देखने लगा।

‘तू कब खरीदेगा।’

यह बात भी नई थी। फिर एक पल के लिए नजर पार्किंग में लगी घास में काम करती महिला पर पड़ी।

‘ब्याह कर ले।’

यह बात भी नई थी। आज चंचल ज्यादा बोल रही थी। मैं उठकर गेट चौकीदार के पास गया। सोचा उससे बात करता।

उसके मुँह का निचला भाग तम्बाकू से भरा था। महक मेरी नाक के बाल फूंक रही थी।

‘इस हरामी के मुँह पर थप्पड़ मार।’

मैं फालतू की बात कर काम पर वापिस लौटा।

‘तेरा हाथ इस मशीन में डाल कर देख।’

मैं पेशाब करने के लिए गया। वहां पैखाने की बदबू तेज थी।

‘सूँघ। तेरे मुँह से ऐसी ही बदबू आती है।’

मैं काम पर लौटा। ऊपर पंखा चल रहा था पर पसीने फिर आ रहे थे। सामने मैनेजर अपने ऑफिस में बैठा था। उसके कमरे में ए०सी० लगा था।

‘ऑफिस में जा और सोफे पर सो जा। मैनेजर को थप्पड़ मार दे।’

मैं काम मे लगा रहा।

एक रुक्का सुना। कंपनी की मालकिन काम देखने को आई थी। वो एक-दो महीने में कभी ही आती थी। मैनेजर और बाकी अफसर अपने ऑफिस से बाहर आ खड़े हुए थे।

‘इसकी गोरी चमड़ी पर हाथ फेर दे। तेरे जीवन के सारे पाप खत्म हो जाएँगे।’

मैं वापिस काम पर लगा रहा। छुट्टी होने में डेढ़ घंटे बचे थे। सुरेश मेरे पास आकर रुपये मांगने लगा। उसे फ़ोन ठीक कराने के लिए चाहिए थे। मेरे पास बचत के रुपये थे। मैं मना करना चाहता था, पर मना ना किया गया।

‘तू इंसान है या चटाई है।’

मैंने मैनेजर को देखा। हमे काम करते देख रहा था। उसके गले मे सोने की चैन दिखी।

‘छीन कर भाग जा। तू बनवा तो सकता नही है।’

काम खत्म हुआ। पर चंचल बोलती रही।

मैं साईकल लेकर कंपनी से चल पड़ा।

•••

शाम

मैं घर आ रहा था। साईकल को लेकर पैदल चल रहा था। एक जगह ट्यूब फट गई थी। ट्यूब के रुपये सुरेश के पास थे।

मेरे साथी और अन्य बंदे मोटरसाइकिल पर जा रहे थे। चंचल अब भी चुप ना हुई थी। मुझे बार-बार नाकारा, नालायक कहे जा रही थी। मैं थका हुआ था। इसे दूर करने की शक्ति मुझमें ना थी। मैंने चुप होने को कहा, पर उसने मेरी ना सुनी। मजाक मन मे था, दुनिया हँसती लग रही थी।

मैं पैदल चलकर, साईकल घसीटता, किसी तरह घर पहुँचा। चंचल बराबर बोल रही थी।

मैंने रुपये लिए पर साईकल को घर ही छोड़ दिया। मैं ठेके की ओर निकला।

••••

रात

मक्खी मुँह पर बैठी है। चंचल बराबर बोल रही है। उसकी बातों से लगता है दुनिया मेरे खिलाफ है।

मैं कुछ करूँ, पर अभी नशे में हूँ।

रात के इस पहर, मैं हांडू चुप होया,
कोई उठ जावै, न्यु पाप ना करणा।
एक बात सिरहाने रख सोया था सावण म्ह,
इब रात नै बीते वक़्त की बात खोजूं मैं।

हैरान होवण की कोशिश करियो मित्तर मेरे,
जब बताऊँ कि किन कमियां साथ जीया गया।
बेरा भी होवै मन नै सब किमी बेशक़,
कुणसे घूंट का स्वाद कीसा था।
मेरी शिकायत हजार, अर भ्रम एक,
पैर राह भूलगे या रास्ता नया बणा दिया।

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खामखा फरियादी बने है

हम पूछ बैठे कि दुःख काहे इतना सारा है,

किधर शुरू और कहाँ ये खत्म हो,

हमने तनिक इतना पूछा।

आप उत्तर दे ना पाओ,

या आपका उतर हमे पसन्द ना आये,

बस स्मरण रहे कि हम केवल फिल्मी बातें ना दोहराए है।

कुछ बीस बरस की जिन्दगानी जिसमे,

पंद्रह या सौलह मुफ़्तख़ोरी के है,

अब जब हम यहां तक ऐसे आये,

तो क्यों आज हम निकम्मे और नालायक कहलाए।

बड़ी इमारतें, गाड़ी और इनमें बसते बड़े लोग,

क्यों ना हमें भी अपने बीच स्थान दिलवाओ।

मानते है औकात कम है और,

फकीरी का रुतबा पहले जैसा ना है,

परन्तु इंसानियत अभी भी जिंदा होनी तो चाहिए ही।

कामचोरी की दिक्कत ना है हमें,

भरपूर किस्म के दंश झेले फिरते है हम,

पर पुश्तैनी नाम हमारा इतना मजबूत ना हुआ,

कि हम उसको जोड़कर अपना दुःख बाजारू करें।

मेरे सरकारी माईबाप,

बस कदम चूमेंगे या पैर दबाएंगे,

तुम कहो तो तुम्हारे बोले को गीतापाठ समझ बोल जाएंगे,

तुम कहो तो हम पानी समझ तेजाब पी जाएंगे,

केवल सरकारी नौकरी दे देना।

दरअसल मुद्दा यह है कि तंगी केवल रुपयों की ही ना है,

पर रिश्तेदारों और अजीज जानकारों के बीच इज्जत की भी है।

सब कामचोर समझते है।

तुम्हारी कृपा होगी तो इज्जत भतेरी होगी।

दुःख झेलना हमारा रोज का कार्य है,

कहो कि आदत हुई है अब यह,

बस ये इज्जत का मामला रुलाता है।

दुःख रोज मिले पर रिश्तेदार साल में एक बार,

तो उनकी हँसी हमें तीखा कुरेदती है।

अंत करे तो अब किस्मत को कहते है,

कि क्यों हमसे रूठी हुई हो।

क्यों हमारे मन मुताबिक ना बनती है।

कहो तो मनाने के लिए व्रत करे या उपवास।

बल्कि यह बात तो हम संसार से कहेंगे,

कि क्या उपाय करें कि तुम अपनी विशालता का एक हिस्सा या एक कोना,

हमारे साथ बाँटो।

हम जुगाड़ी बंधु है सारे।

कमी पड़ने पर सब मिलजुल हिसाब बैठा लेते है।

तुम्हारा कोना अगर हमारे पैरो को छोटा भी पड़े,

तो घुटनो के बल भी हम किसी तरह,

उसमे चले जायेंगे और खुश रहेंगे।

उस पल का एक कष्टदायक सुख,

हमारे वर्तमान की तुलना में बेहतर ही होगा।

तो अब बताओ कि कब यह सब हो रहा है,

हुक्म करो तो पंडित से मुहूर्त निकलवाए,

कोई कमी पड़े तो फौरन बताओ,

हम अभी जुगाड़ बैठाए।

हम अभी जुगाड़ बैठाए।

बस इन दुःखो का टिकाऊ इलाज कर दो,

फिर हम भी चैन-सुख से सो जाएं।

सफेद रंग की चीजें अब लाल होती है

सफेद रंग की चीजें अब लाल होती है,
मेरे देस में मरे बाद क्रांति होती है।

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मेरे दिनों का पता

तुम्हे मेरे दिनों का पता है,
ये सारे एक उतावलेपन से पीड़ित है।
ये उतावलापन है इनके रोज की दिनचर्या से बच निकलने का।
इस बच निकलने या बचाने के धारावाहिक में कोई प्रेम या अन्य पात्र नही है।
सब कुछ एक परम्परा है इस जवानी की।
कि इस उम्र में जीवन की चल रही हकीकत से हमे छुटकारा चाहिए।
चाहे वो क्षणिक ही क्यों ना हो।
हम उसे पाकर रहेंगे और हम पाए बिना ना रुकेंगे।
ये बच निकलने की प्रवृति अंदर से उपजती है कि रोज के समान्यपन को छलकाया जाए।
पैर इतने जोर से जमीन पर टिकाये जाए की उनका जोश जमीन की स्थिरता को विचलित करे।
इस उम्मीद में कि स्थिरता में जमे हुए कुछ या कोई तो जगेगा ही।
वो आएगा और हमारे साथ खड़ा होगा इस संघर्ष में जोे जिंदगी की रोजमर्रा के खेल के खिलाफ है।
ये खेल जिसे खेलने के लिए हमे बचपन से शिक्षा, दीक्षा, लाड-मार आदि से पढ़ाया गया।
कि जब बचपन निकलेगा और जवानी दस्तक देगी तब हम बचपने के बहकावे में पड़कर कोई गलत कर्म ना करेंगे।
कोई गलत कर्म ना करने पर मेरे दिन जीवन के अंत तक सुख-पूर्ण होंगे।
मेरे दिन, इसी परिणाम को लेकर होने वाले संघर्ष से परेशान है।
कि कल के फ़िक्रे में अभी आज का क्या कुसूर है कि इन्हें गवाया जाए।
कल को बचाने के लिये आज बचाना है।
मेरे दिन इसी में है।

मुझे सपनो का डांसर बनना है

मैं सुरेन्द्र हूँ। इस वक़्त गाँव के टेसन पर बैठा हूँ। मेरी कमर में दर्द है और गांड फटी पड़ी है।

कल रात मैं अपनी नौकरी पर था। मैं बिल्डिंग का एक पूरा चक्कर लगाकर कुर्सी पर बैठा था। फ़ोन हाथ में था और मैं यूटूब पर सपना डांसर की नई वीडियो ढूंढ रहा था। फ़ोन पर उसकी वीडियो और फ़ोटो आ रहे थे। जितनी आई, सारी देख रखी थी। मैं जितना नीचे जाता, उतनी ज्यादा वीडियो आती। उनमे से एक पर मेरा ध्यान गया। उस पर सपना को फोटो नही थी। मैं बोर हो रहा हूँ, सोचकर उसे चलाया। फिर उसमे एक लुगाई बोली। उसने सपनो का डांसर बनने को कहा। उसने बात की कि सपनो का पीछा करना चाहिए। कुछ देर तक उसकी बात चली, फिर मैं बिल्डिंग का चक्कर लगाने को चल दिया।

नौकरी करके मैं घर पहुँचा। मैं थका हुआ था। बिजली नही थी। कपड़ो से पसीने की बदबू आ रही थी। मैंने बीड़ी चसाईं और रोटी तोड़ी। सोने को लेटा तो बार-बार वीडियो पर ध्यान जाता। सपनो का डांसर बनो। उनका पीछा करो।

मैं सो गया।

•••••

आज सुबह अजीब लग रहा था। सपनो का डांसर बनो, उनका पीछा करो। बातें मन में जम गयी थी। मेरा सपना क्या है? मुझे ना पता था। छोटी उम्र में भागना, खेलना और घूमना पसंद था। बड़ा हुआ तो बीड़ी, लड़की और घूमना पसन्द था। पिताजी की साइकिल पर पूरा गाँव घूमना, पैदल चलकर अगले गाँव जाना, जोहड़ में भैसों को घूमाना, लड़कियां घुमाने के लिए उनकी क्लास के बाहर घूमना। ये सब घूमना-घुमाना मुझे अच्छा लगता था और शायद यही मेरा सपना था।

आज मैं नौकरी की जगह टेसन गया। वहाँ मैं दिल्ली की रेल में चढ़ लिया। मुझे सपना आज ही पूरा करना था।

रेल में भीड़ थीं। डब्बे के गेट पर भी खड़ा होना मुश्किल था। डब्बे के पाखाने महक मार रहे थे। हवा उनसे होकर आती। भीड़ का पसीना भी नाक तक आता। हालत बुरी थी, पर सहनी पड़ी। दिल्ली का टेसन कब आया, मुझे पता ना चला। मैंने उतरकर कमर पकड़ ली थी। दर्द हो रहा था।

मैंने घर से चलते चाय ना पी थी, टेसन पर याद आया। चाय की तलब थी। टेसन पर एक टपरी पर गया और चाय के लिए बोला। उसने मुझे एक कप में चाय दी। कप मैंने देखा, मेरी छोटी ऊँगली से भी छोटा था। मैंने चाय का पतीला और छलनी देखी। छलनी पर चायपत्ती काली का जगह भूरी पड़ी थी और उन पर मक्खी उड़ती थी। उस चायपत्ती के ढेर में शायद मक्खी भी पड़ी थी और बाकी मक्खी अपनी साथी को ढूंढती उड़ती थी।  बाहर ऐसा ही है, ये सोचकर मैंने चाय पी। चाय का एक घूँट लेने पर पता चला, वो चाय का गर्म जूस था। जी में आया कि कुल्ला करके इस टपरी वाले के मुँह पर फेंक दूँ। मैंने ऐसा कर भी देता, पर 10 रूपए की चाय बर्बाद ना करनी थी।

मैं घर से घूमने को निकला था। चीजें देखने निकला था। दिल्ली के टेसन पर जो पहली चीज मैंने देखी, वो भीड़ थी। बस भीड़। उसमें दुनिया थी। आदमी थे, औरत थी, भिखारी थे और कुत्ते भी थे। उसमे गन्दगी भी थी। मैंने ये सब देखा पर ये चीजें मैंने गाँव में भी खूब देखी थी। पर यहाँ एक चीज अलग थी, औरतें। गाँव की लुगाई सदा ढकी रहती थी। पर यहाँ अलग था। यहाँ इनकी चमड़ी गौरी थी। और ये ढकी हुई भी ना थी। आदमी वाले कपड़े पहन रखी थी। आदमी वाले कपड़ो में उनका सब नजर आता। बाहर ऐसा ही है। मैं ये सब पूरे दिन देखता, पर मुझे दिल्ली भी घूमनी थी।

टेसन से निकलकर मैं टम्पू वाले के पास गया और उसे चिड़ियाघर जाने को बोला। वो चल दिया। उसका टम्पू बढ़िया था। मैं कमर टिकाकर बैठा ताकि कमर में दर्द ना हो। उसका टम्पू आवाज़ भी कम करता था और तेज था। सब सही था, पर हरामी ने किराये के 70 रूपए लिए। मैंने 10 रूपए की कही, पर वो ना माना। पूरे 70 रूपए लिए। पर दिल्ली बड़ा शहर है और यहाँ ऐसा ही है। टेसन वापिस पैदल जाऊंगा, ये सोचकर मैं चिड़ियाघर के अंदर गया।

मैं चिड़ियाघर में गया। चीते, शेर, हाथी, बहुत सारे जानवर थे। अब तक इनका फ़ोटो देखा था। वो सब सही थे, पर वो जाली किसलिए लगा रखी थी। बचपन में पिताजी खेतों पर कांटे वाले तार लगाते थे। रात को गाय, भैंस खेत में घुसकर फसल खाती थी। उनसे बचाने के लिए पिताजी तार लगाते थे। ये जाली भी इसलिए ही लगायी होगी ताकि शेर बाकियो को खा ना ले। पर बाकी जानवर तो फिर खुले घूमने चाहिए, बिलकुल मेरी तरह। मैं ये सब सोच रहा था। मुझे भूख भी लग रही थी। इन चिड़ियाघर वालो को यहाँ मुर्गे भी रखने चाहिए। बाकी जानवरो के खाने का हिसाब तो सही है पर कुछ यहाँ पर इंसानो का भी तो होना चाहिए।

मैं चिड़ियाघर से बाहर आ गया। मुझे भूख लगी थी। सपना पूरा करने के चक्कर में मैंने सुबह रोटी भी ना खायी थी। अब दोपहर हो आई थी। मुझे भूख जबरदस्त लग रही थी। अब मुझे कुछ खाना था। सड़क के किनारे एक ठेला था। वो छोले-भठूरे बना रहा था। एक प्लेट का दाम 40 रूपए था। मौल-करने की हिम्मत ना थी। बाहर ऐसी भूख थी। मैंने उसे एक प्लेट के लिए कह दिया।

उसने मुझे एक प्लेट में थोड़े से छोले और दो भठूरे दिए। कोने में थोडा प्याज भी था। उन छोले-भठूरो की शक्ल 40 रूपए की ना थी। भठूरे साबुन के बुलबुले जैसे थे। लगता था कि फूंक मारी तो उड़ जायेंगे और ऊपर जाकर फट जायेंगे। छोले भी ऐसे ही थे। पूरी सब्जी में बस तीन या चार छोले के दाने थे। और सारा भूरा पानी। मैं ना खाता, पर भूख लग रही थी और 40 रूपए भी बर्बाद ना करने थे।

मैंने छोले-भठूरे खाये। मैं चल दिया। मेरे पास बीड़ी भी नही थी। सपना पूरा करने के चक्कर में घर ही रह गयी थी। और अब पेट में गैस बन रही थी। मुझे बीड़ी पीनी थी। मैंने आसपास देखा। थोड़ी दूरी पर एक खोखा था। मैं खोखे पर गया और शिव के मंडल के लिए कहा। उसने   अपने सुपारी वाले दांतो के बीच से उसका रेट 8 रूपए बताया। इतना सुनना था और मुझे गुस्सा आ गया। मैं उसकी गांड तोड़ता। बेहतरीन तोड़ता। शिव का मंडल गाँव में 5 रूपए का और 512 वाला मंडल 10 का मिलता है। ये साला दिनदहाड़े लूट रहा था। मैं उसको पीटता, पर पेट में गैस बन रही थी। बाहर ऐसा ही है, सोचकर मैंने मंडल लेने के लिए रूपए निकाले। बस 50 रूपए बचे थे। सुबह सपना पूरा करने के चक्कर में मैं रूपए लेना भी भूल गया था। इसका रोना मैं रोता, पर इससे पहले मुझे बीड़ी पीनी थी।

मेरे पास रूपए कम थे। मुझे दिल्ली में और घूमना था। ये हो ना पाता, इसलिए मैं वापस टेसन की तरफ चल दिया। दोपहर में बड़ी दूर पैदल चलना पड़ा। गैस भी हो रही थी। पसीने लगातार आ रहे थे। कमर का दर्द भी वापस आ गया था। पैर उठाना मुश्किल था। किसी तरह टेसन पंहुचा।

टेसन पर पहुँचकर देखा कि 1 बज गया था। गुडगाँव वाली रेल 3 बजे आती। मैं एक बेंच पर जाकर बैठ गया। कमर में दर्द था।

3 बजे रेल आई तो उसमें चढ़ लिया। बिल्कुल सुबह वाला हाल था। भीड़ थी, पसीना था और पाखाने वाली मुँह को लगती हवा। बस कमर दर्द नया था। भीड़ में बीड़ी भी ना पी गयी। हाल गर्मी और भीड़ ने पहले ही बुरा कर दिया था, जब रेल हर एक टेसन पर रूकती तो भीड़ और ज्यादा दिमाग ख़राब करती। बाहर वाले अंदर आने को धक्का मारते और अंदर वाले बाहर जाने को धक्का मारते। इन धक्को, भीड़, पसीनें और गर्मी की वजह से गुस्सा आ रहा था। मैं एक-एक करके सबकी गांड तोड़ता, पर भीड़ में हिलना भी मुश्किल था। सोचा, बाहर ऐसा ही है।

गाँव के टेसन तक आते भीड़ कम हुई, पर सीट ना मिली। टेसन पर उतरा तो राहत मिली। 5 बज रहे थे। मेरी कमर अब और दर्द कर रही थी। पर अभी घर ना जा सकता था। घर जाता तो पिताजी डण्डा करते। मैं टेसन पर ही एक बेंच पर बैठ गया।

मैं बैठा था। सपनो का डांसर बनो और उनका पीछा करो। आज मैंने कौनसा सपना पूरा किया, मेरे समझ में ना आया। और ये घूमने का सपना मेरा कब था? मैं कौन से सपनो का डांसर बना?

मैं रात तक बैठा रहा। सपनो के डांसर ने मुझे बढ़िया चुतिया बनाया था।

आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ

आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ,
सरकार अर्जी सुने, भगवान से फरियाद करता हूँ।

जानता हूँ की चाशनी में डूबा फरेब है उनका,
हैरान हूँ हर बार किस तरह विश्वास करता हूँ।

उनके तलवे चाटकर नौकरशाही को उभरते देखा मैंने,
इस उम्मीद में रोज अपनी जीभ की सफाई करता हूँ।

मेरा ‘आम’ शब्द भी छीन लिया मुझसे पल में,
ये कैसे हुआ, सोचकर रोज हैरान होता हूँ।

लगता है मेरा रब रूठ गया मुझसे उस दिन का,
जब से मैं अपनी अर्जी सुनी जाने की फरियाद करता हूँ।

मुझे भूख लगी है

मैं भूखा हूँ। कितना वक़्त बीता, मुझे पता। तब सब काला था और कुछ नही दिखता था। अब सब दिख रहा है। मैं अब भी भूखा हूँ।

बड़े डब्बे में भी कुछ ना था। मैंने मुँह मारा था। मेरे साथी ने भी देखा था। बड़ी काली शोर वाली वही थी। उसमे खाना होता है। मैं नही गया। मैं भूखा था। मैं बैठा था। मेरा एक कोना था। मेरे पास में वे मुँह चला रहे थे। कुछ खा रहे थे। मैं देख रहा था। मैं खाने के लिए बोला। उनमे से एक उठा। मुझे खाना मिलना था। पर वो चिल्लाया। मैं भाग निकला। वो हंस रहा था।

मैं पत्थर वाली जमीन से भागा। मैं रेत पर गया। पैर गर्म होते थे। मैं कोने में गया। मैं पानी में बैठ गया। मुझे भूख लगी थी। मैं वहाँ रहा। आते-जाते वो मुझे देखते। मुझे भूख लगी थी। मैंने नहीं बोला। वो फिर चिल्लाते। मुझे भागना होता। मुझे भूख लगी थी। मैं वही रहा। मैंने आँखें बंद कर ली। मैं सो गया।

मैं उठा। मैं गली में चला। अब कुछ नही दिखता था। वे खाना दे देते थे। आज कोई नहीं था। मुझे खाना ना मिला। मुझे भूख लगी थी। मैं गली में चलता रहा। कुछ नही दीखता था।

एक जगह दीखता था। वहाँ वो थे। बहुत थे। मेरे साथी भी थे। खाना मिलेगा। मैं अंदर गया। वहाँ वो थे। मैं भूखा था। सब दिख रहा था। गली जैसा नही था। खाना भी था। गली में कोई नही था। वो यहाँ थे। यहाँ खाना था। मुझे भूख लगी थी। मैं कोने में गया। वहां खाना पड़ा था। मेरे साथी खा रहे थे। मुझे भूख लगी थी। मैंने खाना खाया। वे नही चिल्लाये। मैंने खाना नही माँगा। मैंने कोने मे खाया। गली में वो नही थे। वो यहाँ थे। वो भी खाना खाते थे। वे नही चिल्लाये। मैं अब भूखा नही था।