मैं धरती ग्रह होता और मौज लेता

रात ठंडी है। शांत है। तन को भाती है। दिन इसके विपरीत था।

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मुझे पता ना था। सवेरे उठकर अपने नित्य-क्रिया में मगन था। सुबह अच्छी लग रही थी। हौले-हौले हवा भी चल रही थी और बिजली भी बराबर आ रही थी। आज क्या करुँ, इससे पहले कि मैं विचार छेड़ता कॉलेज से एक बन्दे का फ़ोन आया। सोचा की छुट्टियों में कुशल-क्षेम पूछने के लिए किया होगा, पर इसमें बुलावा था। कॉलेज जाना था। निताश तुझे फ़ोन ना उठाना चाहिए था, सोचा। पर सोचने और करने में सदैव एक अंतर रहा है।

एक घण्टे बाद कॉलेज पहुँचा। दूर से देखा तो पाया कि बच्चे झुण्ड में घूम रहे थे। थोडा समीप गया तो देखा कि कुछ ढूंढ़ रहे थे। बिल्कुल समीप गया तो वो कूड़ा उठा रहे थे। निताश वापस हो ले बेटा, उस वक़्त ये एक ही ख्याल था। मैं अमल करता, इससे पहले गुरूजी ने देख लिया। मैं अपनी नजरो में निहायती बेशर्म हूँ, वहाँ से मुड़कर भाग जाता और ऐसा भागता कि कोई पकड़ ना पाता। पर सोचने और करने में सदैव अंतर रहा है।

मैं झुंड में घुलने-मिलने की कोशिश कर रहा था। लड़कियां अलग दिशा में थी, तो लड़के अलग दिशा में थे। उनके पास जाने का मौका देखा, पर बाकी लड़के भी पूरे हरामी थे। मैं एक कदम लेता कि हरामी कुछ काम पकड़ा देते। निताश झाड़ू ले ले, निताश इसे फेंक दे, निताश बियर की बोतल कूड़ेदान में मत डाल, निताश पानी ले आ; टुच्चे कामों में हरामियों ने लगाये रखा। गुस्सा कम, पर रहा, जब तक कि गुरूजी ने हमें इमारतों का चक्कर लगाने को भेजा।

कॉलेज में अभी एग्जाम सम्पन्न हुए थे। एग्जाम में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली उपयोगी चीज, पर्ची, जमीन पर पड़ी थी। दूर से एक नजर डाली, बिल्कुल भोली सी लग रही थी। वो सफ़ेद कागज़ का एक टुकड़ा बेफिक्री के साथ घास और पेड़ो के नीचे पड़ा था। लगता ही नही था इन कागज़ के टुकड़ो में वो जहर है जो टीचर्स और फ्लाइंग वालों को कतई अच्छा नही लगता है। उसने आसपास में घुलने-मिलने की भी कोशिश शुरू कर दी थी। जीरो फोटोकॉपी, हस्तलिखित, किताबों के अंश; सभी प्रकार की पर्चियाँ गलने लग रही थी। उनको उठाना बुरा लग रहा था। उठाने का फ़ायदा भी क्या, पर्चियाँ सड़-गल कर मिट्टी का अंश बनेगी और खाद बन जायेगी। और कागज़ बनता भी तो पेड़ से है। जीवन-मृत्यु का चक्र पूरा होते अगर किसी को अपने जन्मदाता तक ले आये, तो इससे बड़ा पुण्य क्या हो सकता है। इसलिये उनको उठाते अच्छा ना लग रहा था। दूसरा कारण ये भी कि दूसरो का फैलाया कूड़ा उठाने में मुझे रूचि ना थी। मेरा इतना महान व्यक्तित्व ना है कि मैं दूसरो के हित में काम करुँ। ये तो कहने वाले कारण, असली वजह तो ये थी कि मैं लड़कियों से दूर था।

आधे घण्टे बाद इसका अंत हुआ। गुरूजी ने बताया कि आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इसलिए आज हमने कूड़ा उठाया। इससे पर्यावरण कैसे बचा, मुझे ना पता। सब ढकोसलेबाजी लगी। गुरूजी को प्रिंसिपल ने आर्डर दिया होगा। प्रिंसिपल को यूनिवर्सिटी वालो ने आर्डर दिया होगा। यूनिवर्सिटी वालो के पीछे मंत्री महकमा के सेक्रेटरी ने आर्डर दिया होगा। उनको भी आर्डर उनके पिताजी ने दिया होगा। इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी हम थे। सब आर्डर-आर्डर खेल रहे थे, और हम पर आकर खेल खत्म हुआ।

किसी को है पर्यावरण की चिंता? मुझे तो नही है। मुझे सहेली चाहिये और एक सरकारी नौकरी। फिर साल-दर-साल जिंदगी के शौक पूरे करते करते बुढ़ापे में एक-दो पेड़ लगा कर पर्यावरण बचाने की फॉर्मेलिटी भी निभा लूंगा।

कई बार खाली वक़्त में इस ग्रह के बारे सोचता हूँ और जॉर्ज कार्लिन साब का कथन याद आता है, “धरती यही रहेगी, हम यहाँ से चले जायेंगे।” सत्य लगती है ये बात, खुद आदमी ने पर्यावरण की ऐसी-तैसी कि और जब पता लगा कि रहने को और कोई स्थान ना है, तब वो इसे बचाने के ढोंग रचाने चला। वो पर्यावरण को ना बचाता है, वरन खुद को। और बुजदिल इंसान अपने इस कार्य को धरती बचाने के नाम की चादर उढ़ा देता है।

मैं अगर धरती ग्रह होता, तो आदमी ना होता। ढकोसलो से परे होता।

मैं धरती ग्रह होता और मौज लेता

रात ठंडी है। शांत है। तन को भाती है। दिन इसके विपरीत था।

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मुझे पता ना था। सवेरे उठकर अपने नित्य-क्रिया में मगन था। सुबह अच्छी लग रही थी। हौले-हौले हवा भी चल रही थी और बिजली भी बराबर आ रही थी। आज क्या करुँ, इससे पहले कि मैं विचार छेड़ता कॉलेज से एक बन्दे का फ़ोन आया। सोचा की छुट्टियों में कुशल-क्षेम पूछने के लिए किया होगा, पर इसमें बुलावा था। कॉलेज जाना था। निताश तुझे फ़ोन ना उठाना चाहिए था, सोचा। पर सोचने और करने में सदैव एक अंतर रहा है।

एक घण्टे बाद कॉलेज पहुँचा। दूर से देखा तो पाया कि बच्चे झुण्ड में घूम रहे थे। थोडा समीप गया तो देखा कि कुछ ढूंढ़ रहे थे। बिल्कुल समीप गया तो वो कूड़ा उठा रहे थे। निताश वापस हो ले बेटा, उस वक़्त ये एक ही ख्याल था। मैं अमल करता, इससे पहले गुरूजी ने देख लिया। मैं अपनी नजरो में निहायती बेशर्म हूँ, वहाँ से मुड़कर भाग जाता और ऐसा भागता कि कोई पकड़ ना पाता। पर सोचने और करने में सदैव अंतर रहा है।

मैं झुंड में घुलने-मिलने की कोशिश कर रहा था। लड़कियां अलग दिशा में थी, तो लड़के अलग दिशा में थे। उनके पास जाने का मौका देखा, पर बाकी लड़के भी पूरे हरामी थे। मैं एक कदम लेता कि हरामी कुछ काम पकड़ा देते। निताश झाड़ू ले ले, निताश इसे फेंक दे, निताश बियर की बोतल कूड़ेदान में मत डाल, निताश पानी ले आ; टुच्चे कामों में हरामियों ने लगाये रखा। गुस्सा कम, पर रहा, जब तक कि गुरूजी ने हमें इमारतों का चक्कर लगाने को भेजा।

कॉलेज में अभी एग्जाम सम्पन्न हुए थे। एग्जाम में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली उपयोगी चीज, पर्ची, जमीन पर पड़ी थी। दूर से एक नजर डाली, बिल्कुल भोली सी लग रही थी। वो सफ़ेद कागज़ का एक टुकड़ा बेफिक्री के साथ घास और पेड़ो के नीचे पड़ा था। लगता ही नही था इन कागज़ के टुकड़ो में वो जहर है जो टीचर्स और फ्लाइंग वालों को कतई अच्छा नही लगता है। उसने आसपास में घुलने-मिलने की भी कोशिश शुरू कर दी थी। जीरो फोटोकॉपी, हस्तलिखित, किताबों के अंश; सभी प्रकार की पर्चियाँ गलने लग रही थी। उनको उठाना बुरा लग रहा था। उठाने का फ़ायदा भी क्या, पर्चियाँ सड़-गल कर मिट्टी का अंश बनेगी और खाद बन जायेगी। और कागज़ बनता भी तो पेड़ से है। जीवन-मृत्यु का चक्र पूरा होते अगर किसी को अपने जन्मदाता तक ले आये, तो इससे बड़ा पुण्य क्या हो सकता है। इसलिये उनको उठाते अच्छा ना लग रहा था। दूसरा कारण ये भी कि दूसरो का फैलाया कूड़ा उठाने में मुझे रूचि ना थी। मेरा इतना महान व्यक्तित्व ना है कि मैं दूसरो के हित में काम करुँ। ये तो कहने वाले कारण, असली वजह तो ये थी कि मैं लड़कियों से दूर था।

आधे घण्टे बाद इसका अंत हुआ। गुरूजी ने बताया कि आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इसलिए आज हमने कूड़ा उठाया। इससे पर्यावरण कैसे बचा, मुझे ना पता। सब ढकोसलेबाजी लगी। गुरूजी को प्रिंसिपल ने आर्डर दिया होगा। प्रिंसिपल को यूनिवर्सिटी वालो ने आर्डर दिया होगा। यूनिवर्सिटी वालो के पीछे मंत्री महकमा के सेक्रेटरी ने आर्डर दिया होगा। उनको भी आर्डर उनके पिताजी ने दिया होगा। इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी हम थे। सब आर्डर-आर्डर खेल रहे थे, और हम पर आकर खेल खत्म हुआ।

किसी को है पर्यावरण की चिंता? मुझे तो नही है। मुझे सहेली चाहिये और एक सरकारी नौकरी। फिर साल-दर-साल जिंदगी के शौक पूरे करते करते बुढ़ापे में एक-दो पेड़ लगा कर पर्यावरण बचाने की फॉर्मेलिटी भी निभा लूंगा।

कई बार खाली वक़्त में इस ग्रह के बारे सोचता हूँ और जॉर्ज कार्लिन साब का कथन याद आता है, “धरती यही रहेगी, हम यहाँ से चले जायेंगे।” सत्य लगती है ये बात, खुद आदमी ने पर्यावरण की ऐसी-तैसी कि और जब पता लगा कि रहने को और कोई स्थान ना है, तब वो इसे बचाने के ढोंग रचाने चला। वो पर्यावरण को ना बचाता है, वरन खुद को। और बुजदिल इंसान अपने इस कार्य को धरती बचाने के नाम की चादर उढ़ा देता है।

मैं अगर धरती ग्रह होता, तो आदमी ना होता। ढकोसलो से परे होता।

दिल टूटा और पूरी गली में आवाज़ उठी

बिलकुल अभी जागा हूँ। नींद गहरी भी नही हुई थी, कि अचानक हुए शोर ने उठा दिया। उठकर घर से बाहर आया तो देखा कि मैं अकेला ना था। सब अपने घर के बाहर थे। खुसर-पुसर चल रही थी। इनके बीच, वो शोर जोर-जोर से रोने की आवाज़ में तब्दील हो गया था।

मुझे ये जानने में रूचि ना थी कि इतना रोया क्यों जा रहा है या फिर सब अपने घर के बाहर क्यों है। दूसरो की खोज-खबर क्या रखता जब मेरी खुद की दुनिया ख़त्म हो रही थी। सोने से पहले एक दोस्त ने बताया था कि मेरे क्रश की शादी की तैयारी शुरू हो चुकी थी। उसके घरवालों ने उसका रिश्ता तय कर दिया था। ये सुनकर पहले तो अपने दोस्त को कोसा कि उसकी जुबान काली है, फिर उसके घरवालों को कोसा और अंत में दुनिया को बुरा-बुरा कहा। मुझे गुस्सा आ रहा था अपने आप पर और उसके घरवालों पर। उसके माँ-बाप अव्वल दर्जे के कंजर लग रहे थे। उसकी उम्र कोई 19 बरस भी मुश्किल होगी, कि शादी का प्लान बना दिया। जैसे कि वो बूढी गाय हो चली थी जो अब दूसरे के गले डालनी थी। मेरे प्यार का परिंदा उड़ा भी ना था, इससे पहले उसके किसी ने पर काट दिए थे। मैं असहाय था, बिल्कुल शोले के ठाकुर की तरह। चित्त में आया था कि गाँव की पानी की टंकी पर चढ़कर उसे माँगू। फिर याद आया कि गाँव में कोई पानी की टंकी नही है और ऐसी गर्मी में कोई अपने ए०सी० वाले कमरो से ना निकलेगा। ऊपर पंखा अपनी चाल चल रहा था, नीचे मैं बेहाल हो रहा था। कुछ बस में ना था। अंत में झक मारकर सो गया।

*****

जनता खुसर-पुसर कर रही थी। एक से पूछा तो पता लगा कि अगली गली में कनखू मर गया था। उसी के परिवार वाले रुदन कर रहे थे।

रविवार का दिन है। छुट्टी है। सब फुरसत में है। सब को आज ही मरना है, रोना है, रिश्ता तय करना है, दिल तोडना है और मुझे कड़वाहट का एहसास दिलाना है। कहते भी है कि फुरसत का काम इंसान का और जल्दबाज़ी का काम शैतान का।

कनखू की बात करुँ तो उससे जीवन में बात कम, पर उसके बारे में बात बहुत सुनी। वो देसी दारू का मग्गा मारके पांच  खेतो को भी एक बार में जोत देने के लिए मशहूर था। लोग तो यहाँ तक कहते थे कि वो पूरा मग्गा एक सांस में गटक जाता है। लोगो की बातें कितनी सच और कितनी झूठ, ये तो शायद उन्हें भी ना पता हो। खुद की बात करू तो आखरी बार उसे रेल स्टेशन के नजदीक देखा था। एक पेड़ तले पड़ा था। मुँह पर मक्खियां भिनभिना रही थी। पैरो में चप्पल ना थी। कपड़े तार-तार थे। बालों में रेत भरा पड़ा था। शायद अफवाह थोड़ी सच थी, और वो मग्गा मारके पड़ा था। थोड़ी दूर निकल जाने के बाद मुड़कर नजर डाली तो मक्खियां नजर से ओझल थी और उसकी बद-हालत छुप सी गयी थी। पेड़ के नीचे मानो आराम वाली नींद सो रहा था। बस वो दिन और आज का दिन, वो सो ही रहा है। बस उस वक़्त उसके आसपास भीड़ ना थी, मक्खियां थी।

बचपन में मैं और उसका लड़का, हम दोनों साथ खेलते थे। कंचा, गली वाली बैट-बॉल, पिट्ठू-गिंडी; बहुत खेल खेले थे हमने। मशहूर चलन है कि दारु वाले घर में क्लेश रहता है। सब इससे पीड़ित रहते है चाहे वो माँ-पिता हो या बच्चे। अब इस बात को ध्यान करुँ और पीछे का वाकया टटोलूँ तो पाता हूँ कि ऐसा कुछ ना था। वो मुझसे ज्यादा मोटा था। भागता भी मुझसे तेज था। पढाई का पता ना, मुझसे पीछे था दर्जे में। और कुछ ध्यान ना, बड़े होते हमारे मित्तर और वक़्त बिताने के साधन बदल चुके थे। पर जब भी उसे देखा, दूर से मौज में पाया।

अब मुझे उसके ऊपर रुदन बुरा लगता है। कानों में इसका स्वर घुसे आता है। लोगो और दुनिया पर फिर गुस्सा आता है। दोगलेपन की भी हद होती है। जब जिन्दा था तब किसी से ना सुध ना ली थी। सब बिजी थे। उलझे हुए थे जिंदगी में। अब मरणोपरांत क्या दिखा रहे है, खुद जाने।

*****

शाम हो आई है। अब किसी की आवाज़ ना आती है। बस पंखे की चर्र-चर्र सुनाई देती है।

मैं अभी भी गुस्से में हूँ। ये क्षणिक आवेश है, जानता हूँ वक़्त के साथ निकल जायेगा। दिन की गर्मी कुछ भारी भी लगने लगी है। विचार बिजली की तरह आ-जा रहे है। कभी उस पर, खुद पर, तो दुनिया पर गुस्सा आता है। उस पर गुस्सा जायज़ नही है। वो मेरे ख्यालो से अनभिज्ञ है। उसे मेरे वजूद का भी ख्याल ना होगा। गलती उसकी नही है, पर फिर भी मेरे क्रोध की भागी है। कम उम्र में ब्याह जरूर उसकी मर्जी के खिलाफ हो रहा होगा। बेचारी के सारे स्वपन टूटकर बिखर गए होंगें। अपने विवाह और अपने  माँ-पिता के बीच कैसे अपने आपको समेटती होगी वो। बिल्कुल गौ जैसी निरीह है, चुप रहेगी पर अपनी व्यथा ना कहेगी। इन सबके बावजूद क्रोध है। दुनिया पर यूँ है कि सब इसका छलावा है। सामाजिक बन्धनों को खोल दे तो मनुष्य एक-दूसरे को ख़त्म कर दे। पर फिर भी इस छलावे के सब बराबर भागीदार है। मैं, वो और सब इंसान। सब इसमें एक साथ है।

मेरे क्रोध का कोई कारण नही है। उसके विवाह का मेरे लिए कोई कारण नहीं है। दुनिया के चलने का भी कोई कारण नहीं है।

बिना किसी कारण के इस छलावे से मुक्ति, शायद मृत्यु का यही कारण है।

दिल टूटा और पूरी गली में आवाज़ उठी

बिलकुल अभी जागा हूँ। नींद गहरी भी नही हुई थी, कि अचानक हुए शोर ने उठा दिया। उठकर घर से बाहर आया तो देखा कि मैं अकेला ना था। सब अपने घर के बाहर थे। खुसर-पुसर चल रही थी। इनके बीच, वो शोर जोर-जोर से रोने की आवाज़ में तब्दील हो गया था।

मुझे ये जानने में रूचि ना थी कि इतना रोया क्यों जा रहा है या फिर सब अपने घर के बाहर क्यों है। दूसरो की खोज-खबर क्या रखता जब मेरी खुद की दुनिया ख़त्म हो रही थी। सोने से पहले एक दोस्त ने बताया था कि मेरे क्रश की शादी की तैयारी शुरू हो चुकी थी। उसके घरवालों ने उसका रिश्ता तय कर दिया था। ये सुनकर पहले तो अपने दोस्त को कोसा कि उसकी जुबान काली है, फिर उसके घरवालों को कोसा और अंत में दुनिया को बुरा-बुरा कहा। मुझे गुस्सा आ रहा था अपने आप पर और उसके घरवालों पर। उसके माँ-बाप अव्वल दर्जे के कंजर लग रहे थे। उसकी उम्र कोई 19 बरस भी मुश्किल होगी, कि शादी का प्लान बना दिया। जैसे कि वो बूढी गाय हो चली थी जो अब दूसरे के गले डालनी थी। मेरे प्यार का परिंदा उड़ा भी ना था, इससे पहले उसके किसी ने पर काट दिए थे। मैं असहाय था, बिल्कुल शोले के ठाकुर की तरह। चित्त में आया था कि गाँव की पानी की टंकी पर चढ़कर उसे माँगू। फिर याद आया कि गाँव में कोई पानी की टंकी नही है और ऐसी गर्मी में कोई अपने ए०सी० वाले कमरो से ना निकलेगा। ऊपर पंखा अपनी चाल चल रहा था, नीचे मैं बेहाल हो रहा था। कुछ बस में ना था। अंत में झक मारकर सो गया।

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जनता खुसर-पुसर कर रही थी। एक से पूछा तो पता लगा कि अगली गली में कनखू मर गया था। उसी के परिवार वाले रुदन कर रहे थे।

रविवार का दिन है। छुट्टी है। सब फुरसत में है। सब को आज ही मरना है, रोना है, रिश्ता तय करना है, दिल तोडना है और मुझे कड़वाहट का एहसास दिलाना है। कहते भी है कि फुरसत का काम इंसान का और जल्दबाज़ी का काम इंसान का।

कनखू की बात करुँ तो उससे जीवन में बात कम, पर उसके बारे में बात बहुत सुनी। वो देसी दारू का मग्गा मारके पांच  खेतो को भी एक बार में जोत देने के लिए मशहूर था। लोग तो यहाँ तक कहते थे कि वो पूरा मग्गा एक सांस में गटक जाता है। लोगो की बातें कितनी सच और कितनी झूठ, ये तो शायद उन्हें भी ना पता हो। खुद की बात करू तो आखरी बार उसे रेल स्टेशन के नजदीक देखा था। एक पेड़ तले पड़ा था। मुँह पर मक्खियां भिनभिना रही थी। पैरो में चप्पल ना थी। कपड़े तार-तार थे। बालों में रेत भरा पड़ा था। शायद अफवाह थोड़ी सच थी, और वो मग्गा मारके पड़ा था। थोड़ी दूर निकल जाने के बाद मुड़कर नजर डाली तो मक्खियां नजर से ओझल थी और उसकी बद-हालत छुप सी गयी थी। पेड़ के नीचे मानो आराम वाली नींद सो रहा था। बस वो दिन और आज का दिन, वो सो ही रहा है। बस उस वक़्त उसके आसपास भीड़ ना थी, मक्खियां थी।

बचपन में मैं और उसका लड़का, हम दोनों साथ खेलते थे। कंचा, गली वाली बैट-बॉल, पिट्ठू-गिंडी; बहुत खेल खेले थे हमने। मशहूर चलन है कि दारु वाले घर में क्लेश रहता है। सब इससे पीड़ित रहते है चाहे वो माँ-पिता हो या बच्चे। अब इस बात को ध्यान करुँ और पीछे का वाकया टटोलूँ तो पाता हूँ कि ऐसा कुछ ना था। वो मुझसे ज्यादा मोटा था। भागता भी मुझसे तेज था। पढाई का पता ना, मुझसे पीछे था दर्जे में। और कुछ ध्यान ना, बड़े होते हमारे मित्तर और वक़्त बिताने के साधन बदल चुके थे। पर जब भी उसे देखा, दूर से मौज में पाया।

अब मुझे उसके ऊपर रुदन बुरा लगता है। कानों में इसका स्वर घुसे आता है। लोगो और दुनिया पर फिर गुस्सा आता है। दोगलेपन की भी हद होती है। जब जिन्दा था तब किसी से ना सुध ना ली थी। सब बिजी थे। उलझे हुए थे जिंदगी में। अब मरणोपरांत क्या दिखा रहे है, खुद जाने।

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शाम हो आई है। अब किसी की आवाज़ ना आती है। बस पंखे की चर्र-चर्र सुनाई देती है।

मैं अभी भी गुस्से में हूँ। ये क्षणिक आवेश है, जानता हूँ वक़्त के साथ निकल जायेगा। दिन की गर्मी कुछ भारी भी लगने लगी है। विचार बिजली की तरह आ-जा रहे है। कभी उस पर, खुद पर, तो दुनिया पर गुस्सा आता है। उस पर गुस्सा जायज़ नही है। वो मेरे ख्यालो से अनभिज्ञ है। उसे मेरे वजूद का भी ख्याल ना होगा। गलती उसकी नही है, पर फिर भी मेरे क्रोध की भागी है। कम उम्र में ब्याह जरूर उसकी मर्जी के खिलाफ हो रहा होगा। बेचारी के सारे स्वपन टूटकर बिखर गए होंगें। अपने विवाह और अपने  माँ-पिता के बीच कैसे अपने आपको समेटती होगी वो। बिल्कुल गौ जैसी निरीह है, चुप रहेगी पर अपनी व्यथा ना कहेगी। इन सबके बावजूद क्रोध है। दुनिया पर यूँ है कि सब इसका छलावा है। सामाजिक बन्धनों को खोल दे तो मनुष्य एक-दूसरे को ख़त्म कर दे। पर फिर भी इस छलावे के सब बराबर भागीदार है। मैं, वो और सब इंसान। सब इसमें एक साथ है।

मेरे क्रोध का कोई कारण नही है। उसके विवाह का मेरे लिए कोई कारण नहीं है। दुनिया के चलने का भी कोई कारण नहीं है।

बिना किसी कारण के इस छलावे से मुक्ति, शायद मृत्यु का यही कारण है।

Short Story : माँ, शादी उलझन है (भाग – 2)

आज सातवाँ पीरियड गेम्स का था।

किसी पीरियड के वेकंट होने पर चलन था कि प्रिंसिपल मैडम किसी टीचर को भेज देती थी। आज जब हिस्ट्री की पुष्पा मैडम अनुपस्थित थी, तो प्रिंसिपल मैडम ने संजय सर को भेज दिया था। संजय सर पीटीआई थे। स्वभाव के शांत पर हट्ठी। आरम्भ में उन्हें गेम्स पीरियड के लिए मनाना मुश्किल था। क्लास के लड़को ने पढाई के प्रेशर से लेकर सब्जेक्ट की अच्छी तैयारी तक, सारी बातें कह दी थी। पर संजय सर का एक ही कथन था, “लड़को मैं तुम्हारी बात समझता हूँ। पर अकेले तुम्हारे कहने पर गेम्स पीरियड लगाना सही नही है।” फिर जब लड़कियों ने भी खेलने की इच्छा जताई, तो संजय सर के पास कोई बहाना शेष ना था।

लड़के फुटबॉल खेल रहे थे। लड़कियां पेड़ की छाँव में बैठी थी। प्रतीक्षा और पूजा, दोनों बैठकर घास की पाँख तोड़ रहे थे।

“तुझे पता है कल ‘सिया और हाथी’ में क्या हुआ?”, पूजा घास की और देखते हुए पूछती है।

“मुझे क्या पता। पूजा तुझे पता है ना कि मैं ये ‘सिया और हाथी’ और बाकी फ़ालतू शो ना देखती हूँ।”, प्रतीक्षा बोली।

“रहने दे तू,” पूजा ने नजर उठाई और प्रतीक्षा की ओर देखकर बोली, “सुप्रिया बता रही थी तेरे बारे में।”

अचानक राज खुलने पर प्रतीक्षा के मुख पर हैरानी के भाव उभर आये। सुप्रिया उस की दो साल छोटी बहन थी।

“झूठ बोलती होगी वो।”, अंत के क्षणों में भी स्वयं के बचाव में प्रतीक्षा बोल पड़ी।

“अब छोड़ ना ये दिखावा। बता कल का एपिसोड देखा तूने।”

“हां, देखा। बेचारी सिया का कैसे उस मोटे के साथ ब्याह कर दिया।”

“सही तो किया। वो भले हो मोटा, पर तूने पहले के एपिसोड में उसके गुण ना देखे क्या?”

“कैसे गुण?”

“वो छोटे बच्चों के साथ कितने प्यार से खेलता है। माँ-बाप का कितना लिहाज करता है। और तो, पूरा मोहल्ला कितना अच्छा बोलता है उसके बारे में। ये गुण।”

“तो इन गुणों का क्या है। सिर्फ इनके सहारे जीवन थोड़ी जिया जाता है। आदमी को दिखने में सलोना भी होना चाहिए।”

“देखने-दिखने में इंसान कुछ वक़्त बाद ऊब जाता है। पर गुण, मेरी प्रतीक्षा, आगे यही मायने रखते है।”

“ये कैसी बात कर रही है तू?”

“मेरे भैया-भाभी है ना। शादी से पहले दोनों एक-दूसरे से दूर ना हटते थे, सदा संग रहते थे। पर अब तू देख उन्हें, दोनों दिन भर के बाद जब मिलते है, मुश्किल से चार बात करते है।”

“पर…”

प्रतीक्षा के बात कहने से पहले ही, उन दोनों के पास फुटबॉल आकर गिरती है।

“ऐ पूजा। फुटबॉल दे जरा।” दूर से अविनाश बोला था।

“खुद ले जा।”

अगले पल पूजा प्रतीक्षा का हाथ पकड़कर उसे उठा ले गयी थी। प्रतीक्षा चल तो दी थी, पर उसने फुटबॉल की तरफ एक नजर देखा था। शायद उसने फुटबॉल देनी चाही थी।

*****

रात का वक़्त है। प्रतीक्षा टीवी के सामने जमी बैठी है।

“प्रतीक्षा रोटी बन गई। ले जा।” माँ रसोई से बोलती है।

“हां, आती हूँ।” टीवी के सामने बैठी प्रतीक्षा बोलती है।

थोड़ी देर बाद, माँ फिर बोलती है, ” सुप्पी, तू आकर ले जा खाना। इसको तो फुरसत ना।”

यह हर रात का रूटीन था। जैसे ही सात बजते, प्रतीक्षा टीवी के सामने बैठ जाती और तीन घण्टे बाद ही उठती। इन तीन घण्टो में, उसे किसी चीज की सुध ना रहती थी। वो खाना खा ले, माँ को कई बार टीवी भी बन्द करना पड़ता था। माँ और सुप्रिया, दोनों अनजान थे कि प्रतीक्षा को क्या दिखता था टीवी में। एक दिन पूजा ने उसकी इस आदत का हल्का-फुल्का मजाक बनाया था तो पूजा पूरे दिन उससे ना बोली थी। पता नही क्या था टीवी में जिस कारण प्रतीक्षा अपनी दुनिया भूल जाती थी।

“ऐ चुहिया, ले खाना खा ले।” सुप्रिया ने उसके सामने प्लेट रखते हुए कहा।

“हां खाती हूँ।” खोई हुई प्रतीक्षा बोली।

“खा ले जल्दी।” सुप्रिया बोली, “तेरा हीरो कहीं ना भागकर जाने वाला।”

इस बात पर प्रतीक्षा झल्ला उठी। आवेश में उठी और बोली, “माँ समझा लो इसे। फिर मेरे साथ मजाक कर रही है।”

“माँ मैंने कुछ ना किया। खाना खाने को कहा तो ये चिल्ला उठी।”

“माँ ये झूठ बोल रही है। इसने मेरे हीरो के बारे में बोला।”

“माँ झूठ ये बोल रही है। मैंने बस खाना खाने को कहा था।”

इससे पहले कि स्वयं के बचाव में और दलीलें पेश होती, कमरे में माँ का स्वर गूँज उठता है, “ऐ कनजरियों, दोनों चुप हो जाओ। सारा घर सर पे उठा रखा है। पढ़ने-लिखने के वक़्त कुछ ना करती दोनों, वैसे रौला कितना करवा लो। आन दो तुम्हारे पापा को।”

माँ की आवाज़ तेज और टीवी के कार्यक्रम की बैकग्राउंड स्कोर से भी ज्यादा उँची थी।

अगले पल दोनों बहने खाना खा रही थी। टीवी की वॉल्यूम भी कम हो गयी थी।

Problems of A Common Man

Problem. It is a harmless word in itself. But the burden it carries is phenomenal. I don’t like it. The untold rule of generalisation is, if I don’t like a thing, then people don’t like it. Going by this rule, it is evident no one likes problems.

Things I have Problem With
Everything which I don’t like or find irksome, I have a problem with.

But I’m a sane human. I know problems are a part of life. It is inseparable. Life has a problem. Solve it and another comes. Life is  spent on this. But if every problem is solved, then life’s a big scary unknown. And again going by the untold rule of generalisation, no one would like that. So I remain content with my life. I have problems. And I know how to cope with them. But still there are some things which are so ugly, it is impossible to ignore them. They are meant to be hated blindly. These things are numerous, and the untold rule of generalisation tells me that everyone would like to know them.

So without further ado, here they are.

Politicians
I love Politics, but I hate politicians. Politics is a good thing. It is a tool we need to deal with some of our problems. I love it. I love it for the simple fact that it is meant for humans to engage in finding solutions for their problems in a civilised way. I also love it for the fact that it saves me from continuous pestering by my old man, as he leaves me alone when he discusses it with his tea-friends enthusiastically.

So I hate politicians. Everyone does. But I am not in this hate-fest like everyone. I have valid reasons.

Election comes, along with politicians. The politician then visits homes of common people. He promises them a bright future. A future where ‘vikas’ is everywhere. A future where the common man won’t have to lose his slippers to Govt. Offices. And the common man believes it. He votes for him. He makes him MP & MLA. He hopes that politician will work for him and will take decision which will make his life easier. But reality is bitter. All they do is bitching about each other, kadi ninda, throwing chairs at each other, scams, and occasionally sleeping in Parliament. Post-election, they are nowhere to be seen and so are their promises.

This is a valid reason for hating them. But I don’t hate them for it.  The profession of politician requires a man to do certain things. Now it’s a totally different matter that the things are fooling common man with fake promises and visiting their homes. They do them to be a politician. Now hating a person for being true to himself is wrong. And I’m optimistic that under this facade of a politician, is a person who is another common man. A man who earns and cares for his family.

The Perks of being a Wallflower Politician
The profession of politician is a lucrative one. And it has numerous perks.

By being a politician, one receives infinite ‘ijjat’ and garlands wherever he goes. He attracts people. People come to him like a pan spit to the Govt. Office’s walls. People continuously say big things about him and even then he stays humble and down to earth. He accepts what people say but never lets it get to his head. He is always fighting a battle between between being humble and having a puffy ego. And he always stays humble. It is not known how he does it. Perhaps this struggle is what makes him a great man and we read about him in our books.

Another perk a politician has is, they don’t even have to try to become famous. The smallest of oddity or happening to them makes headlines and breaking news. It is like the profession of politician changes a person’s DNA. It changes them on a cellular level. They attract attention without even trying. What’s more, they pass it on to their kids in ‘virasat.’

Another perk a politician has, is job and financial security for himself and his upcoming ‘saat pushtein.’ Even God is yet to see a politician doing another job and his kids always seem to follow him. And this is a big perk. The way one politician makes the lives of seven generations easier is a commendable task. And this definitely makes him a great man. It is rare when a person thinks for someone other than himself before doing a work. If above is not the reason, then this is definitely why we read about him in our books.

I hate politicians for these perks they have. I hate them because they have it and I don’t. I hate politicians because I am not one.

Even though I am not one yet, I am trying to become one. And I do it constantly. Perseverance is the key to success.

Selfie Kisne Li Hai Aaj

I don’t like selfies. Not for the simple fact that my selfies never turn out good. Also not because I want to be different from the herd by having a different viewpoint.

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Edward Norton in Birdman

I visit a place. Be it a Cinema Hall, a Public place or anything which attracts people. There, I see people, with their hand holding phone stretched out, and they look at it. They make sure that apart from their face, the background is also nice. They do all this while forgetting the place where they’re present in the moment. I have this notion, that people should experience things. They should experience its essence. And when it’s done, then click pictures. Sure a picture is worth thousand words, but people dear to you whom you show your selfies, maybe they like the sound of your voice too.

So, I don’t like selfies because most of the time they distract people from real experience. This is a valid reason, along with the two stated above.

Dhinchak Pooja and Selfie Usne Li Thi Us Din
In today’s fast world, I am an alert citizen. I keep myself updated with all the latest happenings and trends. And this is how I tell a day spent looking at memes.

A few days back, I was going through new youtube videos. A good part of my youtube feed was filled with dhinchak Pooja. She had uploaded a new song, ‘selfie maine le li aaj.’ And there were videos mocking her. I saw ’em and had some laughs. I also the original song. And later, in summation, I had these following thoughts.

1. Internet is an uncertain place. It has no pre-defined rules about liking or disliking a new thing.

2. People should respect each other’s opinion or work, even when they don’t like it.

3. This song is the worst piece of music I have heard. And people are right in mocking, roasting and bashing it.

Thoughts run wild like a group of cattle
Holidays are days when one can afford to waste time to his/her heart’s desire.

I think too much than I ought to think. And most of my thoughts are weird and stupid. I thought about this ‘selfie’ song. And i had several thoughts. Below are some of them.

1. There is a prevailing notion among people, that India is getting intolerant. They fear that their freedom of speech and expression is muffled. Maybe they think that a mob of people, who doesn’t agree with their opinion, will thrash them.
This song proves them wrong. The  people of India are tolerating this song. There is no unrest among people due to this song. Sure, there are videos online mocking her. But the point is, she is free to release her song and people are free to criticise it. Freedom of speech and expression is still here. There are no angry people on road due to this song.

2. For sometime, chinese companies like Oppo, Vivo, Gionee, Huawei and Xiaomi, has been heading our mobile phone market. Thanks to their ads focused on selfies and their splurging, they have done it successfully. It has been bad for swadeshi phone companies like Micromax and karbonn. People never liked Micromax. And now they’ve conveniently forgotten about it.

Dhinchak Pooja is a hardcore nationalist. She was deeply saddened to see our swadeshi phone companies fail. Vivo, Xiaomi and other chinese companies are successful because they emphasise heavily on how great their selfie camera is. Now, thanks to her selfie song, people will stop taking selfies. So they won’t buy chinese phones which excel in capturing selfies. It will drive down the sales of chinese companies, and thus, our swadeshi mobile companies will emerge again.