सफेद रंग की चीजें अब लाल होती है

सफेद रंग की चीजें अब लाल होती है,
मेरे देस में मरे बाद क्रांति होती है।

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The useless

Call the girl you liked yesterday.
Fine were things and friends,
Maybe misery turned them away.
The streets are alive again.
You see the day in everything you do.
And as you do things,
You wish it’d be better too.
And as it slips through the fingers
You notice the drop of rain
She wouldn’t notice anyways.

Aren’t you the star,
That shone too bright.
But the night was dark
And you fell down and died.
You are your mess
With a hope she wouldn’t clean anyhow.
Forgotten wannabe seeks a saviour,
But it won’t come.
No, never.
Love won’t save us. Or anyone.

मेरे दिनों का पता

तुम्हे मेरे दिनों का पता है,
ये सारे एक उतावलेपन से पीड़ित है।
ये उतावलापन है इनके रोज की दिनचर्या से बच निकलने का।
इस बच निकलने या बचाने के धारावाहिक में कोई प्रेम या अन्य पात्र नही है।
सब कुछ एक परम्परा है इस जवानी की।
कि इस उम्र में जीवन की चल रही हकीकत से हमे छुटकारा चाहिए।
चाहे वो क्षणिक ही क्यों ना हो।
हम उसे पाकर रहेंगे और हम पाए बिना ना रुकेंगे।
ये बच निकलने की प्रवृति अंदर से उपजती है कि रोज के समान्यपन को छलकाया जाए।
पैर इतने जोर से जमीन पर टिकाये जाए की उनका जोश जमीन की स्थिरता को विचलित करे।
इस उम्मीद में कि स्थिरता में जमे हुए कुछ या कोई तो जगेगा ही।
वो आएगा और हमारे साथ खड़ा होगा इस संघर्ष में जोे जिंदगी की रोजमर्रा के खेल के खिलाफ है।
ये खेल जिसे खेलने के लिए हमे बचपन से शिक्षा, दीक्षा, लाड-मार आदि से पढ़ाया गया।
कि जब बचपन निकलेगा और जवानी दस्तक देगी तब हम बचपने के बहकावे में पड़कर कोई गलत कर्म ना करेंगे।
कोई गलत कर्म ना करने पर मेरे दिन जीवन के अंत तक सुख-पूर्ण होंगे।
मेरे दिन, इसी परिणाम को लेकर होने वाले संघर्ष से परेशान है।
कि कल के फ़िक्रे में अभी आज का क्या कुसूर है कि इन्हें गवाया जाए।
कल को बचाने के लिये आज बचाना है।
मेरे दिन इसी में है।

आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ

आज के दिन में बदलाव की उम्मीद करता हूँ,
सरकार अर्जी सुने, भगवान से फरियाद करता हूँ।

जानता हूँ की चाशनी में डूबा फरेब है उनका,
हैरान हूँ हर बार किस तरह विश्वास करता हूँ।

उनके तलवे चाटकर नौकरशाही को उभरते देखा मैंने,
इस उम्मीद में रोज अपनी जीभ की सफाई करता हूँ।

मेरा ‘आम’ शब्द भी छीन लिया मुझसे पल में,
ये कैसे हुआ, सोचकर रोज हैरान होता हूँ।

लगता है मेरा रब रूठ गया मुझसे उस दिन का,
जब से मैं अपनी अर्जी सुनी जाने की फरियाद करता हूँ।

दिन ढले तो शुरुआत हुई

दिन ढले तो शुरुआत हुई,
अकेलेपन में अपनी तलाश हुई।

एक सड़क देखी, मोधि पड़ी जमीन पर,
उस पर चलकर कितनों को मंजिल प्राप्त हुई।

मंजिल पहुँचोगे अवश्य, पर दिनों की बात ना करो,
पल ऐसा देखना जिसमे तुम्हारी साँसे इसकी सौगात हुई।

मेरे साथी चुपचाप नजर आये आज मुझे,
शोर करो कुछ कि शान्ति अब नापंसद हुई।

एक कोने में बैठके देखूँ जिंदगी पलों में कटती,
बेबस मैं बेचारा, बेरोजगारी मेरी माशूक हुई।

आज दुनिया का जादू हटाया जाए

आज दुनिया का जादू हटाया जाए,
आज इस शाम की कदर हो जाए।

नारों से मोहित जनता रस्ता देखे बहारों का,
बेहतर हो अगर क़यामत का इंतजार किया जाए।

खुदा, इंसान, शैतान; क्या बने फिरते हो,
तुम बिको औकात-अनुसार जे रूपया रब कहाए।

भूला दो गाय, सूअर, बकरो को,
मुद्दा इंसान है, इनपर विचार बतलाएं।

क्या पर्दे, हिजाब, नक़ाब करे हो,
हटाओ तो चेहरा नजर आये।

चिर पहले सुना कि तेरी शादी आती है

चिर पहले सुना कि तेरी शादी आती है,
अब सामने आकर तू क्या बताती है।

मैं सदा तेरे इस गुण के प्रभाव में रहा,
किस सरलता से तू कठिन बातें कह जाती है।

तुम ना तो खुश दिखते हो, ना दुःखी
ये कैसी मुस्कान चेहरे पर तुमने पाली है।

मेरी आँखें नम ना हुई है,
तुम्हे ग़लतफहमी हुई है।

जाते-जाते जहाँ बसो वहाँ का पता लिख जाना,
आज से उस पते कदमों को मनाही है।

अब तो परदे कर लो खिड़कियों पर,
सब की ख़ुशी सब से देखी ना जाती है।

खाली हुआ गिलास, थोड़ी मय तो डालो
रुदन बाद में छेड़ेंगे, अभी विरह कमसिन है।