खामखा फरियादी बने है

हम पूछ बैठे कि दुःख काहे इतना सारा है,

किधर शुरू और कहाँ ये खत्म हो,

हमने तनिक इतना पूछा।

आप उत्तर दे ना पाओ,

या आपका उतर हमे पसन्द ना आये,

बस स्मरण रहे कि हम केवल फिल्मी बातें ना दोहराए है।

कुछ बीस बरस की जिन्दगानी जिसमे,

पंद्रह या सौलह मुफ़्तख़ोरी के है,

अब जब हम यहां तक ऐसे आये,

तो क्यों आज हम निकम्मे और नालायक कहलाए।

बड़ी इमारतें, गाड़ी और इनमें बसते बड़े लोग,

क्यों ना हमें भी अपने बीच स्थान दिलवाओ।

मानते है औकात कम है और,

फकीरी का रुतबा पहले जैसा ना है,

परन्तु इंसानियत अभी भी जिंदा होनी तो चाहिए ही।

कामचोरी की दिक्कत ना है हमें,

भरपूर किस्म के दंश झेले फिरते है हम,

पर पुश्तैनी नाम हमारा इतना मजबूत ना हुआ,

कि हम उसको जोड़कर अपना दुःख बाजारू करें।

मेरे सरकारी माईबाप,

बस कदम चूमेंगे या पैर दबाएंगे,

तुम कहो तो तुम्हारे बोले को गीतापाठ समझ बोल जाएंगे,

तुम कहो तो हम पानी समझ तेजाब पी जाएंगे,

केवल सरकारी नौकरी दे देना।

दरअसल मुद्दा यह है कि तंगी केवल रुपयों की ही ना है,

पर रिश्तेदारों और अजीज जानकारों के बीच इज्जत की भी है।

सब कामचोर समझते है।

तुम्हारी कृपा होगी तो इज्जत भतेरी होगी।

दुःख झेलना हमारा रोज का कार्य है,

कहो कि आदत हुई है अब यह,

बस ये इज्जत का मामला रुलाता है।

दुःख रोज मिले पर रिश्तेदार साल में एक बार,

तो उनकी हँसी हमें तीखा कुरेदती है।

अंत करे तो अब किस्मत को कहते है,

कि क्यों हमसे रूठी हुई हो।

क्यों हमारे मन मुताबिक ना बनती है।

कहो तो मनाने के लिए व्रत करे या उपवास।

बल्कि यह बात तो हम संसार से कहेंगे,

कि क्या उपाय करें कि तुम अपनी विशालता का एक हिस्सा या एक कोना,

हमारे साथ बाँटो।

हम जुगाड़ी बंधु है सारे।

कमी पड़ने पर सब मिलजुल हिसाब बैठा लेते है।

तुम्हारा कोना अगर हमारे पैरो को छोटा भी पड़े,

तो घुटनो के बल भी हम किसी तरह,

उसमे चले जायेंगे और खुश रहेंगे।

उस पल का एक कष्टदायक सुख,

हमारे वर्तमान की तुलना में बेहतर ही होगा।

तो अब बताओ कि कब यह सब हो रहा है,

हुक्म करो तो पंडित से मुहूर्त निकलवाए,

कोई कमी पड़े तो फौरन बताओ,

हम अभी जुगाड़ बैठाए।

हम अभी जुगाड़ बैठाए।

बस इन दुःखो का टिकाऊ इलाज कर दो,

फिर हम भी चैन-सुख से सो जाएं।

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