प्रश्न-उत्तर

सुबह है। पंखे के शोर से परे होकर पंछियों की आवाज़ आती है। वे चहचहा रहे है। वे खुश है, दुःखी है, संतुष्ट है, ऊब रहे है या उनकी आवाज़ शोर से अधिक ना है, मैं यह जान ना पाया हूँ। वैसे जरूरत भी ना है, क्योंकि मुझे पंछियों से कोई काम ना पड़ा है, और आगे भी ना पड़ेगा। इसका एक अपवाद कबूतर हो सकता है। किवदंती है कि एक वक्त कबूतर संदेशवाहक पक्षी था। पंछियो की आवाज़ का ज्ञान कबूतर के साथ सार्थक होता। मैं कबूतर से अपने क्रश को अनाम प्रेमपत्र भिजवाता। और जो जन मुझसे सही तरीके बात ना करते, मैं उनके सिर या उनकी गाड़ी पर कबूतर से बीट करवाता।

एक पक्षी जो मेरा कहा करता, इसकी सीमा को लेकर मैं सोचने में भी असमर्थ हूँ।

“बेटा निताश रोटी खा ले। घना बखत हो लिया।”

“अभी खाऊँ अम्मी।”

मेरी दिनचर्या पूरे दिन आराम करने तक है। किसी ने कहा था कि मैं आलसी हूँ। मैं समझ ना पाया। बात है कि बड़े होते किसी ने आलस का विचार विस्तार में ना बताया था। खुद को देख इतना समझ आया कि आलसी होने से आशय है पूरे दिन को गुजरते देखना पर कुछ ना करना। आलसी होना बुरा हो या अच्छा, इसे मैं अपने तक सीमित रखना चाहता हूँ। बचपन में ऐसे बहुत दिन देखे थे जब पड़ोस के जन घर उल्हाना लेकर आते और कहते कि मैंने उनके बच्चे को गलत बात सिखाई। उन दिनों का सबक है कि उन उल्हानों का आज भी बराबर डर है कि दरवाजे पर खड़ा होकर कोई यूँ ना कहे कि मैंने उनके जवान बेटे को निकम्मा और कामचोर बना दिया।

मेरा यह डर, मेरे दोस्त समझने में असमर्थ है। रोज सारी चीजों को धता बताकर, वे आते है और पास के एक पार्क में बैठते है। मैं भी उनके साथ रहता हूँ। यह रूटीन सोमवार से शुक्रवार तक का है। हफ्ते के अंत में उनके पिता घर पर रहते है, तो पिता के डर से वे ना आते है। शुरू के एक-दो दिन पार्क में बैठना मुझे भी भाता है। बात के दिनों में ऊँघई आती है और मैं चिड़चिड़ा रहता हूँ। नींद भतेरी आती है, पर उनकी फालतू बातों में हाँ-हूँ करना पड़ता है। क्योंकि दोपहर का खाना, कोक और समोसे, का जुगाड़ वही करते है।

••

कल का दिन पार्क में ही बीता। हम तीन जन पार्क में पड़े रहे। ऐसा नही है कि करने को कुछ ना है। काम तीनों के पास बहुत है। मुझे कॉलेज के आखरी साल में दाखिला लेना है। दूसरे को उसकी कोचिंग क्लास में जाना है। तीसरे को खेतीबाड़ी देखनी है। घर से जिम्मेदारियां भी कम ना है। मुझे कूलर की मोटर बदलवानी है और बिजली-पानी का बिल भरना है। दूसरे को उसके भांजे-भांजियों का स्कूल का छुट्टियों का काम करवाना है। तीसरे को घर के लिए गेहूँ सुखाकर टँकी में रखने है। ये काम वे है जो बातों में आये। अन्य का हिसाब ना है। काम तीनों को है और भरपूर है। फिर भी पता नही इन दिनों में क्या नशा है कि सारे जरूरी कामों को दरकिनार कर वक़्त ऐसे बीताने में स्वाद ज्यादा आता है। बेरोजगारी है, आलसपन है, वक़्त की कदर ना समझे या जिंदगी में बेमतलब सुकून चाहिए, मुझे नही पता हमारा क्या बहाना है।

कल का दिन यूँ ही बीता। कुछेक बातें याद है। पर किसने कौनसी बात कही, यह याद ना है।

“एक बात पढ़ी मैंने की हर चीज अणु से बनी है। मैं, तू और ये समोसे भी।”

“मेरा फ़ोन। इसकी बैटरी। अपनी बातें। दिन-रात। क्या सब कुछ?”

“फ़ोन और बैटरी अणु से बने है। बातों और दिन-रात का पता ना।”

“क्या अपने दिन अपनी बातों से बने है?”

“बनने का ना पता। पर दिन बातों में गुजरते जरूर है।”

“तीन-चार घण्टे ही तो बैठते है यहां। कहाँ पूरा दिन गुजरता है।”

“सुन मेरी बात। ये दिन के तीन-चार घण्टे हफ्ते के अंत तक तीन-चार ना रहते है। इनका काम जुड़ जाता है और ये मिलकर रविवार खा जाते है।”

“मैं अपने सारे काम शाम को निपटा लेता हूँ।”

“क्या करता है शाम को?”

“दौड़ मारता हूँ और योग करता हूँ।”

“ये तेरे खुद के काम है। घर से मुक्त है क्या तू?”

“नही है। बस एक कोचिंग जाना रहता है।”

“और तेरी कोचिंग इस पार्क में होती है।”

“भाई कोचिंग लेना फालतू है। वक़्त की बर्बादी है।”

“अभी कौनसी तू वक़्त की इज्जत कर रहा है।”

“भाई कोचिंग लेना बेकार है। सरकारी नौकरी वैसे ही ना मिलनी। इंस्टीटूट पर सब पैसों का खेल है।”

“पार्क में समोसे खाने से भी कोई सरकारी नौकरी ना मिलेगी।”

“तूने भीड़ देखी है बच्चो की?”

“भीड़ हर जगह है। पर तू तो एक है।”

“इसका क्या मतलब?”

“मतलब कि तू अपनी देख। भीड़ में हर बन्दा अपनी सोचता है।”

“मुझे ये रेस पसन्द ना है। पहले स्कूल, फिर कॉलेज और अब कोचिंग। कितनी पढ़ाई करके बस होगा।”

“भाई फिल्मी बकचोदी मत कर। एक फ़िल्म में ही कहा था ये सबको चूतिया बनाती है।”

“वो तो है। पर रेस वाली बात भी तो सही लगती है।”

“सही लगती है क्योंकि फ़िल्म के आखिर में सब सही हुआ था। एक बात बता, तूने आज तक इतनी प्यार वाली फिल्में देखी जिनमे हीरो और हीरोइन की शादी होती है। पर तेरी प्यार वाली कहानी क्या है? याद कर पिछले साल कन्यादान किया था।”

“इस बात को मत छेड़।”

“तू छेड़ने वाले काम करता है। फिल्मे अपने से अलग होती है।”

“अलग भले हो पर कुछ सच्चाई तो होती है। ”

“कैसी सच्चाई?”

“कि जिंदगी में काम ही काम है। आराम कही नही है।”

“बैठकर समोसा खाना कौनसा भारी काम है?”

“भाई हर काम में कुछ मेहनत तो लगती है।”

“तेरी इस बात को काटने में मेहनत ना करूँगा मैं। तुम अव्वल आलसी हो।”

•••

सूरज चढ़ने लगा है। पारा भी। मैं अभी भी खाट पर लेटा हूँ। कल की बातें मन में है। अपने दिन किससे बने है। ये फिल्मी बातें क्यों इतनी जल्दी पकड़ में आती है। जीवन में शुरू में पढ़ाई और अंत तक काम, यह नियम किसने बनाया। क्यों जीवन की हर बात और हर काम रुपयों पर आकर रुकते है। आने वाला कल अच्छा तो होगा। बातें मन में अनेक है, परन्तु खाट पर लेटे इनके उत्तर ना मिल रहे है। अपने दिन भले ही काम और बातों के बने है, पर ये आलस से पीड़ित भी है। और इस रोग का इलाज नामालूम है।

मुझे भूख भी लगने लगी है।

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