कबाड़ी जिंदा होता तो और खुश होते

आज रविवार है। घड़ी की सुइयां चलते हुए आवाज़ करती है। इनकी टिक-टिक के अलावा, मनीपुर गांव में आज शांति है।

महेन्दर और मनका खुश है। उनके बेट किरण को रोकने वाले आ रहे है। महेन्दर सवेरे ही टेंट वाले के पास जाकर हलवाई और उसके सामान को लिवा लाया था। हलवाई ने उसके घर के पीछे वाली जगह में ईंट लगाकर चूल्हा बनाया था और अपना काम शुरू कर दिया था। सबसे पहले उसने एक बड़े भगौने में चाय बनाई, जिसे महेन्दर के सारे आये हुए रिश्तेदार जल्दी पी गए थे। इसके बाद, अपने सहायको के साथ उसने सब्जी काटने और अन्य रसोई वाले कार्य शुरू कर दिए थे।
चमन मोहल्ले में रह-रहकर बर्तनों के आपस में खड़कने और गैस के तेज-मन्दे होने की आवाज़ आती है। इसके अलावा, मोहल्ला शांत है।

दिनेश सुबह से परेशान बैठा है। कल उसने घर की सफाई की थी। सफाई करते उसे कई पुरानी चीजें मिली थी। उन चीजों को उसने रखना चाहा था, पर माँ ने मना कर दिया था। चीजें बेकार है और फालतू में जगह घेर रही है, मां ने कहा था। दिनेश का मन हुआ था कि माँ को बातों से मना ले। उन चीजों में उसके पिछले साल की स्कूल की कॉपी-किताब और पेन के खाली सिक्के मिले थे। खाली हुए सिक्को को वो जीती हुई ट्रॉफी की तरह सम्भालकर रखता था। वो मानता था कि खाली सिक्का साथ रखने से उसका लिखा याद रहता है। उसके मानने और रखने से उसकी कितनी मदद हुई, इसका अभी तक किसी को पता ना चला है। परीक्षा परिणाम आने में वक़्त है। उसके मन में अभी भी सामान को फेंकने को लेकर शंका थी, परन्तु माँ ने उसे समझाया था। माँ ने कहा था कि बेकार चीजें वक़्त खराब करती है, इसलिए उन्हें फेंक देना चाहिए। दिनेश फिर भी पूरी तरह राजी ना हुआ था। अंत में माँ ने कहा था कि सामान कबाड़ी को देकर जितने रुपये मिले, वो रख सकता है। दिनेश इस बात पर तुरन्त मान गया था। परीक्षा के बाद की छुट्टियां उसने सरपंच के इलेक्शन चलने के कारण मौज में गुजारी थी। उस वक़्त दारू और चखने की मौज थी। पर इलेक्शन के बाद इनका सूखा पड़ गया था। दिनेश का मुँह दारू का प्यासा था। और अब सवेरे से बैठे-बैठे कबाड़ी का इंतजार करता-करता थक चुका था। वो घर से निकलकर उसकी दुकान के लिए चला।
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कबाड़ी की दुकान गांव के बाहर थी। उसकी दुकान मनीपुर का एक अजूबा थी। तरह-तरह के सामान उसके यहाँ पड़े रहते थे। और ये भी जरूरी ना था कि उसके वहाँ सारी चीजें खराब हो। कई बार कुछ चीजें सही भी निकल जाती थी, जिन्हें वो अपने काम में लेता था। कबाड़ ढोने के लिए उसने यही तरकीब लगाकर रेहड़ी में बाइक का इंजन लगाकर जुगाड़ बैठा दिया था। उसके पास बाइक के इंजन से चलने वाली रेहड़ी थी।

दिनेश दुकान के सामने खड़ा रुक्के मार रहा था। परंतु कोई जवाब ना मिला था। वो जाने लगा था तो एक राहगीर से उसने पूछा, “भाई कबाड़ी का कुछ पता है?”

“वो तो कल मर लिया।” ऐसा करके राहगीर आगे निकल गया था। दिनेश का हाथ उसके सिर पर था।
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रात हो रही है। दिनेश किरण के साथ छत पर बैठा खाना खा रहा है। दोनों की उम्र में फर्क है, पर दोनों की जंचती अच्छी है। किरण के मुख पर मुस्कान जंच रही है।

“तुझे पता है वो कबाड़ी मर गया।”, दिनेश बोला।

“आज तो थोड़ी सही बात करले। खुशी का मौका है। और कबाड़ी से मुझे क्या लेना-देना।”, किरण बोला।

“आज वो जिंदा होता तो दोनों थोड़ा और खुश होते।” ये कहकर दिनेश ने दिन का पूरा वाक्या सुना दिया।

किरण की मुस्कान फीकी पड़ गयी थी।
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किरण रिश्तेदारों के साथ फोटो खिंचवा रहा है। फोटोग्राफर बार-बार उसे और ज्यादा मुस्कुराने को कहता है। फोटोग्राफर कहता है कि चेहरे पे ग्लो नही है। किरण पूरी कोशिश करता है, परन्तु मुस्कान वैसी ही रहती है।
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