दादी बुंदिया

आज कॉलेज जाने को घर से जल्दी निकला था। रोज-रोज आशीष कहा है, कहा है की रट लगाए फ़ोन करता रहता था। आज उसे ये मौका ना देना था।

“रै बेटा कित जावै है?”

मैं गांव के अड्डे की ओर चला जा रहा था। अचानक पीछे से आवाज़ आयी। आवाज़ दादी बुंदिया की थी।


“दादी गुड़गांव जाऊँ हूँ।”
“बेटा मैं भी चलूँ हूँ। ड़ाक्टर कनै जाउंगी।”
“ठीक दादी। चलो।”

दादी बुंदिया मेरे साथ चलने लगी। उनके पैर उम्र के मारे थे। वो धीमे-धीमे चल रही थी। इस बीच उनका मुँह बराबर चल रहा था। अपनी बहुओ की करतूत, उनके बेटो और पोतों का काम करना, पड़ोसियों को भला-बुरा कहना। वो जुबान से बहुत कुछ कर रही थी। मानो उम्र जुबान को छू भी ना पायी थी। मैं दुविधा में था। दादी बुंदिया को सुनने में आनंद आ रहा था, वही आशीष के फ़ोन भी आने लग गए थे।

अड्डे पर पहुँचकर एक टम्पू में दादी बुंदिया को विदा किया। फिर आशीष को फ़ोन किया। मैं आज फिर देरी से कॉलेज पहुँचने वाला था।

दादी बुंदिया मोहल्ले में तीन घर छोड़कर रहती थी। बरसो पहले बाबा हरकेश गुजर गए थे, तब दादी बुंदिया ने अकेले गुड़गांव जाना शुरू किया था। यूँ तो उनके परिवार में दो खाऊ-कमाऊ पुत्र, उनकी कमेरी पत्नियाँ और उनके पोते थे, जो उनकी सेवा के लिए सदैव तत्पर रहते थे, परंतु अपने गुड़गांव जाने के कार्यक्रम में वो किसी को न्योता ना देती थी।

मोहल्ले में महिलाएं एकत्र होकर बातें करती थी। दादी बुंदिया इस मंडली की अनऑफिसियल मुखिया थी। मंडली में मध्य बैठकर एक हाथ में लकड़ी थामे वो दूसरे हाथ से पूरे गांव की चिट्ठी पढ़ डालती थी। उनकी जुबान का पैनापन, मंडली के लिए गौरव का विषय था, परन्तु मंडली के अन्य सदस्य इस पैनेपन से डरते भी थे। कि दादी बुंदिया की जुबान के शिकार होकर कही वो भी गांव की लोक कथाओं का हिस्सा ना बन जाये।
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एक प्रचलित लोककथा है कि मोहल्ले में पहली गाड़ी आयी थी। गाड़ी एक मारुति 800 थी, जिसे महेंदर लेकर आया था। जिस दिन से गाड़ी आयी थी, महेंदर और उसकी पत्नी मनका ने गाड़ी का गुणगान शुरू कर दिया था। गुणगान करने में महेंदर अपनी नौकरी के कारण पीछे रहा, पर मनका ने कोई कसर ना छोड़ी थी। सुबह झाडू-पोचे से निबटने के बाद वो पूरे मोहल्ले में गाड़ी की महिमा गाती फिरती। उन दिनों मोहल्ले में मण्डली ना थी, सो मनका ने महिमा घर-घर जाकर गायी। गाड़ी मोहल्ले के प्राणियों के लिए नई थी, तो सबमें कौतुहल था। सबको गाड़ी के बारे में जानना था। फसल पक चुकी थी और तैयार थी, तो मनका ने भी खूब मेहनत की। एक हफ्ते में उसने मोहल्ले के हरेक प्राणी को गाड़ी का पाठ रटवा दिया था। सिवाय दादी बुंदिया के। और किसी एक दिन मनका दादी बुंदिया के पास गई।

“दादी राम-राम।” मनका बोली।
“राम-राम बेटी। कैसी है?” दादी बोली।
“दादी मैं तो बढ़िया हूँ। महेन्दर गाड़ी खरीद लाये।”
“बढ़िया बेटी।”

इसके बाद मनका ने दादी बुंदिया को गाड़ी की पूरी महिमा सुना दी। कि किस तरह गाड़ी में बैठके पेड़ चलते नजर आया करे, किस तरह गाड़ी में टूटी सड़क में धचकी ना लगती, किस तरह गाड़ी में हवा लगती है इत्यादि। उस दिन दादी भी ऊब रही थी, तो उन्होंने मनका को चुप ना किया। मनका ने महिमा इस दुविधा पर खत्म करी कि गाड़ी को किस चीज से धोया जाए। नहाने की साबुन से, बर्तन धोने की साबुन से या कपड़े धोने की साबुन से। मनका इस चीज का पता करने की जिम्मेदारी दादी बुंदिया को सौंपके चली गयी।
इसके बाद गली में, अड्डे जाते, पड़ोसी के घर, सब्जी लेते वक्त, कही पर भी मनका को दादी बुंदिया मिलती तो कार धोने की पूछ डालती। आरम्भ में दादी ने सब हंसकर सहा।
एक दिन दादी बुंदिया को मनका से सिलाई का काम पड़ा, तो उसके पास गई। मनका दादी के आने के वक़्त बर्तन धो रही थी। गाड़ी का गुणगान मनका की आदत बन गयी थी, तो दादी के कई बार रोकने पर भी ना रुकी। अनेक बार कार धोने की बात पूछे जाने पर दादी बुंदिया बोली, “रै कान-खानी, साबुन और ठेकर (पत्थर) उठा। ठेकर तै अपना मुंह फोड़ और साबुन तै दिमाग घिस।”

इसके बाद गाड़ी की महिमा का गुणगान फिर ना सुना गया था।
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मुझे टम्पू ना मिला। बारिश भी होने लगी थी। मैंने फ़ोन करके आशीष को बता दिया कि मैं आज कॉलेज ना आ रहा। मैं घर वापस जाने लगा। थोड़ी देर बाद मैं मोहल्ले में था।

“बेटा निताश, तू ना गया दादी के साथ।”, आगे से ताई गीता बोली थी। ताई गीता दादी बुंदिया की बड़ी बहू थी।

“ताई दादी को अकेले जाना था। आप चले जाते उनके साथ।”

“बेटा मैंने कही तो थी सुबह। पर ना मानी।”

“ताई दादी के लिए अब गुड़गांव जाना मुश्किल है। आप गांव की डिस्पेंसरी से ही दवाई क्यों ना दिलवा देते उन्हें?”

“बेटा उसके कहे पे मत जा। वो गुड़गांव डाक्टर के पास ना जाती। बूढ़े की पेंशन निकलवाने जाया करे वो हर महीने। बहुत कह लिया कि मैं चल दूंगी साथ। पर ना मानती। पता ना के करेगी इतने रुपये जोड़के। जरूर छोटी वाली को देती होगी…”
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