सुरेन्दर के सपनो वाली चुल्ल

दिनों की लड़ी लगी पड़ी है। पहला जाता है, दूसरा आता है। वार बदलते है, पर इनके टाइप एक जैसे रहते है। सारे दिन एक जैसे है। मैं तुम्हे ये सब इसलिए नही बता रहा कि मुझे तुमसे सहानुभूति चाहिए। मुझे अपना दुःख भी ना बांटना है। बस बात इतनी है कि पूरे दिन में जो मजाक होते है, उन पर मैं रोता हूँ।

आज शिवरात्रि है। सवेरे मैं मंदिर के बाहर खड़ा कांवड़ देख रहा था कि सुरेन्दर टकरा गया। उसकी आँखें सुल्फि सी थी, जैसे की सोया ना हो। निताश तुझे उससे बात ना करनी चाहिए थी, ये बात अब मेरे दिमाग में अब आती है। पर बात मैंने ना की थी। वो खुद मेरे नजदीक आया था और अपनी सपनो वाली बात बताई थी। कि किस तरह उसने अपने घूमने-फिरने का सपना पूरा किया था और कैसे वो दोबारा एक अलग जगह घूमने जायेगा। ये दुनिया के बाशिंदे है। इन सबकी तशरीफ़ में चुल्ल रहती है कि इसको जब तक कही टेका ना जाए वो शांत ना होती है। उसने अपनी चुल्ल मुझे दे दी। दिन अंत होता है, शिव की सौगंध है कि सब सच कहूँगा। मैं घर बैठा अपने कॉलेज खुलने की राह देखता काटता हूँ। घूमना-फिरना मेरा गाँव के फ्लैटों वाले रोड तक सीमित है। अब मुझे जो दुनिया देखने की ख्वाहिश है, ये पूरी ना होगी।

कोसने को मेरे पास उस सुरेन्दर को लेकर कुछ नही है। यूँ तो मैं अपने मन को कोस सकता हूँ, पर मन मेरा है। अपना है। सुरेन्दर मनीपुर का सबसे बकवास इंसान है। उसके मुँह से पहले बीड़ी निकलती है, फिर उसका धुँआ और अंत में उसकी बकवास। पहले उसकी बकवास सपना डांसर की नयी वीडियो ढूँढने को लेकर थी और अब सपना पूरा करने की है। उस पर एक नजर से कतई ना लगता है कि उसके कुछ सपने होंगे। कमतर आंकना भूल है। पर मेरे गुरूजी कहते थे कि “एस्पेक्टशन एंड एक्सेप्शन आर ऑलवेज देयर।” सुरेन्दर उन मानुसो में से ना है जिनके सपने घूमने-फिरने जैसे होते है। ये शौक शहरी चोंचला है। ये उन तक ही अच्छा है। पर इसके किटाणु संक्रामक है। बातों से फैलते है। सुरेन्दर ने घूमने-फिरने के किटाणु मुझे दे दिए है।

मैंने घूमना-फिरना दूर से देखा है। मेरे दोस्त कही ना कही घूमते रहते है। मनाली, लेह, लद्दाख, दार्जिलिंग फलाना धिमकाना। ये जगह मैंने किताबो में देखि है। वो वहां असल में घूमते है। मेरी बातों में जलन की बदबू दिखे मगर वो है नही। वो मेरी घुटन है। मेरी आसपास की घुटन। ये मुझे अच्छे से जानती है और मैं इसे। इस घुटन से बचने का तरीका है सैर सपाटा। ये बात मुझे पता है। पर इस सैर सपाटे की दवादारू महंगी पुड़िया है। सपने ऊँचे भले ही देखने बढ़िया आदत है। पर ऊँचाई महंगी होती है। यथार्थ में जमीन पैरो के लिए और नीचे मनुष्यो के लिए एक खाली जेब बड़ा ही बदसूरत आइना माफिक है।

लाईनो के मध्य अर्थ मत ढूँढना। ग़ुम जाओगे। अनेक बातों की एक बात है कि मैं एक आम आदमी है। मेरी साधारणता मेरी विशेषता है। मैं जिस चीज को छूता हूँ, वो साधारण हो जाती है। सपने महंगे है। मैंने उन्हें देखा है, पर छुआ नहीं। मैं मित्रो के साथ मॉल में घूमा हूँ। शोरूम्स में  ग्लास परे मॉडल को ताड़ा है। उनके पहने कपड़ो की कुशल कारीगरी और कपड़े की बुनावट को देखा है। शोरूम की लाइट्स और उसकी ए०सी० वाली ठण्डी हवा को महसूस किया है। उनमे आने वाली जनता के ढंग को देखा है। लड़कियों के गोरेपन पर उनकी हंसी को देखा और सुना है। मैकडोनाल्ड्स और डोमिनोस जैसे जगह पर खानपीन के वस्तुओं पर सोचा है। मॉल आगे खड़ी मर्सीडीज, ऑडी और BMW की लम्बी कारों को सराहा है। सिनेमा में एक बार घूमकर देखा है। सब कुछ ‘ए क्लास अपार्ट’ है। अब मेरे बताने के ढंग के ऊपर ना जाना कि मेरा तुम्हे बताना मेरी मजबूरी की पुकार है कि मुझे तुमसे मदद चाहिए। मुझे सब अच्छा लगा। परन्तु अच्छे लगने का अर्थ ये नहीं है कि उस वस्तु की जरूरत है। जहर का स्वाद भले ही श्रेष्ठ हो, परंतु उसे पीना श्रेष्ठ नहीं है। कुछ ऐसा ही हिसाब मेरा इन सब चीजो से है। गाँव में रहते हुए छोटी दुनिया में छोटी सोच विकसित की। अब ये जो शहरी कल्चर है, ये चोंचला है। जनता इसे फॉलो करती है क्योंकि वो कर सकते है। पर इसका मतलब ये नहीं की वो सब के लिए है। विज्ञापन देखना बुद्धि भंग करता है। अनावश्यक चीजो को जिंदगी का अभिन्न अंग दर्शाना इसका मकसद है। कुछ ऐसा ही इन सब शहरी चोंचलो के साथ है। इनका शहरी कल्चर इनकी शहरी जिंदगी का विज्ञापन है। मेरी सोच का दायरा सीमित भले हो, परन्तु सीमित सच बड़े झूठ से सही है।

सुरेन्दर बकवास इंसान है। एक दिन में सपना देखना और उसे पूरा करना, प्रेरणा मनुष्य को क्षणिक प्रेरित कर सकती है। कि वो अपने से ऊपर उठे और आगे बढे। परन्तु प्रेरणा दिमाग का नशा है। जितनी जल्दी चढ़ता है, उतनी ही जल्दी उतरता है। उसके घूमने-फिरने का बताना किस चीज की प्रेरणा थी, मुझे ना पता। वो अपनी फेंकू प्रवृति के लिये प्रसिद्ध है। उसका पिछला स्वप्न सपना डांसर के साथ पड़ोस के लखन के ब्याह में ठुमके मारने का था। उसका वो स्वप्न सच ना हुआ, पर उसने गाँव में सपना डांसर को प्रसिद्ध जरूर करवा दिया था।

मैं दिन को बैठकर देखूँ तो कुछ नया ना है। ये घूमने-फिरने की जो चुल्ल है, ये कल तक उतर जायेगी। फिर भी अभी ये दिमाग में घूम रही है, तो कुछ अजीब है। मन चंचल है। घूमने की सोच से खेलकर जब ऊब जायेगा, तो जल्दी ही कुछ नया पकड़ लेगा। बस मुझे तब तक अपने को संभालकर रखना है।

उपरोक्त लाईनो में स्वप्न है, बातें है, मज़बूरी है, दोस्त है, शौक है, गाँव है, शहर है, इनके लोग है, कार है, मदद है, बीमारी है, दवाई है, रूपए है, चोंचले है, सब है। बस वक़्त की कमी है।

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