बेटा, तूने सारी इज्जत लुटवा दी

मनीपुर में बीते सालों में पंचायत के चुनाव ना हुए थे। आसपास के गाँवों में हो चुके थे। पुराने सरपंच, पंचो को देखकर गाँव की जनता भी बोर हो गयी थी। पहले, उनको देखकर गांववाले जी-जी करते ना रुकते थे। जी आओ बैठो, जी सरकार हुक्का पी लो, जी सरकार बताओ नयी ताजा, जी म्हारा काम करवा दियो; सरपंच के लिए ये सब रोज की बात थी। बीते दिनों में ये सब चुकने लगा था। हुक्का तो दूर की बात, लोग बात भी मुँह बनाकर करने लगे थे। सरपंच मूर्ख ना था। वो सच जानता था। गांववाले उससे ऊब चले थे। पर चुनाव करवाना सरकार का कार्य था, इसलिए वो मजबूर था।

तो जब गाँव में चुनाव होने की खबर फैली, तो सारा गाँव खुश हुआ। सरपंच भी खुश था। अब उसे दोबारा इज्जत मिलने वाली थी।

चुनाव की खबर से सारा गाँव खुश था। पूरे गाँव का माहौल त्यौहार वरगा हो गया था। बैठके जमने लगी थी और हुक्के की मांग बढ़ चली थीं। चुनाव में कौन खड़ा होगा, किसकी क्या चाल रहेगी, कौन जीतेगा; बैठकों में इन मुद्दों पर हुक्कों की गुड़गुड के बीच जोर से बहस होती। इन बैठकों में बुजुर्ग अपनी खाट और पीपल के पेड़ तक सीमित रहे। युवा शक्ति इन्हें ठेकों तक लेकर गयी।

इस चहल के बीच सरपंच अपने घर पर रहा। वो उदास था। सरपंच रहते हुए उसे इज्जत की आदत पड़ गयी थी। अब उसे वो दोबारा ना मिलने वाली थी, इसलिए वो उदास था। चुनाव उसकी जगह उसका बेटा हरचंद लड़ने वाला था।

*****

हरचंद चुनाव को लेकर उत्साहित है। गाँव का सरपंच बनना उसका सपना है।

पिछले चुनावो में जब उसके पिता सरपंच बने, तो उसे कोई फर्क ना पड़ा था। सरपंच बनना कोई ऐसी उपलब्धि ना थी, जिस पर फकर किया जाए। उसकी यह सोच थी। पर इसे बदलते देर ना लगी थी। सरपंच बनते ही उसके पिता को ज्यादा इज्जत मिलने लगी थी। गलियों में चलते लोग राम-राम करते। हुक्के का पहला घूंठ उन्हें मिलता। ग्रामीण उन्हें सदा घेरे रहते। इज्जत का असर उनके घर पर भी पड़ा था। उसकी लिपाई-पुताई तो हुई ही, एक नया कमरा भी बना था। इज्जत भरपूर मात्रा में मिल रही थी, और सरपंच उसे चटकारे लेकर बटोर रहे थे। हरचंद ने इज्जत की पॉवर को अचंभित होकर देखा था। प्रभाव उस पर स्वाभाविक था। उसने गाँव का अगला सरपंच बनने की बात ठान ली थी।

*****

चुनाव में गाँव सरपंच के पद के दो उम्मीदवार आगे आये। पहला हरचंद, और दूसरा अर्जुन।

यह चुनाव पिछलों से भिन्न था। पिछले चुनाव बड़े-बुजुर्ग लोगो तक सीमित रहे थे। कारण दिया जाता रहा था कि गाँव का सरपंच एक अनुभवी और पढ़ा-सीखा हुआ इंसान होना चाहिए। एक जिसने घाट-घाट का पानी पिया हो और वक़्त देखा हो। पिछले चुनावों तक ये कारण चला। इस चुनाव में सरकार ने इस्कूल पढ़े-लिखे होने का नियम अड़ा दिया था। तर्क था कि सरपंच इंसान पढ़ा ना पर अक्षर पढ़ा हो। इस नियम के आगे सारे बुजुर्ग फेल हो गए थे। अब चुनाव युवा शक्ति लड़ रही थी।

हरचंद अपनी जीत को लेकर आश्वस्त था। अर्जुन को पूरा गाँव जानता था। वह सदा ठेकों या खेतों में पड़ा रहता था। ठेकों पर रहता तो दारू और खेतो पर सुट्टा पीता। वो भारी जेब वाला दिलदार था, तो गाँव की आधी युवा शक्ति उसके साथ रहती। उसके चुनाव लड़ने की बात से वो अचंभित हुआ था, पर खुश था। गांववाले कभी एक नशेड़ी को सरपंच ना बनायेंगे, वो ये सोचकर खुश था। अर्जुन के चुनाव लड़ने ने उसके सरपंच बनने का कार्य आसान कर दिया था।

*****

मनीपुर गाँव में चुनाव जीतने की तैयारियां शुरू हो चुकी है।

हरचंद को तैयारियों के लिए ज्यादा सोचना ना पड़ा था। बड़े-बुजुर्गो से उसे कोई मतलब ना था। उसके हिसाब से बड़े-बुजुर्गो का कार्य बस हुक्का पीना और खाट पर पड़े-पड़े शिकायत करना था। बदले में उसने किसी बड़े-बुजुर्ग के ना तो पैर छुए ना ही उन्हें इज्जत दी। उसके पिता सरपंच ने उसे चेताने की कोशिश की। बेटा बड़े लोगो की इज्जत करनी चाहिए, पिता सरपंच ने उसे कहा था। पर हरचंद ने उन्हें अनसुना कर दिया था। उसने अपना सारा ध्यान युवा शक्ति को खुश करने पर लगा दिया था। युवा शक्ति के हर वाहक को उसने अंग्रेजी दारु की बोतल तो दी ही, पर चकणे की दुकान पर अपने नाम से उनके लिए खाता भी खुलवा दिया था। उसने बड़े-बुजुर्गो का ख्याल ना किया, पर उन्हें मना भी ना किया। दिन में एक दो बुजुर्ग लोग जब उसके पास आते, तो खासी-ठण्ड की वजह बताकर लिटिल-लिटिल कहके बोतल ले जाते थे। उनका तर्क था कि लिटिल-लिटिल खाँसी का इलाज कर देती है।

हरचंद अपनी तैयारियों में लगा हुआ था। वही उसका प्रतिद्वंदी अपनी दिनचर्या में लगा रहता। उसने चुनाव जीतने के लिए कोई कार्य ना किया। रोज उठकर या तो ठेकों पर जाता या फिर खेतों में रहता। ऐसा प्रतीत होता था कि उसे चुनाव से कोई फर्क ना पड़ा था।

एक दिन, हरचंद अपने घर के बाहर खाट पर बैठा था। अभी एक पेटी युवा शक्ति को देकर आया था, तो आराम कर रहा था। सामने से अर्जुन आता दिखा तो बोला, “अर्जुन आज इस गली किस तरह?”

“भाई तुझसे मिलने आया बस।”, अर्जुन ने उत्तर दिया।

“आजा भाई। बैठके बात करेंगे।”

“और चुनाव की तैयारी कैसी चल रही है तेरी?”

“बस भाई सही है। तू बता।”

“भाई मैं भी कर ही रहा हूँ। सुन, कल पंचायत करवाई है। तुझे भी आना है। दोनों अपने-अपने विचार गांव के आगे रख लेवेंगे।”

“अरे भाई पंचायत तो ना आया जावेगा। खैर कुछ सेवा कर सकूँ तो बता दे?”

“यार ठेके पे बोतल ना मिल रही। तेरे पास बताई।”

इसके पश्चात, अर्जुन बोतल लेकर अपनी राह चला गया। हरचंद खाट उठाकर घर के अंदर चला गया।

*****

आज पंचायत है। पूरा गाँव पीपल के पेड़ तले इकट्ठा हुआ है। अर्जुन आराम से बैठा है। हरचंद नदारद है।

“हरचंद कहाँ है”, एक बुजुर्ग पूछते है।

“ताऊ घर पे ही है। बुलाया पर वो ना आता।”, एक युवा शक्ति का वाहक बोला।

“तो कोई ना। अर्जुन बेटा, तू शुरू कर।”

अर्जुन अपने स्थान से खड़ा हुआ। उसकी आँखें लाल है।

“गाँववालो, मैं अर्जुन हूँ। इस गाँव का निवासी। मेरे युवा भाइयो को मेरा नमस्कार, तो बड़े-बुजुर्गो को मेरा प्रणाम। पीछे बैठी मेरी माताओ को मेरा चरणस्पर्श। मैं सरपंच पद के लिए उम्मीदवार हूँ। मेरे पास कहने को ज्यादा कुछ नहीं है। आप ही की तरह, मैं भी इस गाँव में रहता हूँ और देखता हूँ कि इसमें कितने अभाव है। बच्चे इस्कूल नहीं जाते, गलियो में पानी भरा रहता है, बिजली मुश्किल से आती है इत्यादि। ये सब छोटी मुसीबतें है। सबसे बड़ी मुसीबत है कि गाँव का नौजवान नशे में फंसा है। इसकी वजह से वह निकम्मा हो गया है। गाँववालो, अगर मैं सरपंच बनता हूँ तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इस नशे की बुराई को जड़ से मिटाऊंगा।”

ये कहकर अर्जुन बैठ गया। गाँव के बुजुर्गो ने हरचंद के लिये दोबारा बुलावा भेजा, पर वो ना आया। अंत में उसके पिता सरपंच गए, पर वो फिर भी ना आया।

“वो पंचायत और गांव को कुछ ना समझता है। ऐसा सरपंच अपने किसी काम का ना।”, एक बुजुर्ग बोले।

“सही कहते हो आप। और तो पूरे गाँव में ये नशे वाली बुराई उसी की तो है।”, एक और बुजुर्ग बोल पड़े।

इसके बाद पूरा गाँव कुछ-कुछ बोलता रहा। इसका अंत अर्जुन को सबकी सहमति से सरपंच बनाकर हुआ।

*****
रात है।

हरचंद अपने कमरे में बैठा है। किवाड़ बंद है। किवाड़ पर हल्की दस्तक देकर उसके पिता बोलते है,
“बेटा, तूने कमाई हुई साड़ी इज्जत लुटवा दी।”

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