अपना तो इहा और उहा, यही ट्रेवल हो लिया

छुट्टियों लगभग बीत चली है। इसका मुझे आभास है, केवल कैलेंडर पर बदलती तारीख से नहीं, पर फेसबुक पर मित्रों की लगातार पोस्ट से भी। हर हफ्ते कहीं जाते है, फ़ोटो खीचते है और हैशटैग ट्रैवल, लाइफ, जर्नी इत्यादि लिखकर डाल देते है। उनकी मौज देखकर मैं और मेरी गली का फ्यूज फूंक जाते है।

कुछ साल पहले हमारे मनीपुर के बाहर खेत-ही-खेत थे। प्रचलित कथा के अनुसार उनमे किसान फसल उगाते थे। फसल उगाने में मेहनत, पानी और बीज बराबर लगता था। किसानों की ये जाति, इनका काम जनता को विचलित करता था। गाँव में अब इनकी जाति विलुप्त हो चुकी है। शायद ये किसी को प्रिय ना थे। इनके विलुप्त होने पर ना तो सरकार ने कोई सड़क या सरकारी भवन इनके नाम किया, ना ही कोई स्कीम निकाली। कोई एनजीओ वाला भी इनकी फ़ोटो खींचने ना आया। किसान किसी को अच्छे ना लगते थे।

किसानों के जाने के बाद गाँव में बड़े-बड़े बिल्डर्स आये। महज एक महीने बाद ही गाँव में डीएलएफ, अंसल, रहेजा और बाकी बिल्डर्स के बड़े-बड़े विज्ञापन लग चुके थे। इन विज्ञापनों में बड़ी इमारते थी,  वेस्टर्न वेशभूषा में झोला लटकाये हंसती कन्याएं थी, हरे-हरे बगीचे थे और चौड़ी सड़को पर भागती कारें थी। बाकी बातों का ज्ञान कम, पर उन कन्याओं ने खुश किया था। सोचा कि इमारतों में अगर ऐसी कन्याएं आई और उनमें से एक भी अगर सहेली बन गयी, तो जिंदगी सफल हो जायेगी।

किसान जा चुके थे। खेत खाली पड़े थे। अब उनमें पूरे दिन रेत उड़ता। बंजर पड़े आँखों को चुभते थे। गांववासियों से खेतों की ये दुर्दशा देखी ना गयी। उन्होंने खेतों का प्रयोग सुबह/शाम की सैर और हगने के लिये किया। इस कार्य में गाँव के प्रत्येक पुरुष, महिला और बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। मैंने भी इसमें अपना योगदान दिया था। किसानों का चले जाना गाँव के लिए अच्छा ही था। खेतों ने पूरे गाँव को एकजुट कर दिया था। सुबह/शाम की सैर ने गाँव के लोगों को जाति और अमीर-गरीब की संकुचित मानसिकता से ऊपर उठाया था। खेतों में सैर के दौरान कोई ऊंची या नीची जात ना देखता था। जातिवाद को ख़त्म करने में जहाँ बड़े-बड़े महापुरुषों को असफलता मिली थी, वही खेतों ने इसे कुछ ही दिनों में ख़त्म कर दिया था। किसानों का विलुप्त होना अच्छा ही था।

ये महान कार्य कुछ महीनो तक चला। बिल्डर्स के आने के पश्चात ये खत्म हो गया।

किसानो ने खेतों का प्रयोग फसल उगाने के लिए किया था। गांववासियों ने सुबह/शाम की सैर, हगने और एकता स्थापित करने के लिए किया। बिल्डर्स ने खेतो का प्रयोग, बड़ी-बड़ी इमारतों को बनाने के लिए किया।

बिल्डर्स को इमारते बनानी थी। इस कार्य को करने के लिए, वे क्रेनों, ट्रैक्टरों, डम्पर, ईंट-रोड़ी, सीमेंट और भैयालोग को लेकर आये। इन भैयालोग को मैंने दूर से कई बार देखा। ये सदा काम करते रहते। इनके सर पर या तो तसला होता या फिर प्लास्टिक की टोपी। कपड़े इनके सदा पसीने और सीमेंट से गीले रहतें। भैयालोग और इनकी औरतें जब काम करती, तब इनके बच्चे सड़क किनारे पड़े रहते। बिखरे बालों में रेत पड़ा रहता और कपडे ना के बराबर। छोटी झुग्गियों में ये बसते थे, जहाँ बिजली, पानी और हगने का कोई जरिया ना था। इनसे मेरी पहले कभी बात ना हुई थी, आज को छोड़कर।

खेतों के चले जाने के बाद अब शाम की सैर सड़कों पर होती है। छुट्टियों में पूरा दिन घर पर बीतता है। रोज उबाऊपन की हद पार होती है। आज पूरा दिन बीत गया, पर किसी से बात ना हो पायी। दोपहर में पड़ोस वाली औरतो की चुगली सुन लेता था, पर आज उसमें भी मन ना रमा था। बात करने को जी मचल रहा था। पर कोई ना था।

मैं सड़क पर चल रहा था। मेरे आगे एक भैयालोग था। पूरा दिन बात ना होने के कारण मन भारी था। एक दम विचार आया कि आज इसी से बात की जाए। एक बार ये सोचा, तो अगले पल मैं भी बोल चुका था, “और भैया, कैसे हो?”

अचानक बोले जाने पर वो थोडा स्तब्ध हुआ। पर फिर पीछे मुड़कर बोला, “अच्छे है।”

“और बताओ क्या किया आज?”

“बस भैया मजूरी की। अब रुपे मिले तो राशन लाते है।”

“और कहाँ के रहने वाले हो तुम?”

जवाब में उसने बिहार और किसी गाँव का नाम लिया था। मैं याद ना रख पाया, क्योंकि मेरा कोई इरादा ना था।

“और तुम यहां इतनी दूर आये कमाने को?”

“भैया आना पड़ता है। उधर काम नही है।  आप बताओ।”

“कॉलेज में पढता हूँ। तो छुट्टियां चल रही है। अब बस घूम रहा हूँ।”

“भैया अकेले काहे।”

“सारे दोस्त ट्रेवल कर रहे है। कोई मसूरी, कोई शिमला। मैं ना गया। अच्छा तुमने किया है कही ट्रेवल?”

“नहीं भैया। अपना तो बिहार और आपका गाँव, यही ट्रेवल है।”

इससे पहले मैं और बातें पूछता, उसका फ़ोन बज चुका था। जोर-जोर से। फ़ोन शर्ट की जेब से निकालकर वो बात करने लग गया। मैं वापस मुड़कर घर आ गया। वापस आते सड़क से नजर उठाकर देखा। ईमारत बन चुकी थी। बस पेंट करना रह गया था।

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3 thoughts on “अपना तो इहा और उहा, यही ट्रेवल हो लिया

  1. दो भारत, अंतर्द्वंद का मार्मिक चित्रण ,इमारत बन चुकी थी पेंट करना बाकी था ये बहुत कुछ कह रहा है।

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    • मित्र ऐसे वाकये रोज दीखते है। बस नजरअंदाज हो जाते है।

      आपका पढ़ने और टिपण्णी करने के मैं आभारी हूँ।

      Liked by 1 person

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