Short Story : माँ, शादी उलझन है (भाग – 2)

आज सातवाँ पीरियड गेम्स का था।

किसी पीरियड के वेकंट होने पर चलन था कि प्रिंसिपल मैडम किसी टीचर को भेज देती थी। आज जब हिस्ट्री की पुष्पा मैडम अनुपस्थित थी, तो प्रिंसिपल मैडम ने संजय सर को भेज दिया था। संजय सर पीटीआई थे। स्वभाव के शांत पर हट्ठी। आरम्भ में उन्हें गेम्स पीरियड के लिए मनाना मुश्किल था। क्लास के लड़को ने पढाई के प्रेशर से लेकर सब्जेक्ट की अच्छी तैयारी तक, सारी बातें कह दी थी। पर संजय सर का एक ही कथन था, “लड़को मैं तुम्हारी बात समझता हूँ। पर अकेले तुम्हारे कहने पर गेम्स पीरियड लगाना सही नही है।” फिर जब लड़कियों ने भी खेलने की इच्छा जताई, तो संजय सर के पास कोई बहाना शेष ना था।

लड़के फुटबॉल खेल रहे थे। लड़कियां पेड़ की छाँव में बैठी थी। प्रतीक्षा और पूजा, दोनों बैठकर घास की पाँख तोड़ रहे थे।

“तुझे पता है कल ‘सिया और हाथी’ में क्या हुआ?”, पूजा घास की और देखते हुए पूछती है।

“मुझे क्या पता। पूजा तुझे पता है ना कि मैं ये ‘सिया और हाथी’ और बाकी फ़ालतू शो ना देखती हूँ।”, प्रतीक्षा बोली।

“रहने दे तू,” पूजा ने नजर उठाई और प्रतीक्षा की ओर देखकर बोली, “सुप्रिया बता रही थी तेरे बारे में।”

अचानक राज खुलने पर प्रतीक्षा के मुख पर हैरानी के भाव उभर आये। सुप्रिया उस की दो साल छोटी बहन थी।

“झूठ बोलती होगी वो।”, अंत के क्षणों में भी स्वयं के बचाव में प्रतीक्षा बोल पड़ी।

“अब छोड़ ना ये दिखावा। बता कल का एपिसोड देखा तूने।”

“हां, देखा। बेचारी सिया का कैसे उस मोटे के साथ ब्याह कर दिया।”

“सही तो किया। वो भले हो मोटा, पर तूने पहले के एपिसोड में उसके गुण ना देखे क्या?”

“कैसे गुण?”

“वो छोटे बच्चों के साथ कितने प्यार से खेलता है। माँ-बाप का कितना लिहाज करता है। और तो, पूरा मोहल्ला कितना अच्छा बोलता है उसके बारे में। ये गुण।”

“तो इन गुणों का क्या है। सिर्फ इनके सहारे जीवन थोड़ी जिया जाता है। आदमी को दिखने में सलोना भी होना चाहिए।”

“देखने-दिखने में इंसान कुछ वक़्त बाद ऊब जाता है। पर गुण, मेरी प्रतीक्षा, आगे यही मायने रखते है।”

“ये कैसी बात कर रही है तू?”

“मेरे भैया-भाभी है ना। शादी से पहले दोनों एक-दूसरे से दूर ना हटते थे, सदा संग रहते थे। पर अब तू देख उन्हें, दोनों दिन भर के बाद जब मिलते है, मुश्किल से चार बात करते है।”

“पर…”

प्रतीक्षा के बात कहने से पहले ही, उन दोनों के पास फुटबॉल आकर गिरती है।

“ऐ पूजा। फुटबॉल दे जरा।” दूर से अविनाश बोला था।

“खुद ले जा।”

अगले पल पूजा प्रतीक्षा का हाथ पकड़कर उसे उठा ले गयी थी। प्रतीक्षा चल तो दी थी, पर उसने फुटबॉल की तरफ एक नजर देखा था। शायद उसने फुटबॉल देनी चाही थी।

*****

रात का वक़्त है। प्रतीक्षा टीवी के सामने जमी बैठी है।

“प्रतीक्षा रोटी बन गई। ले जा।” माँ रसोई से बोलती है।

“हां, आती हूँ।” टीवी के सामने बैठी प्रतीक्षा बोलती है।

थोड़ी देर बाद, माँ फिर बोलती है, ” सुप्पी, तू आकर ले जा खाना। इसको तो फुरसत ना।”

यह हर रात का रूटीन था। जैसे ही सात बजते, प्रतीक्षा टीवी के सामने बैठ जाती और तीन घण्टे बाद ही उठती। इन तीन घण्टो में, उसे किसी चीज की सुध ना रहती थी। वो खाना खा ले, माँ को कई बार टीवी भी बन्द करना पड़ता था। माँ और सुप्रिया, दोनों अनजान थे कि प्रतीक्षा को क्या दिखता था टीवी में। एक दिन पूजा ने उसकी इस आदत का हल्का-फुल्का मजाक बनाया था तो पूजा पूरे दिन उससे ना बोली थी। पता नही क्या था टीवी में जिस कारण प्रतीक्षा अपनी दुनिया भूल जाती थी।

“ऐ चुहिया, ले खाना खा ले।” सुप्रिया ने उसके सामने प्लेट रखते हुए कहा।

“हां खाती हूँ।” खोई हुई प्रतीक्षा बोली।

“खा ले जल्दी।” सुप्रिया बोली, “तेरा हीरो कहीं ना भागकर जाने वाला।”

इस बात पर प्रतीक्षा झल्ला उठी। आवेश में उठी और बोली, “माँ समझा लो इसे। फिर मेरे साथ मजाक कर रही है।”

“माँ मैंने कुछ ना किया। खाना खाने को कहा तो ये चिल्ला उठी।”

“माँ ये झूठ बोल रही है। इसने मेरे हीरो के बारे में बोला।”

“माँ झूठ ये बोल रही है। मैंने बस खाना खाने को कहा था।”

इससे पहले कि स्वयं के बचाव में और दलीलें पेश होती, कमरे में माँ का स्वर गूँज उठता है, “ऐ कनजरियों, दोनों चुप हो जाओ। सारा घर सर पे उठा रखा है। पढ़ने-लिखने के वक़्त कुछ ना करती दोनों, वैसे रौला कितना करवा लो। आन दो तुम्हारे पापा को।”

माँ की आवाज़ तेज और टीवी के कार्यक्रम की बैकग्राउंड स्कोर से भी ज्यादा उँची थी।

अगले पल दोनों बहने खाना खा रही थी। टीवी की वॉल्यूम भी कम हो गयी थी।

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