क्या कहलाता हूँ (Kya Kehlata Hoon)

तुम्हारी बातों में जाने क्या कहलाता हूँ,
बात सुनो, मैं सच बतलाता हूँ।

अपनी जलायी आग पे हाथ सेंकते हो,
मैं अगर बुझाऊँ तो बागी हो जाता हूँ।

हाथ-पाँव कीचड़ में सने रहते है तुम्हारे,
दामन साफ़ रहे मैं शहीद हो जाता हूँ।

मैं लूटता-पिटता खेत से बाजारों तक,
प्राण देकर तुम्हारा बेचारा किसान कहलाता हूँ।

तुम दुनिया ख़त्म करके भी महान हो जाते है,
तुम्हारे कहे इंसान मारके कौनसा इंसान रह जाता हूँ।

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2 thoughts on “क्या कहलाता हूँ (Kya Kehlata Hoon)

  1. तुम दुनिया ख़त्म करके भी महान हो जाते है,
    तुम्हारे कहे इंसान मारके कौनसा इंसान रह जाता हूँ।

    भाईसाब क्या कहने
    दिल छू गई ये कविता

    Liked by 1 person

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