Mere Dost

मेरे दोस्त
तेरे नाम एक पैगाम
तू जब तक मेरे साथ था
मैं मौज में था
जिंदगी और इसकी मुश्किलें
मुझे सताती नहीं थी
दिल या अंदर वाली कोई जगह
वहाँ से तुम्हारे ऊपर भरोसा उठता था
ये दिलासा रहता था
क़ि मैं अगर कुछ ना कर पाया
या किसी पड़ाव में हार मान बैठा
तो उस दौरान
तुम मेरे साथ बैठोगे
सामने जो मसला है
मुझे मेरी हार पर विचलित करता है
उस पर से ध्यान भटकाओगे
मजाक बनकर मुझे हँसाओगे
मुझे यकीन अपने पर कम था
तुम पर ज्यादा था
क़ि तुम मेरे साथ रहोगे
तो जिंदगी के सारे मजाक
मैं हंसकर सहन कर लूंगा
क्यूंकि इस बात से मैं अनजान ना था
की अंत में सब आँखें बन्द होंगी
तो मुझे संतोष होगा
क़ि जिंदगी सांसारिक अभावो में भले गुजरी
पर मेरे मन की सारी कमी तुमने पूरी कर दी थी

अब जब सब सामने है
धोखा खाया या फिर असलियत का साया
तो मुझे खुद पर हँसना आता है
आईना कभी सच ना दिखाता है
चेहरा इंसान का मुखौटा लगता है।

तू चला गया
कोई दुःख नहीं है मुझे
बस इस वक़्त खुद पर गुस्सा आता है
इतना भरोसा जो तुम पर जताया था
वो नाहक था
अब मैं अकेले बैठता हूँ
दीवार की और देखता हूँ
खाली वक़्त को भरने के लिए
यादों के पुराने जख्मो को कुरेदता हूँ
सोचता हूँ अपने-आप से
की कैसा लगता है
जब मनुष्य को ये आभास होता है
क़ि उसका स्वयं, उसका भरोसा, उसका विश्वास
सब कुछ बकवास था।

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