Tales from Moneypur: ए०सी०

मनीपुर की शाम। सूरज इस साल से जल्दी ढलने लगा है। पिछले साल खेतो में उसे वक़्त लगता था। फसले ज्यादा लम्बी ना होती थी। अब खेत बिक चुके है तो उनमे बड़ी-बड़ी ईमारतें है। उनमे सूरज ढलने में ज्यादा वक़्त ना लगता है।

निताश छत पर है। शाम को हवा चल रही है तो गर्मी से थोडा सुकून मिला है। बनियान पसीने से भीगी हुई है। नीचे कमरे में बदबू भी मारती थी। पूरे दिन लाइट ना आई। अब जब हवा उसकी गीली बनियान से टकराकर देह को ठंडक देती है तो लगता है कि पूरे दिन का पसीना आना इसी एक पल के लिए था। पूरे दिन गर्मी में पसीना पूछना और उसकी बू सहना, सिर्फ उस एक पल के लिए।

छत पर टहलते हुए वो सामने वाली छत की और देखता है। उसकी ये सालो की आदत है; किसी भी चीज की ओर एकटक घूरना और फिर खो जाना। आज भी यही करता, पर रोज सूनी होने वाली छत पर आज हलचल है। उसके पडोसी पत्री के हाथ में तार है। ‘जरूर साला ए०सी० के तार डालेगा’, निताश सोचता है। फिर अगले पल नीचे आ जाता है।

निताश को ए०सी० पसंद है। उसे ए०सी० की बनावटी ठण्ड पसंद है। पिछले साल जब पत्री ने ए०सी० लगवाया था, तब उसने ए०सी० देखा था। दीवार पर लगे सफ़ेद प्लास्टिक के डिब्बे में एक भीड़ी सी लाइन से आती ठंडी हवा उसे अच्छी लगी थी। पत्री की बहू ने उसे रिमोट से ए०सी० के फंक्शन भी दिखाए थे, वो भी अच्छा लगा था। कीमत निताश पूछता इससे पहले पत्री की माँ उसके पास आके कहने लगी थी।

“पूरा तीस हजार को लागो है। तीस हजार। पूरे मुहल्ले में सबतै पहली वो भी।”

निताश ने हिसाब लगाया था तीस हजार के हिसाब से अगर वो हर महीने भी रूपए बचाये, तो भी उसे ए०सी० लगवाने में पंद्रह महीने कम-से-कम लगेंगे।

“रै छोरे दीदे पाड़ के मतना देख् इसने। किती नजर लाग्गी तो।”

ये बात निताश को अच्छी ना लगी थी।

*****

गाँव के सरकारी स्कूल का प्लेग्राउंड। पहले बंजर पड़ा रहता था। पूरे दिन धूल-मिट्टी उड़ती थी। पर अब घास लगवा दी गयी है। अब शाम को वहाँ पूरा मनीपुर घूमता है। कोई वक़्त बिताने के लिए, कोई फ़ोन पे बतियाने के लिए, कोई कोने में पेपर पीने के लिये; सबकी जरुरत अलग-अलग है, पर इन सबकी जरुरत को सरकारी इस्कूल का प्लेग्राउंड पूरा करता है। गाँव की पंचायत से ज्यादा गाँव के लिए इस प्लेग्राउंड ने किया है।

निताश ग्राउंड के एक हिस्से में बैठा है। नजरें सामने टहलते लोगो पर तो हाथ घास उखाड़ रहे है।

“भाई निताश, यहाँ आज किस तरहिया?”

बिरजू पीछे से आकर निताश के बाजू बैठ जाता है। और इस से पहले की जवाब मिले, वो भी घास उखाड़ने में व्यस्त हो जाता है।

“आज घर मन ना लग रहा था। सोचा यूँ ही घूम लूँ।”

“भाई शाम को निकल ही लेना चाहिए घर से।”

“तेरा वो तहसील वाला काम पूरा हुआ?”

“हां भाई हो तो गया। पटवारी ने थोडा वक़्त लगाया पर होगा।”

“चल सही है। बस दो महीने और, फिर दोनों एडमिशन देखेंगे कॉलेज में।”

“हां भाई। और तेरा वो इंग्लिश वाला कोर्स कैसा है?”

“भाई कुछ ना है सिवाय वक़्त की बर्बादी के। ग्रामर पढ़ा रहे है और वो भी छठी क्लास वाली।”

“भाई इब वक़्त तो ख़राब हुआ ही करे। पर तू कुछ कर तो रहा है।”

“भाई ना के बराबर है वो। अब पता लगा इस्कूल से निकलने के बाद बन्दे की के औकात हो जाया करे।”

“भाई कुछ ज्यादा भारी बात ना कर रहा तू?”

“साफ़-साफ़ बोल रहा हूँ। इस्कूल से निकलने के बाद खुद देख रहा हूँ की बन्दे की कोई औकात ना रहती। कभी यहाँ घूम तो कभी वहाँ। और ये सारे कोर्स भी मजाक ही है।”

“भाई वो किस तरह?”

“भाई मजाक ही है। कहने को इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स है पर पढ़नी इस्कूल वाली ग्रामर ही है। इस्कूल में ध्यान देता थोडा तो आज वक़्त और रूपए इसमें ना बर्बाद करता।”

“भाई रूपए की तो समझ में आई बात। पर वक़्त कैसे बर्बाद कर रहा है?”

“भाई पेपर देने और कॉलेज में एडमिशन के बीच तीन महीने रहा करे। अब तीन महीने उस कोर्स में बर्बाद ही होवेंगे। इससे अच्छा तो कोई नौकरी कर लेता।”

“भाई ये तीन महीने खाली है। और खाली वक़्त बर्बाद ही हुआ करे। और नौकरी की बात मत कर।”

“नौकरी की बात क्यों ना करूँ?”

“भाई अपने गाँव के आस-पास देख। दो ही नौकरी दिखेगी – या तो गार्ड की या फिर बीड़ी फैक्टरी की। और ये काम करने से अच्छा है की घर ही रह ले।”

“पर शहर में भी तो है नौकरी करने को।”

“भाई शहर में कहाँ नौकरी करता तू और कहाँ इंटरव्यू देता। बात मान, 12वीं पास को कोई ना पूछता आज कल।”

“बात तो तेरी सही है बिरजू। और कोई बिज़नेस करने की सोचे तो?”

“भाई गाँव में लड़को का बिज़नस तो परचून की दुकान और लड़कियों का ब्यूटी पार्लर। और कौन सा बिज़नस हो सकता है यहाँ।”

कुछ खानेपीने की दुकान या फिर बुक डिपो जैसा कुछ। ये तो हो सके है।”

“भाई इस गाँव में तो समोसे और जलेबी ही बिकेगी। और बुक डिपो के लिए नकदी?”

“कह तो सही रहा है तू। पर अभी हमारे पास वक़्त है खूब। ये छोटी-मोटी कमी पूरी हो सके है।”

“भाई अपना वक़्त इन्ही कमियो के लिए कटेगा। और तो मुझे ना पता।”

“तो भाई इस जवानी का क्या करे? दुनिया बदलनी है और वक़्त भी है। तो कुछ भी तो क्या करें।”

“भाई दुनिया अपनी खुद सोच लेगी। जवानी में मजे ले। तू यूँ बता तेरी क्लास में तो लड़कियां होगी शहर वाली।”

“है तो सही। पर बात ना होती उन से।”

“करता ना होगा तू।”

“भाई फटती है उनकी तरफ देखते भी। हाई-फाई है वो और…”

इससे पहले की निताश पूरी बात कर पाता, बिरजू उठकर चल देता है। शायद बिरजू खम्भे में चसे बल्ब को देख कर उठता है। निताश एक पल उसकी और देखता है और फिर खुद उठकर चल देता है।

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