Tales from Moneypur : Angreji Speaking Course

अप्रैल चल चुका है।
मनीपुर में धीरे-धीरे गर्मी अपने आने का आभास करा रही है। धूप सवेरे जल्दी निकल आती है। दोपहर को गर्म हवा जिस्म को झुलसाती है। गाँव के बाहर गन्दा तालाब दिनोदिन सूखता जाता है। दिन में बिजली नहीं आती है। निकलते-मिलते लोग अपनी बातों में गर्मी का भी जिक्र कर देते है। और शाम को चुगलियों के आदान-प्रदान को महिलाएं भी देर से निकलती है। गर्मी आ गयी है, मनीपुर की हर इक चीज इस बात को दर्शाती है।

बीतें मार्च में 12वे दर्जे की परीक्षाएं हुई थी। परिणाम बाद में आएगा, सो तब तक गाँव की नयी जनता के काफी लोग बेरोजगार है। जो नहीं है, वो कुछ लोग खेतों में लावणी में लगे है, तो कुछ पास गाँव की बीड़ी कारखाने में चले जाते है।

निताश कुछ दिनों से घर पर था। तीन-चार दिन सब सही रहा है। पर पांचवे दिन से घर से कटने लगा। वो घर से उबा नहीं। बस घरवालों से हर इक बात पे बीड़ी फेक्टरी में जाने की जो सलाह मिलती, वो अब सही ना जाती। तो अब कुछ करने को, वो घर से निकल कर गुरुग्राम की राह पकड़ता है। इस सब में उसे पड़ोस का बिरजू मिलता है। बिरजू भी नया-नया बेरोजगार है।

“और भाई निताश, आज कहाँ?”
“कही ना यार। गुड़गांव जाऊंगा।”
“भाई गुड़गांव तो मैं भी जा रहा हूँ। मैं पूंछू क्या करने जा रहा है?”
“रेलवे रोड पे कुछ इंस्टिट्यूट है। उनमे जाकर इंग्लिश या कंप्यूटर के कोर्स की पूछ कर आऊंगा।”
“सही है भाई। अब कही जाकर पढ़ने से छुटकारा मिला तो अब भी तू पढ़ेगा।”
“पढता कौन है, बस टेम पास करने जाऊंगा। अपनी बता। क्या काम है तुझे आज?”
“भाई जाति प्रमाण पत्र बनवा रहा हूँ। आज तीसरा दिन है तहसील में। सरपंच ने तो साइन मार दिए पर ये पटवारी टरका रहा है।”
“इसका क्या करेगा तू?”
“दाखिला लूँगा कालिज में। इससे हो जायेगा।”
“अबे कॉलेज में क्या करेगा तू?”
“भाई बी०ए० करूँगा। सब वही तो करते है।”
“अबे वो सब तो सही है। पर 12वीं तो तेरी पर्चियों के बिसर कटी, कॉलेज में क्या हाल होगा।”
“वो सब देखा जायेगा। और पढ़ने को कौन साला कॉलेज जाता है। भाई कॉलेज में सैक्टरो की लडकिया आएँगी। बिलकुल शहरी। अंग्रेजी बोलने वाली। उनके साथ सेटिंग करूँगा।”

इस बात को ज्यों ही निताश सुनता है, हँसना शुरू कर देता है।

“भाई हँस मत। तू देखियो पटा लूँगा दो महीनो में।”

इतना कहते ही, तहसील का रास्ता नजर आता है। बिरजू टेम्पो वाले को रुकने को बोलके किराया देता है। टेम्पो किनारे पे लगते ही, बिरजू उतरकर तहसील ओर चल देता है।

*****

अमेरिकन इंस्टिट्यूट फॉर स्पोकन लैंग्वेज।

रेलवे रोड के बायीं तरफ, एक दो मंजिला ईमारत पर तीन बड़े-बड़े बोर्ड पर अंग्रेजी और हिंदी में ये लिखा है। एक हंसती हुई फिरंगी गोरी कन्या भी एक किताब लिए साइड में छपी है। नीचे अंग्रेजी में लिखा है – Spoken English Courses, Basic Computer, Tally ERP, Personality Development Classes. ईमारत के सामने दुपहिए आराम से खड़े है। टेम्पो से उतरकर थोड़ी देर चलने के बाद निताश इस बिल्डिंग के सामने खड़ा हैं। धूप ज्यादा है, तो अंदर चल देता है।

अंदर जाने के बाद ए०सी० की बनावटी ठण्ड उसे मिलती है। बाहर जहाँ धूप में सब जलता लगता है, अंदर आकर जन्नत लगती है। अच्छा लगता है। फिर जब सामने रिसेप्शन पर वो एक कन्या को देखता है, तो उसे और अच्छा लगता है।

“इंग्लिश स्पीकिंग क्लास्सो की जानकारी चाहिए।”

निताश के कंठ से मुश्किल से निकले ये बोल, रेसेप्शनसिस्ट को शायद सुनाई नहीं दिए। उनकी भी गलती नहीं है, उनका पूरा ध्यान उनके फ़ोन पर था। निताश के तीसरी बार बोलने पर, नजर उठाये बिना वे जवाब देती है,

” ₹1000 एडमिशन फीस है और ₹1250 मंथली। तीन महीने का कोर्स है। एडवांस पेमेंट पर 10% ऑफ है।”

“क्या-क्या सिखाएंगे?”
“इंग्लिश स्पीकिंग एंड थिंग्स।”
“अखबार में पढ़ा था की डैमो क्लास्से भी है?”
“अभी फुल है वे।”
“कोई किताब लेनी होगी?”

निताश के लगातार पूछताछ से शायद वो झल्ला गयी थी। एक पल नजर फ़ोन पे से उठायी, और निताश की तरफ एक पर्चा बढ़ा दिया। उस पल निताश ने गौर से उसके चेहरे पर लगा हुआ मेकअप देखा। कहाँ से लिपस्टिक की आउटलाइन शुरू होती है, कैसे-कैसे गालो पे पुताई हुई लगती है, नाक से निकलते एक-दो बाल, भड़कीली लाल रंग की लिपस्टिक, करीने से बनायीं हुई आइब्रो; उस पल निताश ने बहुत कुछ देखा।

*****

निताश इंस्टिट्यूट के बाहर खड़ा है। दूसरे किसी इंस्टिट्यूट में जाने की उसकी हिम्मत ना हुई।

साइड में एक जूस का ठेला है। उसके पास जाकर एक गिलास जूस बनाने को कहता है। जब तक की जूस बने और उसे मिले, उस खाली वक़्त में यहाँ वहां नजर मारता है। अचानक देखता है की अमेरिकन इंस्टिट्यूट फॉर लैंग्वेजेज की बिल्डिंग में से चार गोरी-गोरी कन्याएं निकलती है, दो स्कूटी पर सवार होती है और अगले पल निकल लेती है।

जूस वाला उसे गिलास थमा देता है। उसे हाथ में पकडे निताश मंद-मंद मुस्काता है।

*****

रात का वक़्त। बिजली नदारद। निताश के पिता खाट पर बैठके हुक्का गुड़गुड़ाते रहे थे की निताश की सामने खड़ा देखते है।

“हां इब के चाहिए?”
“आपा वो दाखिला लेना है।”
“इभी तो पेपर करकै हटा है। नम्बर भी ना आये पेपरआन के। इभी कित दाखिले लेवेगा?”
“वो आपा इंग्लिश सीखनी है।”
“आच्छा। कितने लेवेगा?”
“आपा पांच हजार।”
“रे बीड़ी फैक्टरी में चला जा इतने रपिये चाहिए तो। मैं ना देता।”

इतना सुनकर निताश अम्मी-अम्मी चिल्लाता है। चूल्हे आगे बैठी उसकी माँ नजर उठाकर देखती है। चूल्हे की आंच में धुएं की वजह से आँखों में आया पानी किसी को नही दीखता। आँखें मलती हुई वो बोलती है,

“रे निताश के बापू दे दे रपिये। के इन्हें धरर् के पूजेगा। इब तेरे तकिये नीचे पड़े ये रपिये न्यू तो ना है की रातू-रात बियावेंगे।”

“क्यूँ दूँ रपिये। बियाते ना तो ये फरी में भी ना आते। खेतां का काम करती हानी तो इसके जोर पड़े है। इब रपिये मांगते जोर ना पड़ता।”

“रे दे दे रपिये। तूने ना बेरा। घर पड़ा-पड़ा किमी करता तो ना, ऊपर तें इतणा काम खिंडा दिया करे। काल सारे लीकडे तोड़ दिए। पूछन पे कव्हे है की नुही तोड़ दिए। सारे फेर दुबारा लाने पड़े। इब तने के-के बताऊँ।”

“इसने बीड़ी फेक्टरी में भेज दे। सबतै सही रव्हेगा यो काम।”

“अर बना दे फेर नशेड़ी। मैं ना भेजु। तू चुपचाप रपिये दे दिए कल। किमी सीख ही लेवेगा।”

“चाल तो फेर टीक है। दे दूंगा काल रपिये। अर सुन छोरे तू, इबे इतणे रपिये देरा हूँ तो इनका बराबर की किमी बात भी सीखिये। चाल इब हुक्का भर ला।”

निताश हौले-हौले मुस्कुराते हुए हुक्का भरने चल देता है। पर अँधेरे में किसी को कुछ नजर ना आता है।

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