Tales from Moneypur : शांत चीकू

दोपहर का वक़्त है। मनीपुर प्राइमरी स्कूल की घंटी बज चुकी है। बच्चे दौड़ते हुए कमरो से बाहर निकलते है। इन्ही के बीच, चीकू, कंधे लटकाये और मुँह फुलाए, घर की और बढ़ता है।

***

चीकू घर आता है। सीधे टीवी वाले कमरे में घुसता है। उसकी बड़ी दीदी टीवी देख रही है। कदमो को पटक, चीकू अपने आवागमन की और इशारा करता है। इस पर, उसकी बड़ी दीदी, जिनकी नजर टीवी पर है, बिना नजर घुमाए कहती है,

“आ गया तू। चल अब हाथ-मुँह धो ले।”

मानो इस वाक्य को चीकू ने अनसुना कर दिया, दोबारा पाँव पटकता है। इस बार उसकी दीदी टीवी को छोड़, उसकी और देखती है। पाती है कि चीकू का चेहरा तमतमाया हुआ है और बालों में रेत भरा है।

“कहाँ लड़ाई कर आया आज? बड़ा रोब में हो रहा है।”

चीकू चेहरे के भाव बदले बिना, दीदी के चेहरे को एकटक निहारता है। फिर अचानक दीदी का अचानक फ़ोन बजने लगता है और कमरे में टीवी कार्यक्रम के डायलॉग्स के अलावा, फ़ोन से निकलकर ‘दिल दीवाना ना जाने कब खो गया’ के स्वर गूंजने लगते है। दीदी फ़ोन उठाकर उठती है और बोलती है,

“हां बेबी, आपका बड़ी देर बाद फ़ोन आया…”

बात पूरी हो पाती, इससे पहले ही चीकू भागकर दादाजी के पास चला आता है।

***

दादाजी अपने कमरे में खाट पर बैठे है। सामने हूक्के के साथ उनके टेम का साथी जयलाल भी हुक्का गूडगूड़ाता पड़ा है। दादाजी दोनों हाथों से चश्मे को पकड़, नजरों के दूर-नजदीक लाते है। शायद चश्में का नंबर बढ़ गया है। इतने में, चीकू आकर खड़ा हो जाता है।

“आ लिया तू। चल इब चलके किमी खा-पी ले।”

चीकू मुँह फुलाये खड़ा रहता है। दादाजी चश्मे को एक तरफ रखकर, चीकू की तरफ देखकर कहते है,

“रै छोरे आज के होगा। किमी बोलेगा भी या नुही दीदे पाड़ेगा।”

जयलाल ये सब देखता है। हूक्के का मुँह छोड़कर, चीकू की और देखता है। मानो स्तिथी का जायजा लेते हुए, चीकू की और देखता है। हूक्के से दूर होने का गम उसके चेहरे पर साफ़ दिखता है। शायद उसे कुछ बोलना चाहिए, यूं सोचकर बोलता है,

“छोरे म्हारी बात भी सुण लिया कर कदी। चल इब कोई ना, अपनी महतारी कने जा।”

दादाजी हूक्के का किनारा पकड़कर गूडगूडाते है। चीकू एकटक देखता है, फिर भाग जाता है।

***

माँ रसोई में है। अभी-अभी लस्सी बिलोके अलग हटी है। बाल सम्भवा रही थी की देखती है की चीकू आगे खड़ा है। हाल उसका अभी भी वही है। बाल इधर-उधर जिनमें रेत पड़ा हुआ है, चेहरा लाल और गाल फूले हुए। आँखें लगभग भर आई है। मानो अभी रो पड़ेगा।

“आ गया मेरा लाल। ये क्या हाल बनवा रखा है। चल जाके कपडे बदल ले और खाना खा ले। लस्सी अभी अभी निकाली है।”

“मुझको ना खाना खाना। मुझे आपसे बात भी ना करनी है।”

“क्यों रे? सुबह वाली बात लेकर अभी भी गुस्सा है क्या?”

“हाँ। पापा ने मुझे क्यों मारा? मैं तो बस राजू को रोटी पकड़ा रहा था।”

“अरे मेरा भोला बेटा। कहा मारा। बस एक दो हलकी सी चपत ही तो लगायी थी।”

“थप्पड़ मारे थे जोर से। और वो भी यूँ ही की मैं राजू को रोटी दे रहा था।”

“बेटा राजू गन्दा है। तू उसे छु लेता तो तुझे शुद्ध होना पड़ता। पंडत को बुलाना पड़ता। पूजा करनी पड़ती। समझा।”

“पर क्यों?”

“अब मुझे नहीं पता ये सब। चल अब कपडे बदल ले। तेरे पापा भी आते होंगे।”

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