LOVE LOVE LOVE

There is an ache in my heart. I am not being poetic, just speaking figuratively. I think I have fallen in love.

बीते सात दिन घर से बाहर थे। कल रात घर आया। सुबह सबने पूछा, कहाँ थे? जवाब मे इतना कहा की यही था। अब यही के रूप में तो मुझे खुद नहीं पता की किसको क्या कहूँ। दूसरो की लिखी बातों को सच मानता हूँ, तो शायद कुछ सच लिखने की जुर्रत करू।

मेरे 7 दिन एक कैंप में बीतें। कैंप किस चीज का था, ये ना बताऊंगा। अपने तक रखूँगा। बस यह जान लो की कॉलेज में था। अगला मुद्दा यह की इस कैंप में, सात दिन में, मैं काफी तौर पर ढला और बदला।

सात दिन पहले
मेरी कैंप में जाने की कोई ख्वाहिश ना थी। 8 बजे पहुँचना था। मंजिल दूर थी तो घर से एक घंटे पहले निकलना जरुरी था। अब 7 बजे अनमने ढंग से अनमने काम के लिए निकलना मुझे किसी बुद्धिमता वाला काम ना लगा। पर दोस्तों का जोर था, तो करना पड़ा।

8 बजे से कुछ समय पहले ही कैंप पहुँच गया। थोड़ी देर बाद और जनता आने लगी। फिर इसमें थोड़ी देर और लगाकर गुरूजी भी आ गए।

सारे स्टूडेंट्स आ चुके थे। हम दरी के ऊपर पेड़ के नीचे बैठे थे। हवा मंद पर शीतल थीं। किसी किसी वक़्त जब देह से टकराती तो थोड़ी सिहरन सी दौड़ जाती। पर धूप पूरे शबाब पर थी। शरीर से टकराके उसे झुलसाती नही पर गर्माती थीं। उस पल अच्छा लगता था।

हम सब लाईनो में बैठे थे। एक और लड़के तो दूसरी और लड़कियां। जैसी की  जवानी की चुल्ल है कि विपरीत लिंग वाले इंसान को सदा प्रभावित करना है। ठेठ शब्दों में लड़को को लड़कियो को सेट  करने के चक्कर में सब लड़के कुछ ना कुछ कर रहे थे। एक दूसरे के ऊपर पॉइंट मार रहे थे, व्हाट्सअप जोक्स का जोर से उच्चारण कर रहे थे और इन सब के बीच हो-हो करके हंस भी रहे थे। एक बार बात हो जाए बस कुछ यूँही पूरा जोर लगा रखा था। इन सब के बीच मैं मोबाइल में नजरें गड़ायें बैठा था। लड़कियों से बात करने में झिझक सदा अंदर रही थी, पर अब फटती थी। सो इसके डर से मुँह बंद था और नजर नीचे।

टीचर आये। आकर उन्होंने कैंप के बारे में थोडा बताया। बताया की क्यों हम वहां थे, हम वहां क्या करेंगे, हमे क्या करना चाहिए इत्यादि। किताबी सवालो के सभी जवाब उनके पास रटे-रटाये थे, वो बता रहे थे। असली सवाल जैसे की लड़कियो से बात करवाने को कहने की हिम्मत हम में ना थी, तो हम पूछ नहीं रहे थे।

जैसे उनका कहना शुरू हुआ, हमारा समाप्त हुआ। हम सबको परिचय देना था, और वो भी स्टेज पर जाकर। स्टेज से मुझे बचपन से डर लगता रहा है। वो अब भी लगता है। स्टेज पर जाकर विचार थम जाते हैं और मुँह बंद हो जाता है। मुझे बचपन में लगता था की किसी शोर मचाती क्लास को चुप कराने का साहस अच्छा तरीका था की उसे स्टेज पर चढ़ा दिया जाए। खैर सब परिचय दे रहे थे। पहले एक लड़का, फिर लड़की। मेरी बारी आने वाली थी, पर मुझसे पहले एक लड़की की बारी थी।

वो उठी और स्टेज पर गयी। नजरों को वो सुन्दर लगी। अत्यंत सुन्दर। पर जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो सच में, दिल आ गया उनपर। हर शब्द उनके मुख से जो निकला, जब मैंने सुना तो लगा की दुनिया कितनी बेहतर जगह है। उनकी बात जब तक समाप्त ना हुई नजरें उन पर रही। ज्यादा कुछ ना कह पाउँगा उनकें बारे में, अगर कोशिश भी करूंगा तो सब बनावटी लगेगा। फेक लगेगा। पर ऐसा नहीं है। बात यह की औरतो की प्रशंसा में पहले ही बहुत कुछ लिखा या कहा जा चुका है और जिंदगी ने पहले इसके ज्यादा मौके ना दिए की किसी औरत की प्रशंसा कर पाऊं। पर कुछ लिखूँ तो शायद उनके लिए कम हो। वो अपना परिचय हंस कर दे रही थी। खुश लग रही थी। एक किताब उनके सामने रखी थी। उसमे एक पल देखती तो फिर बोलती। अपने बारे में उस किताब में लिखा होगा। और लिखा होगा तो जरूर वो पढ़ती भी होंगी। मन में ख्वाहिश हुई की उनसे बात हुई तो किताबों के बारें में जरूर बतियाएंगे। इस बीच उनका बोलना समाप्त हुआ तो तालियां गूंज उठी। हमने भी अंत तक बजायी। दिल को तो पहले ही पसंद थी, अब दिमाग ने भी हामी भर दी थी।

अगली बारी मेरी थी। डरते, गिरते, पड़ते स्टेज पर पहुँचा। वहां जाकर वही काम हुआ। मैं चुप हो गया। इसके बाद क्या हुआ, मुझे पता नहीं। बस मैं लौट आया ये कसम खाता हुआ की मैं अब कभी ऐसे काम ना करूँगा।

खैर पहला दिन बीता। कुछ यूँ बाकी दिन भी बीते। वो नजरो के सामने थी। वक़्त बेवक़्त नजरे घुमाकर दीदार भी किया। सदैव हंसती, खुश दिखती। लगा की धरती पर उनका आना भी हँसते-हँसते ही हुआ था। दो तीन बार उन्होंने स्टेज पर जाकर बोला भी। ख्वाहिश थी सुनते रहे। सुनने के लिए बोलना भी जरुरी है, पर कभी उनसे बात करने की हिम्मत ना हुई। झिझक मुझे ले बैठी। और मैं मेरी झिझक को लेके कोने में बैठ गया। प्यार हो गया लगता था मुझे।

आज आठवाँ दिन है। कैंप ख़त्म हो चुका है। उनकी बातें ख़त्म हो चुकी है। उनके दीदार के मौके समाप्त हो चुके है। पर मेरे विचारो में वो अब भी है। और शायद चिर तक रहे।

रात के 11 बज चुके है। दिन ख़त्म होने को है, तो सच बोलने को जी करता है। और सच ये है की उस वक़्त जब उनके तालिया बजी, तब मैं अकेला नहीं था। भीड़ थी। उस भीड़ में मैं एक गुमनाम चेहरा था। और उस भीड़ में हर एक बन्द उन्ही की बात कर रहा था। अब मुझ में कोई ख़ास बात तो है नहीं। औसत छोटे गाँव का बन्दा हूँ जिसकी कोई वास्तविक पहचान नहीं। खुद को कमतर नहीं आँकता, पर फिर भी सच कहता हूँ। झिझक से मैं उनसे बात भी ना कर पाया। अब जब दिन कट चुके है तो खुद को रात के इस वक़्त में कोसता हूँ।

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