मनीपुर : प्यार का किस्सा

रात का वक़्त है। मनीपुर में रोज की तरह बिजली नहीं आ रही। रात के अँधेरे में, निताश अपने छोटे भाई को अपने स्कूल के किस्से सुना रहा है।

मनीपुर का सरकारी इस्कूल। यह भी बाकी सरकारी इस्कूलों के जैसा था। पीली दीवारे जिन पर सालो पहले पुताई हुई थी, जगह-जगह से टूटा हुआ फर्श, कमरो में सीलन की झलक, रेत और मकड़ी के जालो से भरी दीवारे, एक और से तोड़ी हुई चारदीवारी; इस्कूल का हर एक पहलू इसको एक टिपिकल सरकारी इस्कूल बताता था।

देहात का इस्कूल था। तो देहात के ना लिखे नियम चलते थे। अब वो ज्यादातर नियम तो याद ना रहे, पर उनमे से एक नियम सदा याद रहता जो की लड़को और लड़कियो के बीच की दूरी को लेकर था। यह नियम याद रहा क्योंकि इसी को लेके देहात से नफरत हुई थी।

नियम था की लड़के और लड़कियो को इस्कूल में जितना दूर हो सके उतना दूर रखा जाए। पता ना किस चीज को लेकर ये नियम था। पर था तो निभाना पड़ता था। ना निभाना अलग बात थी, पर इसे तोड़ने पर घरवाले और मास्टर दोनों तोड़ते थे।

तो बात 11वीं की है। साल बदला। नए दर्जे में आये। पर बदलाव बस यही तक सीमित रहा। पर उस साल, लड़कियो वाले सेक्शन में एक नयी लड़की आई। उसके आने पर उसको देखा तो नहीं, पर उसके बारें में बातें सुनी। बातें अलग सुनी उसकी, तो वो अलग लगी।

देहात में लड़कियो को शायद दबाकर रखा जाता था। उन दिनों मैंने उन्हें कभी ऊँचा कहते ना सुना था। हौले हौले आपस में बतियाती थी। बातें उनकी जैसी होती थी। हंसती भी दबकर थी। घर भी यही और इस्कूल में भी यही हाल था। उनके रूम से कभी शोर ना आता, भले ही मास्टर ना होता। उनके कमरे में होने का पता मास्टर की पढ़ाने वाली आवाज से ही लगता था। अब ऐसे देस मे कोई ऐसा आये जिसके लिए बातें ख़त्म ना हो, तो अजीब लगा।

बातें बातें कम, अफवाह ज्यादा लगती थी। उसे आये दो महीने का समय ना हुआ था, पर फिर भी हर लौंडे की जुबान पर उसके चर्चे रहते थे। एक कहता की मुँहफट है, बोलती रहती है। दूसरा कहता की शहर से आई है, बालों को अलग इश्टाइल में रखती है। तीसरे ने कहा की फलाने के साथ इसका चक्कर है। चौथे ने कहा की वो छोड़ दिया इसने और नया बना लिया। अब ये गिनती शायद बीस तक चली, पर इतना जरूर था की वो हर एक की बातों में थी। और हर एक के पास कुछ नयी बात थी। अपनी बात करे तो हमने ज्यादा ना सोचा उसको लेके, बस ज्यादा देखा।

तो हमने उसे देखा। जब मौका मिला तब देखा। और बातो को जब गौर में लिया तो सच में वो अलग थी। वो मुँहफट थी। खुलके बोलती थी। पर खुलके हंसती भी थी। बालों को कुछ अलग हिसाब से बांधती थी। चश्मे लगाती थी। इस्कूल की लेडी टीचर भी उसी की बातें करती। क्लासरूम में उसकी आवाज गूंजती थी। चुप लड़कियो में एक वो सदा बक-बक करती रहती थी। कई मायनों में अच्छी भी लगने लगी थी। दिन बीतने लगे। जब मौका मिला उसे देखा। अब जब लड़के उसके बारे में उल्टा-सीधा बोलते तो बुरा लगता। उन्हें चुप कराने का भरपूर जी करता। शायद दिल अपना चुतिया कटवा  चुका था। हमे पता था। पर अच्छा लगता था, सो हमने चलने दिया।

दिन बीते। महीने बीते। साल बीता। पर लड़को की बातें ख़त्म ना हुई। वो सब सुनकर दिल थोडा दुखता, पर ये वो लड़के थे जिनका मानना था की भैंस जमीन और जोहड़ दोनों जगह पर रह सकती है, सो उनकी बातो पे विश्वास कभी ना हुआ। पर मन में कभी-कभार जरूर खटकी।

एक और साल बदला। 12वीं क्लास में दूसरे गाँव से एक लड़का आया। रविश नाम था।  पूरा खालिस देसी। उसकी बातें कभी ख़त्म ना होती। पूरी क्लास को हँसाता। मास्टर को बातों में लगा लेता। शुरुआत में बावलितरेड लगा, पर जब बातें हुई तो लगा की मैं गलत था। बन्दा दिमाग वाला था। इस दौरान थोडा पढाई में मन लगाया तो उस चश्मे वाली से थोडा दूर हुआ।

छुट्टियां पड़ी। ख़त्म हुई। दोबारा गया तो अब की बार रविश के साथ एक दो बार बैठा। बन्दे की बातें टाइमपास के लिए परफेक्ट थी। ऐसी 5-6 बैठक हुई। उसकी और मेरी बातें चली। वो ज्यादातर अपने बारें में कहता रहता। फिर एक दिन उसने अपनी बातों में उस चश्मे वाली का जिक्र किया। मैं सकपका गया एकदम। पर पता ना लगने दिया। उसने बताया की उसकी चश्मे वाली से बात हुई थी और उन दोनों का चक्कर चला था। वो कुछ हफ्ते चला और फिर उसने नया ढून्ढ लिया। शुरआत में यकीन ना किया, पर फिर उसने कुछ चीजें ऐसी दिखाई की यकीन दिल मसोसकर करना पड़ा। उस दिन दिल टूटा। और टूटा भी तो साला कुछ शोर ना हुआ।

12वीं के पेपर नजदीक थे। तो प्यार तो हमसे पूरी साल ना हो पाया था, तो पढाई की कोशिश की। हमारे पेपर का सेण्टर हमारा इस्कूल ही था। चीटिंग भरपूर होती थी। पर अब की बार फ्लाइंग और सुपरिन्टेन्डेन्ट सख्त था। साले ने चीटिंग ना करने दी। लास्ट पेपर का दिन है। मैं पेपर देकर बहार बैठा जूते पहन रहा था। वो बाहर आई। मेरी तरफ देखा। एक पल के लिए नजर मिली। पर फिर वो चली गयी। उस पल में जब नजर मिली थी, तो कटवाने के लिए मैं फिर से तैयार था। पर दिमाग ने बचा लिया।”

“दादा तुमने दो साल तक एकतरफा प्यार किया। आप या तो मूरख थे या पुराने आशिक़। खैर, उसको उस दिन के बाद देखा आपने”

“कॉलेज में मिलती थी रोज। पर वहा वो और मैं भीड़ में खो गए। फिर न मिले कभी।”

“दादा कैसा होता अगर वो और आप एक हो जाते तो?”

“बस अब सो जा। सवेरे इस्कूल भी जाना है तुझे।”

“गुड नाईट दादा।”

“सो जा।”

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