Ek baat suno meri

ना कभी किसी से उम्मीद रक्खी
ना कभी किसी को लेके चीखा चिल्लाया
बस एक चीज की ख्वाहिश है आज
मेरी आवाज़, मेरी बात सुनो।

सुना भी और देखा भी कि दुनिया बड़ी है
काफी प्रकार के लोग है इसमें
पर फिर भी इस भीड़ में
एक जिंदगी क्यों मायूस है, तन्हा है।

लोग गोरे काले ऊपर से
पर दिल के काले होने का क्या जोर है
इंसानो पे चलता खूब जोर है
क्या कभी विचारो पे किया गौर है।

सजना-संवरना भाता है
शीशे में अपने आपको बख़ूब देखा
पर ये भीतरी सुंदरता कौनसी है
कोई शीशा है इसका तो मुझे भी दिखाना।

जीभ मुलायम है
फिर इतने कटु प्रहार कैसे करती है
क्यों चुभते है बोल इसके इतने किसी को
क्या ये सब कुदरती है।

बच्चों में भगवान् बसता है
धरती पर ये भगवान् का रूप है
पर जब तुम्हारा भगवान् सिग्नल पर तुम्हे बुलाता-पुकारता है
तो उन्हें धमकाना फिर मंदिर में जा मनाना क्या है।

कहने को सब अथवा एक इंसान है
फिर कहलाने को सब क्यों अलग है
ये क्या झोल है भाई, क्या माया है
जो इस दुनिया को यही बनाना तुम्हे भाया है।

सवाल खूब उठाये मैंने
जवाब ढूँढने मेरे बस में नहीं है
बस एक बहाना है की सिर्फ इंसान ही हूँ यारो
बात सुनी आपने, सो आभार व्यक्त करता हूँ।

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