Tales from Moneypur : Marriage in Moneypur

नवंबर है। जाड़े के दिन आ चुके है। दिन में मौसम जहाँ हल्का-हल्का ठंडा रहता है, रातें बिलकुल उल्टी है। कंपकपी चढ़ा देती है। बिना रजाई के तो रात गुजारनी मुमकिन ही ना है।

जाड़े का मौसम मुझे तनिक भी अच्छा ना लगता है। सवेरे उठके जब नहाना पड़ता है, तो खुद पे सबसे ज्यादा दया आती है। अब जब दिन की शुरुआत ही इतनी दर्दनाक है, पूरा दिन तो मुश्किलो के ही नाम है फिर तो। खैर, जाड़े का मौसम मुझे इतना भी बुरा न लगता है। कुछ बातें  अच्छी भी होती है। इन दिनों में, शादी-ब्याह के प्रोग्राम होते रहते है हमारे मनीपुर में। तो उनमें खाने-पीने की सही मौज रहती है। पूरे गाँव में भले ही किसी लड़के का लगन हो या लड़की की बरात आई हो, मेरी हाजरी तो पक्की रहती है।

हाँ तो भाई परसो एक ब्याह में जाना हुआ। श्यामचंद की लड़की की शादी थी। करोडो की जमीन बिकी थी, तो सोचा खाने पे अच्छे रूपए लगाये होंगे। घरवालो से कन्यादान के रूपए लिए और पहुँच लिया। कन्यादान किया और ली प्लेट हाथ में। पनीर की सब्जी ली और नान ली। सब्जी तो आसान रही, नान लेने में बहुत मुश्किल हुई। नान वाले तंदूर के आगे प्लेट हाथ में लेके खड़ा रहना पड़ा। बड़ी टुच्ची फील आई। पर फिर जब थोड़ी देर में हाथ-पैर मारने के बाद प्लेट में तीन नान थी, तब अच्छा लगा। म्हनत का फल मीठा तो न, पर पनीर के साथ अच्छा ही लगा।

शादी वाली जगह का माहौल भी निराला ही था। बच्चे यहाँ-वहां पकड़म-पकड़ाई खेलते तो मेरी उम्र की जनता खुद की फ़ोटो ले रही थी। वो भी पूरी इश्टाइल में। हाथ टेढ़े-मेढ़े करके, नजर ऊपर उठाके और् भी पता न क्या-क्या। मुझे क्या था, फ़ोटो तो कभी अच्छे आये ना तो खाने पे कंसन्ट्रेट किया। नान-पनीर के बाद गुलाबजामुन खाये। फिर गोलगप्पे खाये। जितने रूपए का कन्यादान न किया, उससे ज्यादा का खा लिया। गोलगप्पे खाते वक़्त एक दम पटाखे छुटने लगे और डीजे पे गाने की आवाज आई की सुपने में रात ने आई वा करगी चाला रै। बारात आ गयी थी शायद।

तो भाई खा पी लिया पेट भरके। बाहर निकला। बाहर दूल्हे की घोड़ी के आगे कुछ बात हो रही थी। श्यामचंद हाथ जोड़के हमउम्र बन्दे के साथ बात कर रहा था। दूल्हा घोड़ी पे बैठा यहाँ-वहाँ ताकने लग रहा था। एक बार उसने मुँह फाडके उबासी भी ली थी। दूल्हे के आगे बैठा बच्चा भी बोर होता लगता था। पर पीछे बाराती डीजे पे मस्त थे। ब्राज़ील ढोल मिक्स वाला गाना चल रहा था। जनता हाथ-पैर हिलाती-मारती बेसुध थी। घडी में देखा, साढ़े आठ हो रहे थे। घर वापस जाना था। पर श्यामचंद के हाथ अब भी जुड़े हुए थीं। घर पहुचके हाथ-पैर सीधे किये और अंगड़ाई ली, पर श्यामचंद के हाथ तब भी जुड़े दिख रहे थे।

सुबह हुई। रविवार था। खेतो में लावणी करने जाना था। रास्ते में भुरु मिला। वो भी शायद लावणी करने जा रहा था। मिलते ही कहा की तुझे पता कल क्या हुआ। मन में पहले बात उठी की शायद श्यामचंद के जुड़े हाथो का अब पता लगेगा। ना में सर हिलाया। तभी भुरु बोला, “कल वो श्यामचंद की छोरी अपने आशिक के साथ फुर्र होगी। और दूल्हे वाले अब दहेज़ वापिस ना कर रहे।”

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s