इक फ़ालतू बकवास

ये धनतेरस नहीं है। उनके लिए होगी जिनके पास मनी है, मैं तो आज भी धन को तरस रहा हूँ।

साली 10 घंटे की नौकरी और फिर घर पे बहन और माँ की छोटी छोटी चीज पर झिकझिक, कई बार तो यूँ लगता है की मैं पैसे के पीछे नहीं, वो मुझे अपने पीछे भगा रहा है। और जितना पास जाता हूँ, उतना दूर हो जाता हूँ। साली ये लाईने अगर आशिकी में किसी लड़की को कहता, तो उसका रिस्पांस भी शायद कुछ पॉजिटिव ही होता। पर लड़की तो कोई ना थी, ना है और जिस तरह मैं रंडीरोना करता हूँ, मुझे तो कोई मिलेगी भी नहीं। और तो और, मुझे इस जिंदगी से प्यार है, और इस जिंदगी का मिजाज भी कुछ ऐसा ही लगता है।

भाई सूरज सर पर है, बिलकुल सुचा सुचा बोलता हूँ। इस्कूल के वक़्त में मैं भी जिंदगी का आशिक़ था, इसे जीना चाहता था, इसके हर इक पल को अपने मुताबिक ढालना चाहता था। पर सुच्चि बात है, किताबी ज्ञान उनमें ही सही है, ये साली दुनिया सिर्फ धन के ऊपर चलती है।

कई बार तो सोचता हूँ की क्यों अपनी जिंदगी इस टुच्ची सी नौकरी के पीछे ख़राब कर रहा हूँ। हिम्मत वालो के लिए तो आसमां आखिर है। पर करू भी तो क्या करू, ये साली सरकारी नौकरी नाम की चीज तो जैसे की कभी मिलेगी ही नहीं। फारम भर भरके पक गया हूं, ये साली नौकरी तो मिलती है नहीं, बस वक़्त बर्बाद होता रहता है। बस दिलासा है दिलासा, ये साला दिल भी बड़ी कुत्ती चीज है। हलकी सी बहलाने वाली बात बतादो, साला अभी की अभी हवा में किले गड़वा देगा। क्या करू, बेबस रहते हुए इस बेबसी की आदत सी हो गयी लगती है। ओह! बारह सताईस हो गए, चलता हूँ, लंच ख़त्म होने को है।

चाय वाले के पास 5 रूपए का सिक्का फेंकते हुए, वो निकल पड़ता है अपनी 10 घंटे वाली नौकरी करने को।

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