Gujaarish

रात्रि आकाश में टिमटिमाते तारों के औंधे,
ये हवा के झोंके चुपके-से मेरे पास से गुजरते है,
मानो दिन की बिखरी बातों को कान में फुसफुसाते है,
‘तुमने उन्हें देखा। वे खूबसूरत थी।’

वो वक़्त, उसका हर-एक लम्हा मुझे बख़ूब याद है,
बेमन पटकते पैर चलते नजर तुम्हे तलाशती थी,
हँसते-लुत्फ़े-मंजर में युगलों के द्वारा उठी खीज,
मेरे पेशानी के शिकनो के बीच स्वाभाविक थी।

अब ये चन्द पंक्तिया आपके पास आकर कहे,
कि बन्दे के दिन-रात आपके तसव्वुर में कटते है,
तो ये बात कहने लायक कम कहकहा अधिक प्रतीत होगी,
उस लम्हे में, एक मेरी आपसे गुजारिश होगी,
हां-ना की कश्मकश टालके बस खिलके हँस दीजियेगा।

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