चुनाव

सर्दी अपने परवान पर है। मनीपुर गाँव में चौपाल की आग बुझ चुकी है। सारे ताऊ, चाचा और युवा शक्ति के वाहक अपने घरो में दुबके पड़े है। पूछने पर यही पता चलता है को सर्दी ज्यादा है। यह बात उनके मुँह से कुछ अजीब लगती है जिनके लिए गाँव का चुनाव इंडिया और पाकिस्तान के मैच से बढ़कर होता था।

सीन एक उम्मीदवार की बैठक का है। उम्मीदवार वो अपने परिवार और कुछ लोगो और ब्लाक समिति के है। चार पांच लोग बैठे है। चर्चा चल रही है की कौन वोट देगा और कौन वोट काटेगा। बैठक की मेन जनता, उम्मीदवार,  उसका भांजा, और उसका बेटा है। उनके साथ उनके जो शुभचिंतक बैठे है, उनकी खातरदारी चल रही है। जितनी बातें चल रही है, उतनी पेग की बाजियां भी।

उम्मीदवार हरचंद, को मनीपुर की जनता डलेवर के नाम से भी जानती है। जाना अगर उसे इस नाम से ज्यादा जाता है तो उसकी पहचान उसके कार्यो से है। कार्य भले ही उसने कुछ यश कमाने वाले ना किये हो, पर उसके कार्यो ने उसे पहचान जरूर दिलवाई हैं।

बैठक ख़त्म हो चुकी है। मदिरापान के पश्चात सारे शुभ चिंतको ने घर की और चलना सही समझा। आखिर उनका उनसे मतलब ख़त्म तो काम ख़त्म, भले ही आज के लिए। मानवो की रीती भी यही कहती है – यूज़ एंड थ्रौ।

रात का वक़्त है। दूर कही पर डीजे बज रहा है, जिसकी मंद मंद आवाज आती है। बिच में रेल का भोंपू भी बज उठता है। परंतु हरचंद इन सब को नोटिस करने से ज्यादा किसी और बात को सोचने में मशगूल है।

कल वोट डलनी है। रह रहकर उसके दिमाग में हार-जीत का सट्टा चलता रहता है। यु लगता है उसका मन दो गुटो में बँट गया है। एक उसके जीतने के पक्ष में तो दूसरा उसके हारने मे। दोनों गुट अपनी अपनी बात मनाने को अपने अपने मत कहते है। एक शराबियो की प्यास बुझाने के कार्य से अपनी जीत का दावा करता है तो दूसरा का कहना है की वो एक बार तो हारा ही है दूसरी बार भी हारेगा। इन दो के बीच हरचंद एक बिचोलिये की तरह पीस रहा है।

अगला दिन आता है। आज का दिन सब के लिए रोज के जैसा ही है, पर हरचंद के लिए कुछ ख़ास है। उसे लगता है की आज का दिन उसकी उसकी 2 महीने की मेहनत परखने का दिन है। अपने चिंतको के साथ सुबह से ही सरकारी इस्कूल के सामने आ डटा है, भले ही वोटिंग दो घंटे बाद शुरू होगी। यु तो उसने सुबह जल्दी उठने की बात बचपन में सुनी थी, पर अब जब अधेड़ हो चुका है, अब इस बात को अमल में लाया हैं। खैर देर आये दुरुस्त आये।

वोट डालने के लिए जनता उमड़ने लगती है। वोट के लिए पहले अपनी पर्ची लेनी जरुरी है, इसलिए पर्ची वालो के आस पास काफी भीड़ है।

मनीपुर गाँव के ठाकुरानो की संख्या भीड़ में कम है। शायद भीड़ में होना उनकी शान के खिलाफ है। वो तो उन्हें ये फॉरमैलिटी पूरी करनी है, क्योंकि गाव में पाँच महीने बाद सरपंची पद के उम्मीदवार ठाकुरो को भी तो वोट चाहिए। जरुरत पड़ने पर श्रीकृष्ण ने भी छल का सहारा लिया है, और ये तो मानव मात्र है।

हरचंद पर्चियाँ काटने में व्यस्त है। भीड़ बहुत है, परंतु ये इस बात की गारंटी नहीं है की वोट भी उतनी ही डालेगी। आखिर जनता भी फॉर्मेलिटी ही करेगी, वोट डालने में तो जनता को जल्दी तो है ही।

वर्क इन प्रोग्रेस

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